बात दीवाली के उन दिनों की है जब तक बाजार में सोनपापड़ी का आगमन नहीं हुआ था. हाथ से बने बतीसे को देशी सोनपापड़ी के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था लेकिन पतीसे का बाजार में कोई एकाधिकार नहीं था. वह अन्य मिठाईयों की तरह ही समान भाव से खरीदा-बेचा जाता था. लड्डू के साथ उसका थोड़ा कॉम्पटीशन था लेकिन इतना भी नहीं कि मोतीचूर के लड्डू को दुत्कार कर लोग बतीसे के पीछे भागने लगें. उन दिनों त्योहारों के समय एक मिठाई खरीदने से ज्यादा ग्राहक मिक्स मिठाई खरीदना पसंद करते थे जिसमें एक किलो के डिब्बे में तीन-तीन पीस लड्डू, बर्फी, बतीसा, रसगुल्ला, चमचम, बालुसाई और गुलाब जामुन आ जाया करते थे. इसका फायदा यह होता था कि एक तो मिठाई में एकरूपता नहीं रहती थी और दूसरा परिवार में जिसे जो पसंद होता वो उसे चाव से खा लेता था. Sonpapdi Era of Indian Civilization Satire
समय बीतने के साथ ही मिक्स मिठाई और पतीसा ग्राहकों की नजर में अपनी चमक खोने लगे थे. मिक्स मिठाई के इस चलन से ऊब चुके कुछ लोगों ने खुद को समाज में अलग दिखाने के लिए सिर्फ रसगुल्लों या गुलाब जामुन पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया. वो समय आज के जैसा नहीं था कि जहॉं गधे-घोड़ों सब तक दीवाली गिफ्ट पहुंचाना हो. उस समय सिर्फ खास रिश्तेदारों व मित्रों को ही मिठाईयॉं बॉंटी जाती थी. रसगुल्ले व मिक्स मिठाई की कीमत में ठीक-ठाक अंतर हुआ करता था इसलिए जहॉं एक किलो मिक्स मिठाई से काम चलता था वहॉं लोग आधा किलो रसगुल्ले और गुलाब जामुन से काम चलाने लगे थे. Sonpapdi Era of Indian Civilization Satire
काजू कतली ने जैसे ही मार्केट में एंट्री मारी तो लगा की बाकी मिठाईयॉं बिकना ही बंद हो जाएंगी. काजू कतली का हाल तो यह था कि अगर चखने के लिए दुकानदार से एक पीस माँग भी लो तो वो एक किलो के डिब्बे में चखे गए एक पीस का 20 ग्राम कम कर के ही तौलता था. काजू कतली खाने में तो सबसे स्वादिष्ट थी लेकिन जेब में इतनी भारी पड़ती थी कि एक दीवाली के सीजन में आप सिर्फ दो या तीन रिश्तेदारों को ही गिफ्ट कर सकते थे. कुल मिलाकर ड्राई फ्रूट्स की तरह ही काजू कतली भी एलीट क्लास की मिठाई थी जिसे गिफ्ट कर पाना मिडिल क्लास के बस की बात ही नहीं थी. मिडिल क्लास इस गिफ्ट कल्चर में ऐसा पिसा हुआ था कि चाह कर भी बाहर नहीं निकल सकता था और काजू कतली जैसा मँहगा सौदा उसके बजट का भट्टा बिठा सकता था. मिक्स मिठाई या बतीसे की तरफ लौटना आउट डेटेड होने जैसा था. जबकि रसगुल्ले और गुलाब जामुन से भी लोगों का मोह धीरे-धीरे भंग होने लगा था. एलीट क्लास अब ड्राई फ्रूट्स व काजू कतली के साथ ही कैडबरी डेरी मिल्क के गिफ्ट हैम्पर्स की तरफ निकल पड़ा था.
