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साझा कलम : फालतू पुराण

“आ गए अच्छे दिन? आज तो पलंग के नीचे से निकालकर ड्राइंग रूम तक आ गए, क्या बात है !”- जॉन लैपटॉप ने क्रिकेट बैट गुड्डू को ताना मारते हुए बोला. गुड्डू ने कुछ जवाब नहीं दिया, सिर्फ हल्की सी मुस्कराहट बिखेर दी.

“अब यहाँ से नीचे ग्राउंड तक जाओगे या वापस पलंग के नीचे? वैसे आजकल तुम्हारा काम घर की छिपकलियां,कॉकरोच, चूहे भागना ही रह गया है,बोर नहीं हो जाते एक ही काम बार-बार करते?” जॉन ने फिर ताना मारा. जॉन क्या कहना चाह रहा है, गुड्डू अच्छी तरह समझ रहा था. हालाँकि जॉन की बातों में आज का कड़वा सच है , लेकिन सच्ची बात बुरी तो लगती है.

“कहाँ पहले गर्मी की छुट्टियां आते ही, घर के बच्चे सुबह से ही बैट लेकर निकल जाते थे और शाम को ही वापस आते थे. दिन भर क्रिकेट चला करता था, कभी कलीम चाचा के बाड़े में तो कभी दद्दू के आँगन में. वहां से किसी ने भगा दिया तो आयल मिल में पहुँच गए और वहां डांट पड़ी तो छोटी स्कूल के अंदर स्टंप लगा लिए” ये सब याद करके गुड्डू उदास हो गया, लेकिन उदासी और सच्चाई का, क्या लेना-देना.

वक़्त को बदलना था, वो बदला. बच्चों को बड़े होना था , वो बड़े हुए. गुड्डू की जगह जॉन लैपटॉप और मार्क मोबाइल को लेना थी, तो उन्होंने ली. अब घर में AC में बैठकर , बर्गर -चिप्स खाते , कोल्ड्रिंक पीते.

क्रिकेट के मजे मिल रहें हैं तो बाहर ग्राउंड में, धूप में क्यों तपना!

“कभी-कभी बड़ा तरस आता है तुम पर , लेकिन करें वक़्त के साथ सब कुछ बदल जाता है, कल तुम्हारा वक़्त था, आज हमारा है “-जॉन ने झूठी सहानुभूति जताते हुए कहा.

गुड्डू जवाब दे भी क्या दे ! चुपचाप सर झुककर सुनते हुए वो वक़्त याद आया, जब उसके जलवे थे. “जिसका बैट उसकी बैटिंग पहले ये इज्ज़त हुआ करती थी बैट की और बैट मालिक की. क्या-क्या नहीं हुआ करता था क्रिकेट के मैदान में! हड्डियां भी टूटती थी और दिल भी जुड़ते थे. कमल और आरती की लव स्टोरी तो हर कोई जानता हैं. जब तक कमल बैटिंग करता था तब तक आरती खिड़की पर रहती थी. और आरती खिड़की ना छोड़े, इसलिए कमल रात-रात भर बैटिंग की प्रैक्टिस किया करता था. यहाँ तक कि उन दोनों की मिलन की रात भी उसने देखी, कितनी शर्म आयी थी उसे !

लेकिन आज खेल के मैदान भी छोटे हैं और इंसानों के दिल भी. स्कूल-कॉलेजों के मैदानों में नयी-नयी बिल्डिंग्स बन गयी, जिनमे कई सरकारी ऑफिस हैं. अब ऑफिस आयें तो उनके साथ चाय-पानी, कचोरी-समोसों की दुकानें भी आयी और साथ में आयी गन्दगी भी. मन तो ऐसा करता है प्रोग्रेस की प्लानिंग करनेवाले नेता-अफसर के घर जा-जा के उनकी टाँगे तोड़ दूँ.… लेकिन ! अरे ! अब तो खेलने के लिए आँगन तक नहीं बचे, स्कूटर, बाइक, और कार ने सारी जगह घेर ली. घर में रहनेवाले चार और गाड़ियां पाँच.

