प्राकृतिक वनस्पतियों से समृद्ध हैं उत्तराखंड के पहाड़. भूगर्भ व जलवायु की भिन्नता से अनेक वनस्पति प्रजातियों की सघनता के साथ गुणवत्ता में अनमोल .पहाड़ों में पशुओं के चारे की आपूर्ति इन्हीं इलाकों के अवलम्बन क्षेत्र अर्थात आबादी के समीप के खेतों की भूमि, वन, झाड़ों, विविध प्रकार के पेड़ की पत्तियों, शाकों व वनस्पति के साथ सुदूर सीमांत में फैले बुग्यालों से होती रही है. इनके साथ ‘वेस्ट लैंड’ या बेकार भूमि, बंजर भूमि व जंगलों के धरातल पर भी ऐसी वनस्पति मिलती है जो चारे के रूप में प्रयोग की जाती है.
(Uttarakhand Fodder Policy)

पहाड़ में पशुपालन की परंपरा प्राकृतिक रूप से मिले चारे पर निर्भर रही है. यहां प्राप्त अनगिनत चारे की प्रजातियां इसलिए भी महत्त्व की हैं क्योंकि यह पशुओं की उदर पूर्ति के साथ उनकी दुग्ध देय क्षमता व गुणवत्ता को उच्च स्तर का बनाए रखतीं हैं. साथ ही साथ इन प्रजातियों की जड़ें पहाड़ की मिट्टी को बांधे रख भूमि का कटाव रोकने में समर्थ होतीं हैं तो कई सुगन्धित व भेषज गुणों से भरपूर हैं.

ऐसे कई कारण हैं जिनमें भूमि धारक क्षमता की कमी ने पहाड़ के चारा स्त्रोतों व बुग्यालों की गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव डाला है.अब जलवायु में हो रहे परिवर्तन व पहाड़ी इलाकों में बेमौसम पड़ रही गर्मी से बुग्यालों में पशु असमय ले जाये जा रहे हैं.स्वादिष्ट व भेषजों के अविकसित पौधे भी इनके द्वारा चर लिए जाते हैं, जिससे कई प्रजातियों के बीज व कंद बन ही नहीं पाते. ऐसे में वह वनस्पतियां जो पशुओं को अरुचिकर लगती है, लगातार फैलती जाती है. दूर- दूर तक फैली पारथेनियम इसका एक उदाहरण है जो इगजोटिक प्लांट है और जिसने अनगिनत वनस्पतियों के प्रसार इलाके को घेर दिया है. सीमित इलाके में पशुओं का लगातार चरना भी समस्या है तो आवारा पशुओं की बढ़ती संख्या भी परेशानी का कारण बनती जा रही है.

प्राकृतिक प्रकोपों के साथ अंतर संरचना के निर्माण ने विगत वर्षों में भूमि के अपरदन और क्षरण को चिंताजनक स्थितियों में ला दिया है जिससे चारा प्रदान करने वाले इलाके बुरी तरह प्रभावित हुए हैं.

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों का करीब दो तिहाई हिस्सा प्राकृतिक चरागाहों, अल्पाइन चारागाहों, वन व गोचर के साथ खेती योग्य, बंजर और ‘बाजगड़’ यानी खेती के लिए अनुपयुक्त या परती भूमि के अधीन आता है.पशुओं को मिलने वाली इस सम्पदा के बावजूद न तो पशुओं की क्षमता के अनुरूप उत्पादन प्राप्त हुआ है व साथ ही अनुत्पादक पशुओं की वृद्धि से भूमि पर दबाव भी बढ़ा है. चारागाहों की पैदावार बढ़ाने की सार्थक योजनाएं व कार्यनीति भी हाशिये पर रहीं हैं.

