फोटो http://www.munsiyarihotels.com से साभार
30 सितम्बर के प्रातः एक नेपाली कुली को अल्यूमीनियम की सीढ़ी के शीघ्र बुढ़ियागल के नाले तक पहुंचाने हेतु भेजा गया, साथ में दो सदस्य भी सहायक के रूप में गये. राजेश शाह, राकेश शाह और किशान लाल शाह सहित आठ सदस्यों ने यहीं से वापस लौटने का निश्चय कर लिया था. इन सदस्यों से विदाई लेकर अन्य सभी सदस्यों ने पूर्ण तैयारी के साथ 9 बजे कैम्प से प्रस्थान किया. प्रातः काल ग्लेशियरी नाले का पानी कम होने के कारण शाह जी अन्य साथियों सहित नाला पार कर ठुरा खड़क जा सकते थे. परन्तु कर्नल जोशी के आदेश से अन्य सभी साथी पुनः आधार शिविर को लौट गये. कर्नल जोशी, थ्रीश कपूर और मैं तीन व्यक्ति टैन्ट लगाकर बुढ़ियागल कैम्प में रूक गये, गत रात्रि की बनी पकौड़ी और पूड़ी खाकर रात्रि आराम से बीती, निकट ही बुढ़ियागल और पिण्डारी ग्लेशियर के टूटते रहने से रात भर भंयकर आवाज आती रही थी.
पहली अक्टूबर को करीब साढे आठ बजे सुरा खड़क से दो कुलियों के आने पर मैं भी कर्नल साहब से अनुमति लेकर उनके साथ आगे बढ़ गया. 11 बजे सुराखड़क के टीले पर पहुंचा, जहां शाह जी प्रतिक्षा में थे, आम का जूस पीकर हम कैम्प की ओर बढ़े. अनिल बिष्ट, सुभाष चन्दोला, नवीन तिवाड़ी और नीरज कुमार रूट सर्वे करने तखता कैम्प की ओर गये थे और वे वहीं रूक गये, 4 बजे तक आधार शिविर से अन्य साथी भी पहुंच गये. अब हम लगभग 15510 फिट की ऊंचाई पर स्थित ठुरा खड़क में थे. यह एक सुरम्य स्थल है. निकट ही पानी का नाला है, परन्तु लकड़ी का अभाव है. माह जून-जुलाई में सम्भवतः यह स्थल बर्फ से आच्छदित रहने के कारण बहुत नम रहता होगा. इससे ऊपर किसी प्रकार की वनस्पति न उगने के कारण मोरेन है.
दो अक्टूबर के प्रातः शाह जी एक कुली को साथ लेकर तख्ता कैम्प की ओर बढ़े. सुरा खड़क से सीधी चढ़ाई चढ़ते हुए लगभग 16550 फिट की ऊंचाई के पथरीले गिरी श्रृंखला पर टैन्ट लगाकर कैम्प स्थापित किया गया था. इसके दोनों और ग्लेशियर हैं परन्तु पानी का अभाव है. 1972 में नन्दा खाट अभियान के अवसर पर पूर्व अभियान दल द्वारा छोड़े गये तख्ते को अनूप शाह जी ने इस टीले पर खड़ा कर दिया था, तब से यह तख्ता सुरक्षित खड़ा रह कर अभियान दल के सदस्यों के लिए सकेतक का कार्य कर रहा है. आज दिन भर हम लोग दूरबीन से अपने दल के अग्रिम सदस्यों की कार्यविधि और पूर्व की ओर लामचीर में अमेरीकन दल के सदस्यों के अभियान को देखते रहे. इस शिखर पर अल्मोड़ा के सदस्यों द्वारा पांच दिन पूर्व किए गये अभियानद का पद चिन्ह एक पंक्ति के रूप में स्पष्ट दिखाई दे रहा था. इसी का अनुशरण कर अमेरीकन दल के सदस्य भी पंक्तिबद्ध होकर शिखर की ओर बढ़ रहे थे. आज का दिन पूर्ण विश्राम के साथ बीता कर्नल जोशी ने गजेन्द्र बोरा, अशरफ अली और कीर्ति चन्द को आधार शिविर जाकर रोटी सब्जी बना लाने का आदेश दिया. क्योंकि वहां पर्याप्त मात्रा में जलाने की लकड़ी उपलब्ध थी और राशन भी शेष पड़ा था. पहली अक्टूबर से रसोई का दायित्व कुमारी लता ने सम्भाला था, वह लगन और तत्परता से भोजन बना कर सबको बड़े प्रेम से खिला रही थी.
