यात्रा पर्यटन

इटली के रोम में पहाड़ की लड़की

रोम पहुंचते ही सबसे पहली बात ये पता लगी कि यहाँ के लोगों के लिए ये ‘रोमा’ है. एयरपोर्ट से लेकर बस तक, दीवारों मे, इश्तिहारों में सब जगह ‘रोमा’ लिखा है वो भी बड़ा-बड़ा. इसलिए रोमा में आपका स्वागत है. Rome Memoir by Chetna Joshi

एयरपोर्ट के बाहर टैक्सी और छोटी बसों वाले अपने यहाँ की तरह के ही थे. देखते ही आपको घेर लेने वाले. सस्ते में पहुँचाने को तैयार. एक की गिरफ्त में हम भी आने ही वाले थे. वो हमें एक काउंटर तक ले भी आया, बोला टिकट ले लो यहाँ से, सामने बस तैयार खड़ी है. ये पब्लिक ट्रांसपोर्ट वाली बस है न? थोडा मुँह बनाकर बोला ‘उसके लिए तो आपको कम से कम एक घंटे इंतज़ार करना पड़ेगा और वो होटल से दूर छोड़ेगी. ओहह!!! पर कोई नहीं. हम यूं ही तो अपने यूरो नहीं दे सकते. इससे जान छुड़ाकर हम  वहाँ चलते हैं जहां हलचल थोड़ी ज्यादा है. ऐसा लगता है कि दूर खड़े वे लोग भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट के इंतज़ार में हैं. कुछ ही मिनटों में बस भी आ गयी. बड़ी सी बस से चिकमिक ड्राईवर निकला, सिगरेट सुलगाई. समझ के बोला हाँ आधे घंटे में ये बस ‘टर्मिनी’ के लिए निकलेगी. ‘टर्मिनी’ जो रोम का सेंट्रल पॉइंट है. यहाँ पर मेट्रो, बस और ट्राम स्टेशन है. टर्मिनी से अपने बैग खींचते हम पहुंच गए -होटल बेतोजा, दे मेदितरानो, दे अजेलिओ, अतलान्तिको. ये टर्मिनी के पास में ही सामने वाली गली में है. इस गली में ट्राम की पटरियाँ देख के विदेश में होने का कुछ एहसास हुआ.

दिखने के स्टाइल से ये एक काफी पुराना होटल है. रोम वाली कोई बात नहीं है. सीसेलियन डाकुओं के सिगार लिए फोटो भी यहाँ नहीं टंगे हैं. यहाँ दो रिसैप्शनिस्ट हैं. एक को अंग्रेजी बिलकुल नहीं आती. उसने दूसरे को बुलाया. दूसरा वाला काम चलाऊ जानता है. हमारी एंट्री करके चाबियां हमें थमा देता है. होटल के एकदम पतले गलियारे के दोनों तरफ कमरे हैं. हम बिस्कुट और केक को सूंघ-सूंघ कर खाने वाले वेजिटेरियन हैं और काफी रेडी-टू-ईट लेकर आए हैं. रिसैप्शनिस्ट ने कैटल के बारे में सवाल पूछने पर बताया ‘कैटल इस नॉट एलाउड’. हाँ गरम पानी जरूर मिलेगा, होटल के बार से. उसने ये भी बताया कि बाथरूम का पानी पीने लायक नहीं है. नाश्ता कब से कब तक मिलता है बता के उसने आस-पास घूमने के लिए रोम का एक नक्शा जो उसकी डेस्क पर पड़ा हुआ था, हमें थमा दिया.