अब उत्तराखंड में पशु चारा नीति लागू किये जाने की सरकारी घोषणा हुई है. इस दिशा में प्रस्ताव बनाया जा चुका है. किसानों से बातचीत कर चारा नीति का प्रस्ताव अगली कैबिनेट में लाया जायेगा.यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि पहाड़ का अन्न, साग-सब्जी, मसाले जैसी किसम -कसम की जिंस बहुत हद तक रासायनिक उर्वरकों से मुक्त हैं. जानवरों के गोबर व पेड़ों की पत्तियों से बनी खाद यानी ‘मोव ‘माने ‘पर्स’ जब ‘उपरांऊँ तक चढ़ गए सीढ़ी दार खेतों व ‘बगड़’के साथ बहुत कुछ समतल सी घाटी वाली ‘तलाऊं की जमीन और तप्पड़ पर मिस्या जाती हैं तो उससे पैदा उपज का आस्वाद हर प्रवासी को पहाड़ की नराई लगाता है. पहाड़ की यही रीत है कि मैदान तक जा पहुंचे पहाड़ी झोले में ऑर्गेनिक माल तो होगा ही. इन्हीं पहाड़ वासियों की दिनचर्या उनके जानवरों के साथ शुरू होती है सबसे पहले उनका पेट भर के उन्हें जुगाली करते देखते.

पहाड़ में पशुओं को इलाके में आसानी से उपलब्ध घासों, चारे के पेड़ों, झाड़ियों, शाखों, खरपतवारों, गेहूं, धान, मडुआ, मादिरा,बाजिरा , भट्ट, मसूर, मटर, जौ इत्यादि के भूसे व इसके मिश्रण को लाही, सरसों व तिल की खली में मिला व भट्ट, सोयाबीन चने व गेहूं जैसे अनाजों के चोकर के साथ मिला पशुओं को खिलाया जाता है. इनका मिश्रण दर्दरा कर पीस कर दाला बनाते हैं जो खली व नमक के साथ पशुओं के पोषण में फायदेमंद होता है. गेहूं, जौ, भट्ट, सोयाबीन, मटर, चने के दाने हाथ चक्की में दरदरा पीस रख लेते हैं जिसे पानी में घोल गरमागरम पशुओं को दिया जाता है. जाड़े के मौसम में गुड़, खल व तिल की खली दी जाती है.घर का बचा खुचा खाना यानि ‘दौ’ डालना ही हुआ ‘डाट’ में. पानी भी भर कर रखना हुआ ढोर के मुख पर तब जा कर धौ होगी. बड़ी सेवा टहल मांगते हैं पशु. इन सारी क्रियाओं से जुड़े गाय बल्द, उनके बछड़े, भैंस और बकरी-भेड़ का पालन ही उस परंपरा का परिचायक बनता है जिससे सेहत भी चुस्त दुरुस्त रहती है और कहीं न कहीं यह क्रिया परिवार की आर्थिक हालत को भी बेहतर बनाए रखती है. फिर गोमाता तो पूजनीय भी हुई.

पहाड़ी रीति रिवाजों में इनके अलग कौतुक हुए, इनसे जुड़े त्यार हुए. पहाड़ में चुस्त-दुरुस्त बुड्ढे -बाड़ियों को देख उनकी सारपतार और सीप देख कहा जाता है कि खूब घी पचाया है बुबू ने, दूध मट्ठे का असर है आंग में. गोठ में बंधे दुधारू जानवर ‘दूध -दन्याली’ से भरपूर घर की समृद्धि का सूचक भी बन जाते.बागुण फलने ही हुए.

