सखा की शादी हुए दो माह बीत गए थे. इस दौरान वे केरल और राजस्थान जाकर हनीमून निबटा आये थे. इन महीनों में उन्होंने अपने उन सभी अन्तरंग मित्रों को भी निबटा दिया था जिनके बगैर अपने लौंडयुग में वे अगली सुबह के होने तक की कल्पना से आकुल हो जाया करते थे अर्थात उन्होंने शाम की पार्टियों में आना बंद कर दिया था. इस अविवाहित मित्रमंडली में दबे-खुले मुंह उनकी इस बेवफाई को लेकर रोज़ हज़ार तरह की बातें होती थीं जिनका आशय यह निकलता था कि फलाणी चीज़ के चक्कर में सखा कुत्ता बन गया है.
एक दिन सखा मेरे घर आया. उसके चेहरे पर पराजय का ऐसा भाव मैंने इसके पहले कभी नहीं देखा था. वह बालपन से संगी रहा था और उसकी हरेक भाव-मुद्रा बड़ी आसानी से पकड़ में आ जाया करती थी.
“कैसी चल रही है गिरस्ती बेटे!” देखते ही मैंने उसे दाग दिया. वह मेरे एक सवाल में छिपे हज़ार व्यंग्यबाणों से ज़रा भी आहत नहीं हुआ. उलटे उसके चेहरे पर पुरानी ट्रेडमार्क मुस्कान पसरना शुरू हो गई. पल भर में दो महीनों का कलुष ऐसे ही धुल गया.
“आजकल मैं हँसने बहुत लग गया हूँ यार! बात बात पर हँसी आती है अपने पे पैन्चो! … बात-बात पे …” उसने मेज़ पर पड़े एक कैसेट को उलटते-पुलटते हुए ऐसे ही अचानक कहा.
“हँसता तो तू पहले भी था बे!” मैंने कहा तो वह बोला – “अरे नहीं यार. ये अलग तरह की हँसी होती है. मतलब मैं दिन-रात-सुबे-शाम अपने ऊपर ही हँसता रहता हूँ. मतलब शादी के बाद जो है …”
उसने अचानक ठठाकर हँसना शुरू कर दिया और आस्तीन ऊपर कर बांह पर लगी एक खरोंच दिखाते और हँसना जारी रखे हुए पूछा – “ये बता पंडित …. ये बता कि ये क्या है …”
“कोई चोट-फोट होगी और क्या …”
“हाँ है तो चोट लेकिन इसको देख के मुझे ऐसी हँसी आ रही है तीन दिन से कि लग रहा है साली कभी ठीक ही न हो तो अच्छा …” उसका हँसना जारी था.
“ये औरतें भी ना …” उसने हँसी के अतिरेक के कारण भर गयी आँखों के कोर पोंछते हुए कहा ” … होती बड़ी मजेदार हैं साली … उस दिन क्या हुआ मुझे दफ्तर जाने की जल्दी थी तो मैंने सोचा खुद ही आमलेट बना लेता हूँ”
सखा का पुरातन आमलेट-प्रेम मित्रमंडली में किसी से छिपा न था.
“मतलब दो महीने से आमलेट नहीं खाया था यार पंडित. उसके घर में अंडा-मीट कोई नहीं खाता तो मेरी क्या मजाल होती. तो मैंने भी छोड़ दिया था. उस दिन लेकिन सुबह से जो है बॉडी ने आमलेट-आमलेट कहना शुरू किया तो मॉर्निंग वॉक के बहाने छुप के दो अन्डे खरीद लाया. लौटा तो वो सोई हुई थी. सोचा उसे पटा लूँगा किसी तरह. मुझे लगा चाय बना के दे दूंगा तो खुश हो जाएगी. चाय बना के ले गया और कुछ फ़िल्मी टाइप का रोमांटिक डायलाग बोल के उसको उठाया तो तमककर उठी और बाथरूम जाते हुए बोली – ‘ये कोई चाय पीने का टाइम है!'”