होटल में एक बाथ टब जरूर था. जिसके मजे कम से कम हम पहले दिन तो ले ही सके. ये अलग कहानी है की अगले दिन से उसमें पानी जमा होने लगा और वो हमारे किसी काम का नहीं रहा. रोम में भी ऐसा होता है!! खैर 2-3 घंटे में हम तैयार हो कर रास्ता पूछते हुए कोलोजियम की तरफ निकले. अपने एक छोटे बैग में हमने चने और खाने के कुछ और समान रख लिए हैं. एक–दो किमी से ज्यादा नहीं था कोलोजियम वहाँ से. कुछ दूर जाने पर याद आया कि सबसे पहले मेट्रो का टिकिट ले लेना चाहिए जो तंबाकू की दुकान में मिलेगा. आप रोम के बारे में जानने के लिए किसी भी वेबसाइट पर जायें, ये एक बात आपको सबसे पहले पता लगेगी कि मेट्रो के टिकट तंबाकू कि दुकान से लेने होते हैं. इसलिए पहले तंबाकू की दुकान ढूंढनी चाहिए. तंबाकू की दुकान का रास्ता पूछते हुए हम वापस आते हैं. यहां सड़क से लगा हुआ काफी हिस्सा खाली है. ये सीमेंटेड है और नीचे यहाँ वहाँ लोग बैठे हुए हैं. ये किसी गिरिजाघर का पिछवाड़ा है. हम इसके बगल से गुजरते हुए अपने होटल की पिछली वाली गली में आ पहुंचते हैं. जहां कई दुकानें हैं. सड़क पर पटरी वाली दुकानें भी हैं जिनमें जैकेट, पर्स, मफ़लर जैसी चीजें भरी हुइं हैं. काफी गहमागहमी है इस गली में. पर जिस दुकान का बोर्ड तेजी से चमक रहा है उसमें लिखा है ‘टोबेची’. तो ये है तंबाकू की वो दुकान जिसमें हमें टिकिट मिलेंगे. एक हफ्ते का टिकट 24 यूरो का है जो मेट्रो, बस, या ट्राम सब पर चलेगा. अब हफ्ते भर तक जितना मर्जी घूमो. Rome Memoir by Chetna Joshi

अब हम वापस ढलान की ओर को कोलोजियम वाले रास्ते में थे. अभी थोड़ा ही चले थे कि सड़क पर भीड़-भाड़ काफी बढ़ सी गयी. सब लोग बस एक ओर को ही चले जा रहे थे. ठीक सामने एक टूटी हुई सी इमारत दिखाई दी. क्या ये ही है कोलोजियम? दुनिया के सात आश्चर्यों में से एक? लगता तो नहीं. आगे रास्ता बैरीकेडेड था. हम थोड़ा घूम के उसके ठीक सामने पहुंचे. दूर से छोटा सा दिखने वाला कोलोजियम अब विशालकाय हो चुका है. 2000 साल से भी पुराना ये एक गोल एम्फीथिएटर है जिसमें पचासों हज़ार लोग एक साथ प्रतियोगिताओं और सार्वजनिक सभाओं के मजे लिया करते थे. उसके सामने एक इंडिया गेट जैसा एक गेट भी बना हुआ है -‘आर्क ऑफ कोंस्टंटाइन’ नाम का. ये 312 ई के कोंस्टंटाइन की जीत और शांति लाने वाले दूत के रूप का प्रतीक है. इसी के आस पास है पैलेंटाइल हिल और रोमन फोरम. ये कुछ चीजें हमारे घूमने की लिस्ट में थीं पर ये अगल–बगल हैं इसका अंदाजा बिलकुल भी नहीं था. हमने बाहर-बाहर से कोलोजियम के कई चक्कर लगाए. यहाँ काफी जगह है और चप्पे-चप्पे पर हैं बस इंसान ही इंसान. वो भी दुनिया के हर कोनों के. कोलोजियम के अंदर जाने के लिए टिकट की लाइन भी लंका पहुँच चुकी थी.

