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उत्तराखंड विकास नीतियों का असमंजस

पिछली कड़ी यहां पढ़ें : उत्तराखंड में सेवा क्षेत्र का विकास व रणनीतियाँ

उत्तराखंड की स्थापना वर्ष 2000 में हुई, जहाँ राज्य के आर्थिक विकास हेतु किये जाने वाले प्रयासों में तदर्थ नीतियों का सहारा लिया गया. इसके पीछे कई ऐतिहासिक, भौगोलिक, प्रशासनिक और राजनीतिक कारण रहे जिनके पीछे विवादों का लम्बा सिलसिला था. उत्तराखंड में तदर्थ आर्थिक नीतियों पर आश्रित रहने का मुख्य कारक तो यह था कि राज्य निर्माण के समय दीर्घकालिक आर्थिक सोच व दृष्टि का अभाव था इसी कारण नये राज्य के पास स्पष्ट आर्थिक ब्लू प्रिंट न बन पाया. जो सरकार आई उसका ध्यान तत्काल प्रशासनिक ढांचे के निर्माण और बुनियादी संस्थानों के गठन पर अधिक गया. इस आपाधापी में रणनीतिक आर्थिक योजना पिछड़ गई.

उत्तराखंड की विशिष्ट भू-संरचना और असमान विकास दशाओं के रहते पहाड़ और मैदान की विकास प्राथमिकताओं में भारी अंतर भी व्याप्त था. आरम्भ से ही उत्तर प्रदेश के पैटर्न की तरह नीतियाँ अक्सर मैदानी क्षेत्रों (हरिद्वार, देहरादून उधमसिंह नगर) पर केंद्रित रहीं. पहाड़ी इलाकों के लिए कोई दीर्घकालिक, क्षेत्र-विशिष्ट आर्थिक नीति नहीं बन पाई.

राज्य बनने के बाद पंद्रह वर्षों तक सरकारें कई बार बदली जिससे निरंतरता व स्थायित्व प्रदान करने वाली आर्थिक नीति असमंजस में रही. हर सरकार ने अपने तात्कालिक एजेंडा के अनुरूप कार्यक्रम बदले. इसका परिणाम यह हुआ कि जारी योजनाएँ बीच में रुक जाती या फिर उनकी दिशा ही बदल जाती. उत्तराखंड बनने की घोषणा के समय राज्य की संस्थागत क्षमता सीमित थी. राज्य की नौकरशाही उत्तर प्रदेश मॉडल पर चली. उत्तराखंड में तब न तो प्रभावी आर्थिक अनुसन्धान संस्थान था और न ही दिशा निर्देश के लिए मजबूत थिंक-टैंक जो यहां पहाड़ में की जा रही जीवन निर्वाह कृषि में मात्रात्मक व गुणात्मक सुधार लाता. अपनी आवश्यताओं की पूर्ति हेतु मैदानी इलाकों की उपज पर निर्भरता बनी थी और उद्योगों की सघनता भी वहीं थी. रोजगार और जीवन यापन हेतु पहाड़ी इलाकों से पलायन निरन्तर जारी था. स्थानीय जरूरतों पर आधारित नवोन्मेष पर ध्यान नहीं दिया गया.

विकास के लिए आवश्यक विनियोग व संसाधनों पर निर्भरता बनी रही. राज्य का अपना कर -आधार सीमित था. पहाड़ी जिलों में तो यह और भी कम था. आरम्भिक वर्षों में केंद्र से मिलने वाली विशेष आर्थिक सहायता-औद्योगिक पैकेज 2003- 2010 पर विकास की गति न्यूनाधिक रूप से आश्रित रही. इस अवधि में औद्योगिक विकास की जो कोशिश हुईं उन्होंने अवधि समाप्त होते ही दम तोड़ दिया. फिर राज्य में आपदा पर व्यय लगातार बढ़ते जा रहे थे. उत्तराखंड में वर्ष 2010 के बाद तो बाढ़ व भूस्खलन तथा फिर 2013 की आपदा ने सरकार को दीर्घकालिक विकास के बदले राहत व बसाव के साथ नये पुर्ननिर्माण पर केंद्रित किया जिससे आर्थिक नीति का अधिकांश भाग प्रतिक्रियात्मक हो गया.

आज तक उत्तराखंड की आर्थिक नीति यह स्पष्ट नहीं कर पायी कि उसका आर्थिक प्रारूप क्या हो- पर्यटन आधारित? औद्योगिक क्षेत्र आधारित? सेवा क्षेत्र आधारित? या कृषि आधारित? प्राथमिकताएं स्पष्ट न होने से योजनाएँ अस्थायी, खंडित व तदर्थ रूप से बनती रहीं. स्थानीय स्तर पर योजना निर्माण की दुर्बलताएं प्रकट होती रहीं.

पहाड़ों में पंचायतों की आर्थिक योजना बनाने की शक्तियां सीमित रहीं तो जिला योजना समितियों की क्षमता भी दुर्बल थी. ऐसे में विकेन्द्रित या नीचे से ऊपर नियोजन की प्रक्रिया उत्पन्न नहीं हो सकी. रोजगार के अवसर सीमित रहे जिससे पहाड़ से मैदानी इलाकों की ओर पलायन और बढ़ा. होने वाले प्रवास से पहाड़ी इलाकों में खेती बाड़ी, पशुपालन कमजोर पड़े ही उपभोक्ता आधार व स्थानीय बाजार दुर्बल हुए जिससे आपूर्ति / मूल्य की श्रृंखलाऐं कमजोर ही रहीं.

उत्तराखंड की आर्थिक सोच दीर्घकाल की रणनीति के स्थान पर तदर्थ नीतियों, असंगत योजना प्राथमिकताओं, पहाड़ी-मैदानी इलाकों के असंतुलन व कार्यक्रमों के कमजोर क्रियान्वयन पर आधारित रही जिससे संसाधनों का समुचित उपयोग नहीं हो पाया. क्षेत्रीय असमानताएं बढीं. केंद्र के औद्योगिक पैकेज के समाप्त होने के बाद विकास की गति और कम हुई. वर्ष 2000 से 2024 के बीच कुल खेती की भूमि 7.70 लाख हेक्टेयर से सिमट कर 5.68 लाख हेक्टेयर हो गई. उत्तराखंड बनने के बाद अब तक कृषि भूमि लगभग 27 % सिमट गई है. इसका मुख्य कारण भूमि उपयोग में परिवर्तन था कृषि भूमि को गैर कृषिक कार्यों मुख्यतः – कोठी,  भवन, होटल, हाउसिंग स्कीम, पर्यटन हेतु किये गये निर्माण में प्रयुक्त किया जाने लगा. अवैध व अनियोजित भूमि रूपान्तरण की क्रियाओं ने जोर पकड़ा. भू माफिया सक्रिय रहे. पहाड़ी नयनाभिराम स्थलों की खरीद जारी रही. अब तो कृषि योग्य भूमि पर निर्माण को शासन की सहमति मिल चुकी है.