सखा ने कैसेट नीचे रख दिया था.
“यार पंडित, रोज़ साली नौ बजे तक चार-पांच चाय से कम नहीं पीती लेकिन मैं ले बनाके ले गया तो ऐसा रिएक्शन! अबे हंसूं नहीं तो क्या करूं. वो बाथरूम से आई तो मुझे जूते वगैरह पहने देख के बोली – ‘अब यही जूता रह गया था मॉर्निंग वॉक पर पहनने के लिए? वो व्हाईट वाला स्नीकर नहीं पहन सकते थे!’ मैंने थोड़ा प्यार जताने की कोशिश की तो चाय पीने को मान गयी. पहला घूँट लेते ही बोली – ‘छी! ये पत्ती कौन सी डाल दी तुमने! तुमसे तो कोई काम भी ढंग से नहीं होता.’ उधर मैं किसी चोट्टे लेंडी कुत्ते की तरह पाजामे की जेब में धरे दो अण्डों के बारे में सोच रहा था कि इनको कहाँ-कैसे फेंकूं.”
“उसने पता नहीं मेरा चोर मन कैसे पढ़ लिया और बोली – ‘तुमने ये अन्डे जेब में क्यों रखे हैं? बाहर निकालो. अरे हमारे कानपुर वाले मामा तो खाते हैं ना सब कुछ. तुम भी कभी कभी खा लिया करो. ताकत आती है. मैंने मना थोड़ी किया है. बस वो नॉनस्टिक वाले में हाथ मत लगाना जिसे जिज्जी लाई थी दिल्ली से!’
“अचानक मेरे मन में उसके लिए बड़ी मोहब्बत और इज्जत पैदा हो गयी यार भाई. मुझे लगा ये कितनी अच्छी है कि मुझे आमलेट बनाने की परमीशन दे दी बिना पूछे. मैं सीधा किचन में गया और प्याज-हरी मिर्च काट के अन्डे फेंटने लगा तो पीछे से आ गयी और पूछने लगी – ‘टमाटर कहाँ हैं टमाटर?’ ”
“मैंने कहा कि मुझे आमलेट में टमाटर पसंद नहीं हैं तो अजीब सा मुंह बना के बोली – “कानपुर वाले मामाजी कहते हैं बिना टमाटर के आमलेट बनाओ तो एसिडिटी हो जाती है … ना बाबा तुम पहले टमाटर लेकर आओ. मैं नहीं सुन रही रात भर तुम्हारी डकारें. छी!’ टमाटर लेने फ्रिज खोला तो महारानी पीछे से बोलीं – ‘टमाटर कल रात से ख़तम हैं. जाके बाहर से क्यों नहीं ले आते जल्दी से. पैर घिस रहे हैं क्या?’ ”
“तो मैं झटपट जाकर गली के कोने वाली दूकान से टमाटर ले कर आया तो सबसे पहले तो एक-एक टमाटर का मौका-मुआयना किया मैडम ने फिर बोली – ‘तुम ज़रूर वो कोने वाले सतीश के वहां से लाये होगे. तुम्हें तो ना … बच्चा भी लूट ले दिन-दहाड़े. कित्ते के दिए उसने?’ ”
“मैंने बताया कि चार रूपये के पाव भर लाया हूँ तो बोली – ‘मुझे पता था तुम्हें पैसे की कोई वकत तो पता है नहीं और पैसे पेड़ पर लग रहे हैं कोई. … जाओ इनको लौटाओ और आगे वो जो बुढ्ढा नहीं है उसके ठेले से ले कर आओ.’ ”
“अब जो है मुझको ना हंसी आने लग गयी यार पंडित. हंसी को जैसे-तैसे रोक कर मैं बाहर गया और दुबारा से सतीश के पास पहुंचा और उससे कहा कि उन्हीं टमाटरों को दूसरे रंग की प्लास्टिक की थैली में डाल कर दे दे.”
