लाखामंडल का महाभारतकालीन शिव मंदिर. फोटो: सुधीर कुमार
अद्भुत भारत धर्मपूजा में ए. एल बाशम लिखते हैं कि – वैदिक देवता रूद्र से शैव संप्रदाय का विकास हुआ. इनके ईष्ट देव शिवजी जो विनाश के प्रतीक थे तो सरलता की प्रतिमूर्ति भी. तभी वह शम्भु या दयावान कहे गये. ( Shiva Temple in Garhwal )
महाभारत के ‘आदिपर्व’ और ‘वनपर्व’ में रुद्रलोक का प्राप्तिस्थल मानसरोवर बताया गया. हिमालय में पुरातन जाति, ‘कशू’ जो बाद में ‘खश’ कहलायी जिसका देव “कश्शू” कहा गया. यह ‘मीर प्रदेश अर्थात कश्मीर से कुल्लू की ओर प्रसारित होते, “महासू” के नाम से लोकप्रिय हो गया. इसी कारण हिमाचल शिमला, जौनसार-भावर और रंवाई में शिव “महासू” कहे गये.
टोंस घाटी के ईष्ट देव महासू, ‘महाशिव’ का ही अपभ्रंश रहा. हिमाचल व रवाईं में शिव कहीं महासूनाग व कहीं महासू के चार स्वरूपों में पूजा गया. महासू का आगमन जहां कंश जाति के साथ काश्मीर से हुआ तो वहां की शिव पूजा ब्राह्मण विधि विधान की छाप लिए रही. वहीं “लकुलिन संप्रदाय” में रुद्राक्ष, दंड, जटा, लिंग पूजा, मद्य व वाममार्ग का प्रभाव दिखा. शिव को चम्बा और काँगड़ा के गद्दियों में ‘मणि -महेश’ और सर्वत्र “महेश्वर”कहा गया.
खस जाति ने ‘शू’ शिव, मणि महेश, महाशिव:यक्ष, यक्षिणी या जाख-जाखणी, नंदा तथा मातृदेवियों के देवस्थल बनाये. शिवालिक तक विस्तृत खशदेश में जात व यात्रा व देवी की मायके से विदाई वाले प्रसंग जैसे ‘नन्दाजात’ यात्रा की योजना साकार की. वैदिक रूद्र तथा सिंधु सभ्यता के पशुपति का संयोजन वर्तमान के शिव-महादेव के रूप में साकार होता है. इसमें आर्य व अनार्य संस्कृति का मेल है. ( Shiva Temple in Garhwal )
गढ़वाल में पांचवी से चौदहवीं शती ईसवी तक विविध मंदिरों की शिव व उमा-महेश की प्रतिमाओं व शिवलिंगों से स्पष्ट है कि यहां शैव धर्म प्रचलित रहा. ‘लिंगायत’ या वीरशैव मत जो दक्षिणी भारत में प्रचलित था, में वर्ण व्यवस्था न मानी गई व जनेऊ की जगह शिवलिंग धारण किया जाता रहा. इस का प्रभाव भी उत्तराखंड में दिखाई दिया.
गढ़वाल में इसका संकेन्द्रण ऊखीमठ रहा जो केदार, मद महेश्वर का शीतकालीन आवास रहा. शिव प्रसाद डबराल, “उत्तराखंड का इतिहास” में बताते हैं कि, ‘ईसवी पूर्व दूसरी सदी से दूसरी सदी तक उत्तराखंड में कुणिंद शासकों के समय कृष्ण, कुबेर, बलराम, स्कन्द, विशाख व शिव की पूजा की जाती रही. कुणिंद वंश के राजा अमोघमूर्ति की राज मुद्राओं में नंदीपाद और नाग अंकित थे तो दूसरी शती ईस्वी पूर्व के बाद की मुद्राओं में कार्तिकेय व राजा छत्रेश्वर की मुद्राओं पर शिव का अंकन था.
