फोटो https://www.euttaranchal.com से साभार
पिण्डारी कांठा में चार दिन
पांच अक्टूबर के प्रातः ही चाय के पश्चात् चन्दोल, तेवारी, शाहजी और कीर्तिचन्द दो कुलियों को साथ लेकर आगे निकल गये. ग्यारह बजे हमने भी प्रस्थान किया. तख्ता रिज से ग्लेशियर आरम्भ हो जाता है. इस ग्लेशियर पर जापानी दल के हथोड़ा, आइस पीटन, रस्सी आदि पड़े हुए हैं. हमने अपने जुतों पर क्रेमापौनं बांध लिया और परस्पर रस्सी से संलग्न होकर आगे बढ़ने लगे. कर्नल जोशी के जूतों से बार-बार क्रेमापौनं निकलने के कारण विलम्ब होने लगा था. लगभग चार सौ मीटर आगे बढ़ने से करीब 6 मीटर चौड़ा क्रेमास को पार करने में हमें एक घण्टा लग गया. अब पचास मीटर ग्लेशियर पर ऊपर चढ़ने के पश्चात् रस्सी के सहारे चट्टान पर चढ़ना था. एक कुली के पश्चात् असलम और दूसरी कुली के पश्चात् मुझे रस्सी पर चढ़ने का आदेश हुआ.
अनिल बिष्ट ने अयापना हारनेस और कैरावाइनर मुझे दे दिया, मैं रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ता गया. रॉक क्लाइंबिंग का यह मेरा पहला अवसर था. परन्तु मुझे किसी प्रकार की कठिनाई नहीं हुई. राजेन्द्र वोरा और अशरफ ने कर्नल साहब और थ्रीश कपूर को विले करके ऊपर खींचना प्रारम्भ किया. कुछ दूरी पर मुझ से आगे बढ़ने वाला कुली हताश होकर खड़ा था, मैंने उसे पीछे हटा कर स्वयं आगे बढ़ना आरम्भ किया. 80 डिग्री तक की खड़ी चट्टान पर आगे बढ़ते हुए में लगभग 400 फिट तक ऊपर चढ़ चुका था. आगे कुछ खुले स्थान पर मैं रस्सी से पृथक होकर चट्टान पकड़ते हुए ऊपर चढ़ने लगा. इतने में पहाड़ की चोटी से आवाज आई कि बिना रस्सी के सहारे पहाड़ पर चढ़ने से दुर्घटना होने का भय रहता है.
4 बजे से सिलिट गिरना आरम्भ हो गया था, दस्ताने गीले हो गये थे. हाथ अकड़ने लगे, मैं पुनः रस्सी से संलग्न होकर लगभग छः बजे ऊपर चोटी पर पहुंच गया. शाह जी तथा अन्य सभी सदस्य 17560 फिट ऊंचाई पर ग्लेशियर में टेन्ट लगाकर बैठे थे. चाय बनी थी. अंधेरा भी हो चुका था. पीछे छूटे अन्य साथियों के सम्बन्ध में आशंका व्यक्त की जा रही थी कि वे नीचे चट्टान के सहारे या ग्लेशियर के किसी समतल भाग में आसरा लेकर बैठे होंगे. इस रिज पर नन्दाखाट अभियान दल के सदस्यों द्वारा पूर्व में छोड़े गये रिंगाल, फल और दूध के खाली डिब्बे यत्र-तत्र पड़े हुए थे. आज हम आठ व्यक्तियों को थ्रीमैन टेन्ट के अन्दर सिकुड़ कर आरे-तिरछे लेटना पड़ा. गैस सिलण्डर के गैस के गन्ध से जी मचलने के कारण एक कुली रात भर उलटी करता रहा.
छः अक्टूबर की प्रातः सूर्योदय के पश्चात् ही हम टेन्ट से बाहर निकल पाये. दूर धांकरी तक पिण्डर घाटी और द्वाली तक पिण्डर नदी के बहाव के साथ-साथ अश्व मार्ग का दृश्य बहुत मनोहरी लग रहा था. जीरो प्वाइन्ट, पाइलट बाबा के शिष्य का आश्रम और मरतोली खड़क आदि हजारों फिट नीचे खाई में दिखाई दे रहे थे. बलजूरी, पौलीद्वार, नन्दाखाट, च्यांगुच, नन्दाकोट, नन्दा भनार और लामचीर आदि उच्च हिम शिखर तथा नन्दा देवी पूर्व और नन्दा देवी मुख्य का दृश्य बहुत ही निकट से अति आकर्षक लग रहा था. इस स्थल से हमने अनेक फोटो चित्र लिये हैं.