उत्तरप्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र लम्बे समय तक मनी आर्डर इकॉनमी का स्वरूप लिए थे. रोजगार के लिए गये पर्वतवासी अपना परिवार गाँव में ही रखते थे. धीरे-धीरे परिवार की हित चिंता, बच्चों की पढ़ाई लिखाई व स्वास्थ्य कारणों से परिवार भी गाँव से प्रवास करने लगा. रोजगार के लिए किये गये पलायन से बहुल श्रम शक्ति का अभाव हुआ. खेत में काम करने वाले न रहे. खेत खाली होने से धीरे-धीरे भूमि बंजर पड़ी. खेतों में जो उगता उसे बन्दर, सुवर, साही,भालू उजाड़ते रहे. आबादी वाले इलाके में हिंसक पशु आने लगे. प्रकृति का कोप भी ग्रामवासियों को चिंता ग्रस्त कर गया.हर साल बढ़ती आपदाओं – बाढ़, भूस्खलन के साथ गाँवो में बुनियादी ढांचे की कमी ने परिवारों को पलायन के लिए बाध्य किया.

उत्तराखंड बनने के बाद राज्य की आर्थिक संरचना तदर्थ नीतियों, असंगत योजना – प्राथमिकताओं, पर्वतीय-मैदानी इलाकों के असंतुलन और नीतियों के कमजोर क्रियान्वयन से आरंभिक वर्षों में अपेक्षित गति पकड़ नहीं पाई. इस सन्दर्भ में नीति आयोग द्वारा विगत वर्षों में जारी एस डी जे इंडिया इंडेक्स, एसपिरेशनल डिस्ट्रिक्स प्रोग्राम, पर्वतीय राज्यों के लिए गाइड लाइन्स तथा पर्यटन व कृषि पर टास्क फोर्स रिपोर्ट्स के आधार पर स्पष्ट रूप से यह संकेत दिया कि उत्तराखंड को एक “पर्वतीय-विशिष्ट आर्थिक नीति के स्वरूप” को अपनाने की जरुरत है.

उत्तराखंड के विकास सन्दर्भ में नीति आयोग की मुख्य संस्तुति यह रही कि यहां “पहाड़-विशिष्ट विकास मॉडल” को अपनाया जाए. एक समान नीति को पूरे राज्य में लागू करने के बजाय उच्च पर्वत क्षेत्र, मध्यम ऊंचाई के पर्वतीय क्षेत्र व मैदानी भाग के लिए नीति का ढांचा भिन्न-भिन्न हो. योजना-परियोजना का निर्माण ‘पर्वतीय लागत गुणक’ को शामिल करे. परियोजनाओं की डी पी आर में उस क्षेत्र की ढलान या स्लोप, भू कम्पीय जोखिम, सड़क-लागत, आपदाओं या कच्चे माल… भौगोलिक व जैव विविधता आधारित क्षेत्रों को इको-जोन्स में विभाजित कर विशेष योजनाएँ लागू की जाएँ. ढलानों, भूस्खलन के जोखिम, समीपवर्ती शहर से गाँवो के बीच की दूरी, मौसमी अवरोधों को देखते हुए अंतरसंरचना के मानकों में संशोधन किया जाना जरुरी है. उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़ जैसे दुर्गम भू भागों में “न्यून लागत, न्यून गहनता के प्रारूप” को ध्यान में रखा जाए.

राज्य की अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र को प्राथमिकता दी जाये इसका मुख्य कारण यह है कि उत्तराखंड में कृषि भूमि सिमित है और यह तेजी से सिमट भी रही है. अब पर्यटन, वैलनेस, आध्यात्म व योग जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता देते हुए इन पर अधिक विनियोग किया जाए. इस हिमालयी क्षेत्र में मेडिकल टूरिज्म व वैलनेस सर्किट का संवर्धन विकास हेतु उच्च प्रतिमान रखता है. नैनीताल-देहरादून-हरिद्वार-टिहरी को “माइस हब” अर्थात मीटिंग, इंसेंटिव, कॉन्फ्रेंस, ऐक्जिबिशन के रूप में विकसित किया जाए.

उत्तराखंड की भौगोलिक विशिष्टाताओं को देखते हुए यहां स्थान विशेष पर आधारित चल रही क्रियाओं के आधार या अंचल विशेष के लिए माइक्रो नीतियों का निर्धारण जरुरी है. इसे “प्लेस बेस्ड जोनिंग” की संज्ञा दी जा सकती है. पर्वतों के उप क्षेत्र यथा उच्च हिमालयी क्षेत्र, मध्य हिमालय व तलहटी वाले जोन के लिए नीतियों का र्निदिष्टीकरण उनके स्वरूप को ध्यान में रख कर किया जाए. आंचलिक भिन्नताओं से हर इलाके में कार्य व्यवहार अलग हो सकता है. अतः यहां संपन्न की जाने वाली क्रियाओं के स्वरूप को ध्यान में रखते हुए स्वायत्त एवम प्रेरित विनियोग किया जाए.

उत्पादन हेतु संसाधनों का आवंटन व गतिशीलता, विनियोग प्रेरणाऐं और निर्माण संबंधी नियम स्थानीय परिवेश को ध्यान में रख कर किये जाएं जिससे अधिकतम प्रतिफल की प्राप्ति हो. वस्तु उत्पादन प्रक्रिया को होलिस्टिक मूल्य श्रृंखला से समर्थन मिले. कच्चे माल की प्रोसेसिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग के लिए ऐसी नीति लागू करना जिसमें पहाड़ी क्षेत्र की दुर्गमता को ध्यान में रखा जाये जिससे कच्चे माल व प्रशिक्षित श्रम शक्ति की उपलब्धता में व्यवधान न हो. इसके लिए आरंभिक चरण में बुनियादी ढांचे के निर्माण को प्राथमिकता मिले. पहाड़ के दुर्गम इलाकों में दी जाने वाली सुविधा व वित्तीय प्रेरणाओं में पीर-रीजन टैरिफ व परिवहन सम्बन्धित छूट, कैप एक्स सब्सिडी व विद्युत की दरों में एक निश्चित समय अवधि या लक्ष्य आधारित छूट की व्यवस्था रहे.