जानवरों के आहार की व्यवस्था वह सबसे जरुरी क्रिया है जो जाड़ा- गर्मी -बरसात की परवाह नहीं करती. बस कुछ ऐसे जोड़ जुगाड़ कर लिए जाते हैं कि इनके आहार का पर्याप्त बफर स्टॉक उपलब्ध रहें ताकि न तो जानवर दुबला पड़े और न ही उससे मिल रहे प्रतिफल में कोई कमी आये.अपने खेत की उपज के कितने ही अवशिष्ट हों जानवर को घास तो पर्याप्त चाहिए. अब ये घास बारहमासा तो कटती नहीं.इसलिए सही मौसम में न जाने कितने डाने-काने चढ़-उतर, खतरनाक भ्योल पार कर, वन के नित नये फरमानों को सह,हाथ में दराती और रस्सी थामे सुबह सबेरे ही घास और चारे को काटने यात्रा शुरू कर देनी होती है. गाज्यो बनाने के लिए घास के गट्ठर काट और उसकी नमी मारने को सूखा कर लूटे डाल दिए जाते हैं. ये लूटे-लूटाणि ज्यादातर सीधे खड़े पेड़ों पर डाले जाते हैं जिससे चौमास के दिनों और फिर ह्यूँन में ये सड़ने से बचे रहें.इस सारे कौतुक में जानवरों के मुंह तक पहुंचे चारे में करीब एक तिहाई हरे चारे की आवक पेड़ों की पत्तियों, झाड़ियों और साल भर मिल जाने वाले शाकों से होती है.
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पहाड़ों में करीब सौ से अधिक सौ किस्म के शाक मिलते हैं जिनमे दो तिहाई किस्में पशु चारे के लिए बहुत अच्छी मानी जातीं हैं. इनमें शिशूण, कैरुआ, सिराला, सकीना, चमलाई व दूधिया मुख्य मानी जातीं हैं. चरागाहों में तीन हजार फुट के तलाऊं इलाकों में आवंला, मकुना, कबरू, शहतूत, सन्दन, सिरिस और बेल के पेड़ से मिलने वाली पत्तियाँ अच्छी गुणवत्ता की मानी जातीं हैं. वहीं हलदू, खैरवाल, शीशम, गूलर, हरसिंगार, हरड़, बहेड़ा, फल्दु, पपड़ी व घौरा जैसे पेड़ों की पत्तियाँ औसत गुणवत्ता की मानी जातीं हैं सिरान के पेड़ के पात अकेले नहीं खिलाये जाते जबकि यह साल में आठ-नौ महिने हरा रहता है. ऐसे ही अकोला के पेड़ में साल भर पत्तियाँ रहतीं हैं. भेड़ और बकरी के चारे के लिए रोहिणी, कटई, अरदू और सफेद कीकर की पत्तियां अच्छी मानी जातीं हैं जिन्हें वह चाव से खातीं हैं. फिर बेर सबेर डान कान घुमाने ही हुए. मुंगसार भी छोड़े जाएँ जब खेत में फसल न हो.

पहाड़ के बहुल तीन से छह हजार फिट के इलाके में च्यूरा, भीमल, क्वेराल, तिमिल, अकेसिया की पत्ती जानवरों के लिए बेहतर मानी जातीं हैं. काहू की पत्तियाँ खिलाने से पशुओं का दूध बढ़ता है वहीं रोबिनिया की पत्तियों में प्रोटीन ज्यादा होती है. फरबांज, गेठी, अकेशिया, कटोंज, खडिक , तिमीला, वितेंण की पत्तियाँ औसत गुणवत्ता की मानी जाती है. पदम या पंय्या की पत्ती के चारे की गुणवत्ता अच्छी नहीं मानी जाती.बकरी व भेड़ बेंस व मेहल की पत्तियाँ शौक से खाती जाती हैं.

सबसे बेहतर चारे के पेड़ पहाड़ों में छह हजार से ग्यारह हजार फीट की ऊंचाई पर उगते हैं जिनमें खडिक, खरसू, अंगू, कीमू, स्यान के साथ बांज मुख्य है. बांज का पेड़ सदाबहार होता है जिसमें हमेशा पत्तियाँ रहतीं हैं. बकरी को चमखडिक, कबसी तथा भेड़ों को सौंड ज्यादा खिलाते हैं. कंदेल की पत्तियाँ बकरी व भेड़ दोनों पसंद करतीं हैं. यह देखा गया है कि पत्तियों से मिलने वाले चारे का करीब दसवां भाग झाड़ियों और शाक से प्राप्त होता है. झाड़ियों में घिँघारू, हिसालू, मालू, किल्मोड़ा, रिंगाल, टिटाना, कुंजा, घूरकुंजा, घेनू, जानिला, तुशियारी इत्यादि वह खास हैं जिनसे चारा मिलता है, एक झाड़ी से औसत दस से पंद्रह किलो तक हरा चारा मिल जाता है.

