फोटो : www.dnaindia.com से साभार.
नैनीताल जिले के लालकुँआ से लगे बिन्दुखत्ता के राजीवनगर में लगभग साढ़े सात साल पहले आठ साल की अबोध बिटिया की यौन हिंसा के बाद हत्या कर दी गयी थी. राजीवनगर निवासी नवीन राम ने 10 जुलाई 2012 को लालकुँआ थाने में अपनी नाबालिग पुत्री के गायब होने की रिपोर्ट दर्ज करवायी थी. अगले दिन 11 जुलाई की सवेरे बिटिया का शव रहस्यमय परिस्थिति में पड़ोस में रहने वाले दीपक आर्या की मदद से पास के खेत से बरामद हुआ था. इसके बाद पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ अपहरण व दुराचार का मामला दर्ज किया. पुलिस हत्यारे का कोई पता नहीं लगा पायी. हत्याकाण्ड के खुलासे की मांग को लेकर गॉव के लोगों ने कई दिन तक जबरदस्त आंदोलन किया. जनदबाव के बाद पुलिस ने क्षेत्र के 1,100 लोगों से गहन पूछताछ की , लेकिन दुराचारी व हत्यारे का कोई पता नहीं लगा. इसके बाद विवेचना अधिकारी ने घटना स्थल पर मिले साक्ष्यों और 52 संदिग्ध लोगों के डीएनए सैंपल को परीक्षण के लिये सीबीआई की दिल्ली स्थित फोरेंसिक प्रयोगशाला भेजा. Lalkuan Rape Case in 2012
वहां से मिली रिपोर्ट के अनुसार डीएनए सैंपल मेल खाने के आधार पर पुलिस ने 7 फरवरी 2013 को मृतक बिटिया के रिश्ते के फूफा दीपक आर्या को गिरफ्तार किया. डीएनए मेल खाने के आधार पर पुलिस ने दीपक के खिलाफ निचली अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया. पकड़े जाने से पहले जॉच के दौरान दीपक ने कई बार पुलिस को सहयोग देने के नाम पर गुमराह करने की कोशिश भी की. वह 2006 में हुई शादी के बाद से अपनी ससुराल में ही रह रहा था. उसका ससुराल भी बिन्दुखत्ता के तिवारीनगर में था. पुलिस जब संदिग्ध लोगों से उनके डीएनए जॉच के लिये खून के नमूने ले रही थी तो दीपक ने अपने पिता का नाम व अपनी उम्र गलत बतायी. उसने पिता का नाम धनराम व अपनी उम्र 30 वर्ष बतायी जबकि उसके पिता का नाम प्रताप राम व दीपक की उम्र 26 वर्ष थी. दूसरी बार पुलिस ने फिर से खून का नमूना देने के लिये उसे बुलाया तो वह थाने न जाकर अचानक घर से गायब हो गया. बाद में पुलिस की सख्ती के बाद ही उसने सही तरीके से अपने खून का नमूना डीएनए जॉच के लिये दिया था उसकी इस हरकत ने पुलिस का उसके ऊपर शक और पुख्ता कर दिया.
उत्तराखण्ड में पहली बार तब किसी अपराधी को पकड़ने के लिये नैनीताल के तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डॉ. सदानन्द दाते ने डीएनए जांच का सहारा लिया था और विधि विज्ञान प्रयोगशाला की जांच रिपोर्ट के आधार पर दीपक तक पहुँची थी. इस तरह अपराधी को पकड़ने पर तब पुलिस की बहुत वाहवाही भी हुई थी. डीएनए रिपोर्ट, पुलिस की जॉच और 21 गवाहों के बयानों के आधार पर जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने 28 फरवरी 2014 को दीपक को दुराचार व हत्या का दोषी मानते हुये फॉसी की सजा सुनायी. सजा के खिलाफ दीपक ने उच्च न्यायालय की शरण ली. जहां लगभग डेढ़ साल की सुनवायी के बाद 8 अक्टूबर 2015 को उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय खण्ड पीठ ने अपना फैसला सुनाया. न्यायाधीश आलोक सिंह व सर्वेश कुमार की पीठ ने घटना से सम्बंधित साक्ष्यों को पर्याप्त नहीं माना और अभियुक्त दीपक आर्या को दोषमुक्त मानते हुये रिहा करने के आदेश दिये.
उच्च न्यायलय के इस फैसले से पीड़ित परिवार के सदस्यों के साथ ही आम लोग जहॉ सकते की स्थिति में थे, वहीं हमारे देश की न्याय प्रणाली पर भी सवाल उठने लगे. यह बात सही हो सकती है कि दीपक असली अभियुक्त न हो. पर यह सवाल तो अपनी जगह है कि फिर मासूम संजना का हत्यारा और दुराचारी कौन है? न्यायालय ने अपनी ओर से साक्ष्यों के अभाव (?) में दीपक को तो न्याय दिया, लेकिन जिसके साथ अन्याय हुआ उसे व उसके परिवार को न्याय कौन देगा? क्या हमारे न्यायालयों की जिम्मेदारी अभियुक्तों को ही न्याय देने की है? या पीड़ित को न्याय देने की भी है?