ग्रामीण व पहाड़ी क्षेत्रों में जोखिम को देखते हुए किसानों, लघु स्तर पर उत्पादन कर रही इकाईयों के साथ होम स्टे संचालकों हेतु सामूहिक बीमा और प्रीमियम सह-भुगतान की व्यवस्था रहे. पर्यावरण के अनुकूल परियोजनाओं के लिए ग्रीन / ब्लू बांड्स व क्लाइमेट फण्ड एक्सेस हो. भूमि अधिकार व तत्सम्बन्धी नियम सुस्पष्ट हों. वानिकी सम्बन्धित अधिकार व वन सम्पदा के स्थानीय निवासियों द्वारा उपयोग की बाधाऐं दूर की जाएं. हर ब्लॉक में हाई-स्पीड इंटरनेट, मोबाइल भुगतान व ई-मार्किटप्लेस सपोर्ट की सुविधाएं प्रदान की जाएं. उपर्युक्त नीतियों के क्रियान्वयन के लिए संस्थागत ढांचा निम्न चार आधारों पर आश्रित होना चाहिए :

पहला, एक “समन्वय संस्थान” जो नीति, तकनीकी सहयोग व वित्तीय गतिशीलता से सम्बन्धित दायित्व संभाले व निगरानी रखे. यह एसडीएमए अर्थात “स्टेट माउंटेन डेवलपमेंट अथॉरिटी” हो. दूसरा, प्रत्येक पर्वतीय जिले में “जिला पर्वतीय सैल या डीएमसी बने जो सरकारी- निजी समन्वय करे. तीसरा, “ग्राम्य संसाधन कौंसिल” स्थापित हों जो गाँव की पारम्परिक संस्थाओं को बजट व व्यय के अधिकार दें. इनके साथ राज्य स्तर पर ऐसा “शोध केंद्र “हो जो खेती-बाड़ी, फल-फूल उद्यान, हरित क्षेत्र व आपदा रोक की तकनीक पर लगातार काम करते हुए किसानों को की जा रही शोध के नतीजे बताए.

नीतियों के क्रियान्वयन के लिए रोडमैप अल्प, मध्यम व दीर्घ काल हेतु निर्दिष्ट रहें. अल्पकाल अवधि अधिकतम दो वर्ष में की जाने वाली मुख्य गतिविधियां राज्य में तीन-चार ऐसे जिलों का चुनाव हो जो भौगोलिक विविधताएं दिखाएं जैसे चमोली, पौड़ी, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा. अब चुने हर जिले में 10 से 15 समेकित होमस्टे/सामुदायिक पर्यटन इकाईयों के साथ ही कृषि प्रोसेसिंग माइक्रो इकाईयों का गठन किया जाए. स्थानीय कुशलता की पहचान व समुचित मार्गदर्शन के लिए ग्रामीण पर्यटन, एफएमजीसी प्रोसेसिंग व डिजिटल विपणन के लघु केंद्र बनें. विकासखंड स्तर पर डिजिटल कनेक्टिविटी की व्यवस्था रहे और एक लॉजिस्टिक्स हब बने. विशेषकर स्थानीय वस्तुओं के संग्रहण व पैकिंग के लिए जिस पर अंचल-स्थान विशेष की छाप रहे. इनके साथ ही वर्षा काल में घटित आपदा व सूखे मौसम में वनों में लगने वाली आग की घटनाओं से बचाव के लिए हर गाँव में जागरूकता अभियान के प्रयास हों. जंगली जानवरों से बचाव के लिए भी सामूहिक स्तर पर लोग एकजुट हो इनका मुकाबला करते रहे हैं जिसकी खबर वन विभाग व जिला स्तर पर अधिकारियों को देने का तंत्र प्रभावी बने.

मध्यम समय अवधि 3 से 7 साल की हो जिसमें ग्रामों को जोड़ने वाली मूल्य श्रृंखला या वैल्यू चेन का विस्तार संभव है. स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग-टैगिंग व विपणन का कार्य हो. कुछ क्षेत्रों में उत्पादकों व स्वयं सेवी संस्थाओं द्वारा ऐसी ब्रांडिंग की जा रही है पर उनकी कीमतें इतनी अधिक रख दी हैं कि आम उपभोक्ता द्वारा इनकी मांग बेलोच ही बनी रहती है. मध्य काल की अवधि में पहाड़ी इलाकों में एमएसएमई क्लस्टर पार्क और ऊष्मायन या ऊष्मायन केंद्र बनाए जाएँ. राज्य हरित बॉन्ड द्वारा लचीले सड़क व आपदा निवारण कार्य संपन्न कराये जाएं.

दीर्घ समय अवधि हेतु आवश्यक न्यूनतम सम्भव प्रयास किये जाएँ जिनसे पहाड़ी अर्थव्यवस्था का स्थायी स्वरूप पर्यटन, जैविक खेती, मसाले, फल-फूल व भेषज के साथ स्थानीय हस्तशिल्प की मिश्रित अर्थव्यवस्था का स्वरूप ले ले. स्थानीय उत्पादों पर सर्वाधिक ध्यान देते हुए निर्यात क्षमता युक्त ब्रांडेड उत्पाद का वैश्विक बाजार विकसित करने की सोच बने.

राज्य के विकास की योजनाओं के वित्त पोषण के विविध स्त्रोत हैं जिनका विदोहन बहुत सावधानी से किया जाना जरुरी है. यह जानकारी स्पष्ट रूप से होनी चाहिए कि भविष्य के लिए तय की जाने वाली परियोजनाओं को किस संस्था/एजेंसी से विनियोग हेतु धनराशि उपलब्ध हो सकती है. राज्य-केंद्र द्वारा संचालित कई योजनाएं हैं जो विविध अनुदानों व वित्त से संचालित होती हैं. दूसरा, एमबीडीव जलवायु फण्ड हैं जो एशियाई विकास बैंक, विश्व बैंक व ग्रीन क्लाइमेट फण्ड हैं जो परियोजनाओं को वित्त उपलब्ध कराते हैं. तीसरा, उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य में हरित पट्टी के पारिस्थितिकी प्रभाव का प्रतिफल दिखाते हुए विनियोग आकर्षित किया जाना संभव है. चौथे, कई क्षेत्रों में सार्वजनिक -निजी सहयोग द्वारा वित्त पोषण संभव होता है. पाँचवी बात यह कि ग्राम स्तर पर उत्पादकों के समूह या स्थानीय समुदाय सहकारी संस्थाएं बनें जिनसे आम किसान व उत्पादक अपने व्यवसाय की छोटी मोटी जरूरतों या इनपुट्स के लिए कर्ज ले सके, साथ ही काश्तकारों, कारीगरों को माइक्रोफाइनेंस-कार्यशील पूंजी भी मिल सके.