हर ऋतु के हिसाब से पहाड़ में चारे को एकबट्याने या इकठ्ठा करने के अलग-अलग तरीके हैं. ऐसे सीप हैं जो बरसों से चले आ रहे काम से कुछ ऐसी विधियों के रूप में बदल गये जिन्हें समझ लेने से चारा भण्डारण दक्षता व समझदारी से भरा हो जाता है. पथ सीधे सरल नहीं काणे-माणों से भरा है उस पर कई सैणियां तो चप्पल जूतियों की आदत ही नहीं पाड़तीं बस नंगे पाँव चढ़े जाना है. पहाड़ियां हैं, रूखी काली पड़ी चट्टानों से गुजरता रस्ता है. भालू- बाघ है, सुंवर है तो जमीन पर लहराता करेत है ,घोड़ा पछाड़ है. और तो और कई बार घास के साथ कट गया हरा साँप है जिसके बारे में यह कहा जाता है कि ये तो अंधा-काणा होता है. फिर किसम-किसम के धूरे जहां लता-बेल, झाड़-झंकाड़ में छुपे अंगरियाल हैं चटका जाएं तो बऱमांड हिला दें, आंग सुजा दें.

बरखा के मौसम में खास कर बांज-फंल्याट, काफल, बुरांश से धीरे जंगलों में लगती है जोंक जो खून तो चूसती ही है साथ में उसके टपक जाने के बाद तेज खुजली भी कर देती है. जानवरों के भी खूब चिपटती है नाख में तक घुस जाती है.डांसी मच्छर अलग हुए ,किल कीने भी. सब सनेस्वर जानवरों में बिलबिलाट करने वाले ठेरे. ‘बिखुडन’ भी ‘बगुरण’ भी. ‘डासण’ से बचाना हुआ. अब जो भी हो जानवर घर में बरसों से हैं तो पाँव चलते ही उनकी सेवा टहल उनके खानपिन की दिनचर्या में घास इकट्ठा करना रोज का ही काम बन जाता है.

परंपरागत रूप से जो घास अमूमन जानवरों को खिलाई जातीं हैं उनमें चुमरिया, सिनकिया, बाकूनिया, मेसूड़िया, सीरु, व तितरिल्या खास होती हैं. मौसिया ऐसी घास है जिसको जानवर खूब पसंद करते हैं, यह उनके लिए ताकतवर और दूध बढ़ाने वाली होती है. वहीं खरीफ में खरपतवार के के रूप में उगने वाली घास हरी होने पर कड़वी होती है जिस कारण जानवर इसे पसंद नहीं करते इसलिए इसे काट कर सुखा लेते हैं और जाड़े के मौसम में खिलाते हैं.पहाड़ में ऋतुओं के हिसाब से घास उगतीं हैं जिनमें कुवैरू जाड़ों में खरपतवार के रूप में उगती है तो जैगड़ी ऐसी प्रजाति जिसमें पीले रंग का छोटा सा फूल उगता है.बारिश के मौसम में गुरुड़िया चरागाहों में पायी जाती है तो कुमरिया खेत के इनारे किनारे व बंजर जगहों में भी पायी जाती है.

नदी नालों और पहाड़ों में चौड़ी पत्ती वाली कफड़ घास साल भर ही मिल जाती है. साल भर नदी नालों के किनारे बेटुई के नाम वाला चारा भी बेल के रूप में मिलता है. फसलों में खरपतवार के रूप में सिरपतिया घास दिखाई देती है. बेलदार घास में साल भर हरी रहने वाली घास चीपड़ी के नाम से जानी जाती है. यह जंगलों में उतीस व बांज के पेड़ों से लिपटी रहती है.
(Uttarakhand Fodder Policy)

सरकार की सोच है कि अब वह हरे चारे के उत्पादन के लिए खेतिहरों को प्रोत्साहित करने के लिए उन्हें वित्त उपलब्ध कराएगी. हरे चारे के उत्पादन पर पहाड़ी जिलों में प्रति नाली भूमि पर एक हजार रूपये की प्रोत्साहन राशि हर साल दी जाएगी.वहीं साइलेज बनाने के लिए जो हरा चारा सहकारी संघ को उसमें पंजीकृत किसान उपलब्ध कराएँगे उनको हर एकड़ में चारे के उत्पादन पर दस हजार रूपये की प्रोत्साहन धनराशि दिए जाने के प्रविधान किये जायेंगे. किसान यदि स्वयं साइलेज बनाने की पहल करे तो उसे इसकी मशीन की कीमत के 75% का अनुदान मिलेगा.