दूरबीन से देखने पर पता चला की कर्नल साहब की पार्टी कख्ता रिज पर बैठी हैं. गत रात में ही शाह जी ने निश्चय कर लिया था कि कर्नल साहब को अब आगे न बढ़ने की सलाह दी जाय, इस आशय से एक कुली को नीचे भेजा गया. वह कुली इस अभियान से बहुत घबराया हुआ था और वापस लौटना चाहता था. दूसरे कुली प्रेम बहादूर को शुष्क मेवा और टेन्ट लाने के लिए भेजा गया. चाय लेने के पश्चात् 8 बजे चन्दोला और तेवारी रूट सर्वे करने आगे बढ़े. शाहजी और मैं एक टीले से दोनों और देखते रहे. दूरबीन से देखने पर ज्ञात हुआ कि कर्नल जोशी और कपूर साहब तख्ता रिज से नीचे वापस लौट रहे हैं तथा अन्य पांच सदस्य ऊपर की ओर बढ़ रहे हैं. चन्दोला और तिवारी भी रूट सर्वे करके वापस लौट आये थे. साढ़े नौ बजे दलिया खाकर हमारा कैम्प उठ गया. कुली के न पहुंच पाने के कारण गैस सिलेण्डर मैंने उठाया और टेन्ट, राशन आदि आवश्यक सामग्री अन्य सदस्यों को लेना पड़ा. चन्दोला, तेवारी और कीर्तिचन्द एक रस्सी पर तथा शाहजी, मैं और असलम दूसरी रस्सी पर संलग्न होकर एक दूसर के मध्य 15-20 फिट का अन्तर रखते हुए आगे बढ़ते रहे. पिण्डारी ग्लेशियर के अग्र भाग से ट्रेल पास तथा नन्दा खाट और च्यांगुच के मध्य ढलान में लगभग 15 वर्ग किलोमीटर के विस्तार में फैला यह क्षेत्र पिण्डारी कांठा के नाम से जाना जाता है. नन्दा खाट के पूर्वी और च्यांगुच के पश्चिमी ढाल से हजारों वर्ष पूर्व से एकत्रित हिम खण्डों से बने पिण्डारी कांठा के इस चौरस ग्लेशियर में हजारों क्रेमासेज हैं. बड़ी सावधानी पूर्वक आड़े-तिरछे चलते हुए लगभग तीन किमी चलने पर हम 1 बजे एक समतल ग्लेशियर पर पहुंचे. यहॉं से नीचे की ओर भयंकर केमासेज थे. अतः क्रेमपौंन बांध कर एक ग्लेशियरी टीले के 60 डिग्री ढलान पर चढ़ने का प्रयास किया गया. शाहजी और मैं पीछे रहे गये थे. आधे घण्टे के पश्चात् कीर्तीचन्द ने आकर सूचित किया कि आगे भी भयंकर क्रेमासेज हैं.
हिम शिखरों पर कोहरा घिरने के साथ ही सिलिट गिरने लग गया था. ऐसे में आगे बढ़ना उचित न समझ कर हम सभी वापस लौट आये और एक समतल ग्लेशियर में टेन्ट लगाकर विश्राम करने लगे. राशन की कमी थी, चाय पीने के पश्चात् दो पाकेट मैगी उबाल कर हम छः सदस्यों ने खाया. टेन्ट से लगभग 20 मीटर की दूरी पर ऊपर की ओर विशाल हिमखण्ड पर्वताकार खड़े थे, जिसके टूटने की आशंका से रात भर मन में भय समया हुआ था.