जिन सबूतों और साक्ष्यों के आधार पर हमारी न्याय प्रणाली के ही एक अंग जिला व सत्र न्यायालय ने मौत की सजा सुनायी, उन्हीं सबूतों व साक्ष्यों को उच्च न्यायालय ने पर्याप्त नहीं माना. तो फिर हमारी न्याय प्रणाली इतनी लचर क्यों है कि उसके दो स्तर के अंगों के न्याय में धरती आसमान का अंतर है? यह बात तो समझ में आती है कि निचली अदालत कुछ ज्यादा सख्त फैसला कर कर दे, लेकिन इतना अंतर क्यों है कि जिस अपराधी के अपराध को वह साक्ष्यों के आधार पर फॉसी के लायक समझती है, उच्च न्यायालय उन्हीं साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को अपराधी भी मानने को तैयार नहीं. ऐसे में इस सवाल का जवाब कौन देगा कि आखिर सही फैसला किसका है? और यह भी हमारी न्याय प्रणाली पर सवाल उठाता है कि यदि दीपक उच्च न्यायालय नहीं जाता तो निचली अदालत के फैसले से तो उसे फॉसी हो जाती और एक बेकसूर न्याय के नाम पर फॉसी के फन्दे पर लटका दिया जाता.
उच्च न्यायालय के फैसले के बाद यह भी सवाल किया उठा कि क्या न्यायालय को सरकार और पुलिस को यह आदेश नहीं देना चाहिये था कि वह असली (?) अपराधी को गिरफ्तार करे. अगर पुलिस जॉच में सक्षम नहीं थी तो दूसरी ऐजेंसी से जॉच करवाने के आदेश नहीं देने चाहिये थे?
हमारी न्याय प्रणाली पीड़ित को न्याय देने के पक्ष में कब दिखायी देगी? हमारी न्याय व्यवस्था यह भी कहती है कि भले ही सौ अपराधी छूट जाये, लेकिन एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिये. पर हमारी न्याय प्रणाली यह कब कहेगी कि हर पीड़ित को हर हाल में न्याय मिलना ही चाहिये? खासकर दुराचार के बाद नृसंश हत्या जैसे मामलों में!
इस फैसले के बाद प्रदेश सरकार की आलोचना इस बात पर होती रही कि उसने सही ढंग से पैरवी क्यों नहीं की? आलोचना के बीच प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमन्त्री हरीश रावत ने कहा था कि अगर जरूरत पड़ी तो सरकार सर्वोच्च न्यायालय जायेगी. पीड़ित परिवार को हर सम्भव मदद दी जायेगी. तब मामले में सरकार की ढिलायी के खिलाफ भाकपा माले ने 10 अक्टूबर 2015 को लालकुँआ में जुलूस निकाला और पीड़ित परिवार को न्याय देने के लिये प्रदेश सरकार से सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की मांग की थी. उसके बाद प्रदेश सरकार ने 7 जनवरी 2016 को सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की थी. उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने मामले को सुनवाई के लिए स्वीकार भी कर लिया था. पर अभी (6 दिसम्बर 2019 तक) इसमें अंतिम सुनवाई नहीं हुई है. यह देखना अभी बाकि है कि लालकुँआ की बिटिया को न्याय मिलता है कि नहीं?
इस तरह के मामलों में न्यायालयों में इतनी देरी क्यों होती है? इस तरह की देरी के लिए कौन जिम्मेदार है? न्यायालय, सरकार या कोई और? क्या अब समय नहीं आ गया है कि विभिन्न तरह के अपराधों के लिए अलग-अलग न्यायालय हों और उनमें नियुक्त न्यायाधीश केवल वही मामले देखें और दूसरे नहीं. साथ ही यह भी कि हर तरह के मुकदमों की अंतिम सुनवाई के लिए एक निश्चित समय सीमा निर्धारित की जाय, ताकि मुकदमा तारीख दर तारीख के बीच झुलता हुआ वर्षों न खिंचता चला जाय. जब न्याय हो तो पीड़ित को न्याय होने का कोई अहसास ही न हो. उसको वह न्याय एक नासूर न लगे. हर तरह के पीड़ित को समय पर न्याय दिलाने के लिए सरकारों को न्यायाधीशों के सभी खाली पदों पर तत्काल नियुक्ति नहीं करनी चाहिए? ताकि लोगों का न्याय पर भरोसा बरकरार रहे और वह पुलिस के न्याय को ही सही ठहराने को अभिसप्त न हो !
क्या सरकारों व व्यवस्था की नाकामी में पुलिस जिसे पकड़ ले, वही अपराधी और जिसे सरेराह गोली मार दे, वही न्याय होगा? यह त्वरित न्याय के नाम पर कहां आकर खड़े हो गए हैं हम? अगर पुलिस का अपनी नाकामी को छुपाने के लिए न्याय का यह तरीका लोगों की पसन्द बनने लगा तो यह भविष्य के लिए बहुत ही चिंताजनक और भयावह होगा.
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काफल ट्री के नियमित सहयोगी जगमोहन रौतेला वरिष्ठ पत्रकार हैं और हल्द्वानी में रहते हैं. अपने धारदार लेखन और पैनी सामाजिक-राजनैतिक दृष्टि के लिए जाने जाते हैं.
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