प्रो. मृगेश पाण्डे

बसंत ऋतु आई गेछ फूल बुरूंशी जंगलो पारा

ठंड से ठिठुरते पहाड़ में लकदक पड़ी बरफ पिघलती है तो जबरदस्त कुड़कुड़ाट होता है. ह्युं पड़ते बखत तो चारों तरफ से घिर रहे बादल सब दिखने वाली चोटियों से लिपट जाते. एक गुम्म  सी चुप्प लग जाती. फिर रूई के रेशों सा ह्युं धीमे-धीमे तपकने  लगता. बस पड़ते है जाता बादल जितना समेट कर लाये धीमे से तेज और तेज पड़ता. Welcoming to Spring in Uttarakhand

रात होती तो तुषार पड़ता. पला पड़ गई ह्युं को खूब ठोस कर देता और जमा देता. बाहर छूट से तपकने के साथ है जमते भी जाता. लमलकडी जैसा लटक जाता. सुबह से शाम कई दिन तक सूरज भगवान काले सफ़ेद बदरा के पीछे छुपे रहते अब लोग थुरथुराने लगते. बदन भारी ऊनी कपड़ों से लदने  लगता. दारमा, व्यास, चौदास, नीति, माणा की भेड़ बकरियों से काते  ऊन  के बने कपडे, मफलर, टोपी ह्युं  की थुरथुरी को कम करते.

मोटे ऊन के कम्बल, चुटके पहले से ही धूप में डाल सुखा सुखु लिए जाते. तखत चारपाइयों की चूलों पे कभी गरमपानी डाला जाता तो फिर मिट्टीतेल ताकि छनचर  खटमल का उजाड़ हो. गद्दे रजाई को भी पहले से ही धूप में तपा लिया जाता जिससे रात भर उफन  ना चटकें. उपनियाझाड़ से झाड़ा जाता जिससे उफन या पिस्सू झटक जाएं. 

रवि की फसल बो लेने ‘मेफाड़ा’ त्यार हो चुकने के बाद चातुर मास से शुरू खेती के काम कम हो जाते. नये धान पहले देवता को चढ़ा पतड़े में पैट देख पंडित जू बताते कि अब खाये जा सकते हैं. ह्यून में खेती पाती का काम  कम  होता. हरे साग के बोने कि तैयारी  शुरू हो जाती. पालक के कांटे वाले बीज गुनगुने पानी में भिगा फिर खूब खाद वाली क्यारी में डाले  जाते. राख भी डाली जाती. फिर क्यारी दो चार दिन बोरी के टुकड़ों, टाट, हन्तरों घासफूस से ढक दी जाती. सुमे फूटते तो ये सब हटा देते, दूसरी क्यारी ढक देते. बीज अलग अलग क्यारियों में थोड़े -थोड़े टैम  बाद छिड़का जाता जिससे जाड़ों भर पालंग-हालंग, मेथी, लाई, रोज बनती रहे.

आग तापना  भी शुरू हो जाता. जाड़ों के लायक की जलावन लकड़ी पहले से ही जमा कर ली जाती. बांज-फल्यांट सबसे ज्यादा टिकती इसलिए बड़े बूढ़े देखते रहते कि ख़ाली मूली न जला दी जाएं. जाड़े कि रातों में ही जागर लगने होते वहां कितनी गाथा कितनी काथ इसी आग और आंग कि गर्मी के भरोसे हुऐ चाय.

देखते देखते पूस बीत जाता, पुस्युडिया मना लिया जाता. माघ लग जाता. जनवरी वाले नये साल के पर्व त्यौहार जाड़ों के आखिर में बसंत ऋतु से शुरू होने लगते जो शिशिर ऋतु के बाद मीनार्क या चैत्र संक्रांति से लग जाती. माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी बसंत पंचमी कहलाती. माघ के महिने खिचड़ी खायी जाती. खिचड़ी का दान भी किया जाता.

बसंत पंचमी से ही होली की शुरुवात  मानी जातीं. नीचे माल मैदान से ढोलक मड़ाने, पुरानी ढोलक बदलने, पुड़ा बदलने, मसाला लगाने नई ढोलक बेचने ढोली आने लगते.मजीरे खनकते. शौकीनों के पास सिंगल और जर्मन डबल रीड के हारमोनियम भी होते. बसंत पंचमी तक निर्वाण और फिर शिवरात्रि के बाद श्रृंगार की होली  का समा बंध  जाता. बसंत के आगमन के साथ जैजैवंती, खमाज, कहरुवा, पीलू, मालकोस, सहाना , और भैरवी के राग पूस के पहले इतवार से ही मन  को हुलसाने  लगते. झोड़ा चांचरी की शुरुवात का टेम आने लगता. बसंत अपने आने से पहले ही हरियाली सजाने लगता. Welcoming to Spring in Uttarakhand

बसंत पंचमी का दिन अपुच्छ मना जाता. किसी भी शुभ कम को करने के लिए पैट-अपैट की कोई झसक नहीं. बसंत के दिन यज्ञोपवीत भी होता और लगन भी निबट जाते. माँ  सरस्वती की पूजा की जाती. पीले रंग की अलग ही छटा होती. बसंत ऋतु के इस पहिले दिन विद्या और ज्ञान की देवी का आवाहन किया जाता.