अभी तो हम वहाँ पहुंचे ही थे और उस जगह को समझने की कोशिश ही कर रहे थे कि हमें कई लोगों ने रोका. ये सब अलग-अलग टूर ओपेरेटर हैं. ये हमारे पूछे बिना ही बताने लगते हैं कि ये कितने सस्ते में और कितने पास से क्या-क्या दिखा देंगे. इनके अलग-अलग रेट हैं. पर ये सब एक ही बात बोलते हैं कि हम देरी से आए हैं और अगर अब लाइन में लगे तो हमारा नंबर आने तक टिकट काउंटर बंद होने का समय आ जाएगा और अगर टिकट मिल भी गया तो अंदर तसल्ली से देखने लायक समय ही नहीं बचा होगा. इन सबके पास अपने-अपने पम्फ्लेट्स हैं. इन सबका ये भी कहना है कि अगर हमें लाइन में टिकिट मिल भी गया, जिसकी संभावना नहीं के बराबर है, तो टिकट केवल कोलोजियम का होगा. जबकि इनके पास जो ऑफर है उसमें हम तीनों यानी कोलोजियम, रोमन फॉरम और पैलेंटाइल हिल घूम सकते हैं. ये शक्ल से इटालियन नहीं लगते. वैसे भी हम कौन सा इटालियन लोगों को पहचान सकते हैं. पर फिर भी इनकी शक्लों में अफ्रीकन, दक्षिण एशियाई, या फिर मोंगोलीयन नक्शे साफ साफ छपे हैं. कुछ एक तो हमसे सीधे हिन्दी में बात करने लगते हैं. मतलब इन्होंने भी हमारी शक्लों में छपे नक़्शे पढ़ लिए हैं. क्या बात है. ऐसा तो अपने यहाँ साउथ में भी नहीं होता. पर ये हिन्दी वाले भी हमें ये बता के मायूस ही करते हैं कि उनसे टिकिट लेने के सिवाय हमारे पास कोई चारा नहीं है. हमें लगता है हम आज बाहर-बाहर से ही घूम लेते हैं. आते ही कुछ जोरदार देख लेने का हमारा इरादा भी नहीं है. जो भी कुछ दिख जाये बस थोडा महसूस करते हुए देखना है. रोमन फोरम के गेट के बगल से जाने वाली सड़क वाली हल्की सी पहाड़ी पर हम ऊपर जा के सलाखों से अंदर देखने कि कोशिश करते हैं हमें कुछ खास दिखता नहीं. यहाँ थोड़ा ऊपर लोग भी इक्के दुक्के ही हैं हम ऊपर चढ़ते जाते हैं. और ये क्या सड़क का अंत हो गया. और अंत में एक पुराना सा गिरिजाघर आ गया है. तो इक्के-दुक्के जो भी लोग इस सड़क पर थे सब प्रार्थना करने के लिए आए हुए हैं.

गिरिजाघर अंदर से काफी सुंदर है. पर हम अंदर नहीं जाते. वापस नीचे आते हैं. अगर आज कहीं जाना ही है तो कोलोजियम के अंदर जाने के लिए ही कोशिश करनी चाहिए और वो भी सरकारी वाले सस्ते टिकट पर. क्या पता किस्मत साथ दे ही दे. और नहीं मिला टिकट तो नहीं सही.

हम कोलोजियम के सामने से उसके अंदर की ओर जाती 5-6 लाइनों में से एक में लग जाते हैं. लाइन लंबी है और थोड़ी गर्मी भी है. लाइन तो आगे बढती नहीं पर हमारे पीछे खड़े लोगों से कतार काफ़ी लंबी हो चुकी है. गर्मी में पसीना बहा तो वहाँ कई पानी बेचने वाले आ खड़े हुए. ये वाला पानी की एक बोतल 3 यूरो में बेच रहा हैं. वो थोड़ा भूरा सा है और नाटे कद का है. इतालवी बोलता है. दाम सुन के सोचती हूँ कि पानी न ही पियूं. शायद आगे कहीं नल मिल जाए. पर मेरे मन में क्या है वो शायद जान गया. बोलता है कि आगे कहीं पानी नहीं मिलेगा. ओहह!! प्यास तो लगी है. उँगलियों से इशारे में पूछती हूँ कि 2 यूरो में देगा क्या? वो जवाब में पूछता है – इंडियन? मैं सिर ऊपर नीचे हिलाती हूँ. उसकी शक्ल कहती है कि इंडियन हूँ तभी यहाँ भी मोल भाव कर रहीं हूँ. खैर आधा लीटर की बोतल थमाकर वो 2 यूरो ले जाता है. वो इटालियन बोलने वाला बांग्लादेशी है.