‘शुंग और कुषाण शासन में शिव पूजा सर्वाधिक प्रचलित रही तो गुप्त काल में शैव धर्म खूब फला फूला. कालिदास के काव्य में शिव महिमा का वर्णन है तो ‘कुमार संभव’ में शिव चरित का गाथा गान. चौथी शती ईस्वी और पाँचवी शती के आरम्भ में शिव-पार्वती की मूर्तियां बनी तो साथ में उनके लिंग स्वरुप की भी आराधना हुई.
गुप्तकाल में यमुना घाटी में ‘दास’ व ‘यदुवंशी’ राजवंश भी शैव थे. उमा-महेश्वर की पूजा होती थी. राजा छागलेश ने शिव मंदिर का निर्माण कराया था. गुप्त काल से उत्तर गुप्त काल और मध्य काल तक गढ़वाल में एकमुखी लिंग निर्मित होते रहे. तदन्तर एकमुखी शिवलिंग रुद्रनाथ, पौड़ी में विनसर, टिहरी में लछमोली व पलेठी तथा चमोली में गोपेश्वर में स्थापित हुए. ( Shiva Temple in Garhwal )
यशवंत सिंह कटोच ने स्पष्ट किया कि, ‘ शिव व शिव-उमा परिवार के पूजन -अर्चन रानी ईश्वरा की प्रशस्ति में वर्णित है जिसके अनुसार यहाँ शैव मत व्यापक रूप से प्रचलित रहा’.
यह मान्यता भी थी कि भव अर्थात शिव के रूप ब्रह्मा, विष्णु व महेश हैं. लिंग को कन्धों में धारण करने वाले ‘भारशिव नाग’ जिन्होंने भागीरथी नदी के जल से अभिसिंचित कर अश्वमेघ यज्ञ किये का शासन भी गढ़वाल में विद्यमान रहा.
बाड़ाहाट या उत्तरकाशी के त्रिशूल लेख में नाग राजा गणेश्वर व गुह का जिक्र है जो परम शिव भक्त रहे. इस लेख के पहिले श्लोक में कहा गया कि राजा गणेश्वर ने भव्य शिव मंदिर का निर्माण किया. इसके गर्भ गृह के मध्य में गुप्तोत्तर कालीन शिवलिंग स्थापित है. इसी काल का शिवलिंग गोपेश्वर शिव मंदिर में भी विद्यमान है.
पांचवी से आठवीं शती के एकमुखी लिंगों में गोपेश्वर समूह का चतुर्मुख लिंग तथा टिहरी गढ़वाल में कोठार व नेलेस्वर-खवाड़ा में मुख्य रहे. चतुर्भुजी शिव व उमा-महेश की सातवीं शती की प्रतिमा उत्तरकाशी थान गाँव में व इसी काल में निर्मित पार्वती मूर्ति व शिवमंदिर टिहरी-गढ़वाल में पलेठी में विद्यमान रहीं.
टिहरी के लक्षमोली में आठवीं शती की उमा-महेश की तो मलेथा में नवीं शती की नटराज शिव की प्रतिमा बनी. आठवीं से बारहवीं शती तक उत्तराखंड पर राज करने वाले कत्यूरी राजा भी परम शिवभक्त रहे.
नवीं शती से चौदहवीं शती के शिवलिंग, शिव प्रतिमाएं व उमा-महेश प्रतिमाएं उत्तराखंड में शिव पूजन का अवलोकन कराती हैं. टिहरी में सुकड़ाला के शिव मंदिर, विलेश्वर की प्रतिमा, उत्तरकाशी जिले के कमलेश्वर, गुंडियाड़ गाँव व गौर ग्राम तथा पोंटी में उमा-महेश की प्रतिमाएं हैं.