सात अक्टूबर को प्रातः चाय के पश्चात् चारों सदस्य पुनः उसी दिशा की ओर रूट सर्वे पर निकल गये. असलम बीमारी के बहाने लेटा रहा, 8 बजे मैंने दूरबीन से रिज कैम्प के एक टीले पर बिष्ट-बोरा दल के सदस्यों को देखा आशा हुई कि वे लोग भी शीघ्र पहुंच जायेंगे, परन्तु साढ़े ग्यारह बजे तक वे लोग फिर कहीं नहीं दिखाई पड़े .तब तक रूट सर्वे करने वाले भी वापस लौट आ गये. दलिया खाकर कैम्प उठा लिया गया. परन्तु पीछे के सदस्यों के न आने से मन में झुझलाहट थी तो राशन की कमी के कारण निराशा भी. लेकिन अति निकट ही ट्रेल पास दिखाई देने के कारण उत्साह भी बढ़ता जा रहा था कि भूखे-प्यास रहकर भी हम सफलता की सीढ़ी पर उतर ही जायेंगे. पूर्व की भांति रस्सी में संलग्न होकर हम आगे बढ़ते गये. ट्रेल पास एक दम निकट था.
नन्दा देवी का विहंगम दृश्य दिखाई दे रहा था. मन में उल्लास छाया हुआ था, परन्तु ग्लेशियर पर पड़े ताजे बर्फ पर क्रेमासेज के कारण आड़े तिरछे चलते-चलते थक चुके थे. मेरे पांव ठण्ड से अकड़ने लगे. चार बजे ट्रेल पास से लगभग पचास मीटर की दूरी पर एक समतल ग्लेशियर के ऊपर कैम्प लगाया गया. मैंने तौलिया से तुरन्त पांव साफ कर वासलेन मला और पशमीना लपेट कर स्लीपिंग बैग के अन्दर घुस गया. आधे धण्टे के पश्चात् कुछ आराम अनुभव किया. चाय लेने के पश्चात् हम ट्रेल पास कर जाना चाहते थे. टैन्ट से बाहर आने पर दूर क्षितिज पर पीछे के सदस्यों को आते हुए देख कर बड़ी प्रसन्न्ता हुई. वे हमारे पदचिन्हों और झण्डियों के सहारे आ रहे थे. चार बज कर पचपन मिनट पर हम 17707 फिट ऊंचे ट्रेल पास पर पहुंचे.
जोहार घाटी के उच्च पर्वत श्रेणियों और बुग्यालों तथा निकट ही ल्वां ग्लेशियर को देखकर हम हर्ष से उछल पड़े. एक दूसरे के गले मिले. मानों हमें सफलता मिल गई हो. पूरब की ओर निकट ही के दूसरे टीले का 1992 में जोहार घाटी की ओर से केदार सिंह मरतोलिया की पार्टी द्वारा लिये गये फोटो चित्रों का मिलान किया गया. वे भदेली ग्वार से नदी किनारे न आकर दायें च्यागुंच की ओर ऊपर बढ़ने के कारण सफल नहीं हो सके थे. हमने इस टीले से सीधे नीचे उतरने का निश्चय किया, 6 बजे तक पीछे से आने वाले सदस्य भी पहुंच चुके थे. कुली प्रेम बहादुर सहित हम ग्यारह सदस्य थे. दो गैस सिलेण्डरों में गल(बर्फ) पिघलाकर मैगी बनाई गई.
पिण्डारी कांठा की ओर ग्लेशियर से ट्रैल पास के मध्य लगभग 30 फिट ऊंचाई तक मोरेन और पथरीली भूमि है. ट्रेल पास की श्रेणी के पूर्व की ओर लाल-भूरे रंग का नंगा पहाड़ देवी कुण्ड से भी दिखाई देता है. आठ अक्टूबर के प्रातः हम सभी सदस्य ट्रेल पास पर गये, अगरबत्ती जलाई गई नन्दामाई की जयघोष के साथ कु. लता ने सब को शुष्क मेवा वितरित किया. एन.टी.एम.सी. के बैनर के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराते हुए ग्रुप फोटो चित्र लिया गया. हमने इस स्थल पर अपने इस अभियान के प्रतीक स्वरूप पत्थर खड़ा करके छः कैरन भी बनाये हैं.
