प्रो. मृगेश पाण्डे

स्ट्रीट फोटोग्राफी का डिप्रेशन

हाथ पर हाथ पसारे
अब कभाड़ बाज़ार भी सिमटा
हफ्ते में दो दिन का काम बचा
अलसा लो भाई ,सुस्ती है ,मंदी जो छाई
पांच लगे थे ढाबे पर अब बचे हम दो
ठप सर्विसिंग चलो जियो में जवानी चकमक देखें
अब इतने पे ही होगी गुज़र
गांव घर क्या भेजें चलो खुद ही लद जावें
यहाँ पीछे सब फ्लैट खाली झुग्गी की जूठन ही समेटें
पॉलिथीन भी बंद अब क्या बटोरें ?
हैं हाथ पे हाथ !
जय जगन्नाथ
बोहनी न हुई अब कैसे हो बात
एक एक कर सब दुकान बंद सर पे उधार है बाकी
सबकी जेब में छेद पड़े हैं अब मैं क्या किस से मांगू ?
गणपति बाप्पा मोरिया !
सूनी सड़क
रौशनी में नहाई
चलो अब सुस्ती का मंदी का
चलती फिरती भीड़ क्यों गुम?
सूनेपन में बर्थडे मनाएं
आओ चलो मैं छोड़ दूँ घर तक जो भी दो चलेगा !

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

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Girish Lohani

View Comments

  • Prof. Mrigesh Pandey ji , ऐसी मंदी भी नहीं छाई हुई है, बुद्धि जीवियों से तो अपेक्षा की जाती है कि वे किसी भी संदर्भ की उचित व्याख्या करें ।

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