कुछ आधे घंटे के बाद लाइन तेज रफ्तार पकड़ती है. हम टिकिट काउंटर तक पहुँच जाते हैं. ये बाहर मिलने वाले टिकिट की तुलना में काफी सस्ता है. ये इटालियन में है और इसमें कुछ और भी इमारतें बनीं हुईं हैं. जिस तरफ सब लोग जा रहे थे, उसी तरफ हम भी चल दते हैं.

कोलोजियम के अंदर पहुंचते ही सबसे पहले नजर आता है – एक सजा-धजा ‘नल’. बिलकुल सामने, अंदर जाने वाले दरवाजे के ठीक बगल, ऐसी जगह पर जहां इसको सभी लोग देख सकें, और पी सकें फ्री का पानी. लोग ख़ुशी-ख़ुशी पानी भर भी रहे हैं और पी भी रहे हैं. तो बांग्लादेशी हमें लपेट गया. खैर!!

कोलोजियम अंदर से बहुत ही बड़ा है. इसमें कई तल हैं. यहाँ ग्लाड़िएटर्स यानि पेशेवर लड़ाके लोगों का मनोरंजन किया करते थे. ये इस समय भी लोगों से खचाखच भरा हुआ है. हमने गाइड नहीं किया हुआ है. तो हम अपने हिसाब से आराम से ऊपर नीचे, आगे पीछे हर तरफ से इसे देख लेते हैं. सारे अच्छे एंगल से फोटो भी खींच लेते हैं. दूसरों को कैमरा थमा के हम अपनी तस्वीर भी निकलवा लेते हैं. बिना ज्यादा समझे भी एक-डेढ़ घंटा तो लग ही गया इसको पूरा घूमने में. मजा भी काफी आया. यहाँ की सबसे बड़ी प्रसिद्ध ईमारत तो देख ही ली अब बाहर आराम किया जाये. बांकी सडकें तो हैं हीं यहाँ की जिंदगी को देखने के लिए.

कोलोजियम के बाहर लोगों का हुजूम है. पर एक आकार दूर से ही सबसे ज्यादा लंबा दिख रहा है. सफ़ेद लबादे में. हम जैसे जैसे हम उसकी तरफ बढ़ते हैं वो आकर साफ होता जाता है. शायद कोई किसी स्टूल पर खड़ा है. नजदीक आने पर पता चला कि ये तो एक लड़की है जिसने सफ़ेद लंबा गाउन पहना हुआ है. और ये स्टूल पर नहीं एक मोटे पेड़ के तने को जब नीचे से काटा जाए तो जो जमीन से जुड़ा हिस्सा बचता है उसपर खड़ी है. ये यहाँ कोलोजियम के सामने प्री-वेडिंग फोटो शूट करा रही है. साथ में उसका दूल्हा नीचे ही खड़ा है.

ओह ! यहाँ भी लोग ये सब करते हैं जान के अच्छा लगा. लगता है प्री वैडिंग फोटो शूट यहाँ से ही घूमता हुआ हिंदुस्तान आया है. खैर हम इस जोड़े के बिलकुल करीब आ गए. लड़के के इटालियन मूल का होने की संभावना न के बराबर लगती है, लड़की हो भी सकती है. कद का छोटा वो लड़का रंग से कुछ साउथ एशियन टाइप और चेहरे मोहरे से मोंगोलियन है. वहाँ हमारे जैसे और भी कई लोग उनको देखे जा रहे थे. घूर-घूर के. दुल्हन का गाउन बहुत लंबा है और जब वो अलग-अलग पोज बनाने इधर-उधर जाती है, फॉटोग्राफर का साथी उसके गाउन को पीछे से उठाकर संभालता हुआ ले जाता है. 