सुबह सवेरे ही गंगा-जमुना च सरस्वती के जाप के साथ स्नान होता. साफ कपड़े पहने जाते. दिया जला माता के लिए घी की ज्योति जलाई जाती. सुलगते कोयलों में गुगुल डाली जाती, सेम्यो के खुने महकाये जाते. धूप अगरबत्ती सुलगती. चंथरेनी  में चन्दन घिसा जाता, पिठ्या अक्षत सिंहासन में नेहला धुला कर रखे देप्ताओं को लगाए जाते. उन्हें वस्त्र ढकाया जाता. पीला वस्त्र उढ़ाया जाता. जौ की कोमल नई बाली के तिनड़े चढ़ाये जाते. भगवान जी के लिए बासंती कपड़े भी बनते जो हल्दी से रंगे  होते. घर के नान्तिनों के लिए भी पीले कपड़े होते.

सूती कपड़े के रुमाल पीले लड्डू रंग से रंग हर किसी को मिलते. पूजा कर बड़े बूढ़े खुद के सर  भी जौ रख घर कुटुंब में हर किसी के सर पर रखते. नान्तिनो के कान के ऊपर लगा देते.घर की  कन्याएं भी जौ से और सब लोगों का सिर  पूजतीं. आशीर्वाद लेतीं. छोटी कन्याओं के नाक और कान छेदने  के लिए भी आयोजन होता. सोने के तार से नाक कान छेदे जाते या फिर सूई से जिसके मोटे धागे को कुछ दिन छेद पक्का हो जाने तक कान में नाक में रहने दिया जाता. सिलाप वाली जगहों में होने वाली खास वनस्पति के काsन,  झूस,  टुक, सिनक या सिणुक को जो काले रंग की होती है को भी छेदे गए कान या नाक में डाल डिया जाता है. छोटी चेलियां छिदाते समय जैसे ही दरद से टयाँ करने को मुख खोलेंगे तो तुरंत खाप में मिश्री या बताशा डाल दिया जाता.

बसंत पंचमी के दिन पुए बनते साथ में पूरी भी. आटे में दूध मिला बने चोखे पकवान पहले देवता को भोग लगाए जाते. इस दिन खेतोँ में नये फसल की तैयारी की शुरुवात करने के लिए बैलों के कंधे में जुवा रख थोड़ा बहुत चला भी दिया जाता है. कई जगहों में गाँव के लोहार घर घर जा ठाकुरों के घर हरे जौ के तिनड़े देते जिन्हें दरवाजों के ऊपर दोनों भागों में गोबर से चिपका दिया जाता. यह गढ़वाल में काफ़ी प्रचलित रहा. Welcoming to Spring in Uttarakhand

गढ़वाल में उत्तरकाशी, टिहरी और देवप्रयाग में बसंत के आगमन पर मेले लगते. भागीरथी व यमुना जी में स्नान पूजा होती तो रवाईं-जौनपुर और जौनसार में ‘महासू’ की पूजा प्रार्थना,  आरती विधि विधान से होती. हनोल महासू मंदिर  तथा भंकोली में सजधज कर स्त्रियां नवयुवतियां बालिकाएं नृत्य करतीं और महासू को धाल लगातीं:

महासू ल्यालू बाकुरी ले
टोंस ल्यालू लाकुड़ी झम

पहाड़ की लोक गाथाओं में भी बसंत खूब रमा है. बौफल गाथा में बारहों मास बसंत ऋतु व्याप्त होने, सदाबहार फूल खिले रहने, मन में लहर, हिया में हिलौर, जिया में पुलक, आठों रे पहर का गान है

हर जाग दीसा, फूल फूली ग्यान.
फल लागी ग्यान, बोट  झुकी ग्यान.
जङ्गला बानर , फल टोड़ी  खाला.
फूली ग्यान व्याला , फेरी ग्यान भौंरा.
काठंन भरींन, बमौरी किरपाला,
डानन कानन, छीड़ छल छूयाट,
पात -पात पंछी, चूचाण बैगया.
बारामासी बसंत, बरमसिया फूल.

वहीं हरु -सेम गाथा में विरह वेदना है. बसंत ऋतु की मनोहारी सुषमा में छिपला कोट की वन हरियाली में न्यौली कुरकुरा रही है. पर दुखी ह्रदय में न्यौली का गान सुन नायिका और उदास हो जाती है. वह जिसे समीप होना था इस ऋतु में वह तो प्रवास कर गया

छीपुला का गैल घाट, बांसण लागी न्यौली.
दुखी हिरदा को सबद, लागी जां-छे होली.

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जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

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