भूसे को खरीदने और इसके भंडारण के लिए चारा बैंक स्थापित किये जाने जरुरी होंगे जहां भूसे की भेली तैयार की जाएंगी इसके लिए दस करोड़ रूपये की धनराशि से रिवोलविंग फण्ड जुटाने की व्यवस्था होगी. जब भी कोई आपदा आये या चारे की आपूर्ति सीमित हो जाये इस कोष का प्रयोग कर भूसा भेली बनाने वाली इकाइयों को हर क्विंटल भूसे पर पांच सौ ₹ का अनुदान दिया जायेगा.

पहाड़ के किसान मौसम के हिसाब से अपने जानवरों के लिए चारे को एकत्रित करता है. इनमें रबी और खरीफ की फसल के अवशिष्ट को सूखी जगह पर एकबट्या दिया जाता है जिससे वह बारिश से, नमी व सीलन से बचे रहे. धान, मडुआ, मादिरा, के पुवाल व नलुए के साथ जंगल से काट कर लाई गई घास के लूटे बना दिए जाते हैं. गहत, भट्ट, मास या उर्द व सोयाबीन इत्यादि का भूसा तासीर में गरम होता है इसलिए इन्हें जानवरों को जाड़ों के मौसम में दिया जाता है ताकि वह ठंड से बचे रहें.

उत्तराखंड में लगभग पेंतालिस लाख पशु हैं. विगत वर्षों में दुग्ध पदार्थों के उत्पादन में पहाड़ी इलाकों में भी अच्छी वृद्धि दिखाई दी है. लेकिन जिस तेजी से पशुओं को खिलाये जा रहे अवशिष्ट व मोटे अनाज की कीमतों में वृद्धि हुई है उस तेजी से पशुपालकों को दूध के बेहतर दाम नहीं प्राप्त होते. इस साल तो भूसे के दाम में भी अचानक बहुत तेजी से वृद्धि हुई और यह पंद्रह सौ रूपये प्रति क्विंटल से कहीं आगे हो गया. साथ ही पहाड़ी इलाकों में भी बहुतायत से संकर व नई सुधरी हुई नस्ल के दुधारू जानवर पाले जा रहे हैं और उनके समुचित पोषण के लिए पैक्ड पशु आहार की मांग भी लगातार बढ़ी है. कपिला तो था ही अब रामदेव भी बेच रहे हैं जिनकी कीमत भी बढ़ती रहीं हैं. बद्री गाय का दूध, बकरी का दूध भी काफी महंगा होने के बावजूद आम पशुपालक इनकी समुचित कीमत प्राप्त नहीं कर पाता क्योंकि इनके भण्डारण व पैकेजिंग की व्यवस्था कर पाना उसके बूते से बाहर है. ऐसे में वह समितियां व निजी संस्था जो इन्हें बाजार में ब्रांड कर बेचती हैं वही मुनाफा भी प्राप्त कर पातीं हैं. गो मूत्र के प्रचार प्रसार का लाभ भी ऐसे ही बिचौलिए उठाते रहे हैं.

सरकार का इरादा है कि वह पहाड़ी इलाकों में पशु चारा खरीदने व इसके लाने ले जाने पर 75% की सब्सिडी देगी. उत्तराखंड के तराई भाबर में इसकी दर 25% होगी. इस प्रोत्साहन राशि पर आगामी पांच वर्षों के लिए 161 करोड़ रूपये की व्यवस्था की जाएगी.

