फोटो yourstory.com से साभार
तीन बेटों और दो बेटियों के बाद 9 जनवरी 1927 को टिहरी रियासत के वन अधिकारी अम्बादत्त बहुगुणा के घर एक बेटे का जन्म हुआ. अम्बादत्त बहुगुणा और पूर्णादेवी गंगा के भक्त थे सो उन्होंने अपने सबसे छोटे बेटे का नाम रखा गंगा राम. इससे पहले दोनों ने अपनी एक बेटी का नाम भी गंगा देवी रखा था. एकबार पूर्णादेवी के भाई उनके घर आये और प्यार से अपनी भांजी गंगा को बुलाया तो घर से भांजा-भांजी दोनों बाहर निकल आये. यह तो रोज की बात हो गयी कि बेटे गंगा को बुलाओ तो बेटी गंगा आ जाये और बेटी गंगा को बुलाया जाय तो बेटा गंगा आ जाये. समस्या से निपटने के लिये मामा ने परिवार में सबसे छोटे बच्चे को नाम दिया ‘सुन्दरलाल’. यही सुन्दरलाल आज विश्वभर में ‘वृक्ष मानव’ के नाम से विख्यात हैं. आज सुंदरलाल बहुगुणा उम्र के 93वें वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं. (दिलचस्प और प्रेरक रहा है चिपको आन्दोलन का इतिहास)
लाहौर में कालेज के दौरान सुन्दरलाल बहुगुणा. फोटो: हिमालय में महात्मा गांधी के सिपाही सुन्दरलाल बहुगुणा पुस्तक से साभार.
बचपन से ही सुन्दरलाल बहुगुणा को पढ़ने लिखने का खूब शौक था. बचपन में मां द्वारा दूध-जलेबी के लिये दिये पैसे भी सुन्दरलाल बहुगुणा अपनी पुस्तक खरीदने में खर्च करते थे. पंद्रह वर्ष की उम्र में ही उनकी माता पूर्णादेवी गंगा की धारा में बह गयी थी. जब टिहरी रियासत में श्रीदेव सुमन को गिरफ्तार किया गया तब टिहरी जेल से श्रीदेव सुमन का एक वक्तव्य राष्ट्रीय दैनिक हिन्दुस्तान और वीर अर्जुन में छिपा. टिहरी की जेल से दिल्ली तक यह वक्तव्य पहुचाने में मुख्य भूमिका सुन्दरलाल बहुगुणा की भी थी. उन्हें इसके लिये जेल भी हुई. प्रधानाध्यापक के कहने पर पुलिस की निगरानी में ही उन्होंने उस वर्ष परीक्षा दी जिसके बाद उन्हें नरेन्द्रनगर जेल भेज दिया गया जहाँ उन्हें कठोर यातनाएं दी गयी. यहाँ से गुप-चुप तरीके से वह लाहौर भाग गये.
लाहौर में सुन्दरलाल बहुगुणा ने सनातन धर्म कॉलेज से बी.ए. की पढ़ाई की.लाहौर में टिहरी गढ़वाल के रहने वाले लोगों ने ‘प्रजामंडल’ की एक शाखा बनाई थी जिसमें सुन्दरलाल बहुगुणा ने सक्रिय रूप से भागीदारी की. इस बीच टिहरी से भागे सुन्दरलाल बहुगुणा के लाहौर होने की खबर पुलिस तक पहुँच गयी और लाहौर में खोज शुरू हुई. इससे बचने के लिये सुंदरलाल बहुगुणा ने अपना पूरा हुलिया बदल लिया और लाहौर से दो सौ किमी की दूरी पर स्थित एक गाँव लायपुर में सरदार मान सिंह के नाम से रहने लगे. यहां अपनी आजीविका के लिये सरदार घुला सिंह के तीन बेटे और दो बेटियों को पढ़ाने लगे. 1947 लाहौर में बी.ए की परीक्षा पासकर सुन्दरलाल बहुगुणा टिहरी वापस लौट आये.
पश्चिमी पंजाब के एक गाँव लायलपुर में सरदार मानसिंह के रूप में सुन्दरलाल बहुगुणा.
फोटो: हिमालय में महात्मा गांधी के सिपाही सुन्दरलाल बहुगुणा पुस्तक से साभार.
