फोटो: राजेन्द्र सिंह बिष्ट
पुरातन काल से ही भारतीय हिन्दू समाज में विवाह को जीवन का एक महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है. विवाह स्त्री – पुरुष का मिलन मात्र नहीं अपितु एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जहां से मानव वंश को आगे बढ़ाने, पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति करने और जीवन के विविध आयामों से जुड़ने की शुरुआत होती है. कुमाऊं अंचल में प्रचलित वैवाहिक प्रथा के सन्दर्भ में यदि हम बात करें तो हम पाते हैं कि यहां सामाजिक वर्ण व्यवस्था के अनुरुप वैवाहिक सम्बन्ध और विवाह पद्धतियां प्रचलित रही हैं और सामान्य अन्तर और विविधता के साथ कमोवेश आज भी चलन में हैं. यदि 1920 से पूर्व और उसके समकालीन समय की बात की जाय तो तत्कालीन कुमांऊ अंचल में परम्परागत तौर पर तीन तरह के वैवाहिक सम्बन्ध प्रचलित थे ( पन्नालाल, आई. सी. एस. 1920 सरकारी अभिलेख के अनुसार) जिनका विवरण नीचे दिया जा रहा है.
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विवाह संस्कार वाली पत्नी. लोगों के समक्ष जब किसी महिला को पत्नी बनाने के लिए अनुष्ठान, संस्कार तथा स्थानीय रीति-रिवाज के साथ विवाह किया गया हो भले ही वह अनुष्ठान किसी भी प्रकृति का हो. कुमाऊं अंचल में इस तरह का वैवाहिक सम्बन्ध सर्वाधिक प्रचलन में है.
ढांटी. किसी दूसरे व्यक्ति की पत्नी जो सधवा या विधवा हो अथवा पति से परित्यक्त की गयी हो, जब कोई अपनी पत्नी के रुप में उसे घर ले आता है तो वह ढांटी कहलाती है. खास बात यह है कि ढांटी को बिना विवाह संस्कार किये रखैल की तरह रखा जाता है. प्रथानुसार इसमें पूर्व पति अथवा निकटस्थ परिवार वालों को दाम चुकाना जरुरी समझा जाता है.
टेकुवा. जब कोई महिला खासकर विधवा किसी पर पुरुष को पति के तौर पर अपने घर में रख लेती है तो उस पुरुष को टेकुवा, कठवा या हल्या कहा जाता है और इस तरह के सम्बन्ध को कुमांऊ अंचल में टेकुवा की संज्ञा दी जाती है.
बुर्जुग लोगों के कथानुसार आज से आठ दशक पूर्व तक कुमांऊ के समाज में ढांटी, टेकुवा व दामतारो विवाह सम्बन्ध देखने में आते थे जो प्रायः अब नहीं दिखायी देते. आर्थिक रुप से विपन्न परिवार जब अपनी कन्या का विवाह करने में असमर्थ रहता था तब वह वर पक्ष के परिवार से कन्या का दाम लेता था और फिर कन्या का विवाह किया जाता था. यह विवाह दामतारो विवाह कहलाता था. सामाजिक – आर्थिक बदलाव और शिक्षा व जागरुकता के प्रचार-प्रसार से यहां का समाज अब विवाह के उन पुराने तौर-तरीकों से निरन्तर विमुख होने लगा है जिनकी प्रासंगिकता आज के विकसित समाज में किसी भी रुप में नहीं है.
कुछ दशक पूर्व कुमाऊं अंचल में बाल्यावस्था में ही विवाह कर देने की प्रथा प्रचलन में थी परन्तु अब शिक्षा और जागरुकता और सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में बदलाव आ जाने से यह प्रथा लगभग समाप्त हो गयी है. दरअसल तब पहाड़ में खुला समाज था, पर्दा प्रथा नहीं थी साथ ही कृषि व पशुपालन आधारित कार्यों में युवा वर्ग की अधिक भागीदारी रहती थी सो इन परिस्थितियों में गांव अथवा समीप के अविवाहित युवक व युवतियां में परस्पर मेलजोल हो जाने से भावावेश के क्षणों में शारीरिक सम्बन्ध होने व गर्भवती होने की सम्भावनाएं रहती थी. इस वजह से लोग अपनी कन्या का विवाह रजो दर्शन से पूर्व लगभग 12-13 वर्ष की उम्र में कर देते थे.