पहाड़ी सीढ़ी नुमा खेतों को बनाए बचाये रखना जरुरी है. खेतों के किनारे व ढलान पर अनेक प्रकार के फलों के पेड़, विविध प्रयोगों में काम आने वाली झाड़ियाँ व लताऐं लगाई जातीं हैं जिनसे खेतों की मिट्टी का अवक्षय व भूमि अपरदन नहीं होता. स्थानीय बीजों का प्रयोग बढ़ाने की हरसंभव कोशिश रहे. जैविकीय खादों पर ही निर्भर रहा जाए. स्थानीय प्रजातियों व बीजों को बचाने के प्रबल प्रयास हों. वन विभाग किसानों के सहयोग से एग्रोफारेस्टरी को लगातार बढ़ावा देने की परियोजनाएँ सामने रखे.

ग्राम समूहों में सोलर पावर से चलने वाले मॉड्यूलर शीत गृह बनें. इसी क्रम में मूल्य संवर्धित प्रोसेसिंग किट स्थापित हों जैसे कि औषधीय पौंधों से रस आसवित करने व तेल निकालने वाली इकाईयां. विशिष्ट व दुर्लभ पर्वतीय पदार्थों का इको सर्टिफिकेशन व जीआई टेगिंग हो. मध्यस्थों के शोषण से बचाने के लिए डिजिटल मण्डी व ई-प्रोक्योयरमेन्ट की सुविधा प्रदान की जाए. सुदूर ग्रामों तक सड़कें सुधारी जाएं व उनमें पानी की निकासी के ढाल व ड्रेनेज सही तरीके से बनाए जाएँ जिससे वर्षाकाल में सड़कें सुरक्षित रहें.

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र के लिए तीन जोन अधिसूचित किये जाएं जिनका क्रम उच्च पहाड़ी इलाके, मध्य पहाड़ी इलाके व निचले क्षेत्र हो. इनमें हर क्षेत्र में किये जाने वाले निर्माण, पर्यटन, उद्योग, सड़क निर्माण, जल स्त्रोत संरक्षण के लिए पर्यावरण के सुस्पस्ष्ट मानकों का आधार हो जिससे अत्यधिक निर्माण व पारिस्थितिकी की क्षति को नियंत्रित किया जा सके.

हर जिले के लिए तीन वर्ष की अवधि तक चलने वाला रोलिंग प्लान बने जिसमें हर जिले की विशिष्टताओं के आधार पर कृषि,बागवानी व दुग्ध द्वारा हुए मूल्य संवर्धन, पर्यटन, एमएसएमई, अंतरसंरचना,व आपदा बचाव से संबंधित परियोजनाएं चलाई जाएँ. ब्लॉक स्तर पर वार्षिक एक्शन प्लान बनना अनिवार्य हो.

पर्वतीय क्षेत्र की कृषि अपने जैविकीय स्वरूप के कारण विशिष्ट है जिसको संरक्षित व संवर्घित करना प्राथमिक लक्ष्य रहे. फिर महत्वपूर्ण हैं पर्यटन गतिविधियां जो धार्मिक यात्राओं व ब्रिटिश काल से चयनित स्थलों में फला फूला. अभी भी उत्तराखंड में पर्यटन कुछ विशिष्ट स्थानों तक सीमित रहा जहाँ पर्यटकों का दबाव अत्यधिक हो जाता है. इसलिए पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए अन्य सुरम्य स्थलों में आवश्यक सुविधाऐं बढ़ाई जाएँ. इसके लिए माउंटेन टूरिज्म मिशन (एम टी एम)पर कार्यवाही हो. इसमें आरंभिक चरण में 100 सुरम्य चयनित गाँवो को कम्युनिटी टूरिज्म विलेज के रूप में विकसित किया जाए. हर गाँव में न्यूनाधिक 10 होमस्टे व स्थानीय गाइड की सुविधा रहे. आस पास के महत्वपूर्ण स्थलों के ट्रेकिंग सर्किट स्पष्ट हों जिसमें लोक थात की धरोहर से पर्यटकों को परिचित कराया जाए. इन गतिविधियों से धीरे – धीरे पलायन में कमी आएगी और स्थानीय रोजगार बढ़ेगा.

जैविक खेती , सब्जी व फल पर्वतीय कृषि की महत्वपूर्ण विशेषता है जिनके उत्पादन को और अधिक व्यवस्थित कर इससे पर्यटकों द्वारा की जा रही मांग को पूरा किया जा सकता है. ध्यान यह रखना होगा कि ऐसी वस्तुएँ सही कीमतों पर पर्यटकों को उपलब्ध हो जाएँ. मोटे अनाज व अन्य जैविक पदार्थ स्वास्थ्य की दृष्टि से उत्तम होते हैं व इनकी मांग बनी रहती है. गाँव में ही पर्यटकों द्वारा इनकी खरीद से किसानों की आय में वृद्धि तो होती ही है साथ ही वह मध्यस्थों के शोषण से बच भी जाते हैं.

सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के अंतर्गत सामाजिक, पर्यावरणीय व आर्थिक सूचचांकों में राज्य का आंकलन किया जाता है जो नीति व योजनाओं में सस्टेनेबिलिटी एवम विकास संतुलन के लिए मार्गदर्शक बनता है. संयुक्त राष्ट्र ने सन 2015 में सन 2030 एजेंडा के अंतर्गत 17 एसडीजी या सतत विकास लक्ष्य तय किये जो गरीबी के समाप्त होने, भुखमरी की समाप्ति, बेहतर स्वास्थ्य, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, लैँगिक समानता, स्वच्छजल व स्वच्छता, सस्ती ऊर्जा, सम्मानजनक रोजगार, उद्योग व नवाचार, असमानता में कमी, टिकाऊ शहर, समुचित उपभोग, जलवायु कार्यवाही के साथ स्थलीय जीवन, शांति व सामूहिक साझेदारी जैसे कारकों को ध्यान में रखते हैं. इनका लक्ष्य “गरीबी उन्मूलन, समान विकास,पर्यावरण संरक्षण और लोक कल्याण” है. भारत में एसडीजी रिपोर्ट नीति आयोग द्वारा निर्दिष्ट की जाती है जो राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों की रैंकिंग, जिला वार प्रदर्शन व स्वास्थ्य, शिक्षा, जलवायु व गरीबी के आधार पर रिपोर्ट जारी करता है. एसडीजी स्कोर का उपयोग राज्य नीति निर्माण में, केंद्र से फण्ड आवंटन में, जिला नियोजन (डीएमपी / एमडीपी) में तथा अन्तर्राष्ट्रीय फंडिंग (विश्व बैंक, यूएनडीपी, जीसीएफ इत्यादि) में किया जाता है. इस प्रकार एसडीजी रिपोर्ट विकास की हैल्थ रिपोर्ट है जो बताती है कि किया जा रहा विकास मात्र आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक और पर्यावरण की दृष्टि से संतुलित है या नहीं.

उत्तराखंड पर्वतीय, आपदा संवेदनशील और संसाधन निर्भर राज्य है. एसडीजी रिपोर्ट बताती है कि पलायन क्यों बढ़ रहा है? कृषि क्यों कमजोर है? जल व आपदा के जोखिम कितने घातक हैं? साथ ही पर्यटन की दिशा व स्थिरता कैसी है? नीति आयोग ने उत्तराखंड की 2023-24 रिपोर्ट में इसे 100 में से 79 अंक अंक दिए हैं यह रिपोर्ट राज्यों /केंद्र शासित प्रदेशों में सतत विकास की प्रगति को 113 संकेतकों के आधार पर मापती है. इस रिपोर्ट के आधार पर राज्य ने सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय सतत विकास लक्ष्यों में बहुमुखी व संतुलित प्रगति दिखाई है पर लैँगिक समानता व भूख निवारण जैसे सामाजिक लक्ष्य में सुधार की आवश्यता है.

उत्तराखंड का एसडीजी स्कोर अच्छा है फिर भी जीवन योग्य पर्वतीय अर्थव्यवस्था यहां बन नहीं पाई. उत्पादन की सम्भावनाएं व रोजगार के अवसर सीमित हैं. है एसडीजी निर्देशांक तो मुख्यतः यह मापता है कि पहुँच है की नहीं (एक्सेस), योजना पहुंची की नहीं (कवरेज),  भवन, कनेक्शन, शौचालय, बिजली (इंफ्रास्ट्रक्चर) है की नहीं. लेकिन एसडीजी यह नहीं मापता कि सेवा की गुणवत्ता कैसी है? रोजगार की दशा व स्थायित्व कैसा है? जीवन निर्वाह हेतु आय पर्याप्त है अथवा नहीं. गाँवो में रहने लायक जीवन क्यों नहीं है? जब स्कूल हो पर अध्यापक कम हों, बच्चे जंगली जानवरों के डर से स्कूल न पहुंचे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर न हो. अल्ट्रासाउंड मशीन हो पर रेडयोलॉजिस्ट न हो, पानी के नल हों पर पानी न आये, फसल को बंदर सुवर चौपट कर दें. शराब के साथ अन्य घातक नशे की समस्या बढ़ती जा रही हो. ऐसी अनेक खबरें हैं जो अर्ध रोजगार संतुलन व बाजार की अपूर्णता के साथ गुणात्मक घटकों की अवहेलना का परिदृश्य बनाती हैं.

उत्तराखंड में संतुलित पर्वतीय अर्थ व्यवस्था बनी ही नही क्योंकि जो कृषि है वह अपने कच्चे रूप में है, जीवन निर्वाह स्तर पर बने रहने को बाध्य करती है उसे समुचित बाजार नहीं मिल पाता, उसकी प्रोसेसिंग नहीं हो पाती. द्वितीयक क्षेत्र में परंपरागत व्यवसाय चौपट होते रहे. शिल्पकार असंगठित क्षेत्र में मजदूरी करने को बाध्य हुए. विनिर्माण क्षेत्र का प्रतिफल न्यूनतम रहा. सेवा क्षेत्र शहर केंद्रित हुआ. सार यह कि गाँव में उपभोक्ता है पर उत्पादन शहर या मैदानी इलाका है. इसलिए गाँव जब सुगठित आर्थिक इकाई ही नहीं बन पाई तो लोग वहाँ क्यों रुकेंगे. दूसरा कारक है रोजगार जिसे एसडीजी में गहराई से नहीं मापा जाता. इसके माप में सिर्फ यह देखा जाता है कि रोजगार है या नहीं. स्कीम आधारित काम मिला या नहीं? यह नहीं देखा जाता कि बारह महीने काम मिला या नहीं. आय कितनी है? फिर गाँव में दैनिक मजदूरी की दर भी कम रहतीं हैं. मानक तो यह अपेक्षा रखता है कि कुशलता आधारित, सम्मानजनक कार्य है या नहीं. पढ़ लिख कर गाँव में तो इस पढ़ाई के आधार पर काम मिलने से रहा. गाँव में शिक्षा का स्तर भी बदहाल रहता है जबकि एसडीजी का मानक 4 बेहतरी दिखाता है. वह देखता है स्कूल भवन है, नामांकन है, दिन का भोजन बंट रहा है पर यह नहीं देखता कि एक शिक्षक है जो पांचों कक्षाऐं लेता है. विज्ञान /गणित का शिक्षक तो है ही नहीं. अंग्रेजी व डिजिटल स्किल शून्य है. दसवीं के बाद स्कूल है ही नहीं. कहीं डिग्री कॉलेज खुल गया है पर स्टॉफ नहीं, पुस्तकें नहीं, कम्प्यूटर है पर चलाने की जानकारी नहीं. ऐसे में एसडीजी मात्र पहुँच या एक्सेस मापता है, सीखने का प्रतिफल नहीं. ऐसे में नतीजा यह रह जाता है कि पढ़ाई का मतलब सिर्फ डिग्री लेना बन जाता है जिसमें कौशल शून्यता होती है व रोजगार के अवसर मैदानों में ही दिखाई देते हैं.

