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हुड़के की गमक और हुड़किया बौल

उत्तराखण्ड में लोकगीतों की लम्बी परम्परा रही है. यह हमारा दुर्भाग्य है कि इसे लिखित रूप में सहेज कर रखने का प्रयास बहुत देर से तो हुआ ही लेकिन धीमा भी बहुत हुआ. लोकगीत मौखिक ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी पहुँचते रहे. इसका सबसे बुरा प्रभाव यह हुआ कि हम लोकगीतों में अंतर नहीं कर पाये और सभी लोकगीतों को एक ही श्रेणी में रखा जाने लगा. अस्सी के दशक तक फिर भी लोगों को लोकगीतों में अंतर पता होता था लेकिन आज की पीढ़ी पहले तो अपना लोकगीत जान ले वही काफ़ी है.

जागर, भड़ौं, झोड़ा, गारुड़ी, ऐड़ी, हुड़किया बौल, ऋतुरैंण, भगनौल में अंतर बता पाने वाली एक पूरी पीढ़ी संभवतः आज से पांच एक बरस में खत्म हो जायेगी. हम मेलों में बड़े-बड़े लाऊड स्पीकरों में वही बेसूरे कथित हिट गाने बजाते रह जायेंगे.

ख़ैर. आज हम बात कर रहे हैं ‘हुड़किया बौल’ के इतिहास की. उत्तराखण्ड में वर्तमान में धान की रोपाई के दौरान आज भी कुछ स्थानों पर घुटनों तक खिंची मिरजई, चूड़ीदार पैजामा, सिर पर पगड़ी पहने हाथ में हुड़का लिये एक आदमी दिख जायेगा. जो हुड़के की गमक और अपने बोलों से लोगों के काम में फुर्ती लाने का प्रयास करता है.

भूमि के देवता भूमियां, पानी के देवता इंद्र और छाया के देवता मेघ की वंदना से यह हुड़किया अपना गायन शुरू करता है. उसके बाद हुड़किया अच्छी फसल के लिये गांव के देवी-देवताओं की विनती करता है. इसके बाद जिस आदमी के खेत में रोपाई लगाई जाती है उसका नाम लेकर बताता है कि आज फ़ला आदमी की जमीन में बौल होगा और मैं फलाने राजा या भड़ की गाथा गाऊंगा. उसके बाद रोपाई कर रहे लोगों से फुर्ती से हाथ चलाने के लिये कहता हुआ गाथा शुरू करता है.

‘भड़’ का अर्थ वीर से है. जैसे देवता बना दिये गये मृत मनुष्यों की गाथायें जागर कहलाती हैं वैसे ही कुमाऊं में ऐतिहासिक योद्धाओं के शौर्य वर्णन की गाथायें भड़ौ और कटकू कहलाती हैं. भारत में वीरगाथाओं का प्रचलन संभवतः मध्यकाल या पूर्व मध्यकाल से माना जा सकता है. जैसे राजस्थान में पंवाड़े होते हैं उसी तरह कुमाऊं में भड़ौ और कटकू हैं. (पारंपरिक लोक-संगीत की धरोहर ‘हरदा सूरदास’)

हिमालयी क्षेत्र में मध्यकालीन दरबारों के हुड़क्ये और भाट राजाओं की सेनाओं के साथ युद्ध में जाते और सेना में वीरता का भाव जगाने के लिये बड़े-बड़े युद्धाओं के गीत गाते थे. यह गीत ही भड़ौ कहलाते थे और इनको गाने वाला हुड़क्या, चम्प्या या रणचम्प्या कहलाता है.

कटकू का अर्थ सेना से है. नगाड़ों के साथ सेनाओं के लड़ने की विषयवस्तु पर बनीं गाथायें ‘कटकू’ कही जाती है. कटकू को ही कडौक या कड़कू कहते हैं.

मध्यकाल तक हुड़क्या का जिक्र किसी जाति के लिये किये जाने के साक्ष्य नहीं मिलते हैं. इस काल तक उनकी आर्थिक स्थिति और समाज में स्थान दोनों ही अच्छे कहे जा सकते हैं जो पूरी तरह से राजाओं पर निर्भर थे. मध्यकाल के अंत तक कुमाऊं में उपरी तौर पर तो राजनैतिक स्थिरता आती है लेकिन नीचे स्थित छोटे-छोटे राजाओं में दरिद्रता की शुरुआत होती है. राजाओं में शुरू हुई इस दरिद्रता का प्रभाव हुड़क्याओं पर भी पड़ता है.

