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दारमा के बेदांग में तैनात पंचाचूली के पहरेदार

‘क्यों आए, कैसे आए, परमिट दिखाओ…’ के सवाल उठने लाजमी थे. इस पर हमने उन्हें अपने परमिट दिखाए. रजिस्टर में दर्ज करते हुए जब उन्हें भान हुआ कि हममें से दो पत्रकार हैं तो उनका व्यवहार बदल गया. एक जवान दौड़कर साहेब को हमारी सूचना दे आया तो साहब भी तुरंत आ गए.  (Sin La Pass Trek 18)

परिचय के आदान-प्रदान के बाद पता चला कि वह इस पोस्ट में तैनात इंस्पेक्टर कमलजीत सिंह हैं. वह हमें अपनी बैरक में ले गए. बैरक के बीच में बुखारी जल रही थी तो वहां अच्छा-खासी गर्मी थी. थोड़ी देर में कॉफी-बिस्किट आ गए. कुछ देर बातचीत के बाद हमने उनसे टैंट लगाने की इज़ाज़त चाही तो उन्होंने तत्काल एक बैरकनुमा बड़े हॉल में हमारे रहने की व्यवस्था के लिए जवानों को बोला. हमने उन्हें बताया कि हमारे पास पर्याप्त सामान है लेकिन वह माने नहीं.

बैरक में अंदर गए तो देखा कि यह नई-नई बन रही थी. वह बैरक कम एक पूरा हॉल ही था. वहां एक ओर बैरक बनाने वालों का भी आशियाना दिखा. दो जवान एक बड़ा सा स्टोव हमें दे गए. वहां चारपाईयों में हमने अपना सामान रख दिया. बाहर हल्की बारिश होने लगी थी तो स्टोव में मैगी बनानी शुरू कर दी. अब अंधेरा घिरने लगा था. बाहर से कुछ आवाजें सुनाई दीं तो बाहर झांका. आईटीबीपी वालों की शाम की रौलकॉल चल रही थी, जिसमें उन्हें रात्रि ड्यूटी के साथ अन्य निर्देश दिए जा रहे थे. बारिश में भीगते हुए वे भी नारे लगाने के बाद सरपट अपनी बैरकों में भाग लिए.

पंकज चुपचाप था और उसकी चुप्पी का कारण मैं समझता था. मैगी बनने के बाद मैंने उसे मैगी दी तो उसने मना कर दिया. इस पर मैंने गूंजी से अब तक की सारी बातों पर अपना पक्ष रखते हुए कहा कि

अब यह रकसेक मेरे बस का नहीं है. मुझे यह अभियान पूरा कराना था अब तो वापसी में नीचे ही जाना है, जिसने ले जाना हो ले जाए. छोड़ना हो छोड़ जाए. अब मैं अपना रकसेक ही ले जाउंगा. बहुत हो गया!

बमुश्किल पंकज माना तो मैगी को मिल-बांटकर हम सब ने अपनी भूख शांत की और फिर स्लीपिंग बैग में घुस गए. दिनभर थके थे तो नींद भी जल्द आ गई.

सुबह अलसाये से उठे और चाय बनाकर पी. तैयारी के बाद पोस्ट कमांडर से मिलने गए तो उन्होंने मुस्कुराते हुए विदा किया. बेदांग में आज आईटीबीपी के जवान अपनी बैरकों को साफ करने में जुटे पड़े थे. पता चला कि कुछ दिनों में यहां सेकेण्ड कमांडेन्ट साहब का दौरा है तो उनके स्वागत की तैयारियां चल रही हैं. (Sin La Pass Trek 18)

नीचे की ओर सामने पंचाचूली समूह के तीन पर्वतों का नज़ारा कुछ अलग ही दिखाई दे रहा था. वे पहरेदार की तरह सीना ताने प्रतीत हो रहे थे. बेदांग से दस किमी आगे ‘गो’ गांव तक का रास्ता ढलान लिए हुए है. मैंने अपना रकसेक पीठ पर लादा तो महेशदा ने अपना रकसेक संजय को देकर संजय वाला रकसेक ले लिया. आधा किलोमीटर चलने के बाद उन्होंने वो रकसेक किनारे रखकर अपने हाथ खड़े कर लिए.

बापरे अजीब रकसेक है यह. नीचे घुटनों के पीछे मार रहा है और ऊपर सिर में अलग झटके दे रहा है. दिमाग में घंटे जैसे बज रहे हैं. मेरे बस का तो नहीं है यह.

कुछ दूर तक पंकज ने भी कोशिश की. बाद में मैंने पूरन को कहा कि सबने ट्राई कर लिया है अब बस तुम ही बचे हो. पूरन तुरंत तैयार हो गया. कुछ देर बाद उसने भी उस भीमकाय रकसेक को पटक दिया तो हम सब हंस पड़े. अब सभी की समझ में आ गया था कि मैं इस रकसेक की वजह से ही चिड़चिड़ा हो गया था. लेकिन पूरन ने हार नहीं मानी. उसने मुझसे छोटी रस्सी मांगी और लंबे रकसेक को उल्टाकर आधे रकसेक के पेट में रस्सी से गांठ लगा आधा कर लिया. अब रकसेक साइज में छोटा और उसके लिए सही हो गया था. उसने हंसते हुए उसे कांधों में डाल लिया. आगे एक छलछलाता गधेरा मिला तो सामान किनारे रख उसके झरने में स्नान कर हमने अपनी थकान मिटाई. (Sin La Pass Trek 18)

आज सब खुश थे. मेरी चिड़चिड़ाहट भी अब गायब हो गई थी. आगे रास्ते में भोजपत्र का जंगल मिला. धौलीगंगा नदी के उस पार तेदांग, धाकर, सिपू गांव दिखाई दे रहे थे. नीचे उतरकर नदी में बने झूलापुल को पार किया. झूलापुल से पहले बाई ओर का रास्ता गो गांव को जाता दिखा. आगे पुल पार से दातुगांव के लिए तीन किलोमीटर की मीठी चढ़ाई थी. पुल पार एक दुकान में चाय पीने वक्त तक कुछ सुस्ता लिए. धीरे-धीरे चढ़ाई में चढ़ना शुरू किया. पंकज और पूरन आगे निकल गए थे.

जगह-जगह रास्ते के किनारे में पड़ने वाली चट्टानों में स्लोगन लिखे हुए थे- ‘निराश न हों आगे अनुपम सौंदर्य मिलेगा.’ घंटेभर बाद एक मोड़ पर थकान मिटाने के लिए रुका ही था कि उप्पर से पंकज दौड़ते हुए आया, ‘जल्दी आओ, जल्दी आओ…’ उसके उकसावे पर जल्दी से मोड़ पार किया तो सामने के नज़ारे से मैं भौच्चका रह गया. (Sin La Pass Trek 18)

जारी…

– बागेश्वर से केशव भट्ट

पिछली क़िस्त: गहरे हरे रंग का गौरीकुंड और सिनला पास का शिखर

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बागेश्वर में रहने वाले केशव भट्ट पहाड़ सामयिक समस्याओं को लेकर अपने सचेत लेखन के लिए अपने लिए एक ख़ास जगह बना चुके हैं. ट्रेकिंग और यात्राओं के शौक़ीन केशव की अनेक रचनाएं स्थानीय व राष्ट्रीय समाचारपत्रों-पत्रिकाओं में छपती रही हैं.

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