तीन अक्टूबर के प्रातः कर्नल जोशी और कपूर साहब ने एक कुली को साथ लेकर तख्ता कैम्प के लिये प्रस्थान किया. साढ़े ग्यारह बजे खिचड़ी खाने के पश्चात् डॉं. चन्द, कु. लता और मैं भी कुछ आवश्यक राशन आदि लेकर अग्रिम कैम्प के लिए चले. दो बजे कैम्प में पहुंच कर हम कुछ आगे की ओर बढ़े थे कि थोड़ी देर पश्चात् रोप फिक्स करके शाह जी वापस लौटते हुए मिले. उन्होंने बताया कि रोप फिक्स तो हो चुका है, परन्तु लूज रौक्स में पत्थर गिरने का भय है और रस्सी के सहारे 75 डिग्री अंश के ढलान पर 600 फीट ऊपर चढ़ना प्रत्येक सदस्य के वश की बात नहीं है, तथा कर्नल साहब को तो वापस लौटना ही पड़ेगा. परन्तु उन्हें ऐसा कौन कह सकता था. हम तीनों ठुरा खड़क के लिये वापस लौट आये, क्योंकि अधिक ऊंचाई पर नयी जलवायु में अभ्यस्त होने के लिए एक्लटाइजेशन के रूप में इस प्रकार लौटा-फैरी करना भी आवश्यक होता है.
बी.सी. पाण्डे के पास एक छोटा सा ट्रान्सिस्टर था, उसने बी.बी.सी. न्यूज के अनुसार देहली जा रहे उत्तराखण्ड आन्दोलनकारियों पर 2 अक्टूबर को मुजफ्फरनगर में पुलिस द्वारा गोली चलाये जाने तथा पूरे उत्तराखण्ड में तनावपूर्ण स्थिति होने के कारण कई नगरों में धारा 144 लगाये जाने के समाचार से अवगत कराया. शाम को नीरज कुमार भी वापस लौट आया था, वह इस अभियान की व्यवस्था से कुछ असन्तुष्ट था और अप्रशिक्षित सदस्यों के साथ आगे बढ़ने पर कठिनाई अनुभव कर रहा था. इस पर डॉ. चन्द कुछ नाराज भी हो गये, परन्तु नीरज कुमार, बी.सी.पाण्डे और राजेश जोशी अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के कारण वापस लौटना चाहते थे. आधार शिविर से बन कर आई कुछ रोटी और सब्जी ठुराखड़क में रखकर शेष रोटी-सब्जी तख्ता कैम्प को भेज दी गई. सात सदस्यों के लिए केवल नौ रोटी भेजे जाने पर कर्नल जोशी का रोष भरा पत्र आया. पत्र में सभी सदस्यों को आगे बढ़ने का आदेश था, परन्तु मेरा और कु.लता का नाम विशेष रूप से उल्लखित होने के कारण डॉ. चन्द असमन्जस में पड़ गये कि उन्हें अब क्या करना चाहिए. वे रात भर इसी उधेड़ बुन में रहे.
चार अक्टूबर के प्रातः चार कुलियों को जलाने की लकड़ी लाने हेतु आधार शिविर भेजा गया. नीरज पाण्डे और जोशी कैम्प में ही रहे. हम तीनाें सदस्य पूर्ण तैयारी के साथ 1 बजे पुनः तख्ता कैम्प पहुंचे. आज शाह जी ने अग्रिम दल के साथ रिज कैम्प पहुंचना था, परन्तु ज्ञात हुआ कि रिज कैम्प पर चढ़ने की कठिनाई से अवगत होकर कर्नल जोशी के आदेश से वे लोग दिन भर पिण्डारी ग्लेशियर के मध्य रूट सर्वे करते रहे, परन्तु ग्लेशियर के विशाल हिम खण्डों और लम्बे-चौड़े क्रेमासेज तथा 4-5 मीटर तक लम्बे लटके सीरेक्सेज को पार कर आगे निकल पाना बहुत कठिन था. उन्हें इन क्रेमासेज में पूर्व अभियान दलों के हेलमेट, आइसएक्स, रस्सियां और कपड़े आदि पड़े हुए भी दिखाई दिये. इस प्रकार आज का दिन व्यर्थ व्यतीत हुआ. दो बजे से मौसम प्रतिकूल होने से सिलिट की तेज बोछार पड़ने लगी और धीरे-धीरे 10 से.मी. तक बर्फ की मोटी तह जम गई. सब लोग टेन्ट के अन्दर दुबके पड़े थे. साढ़े तीन बजे डॉ. चन्द ने आकर मुझे अवगत कराया कि कर्नल जोशी और शाह जी अनुमति लेकर वे वापस लौट रहे है. अपने एक स्नेही साथी के बिछुड़ने से मन में ग्लानि अवश्य हुई. परन्तु मैं किसी भी स्थिति में वापस लौटना नहीं चाहता था.
( जारी )
पुरवासी के सोलहवें अंक में डॉ एस. एस. पांगती का लिखा लेख ‘ ट्रेल पास अभियान ‘
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