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फाग : मंगल संस्कारों में गाये जाने वाले गीत

‘फाग’ कुमाऊं में विभिन्न संस्कारों के अवसर पर गाये जाने वाले मंगलगीत हैं. इन्हें ‘शकुनगीत’ भी कहा जाता है. ओधान, पुत्र-जन्म, षष्ठी, नामकरण, व्रतबंध, विवाह आदि विभिन्न संस्कारों के अवसर पर फाग और शकुन गीत गाये जाते हैं.

धार्मिक उस्त्सवों में भी देवी-देवताओं की गाथाओं को फाग के रूप में गाया जाता है. अन्य प्रदेशों के सोहर, बन्ना-बनडी, सगुन आदि गीतों की तरह यहां फाग गीत प्रचलित हैं.

फाग केवल स्त्रियों द्वारा गाये जाते हैं. इसमें दो या दो से अधिक गायिकायें होती हैं. समय इर विषय की दृष्टि से फाग दो प्रकार के होते हैं, प्रासंगिक और अनिवार्य.

प्रासंगिक उत्सवों, मांगलिक कार्यों में गाये जाते हैं. अनिवार्य विविध संस्कारों के समय अनिवार्य रूप से गाये जाते हैं. इन गीतों में लोक-वेद की रीति का अभूतपूर्व समन्वय परिलक्षित होता है.

फाग की शुरुआत आकाश-पाताल, पृथ्वी आदि के देवी-देवताओं की वंदना से होता है. इसमें गणेशपूजन, मातापूजन, कलश स्थापना आदि गीतों के साथ परिवार व उसके सदस्यों एवं संबंधियों के प्रति मंगल कामना निहित रहती है.

कामनापरक गीतों में ‘औछ्न’ गीत गाये जाते हैं, जिनमें गर्भिणी की स्थिति का मनोवैज्ञानिक चित्रण मिलता है. नामकरण और व्रतबंध संबंधी गीतों में बालक के गर्भवास से लेकर विद्याध्ययन, यज्ञोपवीत, न्यूतण आदि गीत गाये जाते हैं.

विवाह में कन्या और वर पक्ष के पृथक-पृथक फाग गाये जाते हैं. वर पक्ष के गीतों में श्रृंगार, बारात प्रस्थान, मां का पुत्र से दूध का मोल मांगना, रत्याली, घरपैंसा, बिरादरों व बारातियों की विदाई आदि के गीत मुख्य हैं.

कन्या पक्ष के गीतों में बारात आगमन, धूल्यर्घ, श्रृंगार, कन्यादान, सप्तपदी, बारात विदाई आदि मुख्य हैं. कन्या की विदाई के अवसर के गीत बहुत करुणात्मक होते हैं –

छोडू यो-छोडू यो बाली त्वीले, धुत्माटी को खेल,

छोड्या बाली, माणूनी का खाजा.

किलै छोड़ी बाली त्वीले, मायूड़ी की कोख,

किलै छोड्यो, बाबा ज्यू को घौर.

कुमाऊनी फाग गीतों में प्रायः वाक्यांश और पदों की पुनरावृत्ति होती है. इनमें अनुकान्तता पाई जाती है. फाग एक छंदरूप भी है. यह कुमाऊनी का अर्द्धसम मुद्रक वर्णिक अतुकांत छंद हैं. इसमें पहले और तीसरे चरण में 14 वर्ण और दूसरे और चौथे चरण में 10 वर्ण आते हैं. इसमें आवृतियों से त्रिपाद और अन्य लयात्मक रूप निर्मित होते हैं.

पहाड़ पत्रिका के 16-17 अंक में देबसिंह पोखरिया द्वारा लिखे गये लेख लोक साहित्य के आयाम से साभार.

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Girish Lohani

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