Featured

किलमोड़े के कांटे से टैटू

आज वैश्विक स्तर पर शरीर में तरह-तरह के टैटू गुदवाने का प्रचलन है. भारत में भी इसका प्रचलन जोरों पर है. विश्व में टैटू बनाने के कोर्स चलते हैं, जिसका एक अपना बड़ा बाजार है. भारत में बड़े शहरों में आपको शरीर में टैटू बनाने वाली दुकानें दिख जायेंगी. वहीं छोटे कस्बों में मेले इत्यादि में मशीन से टैटू बनाने वाले मिल जायेंगे.

पहाड़ों में भी इसका प्रचलन काफ़ी है, यहां मेलों में, उत्सवों में हमेशा शरीर में टैटू उकेरने वाले अक्सर मिल जाते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि पहाड़ों में मशीन से टैटू बनाने से पहले भी टैटू बनाये जाते थे.

पहाड़ों में शरीर में आकृति उकेरने का प्रचलन बहुत लम्बे समय से है. शुरुआत में लोग संस्कृत का कोई मंत्र, शिवलिंग, ॐ इत्यादि की आकृति अपनी बाह में बनवाते थे. टैटू बनाने का कार्य टम्टा जाति के लोग करते थे. इसके लिये किसी भी प्रकार की मशीन का प्रयोग नहीं किया जाता था.

कुमाऊनी में अंगों को गोदकर आकृति उभारने को गाजो कहा जाता था. इसके लिये किसी नुकीले कांटे का उपयोग किया जाता था. सबसे मजबूत और लम्बा होने के कारण अक्सर किलमोड़े के कांटे से ही टैटू शरीर के विभिन्न भागों में गोदा जाता था.

टैटू बनाने के लिये पांच या सात प्रकार के रंगों का प्रयोग किया जाता था. जिसमें तवे के नीचे की खरोंच, काली बकरी का दूध, चीड़ के पेड़ों से प्राप्त लीसा, बाजार में मिलने वाली हरी स्याही और लड़के की मां के स्तन का दूध आदि चीजों को मिलाया जाता.

इसके बाद इसे किलमोड़े के कांटे के मुंह पर रंग लगाकर शरीर के उस भाग में गोदा जाता जहां पर आकृति उकेरनी होती. वहां पर छेदकर खून निकालते और बार-बार गोदते जिससे उसमें रंग भर जाता. लोग देवताओं की आकृति, फूल-पत्ती इत्यादि अपने शरीर में गुदवाते. अक्सर टैटू बनाने वाले मेलों में मिल जाया करते. स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने के कारण इस तरह का प्रचलन अब नहीं है.      

काफल ट्री डेस्क  

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online    

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Girish Lohani

Recent Posts

हिमालय के गुमनाम नायक की कहानी

इस तस्वीर में आपको दिख रहे हैं "पंडित नैन सिंह रावत" — 19वीं सदी के उन महान…

1 week ago

भारतीय परम्परा और धरती मां

हमारी भारतीय परंपरा में धरती को हमेशा से ही मां कह कर पुकारा गया है. ‘माता…

1 week ago

एटकिंसन : पहाड़ आधारित प्रशासन का निर्माता

तत्कालीन नार्थ वेस्टर्न प्रोविनेंस यानी उत्तर प्रदेश के जिस ब्रिटिश अधिकारी ने उन्नीसवीं शताब्दी के…

2 weeks ago

बीमारी का बहम और इकदँडेश्वर महाराज का ज्ञान

संसार मिथ्या और जीवन भ्रम है, मनुष्य का मानना है वह जीवों में श्रेष्ठ व बुद्धिमान…

2 weeks ago

शकटाल का प्रतिशोध

पिछली कथा में हमने देखा कि कैसे योगनंद सत्ता तक पहुँचा, शकटाल ने अपने सौ पुत्र…

2 weeks ago

बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है

उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…

2 months ago