सुन्दरलाल बहुगुणा मीराबेन को अपना गुरु मानते हैं. 1949 में उन्होंने दलित वर्ग के विद्यार्थियों के उत्थान के लिए टिहरी में ‘ठक्कर बाप्पा होस्टल’ की स्थापना की. सुन्दरलाल बहुगुणा ने बहुत से वर्षों तक कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में कार्य भी किया. बाद में अपनी पत्नी श्रीमती विमला नौटियाल की सलाह पर उन्होंने राजनीतिक जीवन पूरी तरह छोड़ दिया और पूरी तरह से अपना जीवन समाज सेवा में समर्पित कर दिया. अपने शुरूआती वर्षों में उन्होंने दलितों को मंदिर प्रवेश का अधिकार दिलाने के लिए आन्दोलन छेड़ा, शराब की दुकानों को खोलने से रोकने के लिए सुन्दरलाल बहुगुणा ने सोलह दिन तक अनशन किया. (जल्दी ही बहुत कुछ किया जाना है हिमालय के लिए)
उनकी पत्नी सरला बहन की सबसे प्रिय शिष्या थी और वह स्वयं मीराबेन के शिष्य थे. दोनों ने मिलकर बालगंगा नदी के किनारे सिल्यारा गांव में अपने लिये झोपड़ी बनाई और वहीँ बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया. सुन्दरलाल बहुगुणा लड़कों को पढ़ाते और विमला नौटियाल लड़कियों को पढ़ाती. दोनों के प्रयास से यहीं ‘नवजीवन मंडल’ की नीव पड़ी. बाद में सरला बहन की सलाह पर ही यह नवजीवन मंडल ‘नवजीवन आश्रम’ में बदला. जो स्थानीय लोगों को आत्मनिर्भर बनाता.
सुंदरलाल बहुगुणा और उनकी पत्नी विमला नौटियाल
इसके बाद सुन्दरलाल बहुगुणा ने पर्यावरण को लेकर उत्तराखण्ड में चल रहे चिपको आन्दोलन को वैश्विक स्तर पर पहुंचाया. ‘चिपको आन्दोलन’ के कारण वे विश्वभर में ‘वृक्षमित्र’ के नाम से प्रसिद्ध हो गए. बहुगुणा के ‘चिपको आन्दोलन’ का घोषवाक्य है ‘क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार. मिट्टी, पानी और बयार, जिंदा रहने के आधार’.
पर्यावरण संरक्षण के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाले पद्मविभूषण सुन्दरलाल बहुगुणा का दशकों पहले दिया गया सूत्रवाक्य ‘धार एंच पाणी, ढाल पर डाला, बिजली बणावा खाला-खाला’ (ऊंचाई वाले इलाकों में पानी एकत्रित करो और ढालदार क्षेत्रों में पेड़ लगाओ) आज भी न सिर्फ पूरी तरह प्रासंगिक है, बल्कि आज इसे लागू करने की जरूरत और अधिक नजर आती है.
सुंदरलाल बहुगुणा ने 1981 से 1983 के बीच पर्यावरण को बचाने का संदेश लेकर, चंबा के लंगेरा गांव से हिमालयी क्षेत्र में करीब 5000 किलोमीटर की पदयात्रा की. यह यात्रा 1983 में विश्वस्तर पर सुर्खियों में रही.
बहुगुणा के कार्यों से प्रभावित होकर अमेरिका की फ्रेंड ऑफ नेचर नामक संस्था ने 1980 में इनको पुरस्कृत किया. इसके अलावा उन्हें कई सारे पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. पर्यावरण को स्थाई सम्पति मानने वाला यह महापुरुष ‘पर्यावरण गांधी’ बन गया. अंतरराष्ट्रीय मान्यता के रूप में 1981 में स्टाकहोम का वैकल्पिक नोबेल पुरस्कार मिला. (“इन पेड़ों को काटने से पहले तुम्हें अपनी कुल्हाड़ियाँ हमारी देहों पर चलानी होंगी!”)
सुन्दरलाल बहुगुणा को सन 1981 में पद्मश्री पुरस्कार दिया गया. सुन्दरलाल बहुगुणा ने यह कह कर इस पुरुस्कार को स्वीकार नहीं किया कि “जब तक पेड़ों की कटाई जारी है, मैं अपने को इस सम्मान के योग्य नहीं समझता हूँ.”
पर्यावरण को बचाने के लिए ही 1990 में सुंदर लाल बहुगुणा ने टिहरी बांध का विरोध किया था. उनका मानना था कि 100 मेगावाट से अधिक क्षमता का बांध नहीं बनना चाहिए. वे जगह-जगह जो जलधाराएं हैं, उन पर छोटी-छोटी बिजली परियोजनाएं बनाये जाने के पक्ष में थे.
पर्यावरण को स्थाई सम्पति माननेवाला यह महापुरुष आज ‘पर्यावरण गाँधी’ बन गया है.
– गिरीश चन्द्र लोहनी.
संदर्भ ग्रन्थ – खड्ग सिंह वल्दिया की पुस्तक हिमालय में महात्मा गांधी के सिपाही सुन्दरलाल बहुगुणा, केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय की वेबसाईट.
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