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समाप्त होता जा रहा है संक्रांत में पैड या पूरी देने का रिवाज

हमारे पहाड़ों में सभी लोग संक्रांत कोई त्यौहार में पूरे गांव बाखली में दो-दो पूरी और एक बड़ा (पैड) देने का रिवाज आज समाप्ति की ओर बढ़ता नजर आ रहा है. (Fading Customs in Uttarakhand)

अब न तो गांव में इतने लोग बचे हैं और न ही अब कोई किसी के घर जाना चाहता है. पहले हमारे बचपन में संक्रांत के दिन सबसे पहला काम बाखली में (पैड) पूरी  बांटने का होता था.

एक परात में सबके लिए दो-दो पूरी और एक मास का बड़ा रखकर अपने खाने से पहले सबको बांट के आना होता था. अपने घर में बनाई पूरियां सभी के घरों से आयी पूडियों से कई ज्यादा हो जाती थी फिर उनको संक्रांत के दूसरे दिन गर्म करके नमक लगाकर खाने का अलग ही आनंद था. (Fading Customs in Uttarakhand)

वह संक्रांत के दिन के पकवानों से भी अधिक स्वादिष्ट होती थी. पूरी बांटने का रिवाज एक आपसी भाईचारे को कायम रखता था. इससे यह पता चल जाता था कि फलां परिवार से हमारा अच्छा संबंध है. अगर कभी किसी से घास, पानी में लड़ाई हो भी गई तो वह संक्रांत के दिन की पूरी के साथ खत्म हो जाती थी.

अब तो न बाखली बची ओर न पैड बांटने वाले बच्चे, अब तो अपना बनाओ अपना खाओ. न पैड बांटने की देर होती है और न ही दूसरों के घर की पूरी का स्वाद आता है. (Fading Customs in Uttarakhand)

कविता जोशी रानीखेत में रहती हैं. रानीखेत की रहने वाली कविता पेशे से पत्रकार हैं.

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