“थैली मेरे हाथ से छीनकर पहले रेट पूछा तो मैंने झूठ मूठ कह दिया कि दो रूपये के हैं. मेरी बात अनसुनी करके फिर से एक-एक टमाटर का फैमिली ट्री डिस्कस करने के बाद बोली – ‘मैंने कहा था ना … खबरदार जो आगे से उस सतीश चोर के यहाँ से कुछ लाए तो …’ दफ्तर को अब काफी देर हो रही थी. मैंने टमाटर काटने को चाकू उठाया ही था तो उसे मेरे हाथ से छीन के बोली – ‘ऐसे काटते हैं कोई टमाटर को … अब तुम जाओ जल्दी से बाथरूम. पानी गरम हो गया है. और हां ब्रश करने के लिए अलग से गरम पानी का मग्गा भर लेना …’ ”
“तो यार पंडित, कपड़े-वपड़े लेके मैं बाथरूम जाने लगा तो देखा बिचारी अन्डे फेंट रही है. मतलब जिसके घर में आज तक अंडा किसी ने नहीं छुआ वो मेरे लिए आमलेट बना रही है. ये देख कर ऐसी मति भ्रष्ट हुई कि मुझे साली पे लाड़ आ गया यार. मैंने पीछे से जाके उसकी उसकी कमर पकड़ ली …”
“कमर पकड़ी तो उसने गुस्से में कहा – ‘तुम्हें हर बखत यही गन्दा काम सूझता है …’ और जिस कांटे से अन्डे फेंट रही थी उसी से मुझ पर हमला जैसा कर दिया. तो ये यहाँ पर ज़रा सी लग गयी …” सखा ने बांह दुबारा दिखाते हुए कहा.
वह फिर हँस रहा था. उसे देख कर मेरी हँसी भी छूट गयी.
“फिर … साला आमलेट बना कि नहीं?”
“अरे किसके बाप का आमलेट पंडित. वो तो जल-भड़ी गया बिचारा. इधर बांह पर काँटा लगा और उधर उसने नीचे फर्श पर बैठ कर रोना शुरू कर दिया कि मुझसे खून हो गया करके. मैंने नीचे बैठ कर उसे मनाते-बोत्याते हुए कहा कि देखो कुछ नहीं हुआ बस खरोंच लगी है तो बिफरकर बोली – ‘इतना खून निकल रहा है और तुम कह रहे हो कुछ नहीं हुआ … चलो जल्दी से बाहर कोई रिक्शा देखो मैं तैयार होती हूँ …’ मैंने पूछा अब कहाँ के लिए तैयार होओगी तो बोली – ‘डाक्टर के यहाँ जाना है और क्या. तुम्हें तो ना मैं मंदिर भी ले जाती हू तो ऐसा मुंह बनाते हो जैसे जहन्नुम जा रहे हो …’ ”
“तो रिक्शा-फिक्शा कर के डाक्टर मित्तल के क्लीनिक पहुंचे. वहां साली ऐसी भीड़ – किसी का पैर टूटा हुआ है, किसी को एक सौ पांच बुखार, किसी को कुछ, किसी को कुछ – बारी का इंतज़ार उससे क्या होता … सीधी अन्दर घुस गयी केबिन में कि मेरे हजबैंड को देख लीजिये. इमरजेंसी है. बहुत गहरी चोट लगी है, खून-खच्चर हो रहा है …”
“डाक्टर ने मेरी खरोंच देखी तो कमीनगी से मुस्कराने लगा. यार मुझ को तो ऐसी शर्म आ गई ना पंडित … खैर फिर डाक्टर बिचारे ने मेरे आला लगाया और गला खंखारते हुए उससे पूछा कि हुआ क्या था. आँखों में इतने बड़े-बड़े आंसू ला कर उसने बोलना शुरू किया – ‘डाक्टर साहब हमारे मम्मी-पापा के घर में तो ना कोई भी अंडा नहीं खाता. एक कानपुर वाले रज्जू मामा खाते हैं बस …”
-अशोक पाण्डे
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