गाँवो में चिकित्सा सेवा बदहाल है जबकि एसडीजी का मानक 3 सब अच्छा दिखाता है. इस विरोधाभास का कारण यह है कि एसडीजी गिनता है कि चिकित्सा केंद्र /उपकेंद्र है या नहीं. उसका भवन बना या नहीं. संस्थागत प्रसव की सुविधा है या नहीं पर वास्तविकता तो यह है कि चिकित्सक नहीं रहते, विशेषज्ञ नहीं होते, सामान्य दवाएं भी उपलब्ध नहीं होती. प्राथमिक चिकित्सा केंद्र /अस्पताल मरीज को रिफर कर देते हैं बड़े अस्पताल में जहां इमरजेंसी में सफर लम्बी अवधि का होता है. एम्बुलेंस नहीं मिलती. रास्ते अवरुद्ध होते हैं. इसीलिए बीमारी में मरीज सीधे शहर भागता है जहाँ सरकारी अस्पताल में सुविधा न मिलने पर निजी अस्पतालों की शरण लेनी पड़ती है.

पहाड़ में कृषि क्यों मर रही है? यह सबसे गंभीर प्रश्न है. पहाड़ की खेती 85% वर्षा पर निर्भर (रेन फेड) है. खेत सीढ़ीदार हैं उपरांऊ पर. घाटियों में तलाऊं में भी जोत का आकार 0.7 हेक्टेयर से कम है. हो रही खेती पर बंदर, सुअर व अन्य वन्य जीवों के द्वारा किये उजाड़ का खतरा है. साथ ही आबादी तक बाघ भालू आ पहुँचते हैं. उनके आक्रमण की घटनाएं बढ़ रही हैं. गावों में जो फसल पैदा होती है उसका खरीद तंत्र विकसित नहीं है. किसान खुद ही समीप के कस्बों, शहर तक माल की ढुलाई करता है. एसजीडी के मापक 2 में उत्तराखंड जीरो हंगर में है क्योंकि राशन मिल रहा है, बच्चों को मिड डे मील मिल रहा है मतलब यह कि कुपोषण घट रहा है. पर राशन में मिल गये अनाज से गुजारा हो जाता है तो इसे उगाने का परिश्रम क्यों करें की सोच पनप रही है. फिर इस माप में खेतिहर की आय नहीं मापी जाती. यह मानसिकता बन गई है कि खेती घाटे का सौदा है – इससे बेहतर तो नौकरी है. नौकरी तो गाँव में है नहीं और न ही सुविधाऐं सो पलायन का सिलसिला चलते रहता है.

एसडी जी की रपट में पलायन व प्रवास का सूचक नहीं है. इसी तरह पहाड़ों में जीवन की गुणवत्ता, गांव में आर्थिक व्यवहार्यता व सेवाओं से दूरी के माप अनुपस्थित हैं इसलिए यह वास्तविकता से मेल नहीं खाता. इसी कारण विकास की तमाम योजनाओं परियोजनाओं की घोषणाओं के बावजूद पहाड़ में रहना कष्ट प्रद बना है. योजनाओं के बावजूद आर्थिक गतिविधियों में ठहराव दिखाई देता है. वहां निर्माण भले ही हुआ हो पर सेवा प्रदाता अनुपस्थित हैं. परिवार में पढ़े लिखे लोग हों पर रोजगार के अवसर नहीं हैं. अंतरसंरचना के निर्मित होने के बाद भी गांव खाली हैं. उत्तराखंड में एसडीजी स्कोर उच्च होने के बाद भी पलायन की प्रवृति थमी नहीं है, आर्थिक गतिविधियां संकुचित हैं क्योंकि सेवाओं की कमी है. स्थानीय अर्थव्यवस्था दुर्बल बनी रहती है. मौजूदा सूचकांक (एसडीजी व एचडीआई) पर्वतीय क्षेत्र में निवास करने की वास्तविक व्यवहारिकता को नहीं मापते इसलिए पर्वतीय विकास सूचक एमएलआई (माउंटेन लिवबिलिटी इंडेक्स) की परख करनी जरुरी है. पर्वतीय विकास सूचक का उद्देश्य यह मापना है कि, “क्या कोई व्यक्ति /परिवार पहाड़ में सम्मानजनक, सुरक्षित और आर्थिक रूप से टिकाऊ जीवन जी सकता है या नहीं.

पर्वतीय निवास सूचक का उद्देश्य मुख्यतः पलायन के संरचनात्मक कारणों की पहचान करना है. जिससे जिला/ब्लॉक/ग्राम स्तर पर नीतिगत हस्तक्षेप किये जाने संभव हों. बजट व योजना प्राथमिकताओं का पुर्नसंयोजन किया जा सके. एसजीडी स्कोर के साथ जमीनी वास्तविकता के अंतराल को प्रकट किया जा सके.

पर्वतीय विकास सूचक सबसे पहले आजीविका व स्थानीय रोजगार को ध्यान में रखता है जिसमें मुख्य प्रश्न यह है कि क्या पहाड़ में साल भर का सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध है? इसमें उप सूचक होंगे –

  1. 12 महीने रोजगार उपलब्धताl
  2. औसत मासिक स्थानीय आय
  3. गैर कृषि स्थानीय रोजगार का अनुपात
  4. स्वरोजगार /उद्यमिता अवसर
  5. महिलाओं की आय – भागीदारी. {भार 25%}

दूसरी चिंता ग्राम निवासियों के स्वास्थ्य व आपात पहुँच को ले कर है. प्रश्न यह है कि बीमारी या आपात काल में जीवन सुरक्षित है या नहीं. इसके सूचकों में –

  1. ग्रामवासियों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक पहुँच का औसत समय क्या है
  2. डॉक्टर / नर्स की उपलब्धता
  3. आपातसेवा-एम्बुलेंस मिलने व केंद्र तक पहुँचने में लगा समय
  4. टेली मेडिसिन की कार्यशीलता.{भार 20%}

तीसरा आयाम शिक्षा एवम भविष्य के अवसर से सम्बन्धित है. मुख्य प्रश्न यह है कि क्या बच्चों का भविष्य गाँव से जुड़ा रह सकता है. इसके सूचकों में –

  1. माध्यमिक विद्यालय तक पहुँच
  2. शिक्षक-छात्र अनुपात
  3. विज्ञान-डिजिटल शिक्षा की उपलब्धता
  4. स्थानीय कौशल/रोजगार से शिक्षा का जुड़ाव जानना जरुरी है.{भार 15%}