टिहरी के चक्र गाँव व वजिंग व पौंटी के साथ ही उत्तरकाशी में कमलेश्वर में नौवीं शती का लिंग, व गुंडियाड़ गाँव, गैरग्राम व डिकाल गाँव में बारहवीं शती के एकमुखी व चतुर्मुखी शिवलिंग स्थापित मिलते हैं. गुंडियाड़ गाँव में बारहवीं शती का निर्मित जटाजूट धारी शिव के मुंह की प्रतिमा है. चौदहवीं शती की शिव प्रतिमाएं टिहरी गढ़वाल में वजिन्गा व उत्तरकाशी में थान गाँव व देवलसारी में, तो उमा – महेश प्रतिमा बड़कोट में हैं. ( Shiva Temple in Garhwal )
शैव धर्म के प्रमुख तीर्थ द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक गढ़वाल में केदारनाथ में विद्यमान है. केदार कल्प अध्याय 41 के शिव-पार्वती संवाद में शिव पार्वती से कहते हैं कि ब्रह्ममूर्ति धारण कर सृष्टि की रचना मैंने इसी स्थान से की, इसकी प्राप्ति देवताओं को भी दुर्लभ है.
पंचकेदार के रूप में महा शिव पंचकेदारी में विराज करते हैं जिसमें केदारनाथ, मध्य महेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ व कल्पेश्वर हैं. लाखामंडल में केदारशिला शिवरूप में पूजी जाती है. केदारखंड के हर स्थान को शिवतीर्थ कहा जाता है. कहा गया कि, ये सन्त्यपि केदारं गमिष्याम इति क्वचित… गच्छति शिवलोक तु सत्यं सत्यं न संशय:’.
मोहनलाल बाबुलकर के आंकलन के अनुसार गढ़वाल में शिव मंदिरों की संख्या तीन सौ से अधिक है. इनमें केदार नाथ में कर्नाटक के वीर शैव संप्रदाय के रावल हैं. अन्य सभी शिव मंदिरों पर नाथों द्वारा पूजा अर्चना संपन्न कराई जाती है. नाथों की मुख्य जागीरें श्रीनगर के कमलेश्वर मंदिर, टिहरी के बूढ़ा केदार मंदिर, देवलगढ़ के सत्यनाथ मंदिर, चमोली के गोपेश्वर मंदिर और उत्तरकाशी के विश्वनाथ मंदिर में हैं. गढ़वाल के मुख्य शिव मंदिर स्थान निम्नवत हैं :
द्वादश लिंग ज्योति -लिङ्ग में विख्यात केदार नाथ.
मध्य महेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ व कल्पेश्वर के चार केदार.
उत्तरकाशी में विश्वनाथ.
गुप्तकाशी में प्राचीन मंदिर चंद्रशेखर.
रुद्रप्रयाग में कोटेश्वर, रुद्रनाथ
श्रीनगर में कमलेश्वर व निकट में भिल्ल केदार.
पौड़ी में क्यूं कालेश्वर
लैंसडौन में कालेश्वर और तड़ासर.
टिहरी चाका में कोटेश्वर, टिहरी लछमोली में लक्ष्यमोली, चौरास में किलकिलेश्वर.
लाखामंडल में लाखेश्वर.
चौंदकोट में एकेश्वर.
क्वीली भरपूर में कोटेश्वर.
घुड़दौड़स्यूं राठ में चम्पेश्वर.
असवालस्यूं में मंडनेश्वर .
कुराली लस्या में तुंगेश्वर.
डांगी बागर में घुनेश्वर.
बागी में बागेश्वर.
रमोली में भिलेश्वर.
रामासिराई में कमलेश्वर.
जोशीमठ में ज्योतिश्वरीस्वर.
ऊखीमठ में ओंकारेश्वर.
सिला अगस्तमुनि में शिल्हेश्वर.
भटवाड़ी में भास्करेश्वर.
विचला नागपुर में बामनाथ.
सितोन्स्यूं में कोटमहादेव.
गुजडू में सल्ड महादेव.
धराली में कल्पकेदार.
बड़कोट में शिवमंदिर.
वचनस्युं में वैरागना.
कालीमठ में गौरी शंकर.
पिंडर घाटी में देवाल.
घाट में वैरास कुंड
राठ चौथान में विंसर.
ऋषिकेश में नीलकंठ.
Shiva Temple in Garhwal
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जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
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