समाज

पहाड़ों में नवरात्र के दिनों की यादें

सरादों के बाद नवरात्र शुरु हो जाते हैं. इन दिनों असोज का काम यानि फसल समेटने का काम कुछ कम हो जाता है लोग उत्सव के मूड में आ जाते हैं. नई फसल भी हुई रहती है और नवरात्र के बहाने अपने ईष्टदेव को यह फसल-पानी, फल-फूल अर्पण भी कर लेते हैं.
(Traditional Navratri in Uttarakhand)

क्या ही रौनक हो जाती है इन दिनों. पहाड़ के देवी देवताओं के मन्दिर बड़े ही सुरम्य स्थानों पर बने हैं. कहीं पर पर्वत की चोटी में कहीं पर नदी यानी गधेरे के किनारे किसी जंगल में एकान्त स्थानों पर, कहीं पर घने पेड़ों के झुरमुट के बीच. लगभग हर स्थान जहां पर मन्दिर बना होता है वह स्थान अपने आप में अनूठा होता है और अपना कुछ न कुछ महत्व लिये होता है.

नवरात्रों में हमारे यहां गांव के लोग अपने नजदीकी इष्ट देवता, ग्राम देवताओं के यहां नौरत बैठते हैं मन्दिर के पुजारी और बामण के नेतृत्व में कुछ लोग मन्दिर जाते हैं और विधि विधान से पूजा अर्चना कर हरेला बोते हैं और नौ दिन तक मन्दिर में ही निवास करते हैं. सुबह, दोपहर शाम की पूजा होती है. और नौर्त बैठे लोग मन्दिर के प्रांगण में बने मन्या (धर्मशाला जैसा एक कमरा) में रहते हैं. नौर्त बैठा व्यक्ति नौ दिन तक घर नहीं जाता, भले घर में कितना ही जरूरी काम आ जाय. मान्यता है कि नौर्त बैठे व्यक्ति को गांव में हुआ नातक, सूतक भी नहीं लगता.
(Traditional Navratri in Uttarakhand)

मन्दिर में ही भोजन बनाकर महाप्रसाद बनाकर ये लोग भगवान को भोग भी लगाते हैं और स्वयं भी ग्रहण करते हैं. ये लोग नौ दिन एक छाक् खाते हैं यानि एक टाइम. नौर्त बैठे लोगों की सहायता के लिए गांव के कुछ लोग रोज मन्दिर जाकर खाना बनाने पूजा पाठ आदि में सहायता भी करते हैं और वापस घर आ जाते हैं. ये वो लोग हैं जिनको नोर्त बैठने का समय न हो या घर में अपटन हो. रोज जाने की बाध्यता भी नहीं हुई.

जो नौर्त बैठे होते हैं अपना राशन पानी ले जाते हैं और जो रोज आने जाने वाले होते हैं अपने घर से चावल, दाल, मसाले, तेल, साग-पात लेकर चलते हैं. मतलब अपने खाने का बैकर जैसा मन्दिर जाकर सब सामग्री मिलाई जाती है जैसे नैनाग-भुकार में करते हैं और सामूहिक भोज तैयार हो जाता है. यहां पर बने भोजन के क्या कहने, खाने वाला ही बता सकता है.

जब मन्दिर में नौर्त चल रहे होते हैं तब वहां ढोली भी रहते हैं. सुबह शाम नौबत बजाते हैं. दोपहर भोग आरती और शायंकालीन आरती पर जब ढोल पर बाईस प्रकार की ताल के साथ ढोल बजते हैं तो पूरा वातावरण मानो अलोकिक हो जाता है. ढोल के साथ भुकर, मजीरे, झाझर (ताव), रणसिंह बजते हैं. यहीं पर वीर रस के बाजे के साथ पुजारी बरमो करते हैं और डंगरिये के शरीर में देवता अवतरित होने लगते हैं.

घ्यान-चम-घ्यान-घ्यान-चम के साथ भुकर में ह्वा-तु-तु-चु-तू… बीच जब पुजारी. हे नारायण… परमेश्वरौ… गुरु ग्यानी छै अन्तर्ध्यानी है रूप निरन्तर छ हो भगवान नारायण तेर… कहकर बरमौ करता है तो एक कम्पन तो साधारण आदमी के शरीर में भी छूट ही जाती है. आज के युग में कुछ लोग इस पर सवाल उठा सकते हैं पर देवभूमि की यह अनोखी चीज को सिरे से नकारा भी नहीं जा सकता कुछ साक्षात घटने वाली चीजें नास्तिक आदमी को भी सोचने को विवश कर देती हैं.
(Traditional Navratri in Uttarakhand)

किसी चोटी पर या जंगल के बीच शायंकालीन आरती पर बजने वाला ढोल जब आस-पास की पहाड़ियों से टकराकर एक गूंज पैदा करता है और ये ध्वनि आस-पास के गांवों में दूर तक सुनाई पड़ती है तो सारा वातावरण भक्तिमय हो जाता है. मेरे गांव खन्तोली में श्री धौलीनाग मन्दिर, धपोलासेरा हरज्यू मन्दिर, काण्डा कासिण के ढोल सुनाई पड़ते हैं तो घर बैठे-बैठे हाथ जुड़ जाते हैं.

