किताबों और ड्रेस के बग़ैर अल्मोड़ा में ‘सर्व शिक्षा अभियान’

नए शैक्षिक सत्र के शुरू होने के चार महीनों बाद भी सर्व शिक्षा अभियान के तहत एक से आठवीं तक की कक्षाओं में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को ड्रेस की रक़म चार महीने बाद भी नहीं मिल पाई है. इससे पता चलता है कि प्राथमिक शिक्षा में सुधार का सरकारी दावा कितना खोखला है. सरकार प्राथमिक एवं उच्च-प्राथमिक में पढ़ने वाले बच्चों को शिक्षा के अधिकार के तहत निशुल्क शिक्षा देने  की बात करती है, लेकिन धरालत पर परिणाम शून्य है. बच्चे स्कूल की ड्रेस के बजाय आम कपड़ों में ही स्कूल जा रहे है. सरकार की यह लचर व्यवस्था शिक्षा के अधिकार क़ानून का सीधा उल्लघंन है. ड्रेस की रक़म छात्र-छात्राओं के खाते में आनी थी,लेकिन चार महीने बाद भी कोई पैसा नही मिल सका है.

अल्मोड़ा ज़िले में लगभग 45 हज़ार बच्चे इससे सीधा प्रभावित हो रहे है. लगभग 1750 स्कूलों के बच्चों के साथ यह समस्या है. सरकारप्रति छात्र दो ड्रेस देती है जिसके लिए चार सौ रूपये प्रति छात्र दिए जाते रहे हैं. लेकिन इस वर्ष अभी तक ड्रेस को लेकर प्रकिया अधर में ही अटकी हुई है. अधिकारियों का कहना है कि इस वर्ष ड्रेस का पैसा डीबीटी के माध्यम से मिलना है, लेकिन अभी तक सरकार की तरफ से बजट जारी नही होने के कारण भुगतान नहीं हो सका है. बात यहीं आकर नहीं थमती है. ड्रेस के साथ ही कई स्कूलों में नौनिहालों को किताबें तक नहीं मिल सकी हैं, जबकि इस सत्र के चार महीने बीत चुके हैं. अगले महीने ही अर्ध-वार्षिक परीक्षा होनी है लेकिन जब किताबें ही ना हों तो परीक्षा के औचित्य को समझा जा सकता है. कई स्कूलों में अध्यापकों ने किताबें खरीद कर कामचलाऊ व्यवस्था बनाई है, लेकिन कब तक सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के प्रति दोहरा रवैया जारी रहेगा.

पूर्व में सरकार ‘सर्व शिक्षा अभियान’ के अंतर्गत अध्यापकों का वेतन महीनों तक देने में असमर्थ रही, लेकिन अब सरकार बच्चों की ड्रेस व किताबें उपलब्ध कराने में ही लाचार नज़र आने लगी है. गौरतलब है कि राज्य और केंद्र दोनों जगह बीजेपी की सरकार है उसके बाद भी केंद्र पोषित सर्व शिक्षा अभियान के बच्चों को बजट की भारी कमी झेलनी पड़ रही है.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

उत्तराखंड राज्य की अवधारणा किसी एक नेता या आंदोलन से नहीं बनी

पिछली कड़ी : एटकिंसन : पहाड़ आधारित प्रशासन का निर्माता हिमालय को जानने समझने व…

1 week ago

एक ‘युवा’ एथलीट जिनकी उम्र 92 वर्ष है!

आम तौर पर एक उम्र के बाद व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से अशक्त, बेबस…

1 week ago

रिंगाल: पहाड़ की बुनावट में छिपा रोजगार और जीवन

पहाड़ों में जीवन हमेशा प्रकृति के साथ जुड़कर चला है. यहाँ जंगल सिर्फ पेड़ों का…

1 week ago

हिमालय के गुमनाम नायक की कहानी

इस तस्वीर में आपको दिख रहे हैं "पंडित नैन सिंह रावत" — 19वीं सदी के उन महान…

4 weeks ago

भारतीय परम्परा और धरती मां

हमारी भारतीय परंपरा में धरती को हमेशा से ही मां कह कर पुकारा गया है. ‘माता…

4 weeks ago

एटकिंसन : पहाड़ आधारित प्रशासन का निर्माता

तत्कालीन नार्थ वेस्टर्न प्रोविनेंस यानी उत्तर प्रदेश के जिस ब्रिटिश अधिकारी ने उन्नीसवीं शताब्दी के…

1 month ago