कुमाऊं अंचल में विवाह की मुख्यतः तीन पद्धतियां चलन में रही हैं जो इस तरह हैं.
अंचल विवाह. कुमाऊं अंचल में प्रायः अधिकांश विवाह इसी पद्धति के आधार पर किये जाने का प्रचलन है. इस तरह के विवाह में वर पक्ष के लोग बारात लेकर कन्या के घर जाते हैं. इसमें दूल्हे व दुल्हन के अंचल को ( जो पीले रंग का लम्बा व पतला कपड़ा होता है ) परस्पर बांध कर विवाह किया जाता है. कन्या के माता-पिता की ओर से वर पक्ष के परिवार को कन्या सौंप दी जाती है जिसे कन्यादान कहते हैं. अंचल विवाह पूर्णतः वैदिक अनुष्ठान संस्कार तथा स्थानीय रीति-रिवाज के साथ किया जाता है.
सरोल विवाह. कुमाऊं में इस तरह के विवाह को बढ़ा या डोला विवाह भी कहा जाता है. इस विवाह में वर पक्ष के लोगों द्वारा ढोल-बाजे के साथ और बगैर विवाह अनुष्ठान कर कन्या को अपने घर लाया जाता है तथा बाद में नियत मुहूर्त में वर के घर पर लग्न के अनुसार अनुष्ठानिक रीति से विवाह कार्य सम्पन्न किया जाता है. इस विवाह में दूल्हा-दुल्हन के सिर में मुकुट बांधने की प्रथा नहीं है. कुमाऊं अंचल में सरोल विवाह की प्रथा अब नहीं के बराबर दिखायी देती है.
मंदिर विवाह. जब दूल्हा – दुल्हन की शादी किसी मंदिर में की जाती है तो वह मंदिर विवाह कहलाता है. कुमाऊं अंचल में अल्मोड़ा के चितई और नैनीताल के घोड़ाखाल स्थित गोलू देवता के मंदिर सहित कुछ अन्य मंदिरों में प्रायः ऐसे विवाह सम्पन्न होते हैं. वैवाहिक कार्यक्रम एक दिवसीय होने से इसमें जोड़े का विवाह सूक्ष्म अनुष्ठानिक रीति से ही किया जाता है जिसमें दूल्हा – दुल्हन पक्ष के लोग अनिवार्यतः उपस्थित रहते हैं.
कुमाऊं अंचल में वैदिक रीतिनुसार सम्पन्न होने विवाह में संस्कार की भूमिका सबसे प्रधान होती है, जिसमें से पाणिग्रहण अथवा कन्यादान, सप्तपदी और अग्नि प्रदक्षिणा अथवा फेरों को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है इसके अलावा कुछ छोटे – बड़े संस्कार विवाह से पूर्व और बाद में भी किये जाते हैं. विशेष बात यह है कि विवाह के सभी संस्कार वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ सम्पादित होते हैं. कुमाऊं अंचल में सर्वाधिक तौर पर प्रचलित अंचल विवाह को मानक मानते हुए इसमें प्रयुक्त अनुष्ठान, संस्कार तथा स्थानीय रीति – रिवाज की विशेषताओं का उल्लेख करना उपयुक्त होगा. वैदिक रीतिनुसार सम्पन्न होने वाले वैवाहिक कार्यक्रम और उसके क्रमबद्ध चरणों का उल्लेख नीचे किया जा रहा हैं.
फोटो: राजेन्द्र सिंह बिष्ट
विवाह तय करना. कुमाऊं अंचल में परम्परानुसार सजातीय और समकक्षी परिवारों के मध्य ही उपयुक्त वर – वधू की तलाश की जाती है और जन्म कुडंली के मिलान अथवा चिन्ह साम्य हो जाने के उपरान्त ही विवाह तय किया जाता है, जिसे यहां ब्या ठैरीगो कहते हैं. इसके बाद कुल पुरोहित द्वारा शुभ मुहूर्त में विवाह की तिथि निर्धारित कर दी जाती है जिसे लगन सुझी गो कहते हैं.