चौथा प्रश्न यह है कि क्या गाँव अपना भोजन और आय उत्पन्न कर सकता है अर्थात कृषि एवम खाद्य आत्मनिर्भरता कितनी है. इसे जानने के लिए

  1. सक्रिय खेती योग्य भूमि का प्रतिशत
  2. किसान की शुद्ध वार्षिक आय
  3. स्थानीय खाद्य उत्पादन अनुपात
  4. एम एस पी /खरीद /प्रोसेसिंग तक पहुँच देखनी होगी.{भार 15%}

पांचवा पक्ष मूलभूत सेवाओं एवम कनेक्टिविटी से संबंधित है जिसमें यह पता करना होगा कि रोजमर्रा का जीवन कितना सुगम है. इसे जानने के लिए

  1. साल भर सड़क कनेक्टिविटी
  2. बिजली की उपलब्धता घंटे/दिन में
  3. मोबाइल / इंटरनेट कवरेज
  4. सार्वजनिक परिवहन उपलब्धता को देखना होगा. {भार 15%}

अंततः छठा प्रश्न यह है कि क्या पहाड़ में जीवन सुरक्षित, सम्मानजनक और स्थायी बसाव की प्रकृति का है. यह जानने के लिए समझना होगा कि

  1. आपदा जोखिम व सुरक्षा व्यवस्था कैसी है
  2. वन्यजीवों के हमले व प्राकृतिक जोखिम कितने हैं
  3. सामाजिक संस्थाएं /सामुदायिक सक्रियता कितनी है
  4. महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा की दशा क्या है? {भार 10%}

उपर्युक्त में प्रत्येक उपसूचक 0-10 अंक के, आयाम – वार भारांक लागू.

पर्वतीय निवास सूचक स्कोर श्रेणी में 75 से अधिक अंक रहने योग्य, 50-74 जोखिमग्रस्त व 50 से कम पलायन प्रेरक की दशा बताएंगे जिसे रिवर्स माइग्रेशन प्रायोरिटी जोन में रखा जायेगा. पर्वतीय निवास सूचक की दशा से यह स्पष्ट करना संभव होता है कि पहाड़ में टिके रहने के लिए किन दशाओं व परिस्थितियों का होना आवश्यक है.

पर्वतीय विकास सूचक नीति आयोग के एसडीजी निर्देशांक के साथ पूरक रूप में देखा जा सकता है. इनमें मूल अंतर यह है कि एसडीजी जहां सेवा/योजना की पंहुच व कवरेज को मापता है वहीँ पर्वतीय निवास सूचक सेवा की गुणवत्ता, दूरी, निरन्तरता और जीवन योग्यता का मापन करता है. यदि इन दोनों के सम्मिलित प्रभाव का आंकलन किया जाए तो ऐसे नतीजों तक पहुँच हो जाती है जिनके आधार पर नीतिगत निर्णय लिए जा सकें. उदाहरण के लिए आजीविका और रोजगार में एस डी जी गरीबी व रोजगार की दर को मापता है तो एम एल आई साल भर मिलने वाले काम, स्थानीय आय व सम्माननीय काम को शामिल करता है.

स्वास्थ्य के संबंध में एस डी जी संस्थान/भवन/उपकरण व कवरेज को ध्यान में रखता है तो एम एल आई वहाँ डॉक्टर की उपलब्धता व आपात पहुँच समय को ध्यान में रखता है. शिक्षा में एसडीजी नामांकन व साक्षरता पर फोकस करता है तो एमएलआई वहां उपलब्ध शिक्षक की गुणवत्ता व भविष्य उन्मुख कौशल पर भी विचार करता है. खेती व खाद्य में एसडीजी, पोषण व वितरण के पक्ष मापता है तो एमएलआई उसमें किसान को मिलने वाली आय, सक्रिय खेती व स्थानीय उत्पादन को जोड़ता है. सेवाओं और कनेक्टिविटी में एसडीजी आधार भूत ढांचे पर केंद्रित है तो एमएलआई इनकी साल भर मिलने वाली उपयोगिता व विश्वसनीयता को भी ध्यान में रखता है. इसी प्रकार पर्यावरण और सुरक्षा के बिंदु पर एसडीजी इनके संरक्षण प्रयास पर केंद्रित है तो एमएलआई निवासियों की सुरक्षा, आपदा जोखिम व वन्यजीव दबाव को भी शामिल करता है.

उत्तराखंड के विकास हेतु नीति आयोग की जो मुख्य सिफारिशें हैं उनमें प्राथमिक है पर्वतीय विशिष्ट योजना के ढांचे का निर्माण करना. इसका कारण यह है कि भौगोलिक दशाओं में व्यापक भिन्नता होने से पूरे राज्य के लिए एक सी नीति प्रभावी नहीं बन सकती इसलिए दुर्गम क्षेत्र वाले पहाड़ी इलाकों, मध्य हिमालय व तराई-भाबर के लिए भिन्नतप्रद नीतिगत प्रारूप बनाए जाने चाहिए. दूसरी बात यह कि विविध परियोजनाओं की डीपीआर में पर्वत लागत घटक अर्थात माउंटेन कॉस्ट फैक्टर को जोड़ा जाए जिससे परिवहन, निर्माण, ढलान व सामग्री की उच्च लागत को बजट में सम्मिलित किया जाए. उत्पादन आधारित बजटिंग अर्थात आउट कम बजटिंग हो. जिला व ब्लॉक स्तर पर वास्तविक समय डेटा डेश बोर्ड हो जिससे डेटा आधारित शासन व क्रियान्वयन संभव ही सके. इसके लिए नीति आयोग मॉडल पर “डिस्ट्रिक्ट डिलीवरी यूनिट्स” बनाई जाएँ. तीसरा पक्ष कृषि व बागवानी में “वैल्यू एडिशन” के सुधार को ले कर है. भूमि के उपयोग को वैज्ञानिक व आपदा संवेदनशीलता आधारित बनाया जाए. पर्वतीय कृषि को वाणिज्यिक रूप से सबल जोन में विभाजित करने की सिफारिश नीति आयोग करता है. मुख्य अनाज-दाल-मसाले-फल व औषधीय पौंधों इत्यादि का क्लस्टर विकास चिन्हित हो जिसके आधार पर इनके भंडारण, प्रोसेसिंग आदि की कड़ियाँ विकसित की जाएँ. पहाड़ में उत्पादित सभी आर्गेनिक पदार्थों को जी आई टैग मिले, राज्य द्वारा इनकी ब्रांडिंग हो व इन्हें ई-कॉमर्स से जोड़ा जाय. कृषि के बाद दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र पर्यटन है. नीति आयोग के अनुसार पर्यटन का विकास “धारक क्षमता या कैरिँग कैपेसिटी” के अनुरूप हो. अति भीड़-भाड़ व व्यस्त नैनीताल-मसूरी-तीर्थ यात्रा मार्गों के लिए धारण क्षमता मास्टर प्लान बने. धार्मिक पर्यटन को “इको-स्प्रिचुअल टूरिज्म मॉडल” से जोड़ा जाए. व्यस्त पर्यटन स्थलों के निकटवर्ती ग्रामीण स्थलों का चुनाव कर वहां होम स्टे, स्थानीय गाइड व सामुदायिक स्वामित्व से जुड़ी सेवाओं का ढांचा विकसित हो.