मिडिल क्लास के गिफ्ट और स्वीट मार्केट को रिलायंस जियो जैसे एक नए और फ्रेश चेहरे की तलाश थी जो दिखने में आकर्षक भी हो और पॉकेट के अनुरूप भी. मुकेश अंबानी ने जिस तरह टेलीकॉम मार्केट को भॉंप लिया था ठीक उसी तरह सोनपापड़ी के मालिक ने स्वीट मार्केट को भॉंप लिया था. बाजार में सभी मिठाइयों का विकल्प सोनपापड़ी उतर चुकी थी. बहुत ही आकर्षक पैक में व कम दाम पर. सोनपापड़ी ने जियो की तरह बाजार से लगभग अपने सारे प्रतिस्पर्धियों को बाहर कर दिया था. बाजार में दूसरी मिठाइयॉं एयरटेल, वोडाफ़ोन व आइडिया के ग्राहकों की तरह बहुत कम होने लगी थी. सोनपापड़ी का मार्केट में अब एकछत्र राज था. एकाधिकार के साथ-साथ बहुत सारी समस्याएँ भी साथ चली आती हैं. जैसे जियो का एकाधिकार तो था बाजार में लेकिन उसके नेटवर्क कई जगह नहीं आते थे. ठीक उसी तरह सोनपापड़ी का भी एकाधिकार तो था मार्केट में लेकिन जिधर देखो, बाजार से घर तक, सिर्फ सोनपापड़ी ही नजर आती थी. Sonpapdi Era of Indian Civilization Satire
सोनपापड़ी खाने में बुरी नहीं थी लेकिन जब दीवाली के पूरे त्यौहार में घर पर सिर्फ सोनपापड़ी के डिब्बों का अंबार लगने लगा हो तो मोह भंग होना स्वाभाविक था. अब लोगों ने एक नया तरीका ईजाद किया कि बाजार से तब तक सोनपापड़ी नहीं खरीदी जाएगी जब तक गिफ्ट में आए सारे डिब्बे ठिकाने नहीं लगा लिये जाते. शर्मा जी गिफ्ट में आया सोनपापड़ी का डिब्बा वर्मा जी को पकड़ाते तो वर्मा जी यादव जी को सप्रेम भेंट कर देते. यादव जी सोढी अंकल को चेपते तो सोढी अंकल करीम चाचा को लपेट आते. करीम चाचा भी कहॉं इस चक्र को टूटने देने वाले थे वो भी सोढी अंकल का दिया सोनपापड़ी का डिब्बा वापस शर्मा जी को बाकायदा दीवाली की गले मिलकर मुबारकबाद देते हुए पकड़ा आते. कार्ल मार्क्स द्वारा दिये गए आर्थिक मंदी के चक्र की तरह ही सोनपापड़ी का चक्र भी देश में भयानक रूप से चल पड़ा था. अब न तो सोनपापड़ी निगलते बन रही थी न ही उगलते.
इसी बीच दुनिया की भलाई में लगे एनजीओ की तरह ही कुछ सोनपापड़ी प्रेमी लोगों की भावनाएँ आहत होने लगी कि आखिर इस तरह सोनपापड़ी को दुत्कारना और दूसरों को चेपना ठीक नहीं है. वो कहते पाए जाते कि अगर आप लोगों को इतनी ही नफरत है सोनपापड़ी से तो हमें दे दिया कीजिये. हम इसका भरपूर सेवन करेंगे. आस पास के मोहल्लों में ऐसे लोगों की खोज बढ़ने लगी थी जिन्हें सोनपापड़ी के एक्ट्रा डिब्बे पकड़ा कर थोड़ा पुण्य भी कमाया जा सके और डिब्बों को ठिकाने भी लगाया जा सके. Sonpapdi Era of Indian Civilization Satire
सोनपापड़ी लोगों के लिए सौतन जैसी हो गई थी जिससे छुटकारा पाना कठिन हो गया था. मिक्स मिठाई की तरफ वापस जाना मतलब अपनी इज्जत का फालूदा करवाने जैसा था और काजू-कतली व कैडबरी की तरफ जाना मतलब अपने बजट का फालूदा करवाने जैसा था इसलिए लोगों ने सोच लिया था कि जब तक सोनपापड़ी का कोई सुंदर मजबूत सस्ता व टिकाऊ विकल्प बाजार में नहीं आ जाता तब तक सोनपापड़ी को ही व्हाट्सऐप मैसेज की तरह रिश्तेदारों व दोस्तों को फॉरवर्ड करते रहेंगे.
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नानकमत्ता (ऊधम सिंह नगर) के रहने वाले कमलेश जोशीने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक व भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबन्ध संस्थान (IITTM), ग्वालियर से MBA किया है. वर्तमान में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यटन विभाग में शोध छात्र हैं.
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