फोटो: भिटौली फेसबुक पेज से साभार
सीराकोट का किला उत्तराखण्ड के कुमाऊँ मंडल के पिथौरागढ़ जिले के डीडीहाट में है. सीराकोट का किला 800 मीटर ऊंची पहाड़ी पर बना है. इस किले का निर्माण मल्ल राजाओं द्वारा किया गया बताया जाता है. किले के बाहरी भाग का इस्तेमाल राजा द्वारा आवास के लिये किया जाता था. किले के बीच भगवान शिव तथा भैरव के मंदिर बनाये गए हैं. इसी पहाड़ी पर मलेनाथ का मंदिर व कुछ धर्मशालाएँ भी हैं. इस जगह को छानपाटा नौली के नाम से भी जाना जाता है.
यह कोट अर्थात किला तीन तरफ से प्राकृतिक चट्टानों से संरक्षित है, एक ओर से इसमें निर्माण कर संरक्षित किया गया है. इस पहाड़ी किले में 5 परकोटे बने हुए हैं जो इससे लगभग 25 मीटर की ऊँचाई में समतल स्थान के साथ-साथ मुख्य टीले से लगभग 200 मीटर नीचे हैं. यहीं से दूसरी दीवार बनी है. इन परकोटों पर संतरी के लिए कोई कक्ष नहीं बना है.
किले पर चढ़ने व उतरने के लिए बड़े-बड़े पत्थरों की सीढियां बनायी गयी हैं. वर्तमान में यहाँ मौजूद मंदिर में जाने के लिए तीन दरवाजे बनाये गए हैं. भैरों मंदिर के पास दूसरा दरवाजा मौजूद है.
सीराकोट के पूर्वी हिस्से में 500 मीटर की दूरी पर राजकोट है. भैरों मंदिर के पास से राजकोट के लिए रास्ता जाता है.
यहाँ एक लम्बी सुरंग भी बनायी गयी थी, सीधा छानपाटा नौली से जुड़ने वाली यह सुरंग अब मलबे के नीचे दब चुकी है.
चन्द राजा रुद्रचन्द के सेनापति पुरुख पन्त तीन बार राजा हरिमल्ल से पराजित हुए. पराजयों के बाद उन्होंने छानपाटा नौली में साधुवेश धारण कर सीराकोट की सूचनाएँ इकट्ठा कीं. राजा के सिपाहियों को अपने भरोसे में लेकर सीराकोट में जाने वाला पानी का मूल स्रोत नष्ट कर दिया. सीराकोट में पानी व अनाज की आपूर्ति बंद होने से राजा हरिमल्ल ने आत्मसमर्पण कर दिया.
संरक्षण के अभाव में नष्टप्रायः किले से हिमालय तथा डीडीहाट का विहंगम दृश्य दिखाई देता है.
(उत्तराखण्ड ज्ञानकोष, प्रो. डी. डी. शर्मा के आधार पर)
वाट्सएप में पोस्ट पाने के लिये यहाँ क्लिक करें. वाट्सएप काफल ट्री
हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें : Kafal Tree Online
काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री
काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें
कुमाऊँ में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान कृष्ण के जन्म का धार्मिक पर्व नहीं रही है,…
पिछली कड़ी : पहले समाज बदलो, राज्य अपने आप सार्थक हो जाएगा : इंद्र सिंह नयाल इन्द्र…
पूरी तरह आंचलिक परिवेश में तैयार, "टुकड़ा टुकड़ा जिंदगी" वरिष्ठ इतिहासकार डॉ निर्मल जोशी की नव प्रकाशित…
ये सितंबर 1994 की सुबह थी जब खटीमा में पूर्व सैनिकों का जुलूस निकल रहा था. पूर्व…
उत्तराखण्ड को सामान्यतः हिमालय, नदियों, झरनों और जलधाराओं की भूमि के रूप में जाना जाता है. किंतु…
पिछले 3 सालों से अल्मोड़ा के कुछ जागरूक युवा अल्मोड़ा मानसून मैराथन का आयोजन कर रहे हैं,जिसमें…