अगला पक्ष मानव पूंजी स्वास्थ्य व शिक्षा से सम्बन्धित है जिसमें पर्वतीय कौशल के लिए स्किल मैपिंग हो जिसमें एडवेंचर गाइड, होम स्टे संचालन, आपदा प्रबंधन व ई-उद्यमिता मुख्यत: सम्मिलित रहेगी. जो उद्योग विकसित किये जाने जरुरी हैं उनकी प्रकृति हरित हो जैसे कि स्थानीय जैविकीय उत्पादों की प्रोसेसिंग, हर्बल, हस्तशिल्प व रिंगाल बांस आधारित उद्योगों का क्लस्टर या समूह विकसित करना जिनके लिए क्रेडिट गारंटी व कैपिटल सब्सिडी आधारित पैकेज दिए जाएं. स्थानीय कुटीर उद्योगों में रोजगार सृजन की क्षमता है जिसके लिए सरकार द्वारा उचित प्रोत्साहन व कच्चे माल की खरीद के लिए कम ब्याज पर ऋण की सुविधा दी जानी जरुरी है. लकड़ी की नक्काशी व पत्थर के काम वाले शिल्पकार समुचित काम न मिलने पर मजदूरी करने को बाध्य हैं यहीं हॉल लोहे व ताँबे के कारीगरों का है. प्रदेश के सभी तेरह जिलों में विविध धंधों में लगे शिल्पकारों का सर्वेक्षण कर परंपरागत उद्योगों को बचाए बनाए रखने के कार्यक्रमों द्वारा गाँवो से हो रहे पलायन की रोकथाम करना जरुरी है. महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को इस वैल्यू चेन में प्रमुख भूमिका मिले.

पहाड़ों में विगत वर्षों में मौसम के बदलने के साथ जुड़ी आपदा की घटनाएं बढ़ी हैं जिनसे व्यापक धन-जन हानि हुई है ऐसी विपरीत परिस्थितियों के लिए नीति आयोग आपदा जोखिम न्यूनीकरण (डीआरआर) पर बल देता है. नीति आयोग – एनडीएमए संयुक्त दिशा – निर्देश में “बिल्ड बैक बैटर” की अवधारणा दी गई है जिसमें पहाड़ों के लिए अलग बिल्डिंग कोड व स्लोप स्टेबिलाइजेशन मास्टर प्लान बना कर उसके अनुरूप निर्माण कार्य संपन्न किये जाएँ. रिवर बेसिन आधारित बाढ़ प्रबंधन किया जाए. जलवायु के लचीलेपन व ऊर्जा की नवीनता को देखते हुए सुदूर ग्रामों में सोलर के मिनी ग्रिड्स बनाए जाने होंगे तथा माइक्रो हाईडिल परियोजनाओं का विस्तार करना होगा. इसके साथ ही क्लाइमेट बजट व ग्रीन बॉन्ड जैसी व्यवस्था हो. इन उपायों से नीति आयोग उत्तराखंड में पलायन कम करने, स्थानीय रोजगार को बढ़ाने व राज्य को एक टिकाऊ पर्वतीय अर्थव्यवस्था में बदलने के लिए कृषि व पर्यटन में मूल्य संवर्धन, ग्रीन एमएसएमई व आपदा सहनशील अंतरसंरचना के साथ मजबूत डाटा आधारित शासन के द्वारा निर्धारित नीतियों की रुपरेखा प्रस्तुत करता है. अपनी रिपोर्ट में नीति आयोग ने हिमालयी राज्यों के लिए एक समन्वित प्राधिकरण बनाने और एक समेकित विकास मॉडल की सिफारिश की है जिसमें पहाड़ी राज्यों के लिए “वन-साइज-फिट्स-ऑल” नीति को सही नहीं माना गया है जो अभी तक चलाई जा रही है. नीति आयोग “सहकारी संघ वाद व राज्यों की परिस्थितियों के अनुसार नीति निर्माण को मान्यता देता है इसलिए हिमालयी राज्यों के लिए विशेष नीति बनाना तर्कसंगत माना गया है.

उत्तराखंड के मैक्रो व राजकोषीय परिदृश्य(2025) में उत्तराखंड राज्य की समग्र आर्थिक व वित्तीय स्थिति-बजट, राजस्व, व्यय व निवेश क्षमता का विश्लेषण करते हुए राज्य द्वारा विकास की नीति निर्माण के आधार स्पष्ट किये गये हैं.

उत्तराखंड का एसडीजी इंडिया इंडेक्स में प्रदर्शन राष्ट्रीय औसत से बेहतर है इसके बावजूद राज्य के पर्वतीय जिलों से लगातार पलायन हो रहा है. सेवाओं की गुणवत्ता दुर्बल है और गाँवों की आर्थिकी में क्षरण देखा जा रहा है. नीतियों को निर्धारित करने में जो एसडीजी कारक ध्यान में रखे जा रहे हैं उनमें ई जमीनी जीवन-योग्यता के बीच संरचनात्मक अंतर है. पर्वतीय निवास सूचक या एमएलआई इस अंतर को मापने का एक वैकल्पिक नीति उपकरण है जो यह बताता है कि पहाड़ में टिकाऊ जीवन संभव क्यों नहीं हो पा रहा है. उत्तराखंड में मुख्य समस्या दूरी, गुणवत्ता, निरंतरता और आय स्थिरता की है जिन्हें ध्यान में रखे बिना विकास नीतियाँ असमंजस का प्रदर्शन करती रहेंगी.

जारी…

प्रोफेसर मृगेश पाण्डे

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

इसे भी पढ़ें : उत्तराखंड में वित्तीय अनुशासन की नई दिशा

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