पहाड़ी इलाकों में अक्टूबर से मार्च और मैदानी इलाकों में गर्मी के मौसम में माई जून व फिर बरसात के बाद जाड़ों की शुरुवात तक चारे की कमी हो जाती है. कुल मिला कर अभी मांग के सापेक्ष हरा चारा 30% व सूखा चारा 15% तक कम पड़ जाता है. नई चारा नीति इस अंतराल को पाटने के उद्देश्य से चारे के उत्पादन के संवर्धन की योजना बना रही है.

मुख्य मंत्री राज्य पशुधन मिशन से 244 करोड़ ₹ का निवेश कर पशुपालन में आत्मनिर्भरता और केंद्र की निर्भरता कम करने के उद्देश्य से चारा विकास नीति प्रस्तावित की गई है. अनुमान लगाया गया है कि इस निवेश से अगले पांच वर्षों में लगभग दस हजार उद्यमी इससे जुड़ लाभान्वित होंगे.

पहाड़ी इलाकों में चारे की व्यवस्था में अनवरत श्रम चाहिए जो महिलाओं के परिश्रम पर ही निर्भर है. मैदानी इलाकों में चारे के लिए अन्य कई अवशिष्ट व भूसा है जो आसानी से उपलब्ध भी है और जिसकी लागत भी कम पड़ती है.लगातार बदलती हुई परिस्थितियों में अब यह जरुरी हो गया है कि चारा उगने वाली भूमि में भूमि के कटाव को रोकने को प्राथमिकता मिले और उसकी उर्वरा शक्ति की जाँच की जाये जिससे जिन तत्वों का अभाव हो उन्हें सीमित मात्रा में दिए रसायनों के साथ गोबर व सड़ी पत्तियों की कम्पोस्ट से पूरित किया जाये. उपयोगी घासों की वृद्धि को तब तक बढ़ाया नहीं जा सकता जब तक खरपतवार विनिष्ट नहीं की जाती. ग्रामीण इनसे भली भांति परिचित होते हैं पर अधिकांश जगहों में उस सामुदायिक पहल व सहकारी चेतना का अभाव दिखता है जो इनको यथासंभव कम करने के लिए जरुरी हैं. ठीक वैसे ही जैसे वन अग्नि में लोगों की सोच हो गई कि आग बुझाना तो जंगलात वालों का काम है वैसी ही धारणा अब वाहय पौंधो के प्रति बनती जा रही है.

एक समय वह भी था जब लोहुमी जी ने कुरी के झाड़ का समूल नाश करने के लिए कुरी कीट खोज निकाला तब कृषि विश्वविद्यालय से भी उन्हें तकनीकी मदद मिली थी. पर अब न तो ऐसी विधियां अख़बारों में चर्चा का स्थान पातीं हैं और जो वैज्ञानिक व अधिकारी ऐसी परियोजनाओं से सम्बद्ध रहे हैं वह आम जन तक अपने निष्कर्ष पहुँचाने में रूचि ही रखते दिख रहे .

ऐसी योजनाएं व्यवहारिक हो सकतीं हैं जो चारागाह प्रबंध में वैज्ञानिक विधियों के प्रयोग का सम्पुट लें. ऐसी कार्य योजना जिसके अधीन नियंत्रित व चक्रानुसार चराई करवाई जाये. यह तब संभव होगा जब एक ही स्थान पर पशु अधिक लम्बे समय तक चराई के लिए न छोड़े जाएं. ऐसे में चरागाहों और बुग्यालों में वनस्पतियों के चरम काल में ही जानवरों का प्रवेश करवाया जाये. इसी प्रकार चराई के बाद कुछ समय तक उस इलाके की सुरक्षा की जाये. चारागाह प्रबंध में किसानों व पशुपालकों के साथ मिलबैठ कर योजना बने. पहाड़ की भौगोलिक परिस्थिति की भिन्नता से हर इलाके की योजना विविधिकृत होनी भी संभव हैं.
(Uttarakhand Fodder Policy)

प्रोफेसर मृगेश पाण्डे

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

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पहाड़ी खेती : जलागम योजना के फलसफे

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