निमंत्रण देना. विवाह की तिथि तय हो जाने के बाद वर व कन्या दोनों पक्षों की ओर से अपने बिरादरों, नाते – रिश्तेदार और परिचित लोगों को निमंत्रण दिया जाता है. कुमाऊं अंचल में गांव व निकट गांवों में मौखिक निमंत्रण देने की परम्परा चली आ रही है इसे यहां न्यूत देना कहा जाता है. वर्तमान दौर में छपाई किये हुए निमंत्रण पत्रों को हाथों – हाथ और डाक के माध्यम से भेजने का चलन भी बढ़ गया है. कुमाऊं अंचल के संस्कार गीतों में सुवा ( तोता ) के माध्यम से लोगों को निमंत्रण पहुंचाने ( न्यूतने ) का अलौकिक वर्णन आया है. ओ सुवा, वन में रहने वाले सुवा… तेरा तो सुन्दर हरा शरीर… पीली चोंच… चंचल आंखे… व तेज नजर है… जा सुवा सभी नगरवासियों को निमंत्रण दे आओ…
सुवा रे सुवा, बनखण्डी सुवा,
जा सुवा नगरिन न्यूत दिया
हरिया तेरो गात, पिंङली तेरो ठूंग,
रतनारी तेरी आंखी, नजर तेरी बांकी
सुवा रे सुवा, बनखण्डी सुवा,
जा सुवा नगरिन न्यूत दिया
तिलक लगाना. विवाह की तिथि से पूर्व अथवा बारात आने से कुछ समय पहले तिलक लगाने यानि पिठ्या लगूण का कार्यक्रम होता है. इसके तहत वर पक्ष की ओर से पांच अथवा सात लोग कन्या पक्ष के यहां जाकर भावी वधू को टीका लगाते है और उसे उपहार स्वरुप वस्त्र, फल, मिष्ठान व द्रव्य आदि प्रदान करते हैं. इधर कन्या पक्ष की तरफ से भी इस एवज में उपहार दिये जाते हैं. इस कार्यक्रम में वर की उपस्थिति आवश्यक नहीं होती. इस अनुष्ठान को एक तरह से सगाई का ही प्रतिरुप माना जा सकता है.
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सुआल पथाई. विवाह से एक या तीन अथवा पांच दिन पहले वर व कन्या दोनों के यहां सुवाल पथाई का कार्यक्रम होता है. सुवाल पथाई की इस विशिष्ट परम्परा में आटे से निर्मित पापड़ ( सुवाल ) तथा आटे, चावल व तिल के लड्डू ( लाडू ) बनाये जाते हैं सुवाल पथाई के लिए आटा गूथने के समय गीतों के माध्यम से पितरों को भी निमंत्रित किया जाता है. प्रतीक रुप में भंवरे से पितृ लोक जाकर उन्हें निमंत्रण देने का अनुरोध किया जाता है भंवरा कहता है कि मैं पितरों का नाम नहीं जानता… गांव नहीं जानता… पितरों का द्वार कहां होगा… जहां बादलों की रेखा होगी… सूरज, चन्द्रमा होंगे… सोने के दमकते द्वार होंगे उसी स्वर्ग में पितरों का द्वार होगा.
जाना जाना भंवरी पितरों का लोका, पितरन न्यूति,
नौ नि जाणनू, गौं नि जाणनू, कां होला पितर द्वार,
आधा सरग बादल रेख, आधा सरग चन्द्र सुरजि,
आधा सरग पितरन को द्वार, जां रे होला सुनु का द्वार
(जारी )
अल्मोड़ा के निकट कांडे (सत्राली) गाँव में जन्मे चन्द्रशेखर तिवारी पहाड़ के विकास व नियोजन, पर्यावरण तथा संस्कृति विषयों पर सतत लेखन करते हैं. आकाशवाणी व दूरदर्शन के नियमित वार्ताकार चन्द्रशेखर तिवारी की कुमायूं अंचल में रामलीला (संपादित), हिमालय के गावों में और उत्तराखंड : होली के लोक रंग पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. वर्तमान में दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में रिसर्च एसोसिएट के पद पर हैं.
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