नवरात्र के दौरान अष्टमी या नवमी, दसमी को अलग-अलग तिथियों को कुछ मन्दिरों में परम्परानुसार मेले भी लगते हैं. हमारे गांव में पंचमी की रात को मेला लगता है. इसमें बाईस हात की मशाल मुख्य आकर्षण का केन्द्र होती है. अब आपको बताता हूं कि हम गांव में व्यक्तिगत तौर पर नवरात्र कैसे मनाया करते थे. नवरात्र मनाने का यह काम बच्चे ही करते थे इसमें बड़ों की कोई भूमिका नहीं होती थी और पता नहीं जिस परम्परा का उल्लेख में कर रहा हूं वह कुमाऊ में और कहां-कहां होती है.

पहले नवरात्र के दिन हम बच्चे अपने घर के आंगन में या तुलसी के वृदावन के पास एक मन्दिर बनाते थे. जिसे कुड़माई या कुलमाई कहते थे. कुड़ यानी मकान की माई (देवी) या कुल की देवी ( कुलमाई ). मन्दिर बनाकर उसमें एक पत्थर रखकर कुलदेवी स्थापित करते थे. अक्सर परिवार के हिसाब से ये अन्यारि देवी और उज्याई देवी में एक होती थी, अपने वंश परम्परानुसार. इसके अन्दर एक कटोरी में हरेला भी बोया जाता था. रोज शाम को हम बच्चे ही इसके अन्दर दिया जलाकर आरती भी करते थे और एक छोटी सी धूनी भी जलाते थे. गांव के बड़े मन्दिर की तर्ज पर शंख से भुकर की आवाज भी निकाला करते थे.

दसमी के दिन एक ककड़ी गाज्यो के तिनकों से पैर सींग पूंछ बनाकर बकरी का आकार देकर बलि भी कुछ बच्चे लोग देते थे. यह भी अपने परिवार की देवी के अनुसार था, कुछ में यह नहीं होता था. मुझे तो बड़ा शौक था ये कुड़माई का मन्दिर बनाने का. पन्द्रह बीस दिन पहले से छोटे-छोटे पत्थर जमा करता था. जंगल से माटखाणि से चिकनी मिट्टी लाता था जिसमें काटे हुये हरे पिरूल को मिलाकर गारा बनाता और मन्दिर तैयार करता. बकायदा गुम्बद भी कमेट से उछीटता था. हरेला काटने के बाद पत्थर की मूर्ति किसी काटेदार झाड़ी में विसर्जित करते थे और मन्दिर हटा दिया जाता और इन्तजार करने लग जाते अगले नौरतों का.
(Traditional Navratri in Uttarakhand)

विनोद पन्त_खन्तोली

वर्तमान में हरिद्वार में रहने वाले विनोद पन्त ,मूल रूप से खंतोली गांव के रहने वाले हैं. विनोद पन्त उन चुनिन्दा लेखकों में हैं जो आज भी कुमाऊनी भाषा में निरंतर लिख रहे हैं. उनकी कवितायें और व्यंग्य पाठकों द्वारा खूब पसंद किये जाते हैं. हमें आशा है की उनकी रचनाएं हम नियमित छाप सकेंगे.

इसे भी पढ़ें: ‘टपकिया’ बिना अधूरा है झोली-भात

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

कानिया के प्रेम में दीवानी सुबनी : लोककथा

रात ढलते ही जब सुबनी और लाली दोनों बहनें पानी भरने के लिए गाँव के…

19 hours ago

चीड़ की छाल को कलाकृतियों का रूप दे रहा एक कलाकार

चीड़ के जंगल उत्तराखण्ड के कुमाऊं व गढ़वाल क्षेत्र में 900 से 1500 मीटर की ऊंचाई पर बहुतायत में पाये…

20 hours ago

मेरी यादों का पहाड़ : एक बहुआयामी किताब

2013 सन् में नेशनल बुक ट्रस्ट ने देवेन्द्र मेवाड़ी की किताब 'मेरी यादों का पहाड़' छापकर सराहनीय…

22 hours ago

पहाड़ की पुकार जो खींच ले गई मुझे

नौ साल बाद पिथौरागढ़ जा रहा था. पिछले कुछ वर्षों में जब भी छुट्टी मिली, बेटी…

5 days ago

‘मनिला डांडे की देवी मां आज बहुत उदास है

देवी मां उदास है परन्तु परलोक गया पुत्र आज भी यादों में आकर उसको हिम्मत…

5 days ago

सोशियल इकोनॉमी ऑफ हिमालय : हिमालय की सामाजिक अर्थव्यवस्था का आरंभिक अकादमिक अध्ययन

पिछली कड़ी : उत्तराखंड राज्य की अवधारणा किसी एक नेता या आंदोलन से नहीं बनी…

7 days ago