अब तक युद्ध में सेना के साथ भेजे जाने वाले हुड़क्याओं को राजा ने अब कृषि बेगारों के बीच भेजना शुरू कर दिया. राजाओं के खेतों में बेगार देने आई प्रजा के मनोरंजन और उनसे तेजी से काम कराने के लिये हुड़क्या का प्रयोग किया जाने लगा. गाथाओं को जब बिना सजाये संवारे कही गद्य में कहीं पद्य में जल्दी-जल्दी कहानी ख़त्म करने की भावना से जब हुड़क्या गाता तो इसे ‘बौल तारना’ कहते. यहीं से गायन की चम्पू-प्रवृत्ति ‘हुड़किया बौल’ की शुरुआत हुई. इस तरह राज दरबारों से हुड़क्या आम जनता के बीच आया. यहीं से हुड़क्या एक जाति के रूप में भी समाज में प्रवेश पाता है. (जागर-गाथा और पाँडवों का जन्म)

आधुनिक काल में हुड़क्या गायकों की स्थिति और ख़राब होती गई और उन्हें अछूतों में शामिल कर दिया गया. गांव के बाहर उनके रहने का स्थान बनाया गया. यह स्थिति इतनी ख़राब हो गयी कि एक समय उन्हें अपनी पत्नी और किशोर युवतियों तक को हुड़क्या बौल के गायन के दौरान नचाना पड़ा. हुड़क्या बौल का गायन करने वाला दम्पति हुड़क्या- हुड़क्यानि कहा जाने लगा. यह परम्परा उत्तराखण्ड के गांवों में नब्बे के दशक तक एक बेहद आम दृश्य में एक थी. वर्तमान में हुड़क्या बौल के दौरान हुड़क्यानि के नाचने के परम्परा स्वतः बंद हो गयी है.

फोटो : अमित साह

भारत की आजादी के बाद पहाड़ी क्षेत्रों में पुरुष नौकरी के लिये मैदानी भागों में जाने लगे. ऐसे में खेती का पूरा भार महिलाओं पर आ गया. पहाड़ में महिलाओं ने जब खेती का भार संभाला तो ‘हुड़किया बौल’ में भी परिवर्तन आ गया. अब ‘हुड़किया बौल’ में भड़ौ और कटकू से हटकर न्यौली, चांचरी जैसे गीतों ने प्रवेश लिया. वर्तमान में भी रोपाई के दौरान भड़ौ और कटकू से अधिक विरह गीतों को  गाया जाता है.

आज भले ही हुड़क्या बौल का जिक्र केवल धान की रोपाई के दौरान आता है लेकिन कुछ दशक पहले तक ‘हुड़क्या बौल’ खेतों में गुड़ाई के दौरान भी गाये जाते थे जिसे ‘गुड़ौल’ कहते थे. ‘गुड़ौल’ के समय ही अधिकतर भड़ौ और कटकू गाये जाते थे. मडुए के खेतों में गुड़ाई के समय सबसे अधिक रूप से ‘हुड़क्या बौल’ गाये जाते थे. पहले मडुए की खेती पहाड़ों में बहुत ज्यादा की जाती थी इसके कारण कामगारों की हौसलाअफजाई के लिये हाथ में हुड़का लिये हुड़क्या ‘हुड़क्या बौल’ का गायन करता था.

‘हुड़क्या बौल’ में जिन भड़ौ और कटकू को गाया जाता था उसमें लोक जीवन के अलावा अपने क्षेत्र का भी सुंदर वर्णन रहता का सुंदर चित्रण रहता था. नरसिंह धौंनी भड़ौ का यह हिस्सा पढ़िए

ढोल को ढुसको, निशान का ह्वाला, दमाऊ को गिदिरको लाई,
कुमूँ बठे बरयात लागि बाटा.
कालि कुमूँ बाज्या दमाऊ रे लोघाट पडिगे हाई.
लोघाट बाज्या दमाऊ, रामेश्वर पडि गै हाई.
रामेश्वर बठे सोर पूज्या, धोंनिज्यू को वासो पड्यो चौपख्या.
झूलाघाट पुज्या, तार में रोक्यो फल्यौ. फुरर्चुणि पडि गै हाई.

(अभिनय, स्वांग और रोमांच का उत्सव ‘हिल-जात्रा’)

( नरसिंह धोंनी डोटी के बालारानी हियाँ से विवाह के लिये जा रहा है और उस समय उसके रास्ते में पडने वाली जगहों का वर्णन किया गया है. )

नरसिंह धोंनी भड़ौ में ही हियाँ रानी के रूप का वर्णन पढिये –

कुस्यारु क ड्वक जसि, सुरज कि जोति.
छोलियाँ हल्द जसि, पालङा कि काति
सितो भरि भात खायोत उखालि मरन्यां
चूल भरि पॉणि खायोत नङछोलि मरन्या

जेठ के आडू से लदे डोके जैसी, सूर्य की ज्योति जैसी, कच्ची हल्दी जैसी, पालक की कली जैसी, हियाँ रानी इतनी नाजुक है कि सीते भर भात (चावल का एक पका हुआ दाना) भी खा ले तो उल्टी कर देती है अंजुली भर पानी पी ले तो उसे जुकाम हो जाता है.

– गिरीश लोहनी

संदर्भ ग्रन्थ : डॉ प्रयाग जोशी की पुस्तक कुमाऊंनी लोकगाथाएं, केन्द्रीय सांस्कृति मंत्रालय की वेबसाइट, शिवप्रसाद डबराल की उत्तराखंड के इतिहास पर विभिन्न पुस्तकें.

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Girish Lohani

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