ट्रेल पास से नन्दा देवी के पदतल से शिखर तक का सम्पूर्ण दृश्य बहुत ही आकर्षक दिखाई देता है. नन्दा देवी और नन्दा खाट के मध्य में लौंग स्ट्राफ कौल भी सम्मुख ही दिखता है. ग्यारह बजे तक टीले पर रोप फिक्स कर अनिल बिष्ट, नवीन तेवारी, असलम अली और प्रेम बहादुर रस्सी के सहारे नीचे उतर गये. चन्दोला और शाह जी ने बेश सम्भाला, गजेन्द्र बोरा मध्य भाग में सदस्यों को रैप्लिंग करने में सहायता कर रहा था. पांच रस्सी और रौक पिटन तख्ता कैम्प के चट्टान पर ही छोड़ आये थे. अब हमारे पास केवल पांच सौ फिट लम्बी रस्सी थी. जबकि हमें सीधे नीचे ल्वां ग्लेशियर पर उतरने के लिए दो हजार फिट लम्बी रस्सी की आवश्यकता थी. अतः पांच सौ फिट नीचे उतर कर बिष्ट और तेवारी मुख्य नाले से हट कर मोरेन होते हुए बायीं और चट्टान के पीछे रूट सर्वे करने चले गये. मैं गजेन्द्र बोरा को अपना हार्नेस तथा कैरावाइनर मुझे देने के लिए बार-बार आग्रह कर रहा था. ताकि मैं भी नीचे उतर कर रूट सर्वे करने जा सकूं.
छः सदस्य नीचे उतर चुके थे, ढाई बजे से सिलिट की वर्षा के साथ बहुत ठण्डी हवा चलने लगी. तीन बजे नीचे से सूचना मिली की वहां से नीचे उतर पाना सम्भव नहीं है और न चट्टान के मध्य कहीं टैन्ट लगाने के लिए पर्याप्त स्थान ही है, अतः ऊपर के सदस्य नीचे उतरने का प्रयास न करें. अब शाह जी का कहना था कि पुनः गत कैम्प की ओर लौट चलें और मेरा आग्रह था कि हम उसी टीले कहीं टैन्ट लगाकर दुबके पड़े रहें. जबकि उस स्थल पर हवा की गति बहुत तेज थी, अतः कीर्तीचन्द, कु. लता और मैं पुनः पूर्व कैम्प की ओर लौट आये ग्लेशियर पर टैन्ट खड़ा कर लिया. चन्दोला चाय, चीनी आदि खाद्य सामग्री लेकर नीचे उतर गया, वहां से एक गैस सिलेण्डर लाकर पांच बजे कैम्प में वापस पहुंचा. शाहजी तब तक ऊपर टीले से दोनों ओर के घटना क्रमों का अवलोकन करते रहे. आज इस प्रकार वापस लौटने तथा मौसम प्रतिकूल होने के कारण मन में क्षोभ हो रहा था कि यदि इसी प्रकार मौसम प्रतिकूल होता रहे या अधिक हिमपात हो जाये तो हम ऐसे विकट स्थल में फंस जायेंगे. जबकि हमारा लक्ष्य दो अक्टूबर तक मुनस्यारी पहुंच जाना था. अतः घर के लोग इस विलम्ब के कारण बहुत चिन्तित होंगे.
कॉफी और दलिया लेकर हम नौ बजे सो गये. कुछ देर पश्चात् मैं सीटी की आवाज सुन कर चौंक पड़ा. कुछ देर पश्चात् दूसरी सीटी लगने पर सभी सदस्य घबरा गये और चन्दोला तथा कीर्तीचन्द टार्च लेकर टीले की ओर बढ़े. वहां से भी स्पष्ट आवाज आने लगी. किसी आकस्मिक दुर्घटना की आशंका से हम बहुत भयभीत हो उठे. दस बजे असलम और अशरफ दोनों भाई ठण्ड से बुरी तरह अकड़ कर हॉंफते हुए टैन्ट में पहुंचे. उनका जूता उतारा गया. हाथ पॉंव सहला कर गरम किये. उन्हें चाय पिलाई गई. तब उन्होंने बताया की नीचे चट्टान में छः व्यक्तियों के लिए पर्याप्त स्थान न मिलने के कारण उन्हें ऊपर वापस जाने हेतु विवश किया गया. अतः अंधेरे में प्राण हथेली पर रख कर जुमारिग करते हुए आये हैं. वे चारों सदस्य सुरक्षित हैं. आज का दिन इस अभियान अवधि का सबसे निराशाजनक दिन था.
पुरवासी के सोलहवें अंक में डॉ एस. एस. पांगती का लिखा लेख ‘ ट्रेल पास अभियान ‘
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