जॉन सच ही कह रहा है कि वक़्त के साथ सब बदल जाता है.

“अरे गुड्डू तुझे पता है राहुल ने एक नया गेम डाउनलोड किया, इतना इंट्रेस्टिंग गेम है कि वो तो पागल हो गया उसके पीछे, रात-रात भर लगा रहता है मेरे साथ. राहुल और राज दोनों भाईयों में हमेशा एक ही बात पे झगड़ा होता है कि लैपटॉप कौन यूज़ करेगा ? मेरे बिना तो उनका खाना भी हज़म नहीं होता ” बड़े गर्व के साथ जॉन ने कहा. “आज फिर शॉपिंग करने गए हैं, देखना कोई नया गेम ज़रूर लेकर आएंगे” -जॉन ने कॉन्फिडेंस के साथ बोला.

“काश ! वो नयी बॉल लेकर आये “-मायूस गुड्डू ने सोचा

तभी मैन गेट खुलने की आवाज़ आयी और कार अंदर घुसी.

“आ गए, देखना आते ही मेरी डिमांड करेंगे” -जॉन ने ख़ुशी से बोला

गुड्डू ने चुपचाप पलंग के नीचे देखा, सोचा चलो भाई वापस अपने घर. हॉल का दरवाज़ा खुला और राहुल और राज की आवाज़ से पूरा घर भर गया. दोनों बहुत एक्साइट थे. हमेशा की तरह दोनों में फिर लड़ाई थी.

“पहले मैं खेलूंगा”- राज ने कहा

“नहीं, पहले मैं, तू हमेशा पहले खेलता है, आज मेरा नंबर है “-राहुल ने कहा

“लैपटाप पे सबसे पहले तूने ही खेला था, आज X-BOX पे में खेलूंगा, ये मेरा है”- राज गुस्से में बोला

“तेरा कहाँ से हो गया, चाहिए तो लैपटाप ले लें, जा आज से तुझे दिया”- राहुल ने कहा

“मुझे नहीं चाहिए तेरा सड़ा लैपटॉप” -राज बोला

“वाह! बेटा आज सड़ा हो गया, कल तक तो बहुत प्यारा था “- राहुल ने जवाब दिया

“तो तू ले लें ना, इतना पसंद है तो”- राज ने नहले पे दहला मारा

“मैं क्यों लूँ , तू लें “- राहुल चिड़ गया अब

“तू लें, तू लें तू लें “- राज और ज़ोर से बोला

दोनों को लड़ता देख, गुड्डू झूठ-मूठ खांसा. जॉन ने जैसे ही तिरछी निगाहों से उसे देखा , गुड्डू छत की और देखकर गाना गाने लगा -” आसमान में उड़नेवाले मिट्टी में मिल जायेगा, कसमे-वादे , प्यार-वफ़ा , सब बातें हैं, बातों का क्या”

तीर निशाने पर लगा, जॉन एकदम से भड़क उठा, बोला -“मुझे ताना मार रहा है ना ! सीधे-सीधे बोल ना, क्या बोल रहा है ”

“मैं कहाँ कुछ बोल रहा हूँ भाईजान, थोड़ी देर पहले आप ही बोल रहे थें कि वक़्त के साथ सब बदल जाता है” -गुड्डू ने जवाब दिया. इससे पहले की जॉन कुछ बोले तभी राज आया, उसने जॉन को उठकर टेबल के नीचे रख दिया और अपना X-BOX खेलने में बिजी हो गया.

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आशीष ठाकुर मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं. फिलहाल पिछले 15 वर्षों से मुंबई में रहते हैं. पहले एडवरटाइजिंग, फिर टेलीविज़न और अब फ्रीलांसिंग करते हुए मीडिया से जुड़े हुए हैं. फिल्मों और साहित्य से गहरा जुड़ाव रखते हैं और फिलहाल इसी क्षेत्र में कुछ बेहतर करने के लिए प्रयासरत है.

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