वहाँ से हम बाहर सड़क पर निकल आए. सड़क के अगल-बगल हर ओर इतिहास बिखरा पड़ा है. दिन की तुलना में इस समय सड़क काफी भर गईं हैं. सड़क पर पेंटिंग बनाने वाले, बड़े से छर्रे के बीच से निकल कर करतब दिखाने वाले, मुंह से आग का गोल-गोल गोला उड़ाने वाले, गिटार और वोइलीन बजाने वाले, ताबड़तोड़ ब्रेक डांस करने वाले नौजवान लड़के और लंबे से माइक पर इटालियन ओपेरा जैसा कुछ गाने वाली लड़कियां सब आ गए हैं. संगीत से संबन्धित लोग अपने अपने यंत्र सड़क के किनारे सेट कर रहे हैं. यदि कोई गाता है तो बैक्ग्राउण्ड स्कोर के लिए इन्स्ट्रुमेंट सेट है. आगे एक उल्टी टोपी या कोई ऐसी चीज रखी हुई है पैसे इकट्ठा करने के लिए. अगर उनका हुनर आपको पसंद आया तो आप की जो भी इच्छा हो वो आप दें, न मन हो तो न दें. ना भी दें तो भी आप देर तक वहाँ खड़े हो सकते हैं, मनोरंजन से आपको कोई रोकेगा नहीं.

लड़कों का ग्रुप सड़क पर डांस शुरू कर रहा है. उनके कैप्टन ने एक रस्सी से एक बड़ा सा घेरा बनाया है. वो दर्शकों को घेरे से बाहर रहने को कहता है. अपने ग्रुप का परिचय कराता है. इस ग्रुप में अलबीनिया से लेकर कई अलग अलग देशों के लड़के हैं. सब करंट की तरह नाचते हैं. जल्द ही वहां कुछ लोग इकट्ठा हो जाते हैं और डांस के मजे लेने लगते हैं, तो वो धीरे-धीरे घेरा छोटा करता है. एक बार फिर सबसे घेरे से बाहर ही रहने के लिए कहता है. इस तरह घेरा छोटा होता जाता है और लोग डांस करने वाले इस ग्रुप के करीब, और करीब आते जाते हैं. अंत में घेरा जिसके अन्दर ये डांसर डांस करते हैं एकदम छोटा सा हो जाता है और उसके बाहर लोगों की भीड़ बड़ी हो जाती है. अब आप डांसर के बिलकुल बगल खड़े होकर ताली बजा कर खाली तो नहीं खिसक पाओगे. आपको ये नजदीकी अपनी जेब थोड़ी ढीली करने पर मजबूर कर ही देगी. अपनी इलैक्ट्रिक परफॉर्मेंस के बाद वो सबसे टोपी को उल्टा करके अच्छे पैसे निकलवा लेता है. परफॉर्मेंस के मजे लेकर लोग खुशी-खुशी निकल जाते हैं. वो एक बार फिर घेरा बड़ा करता है. पीछे से नए लोग एक बड़े से घेरे के बाहर आ जाते हैं. और वो फिर से सबको घेरे से बाहर रहने के लिए कहता है.

सड़क के प्रोग्राम देखते हुए हम कब कहाँ से मार्केट के अंदर पंहुंच गए पता ही नहीं चला. कहाँ से कौन सा मोड पकड़ा कि हम यहाँ पहुंच गए. इन पतली गलियों में खूबसूरती से कुर्सी-मेजें लगीं हैं, मेजों पर फूल और जगमग करती मोमबत्तियां हैं, तरह-तरह के खाने-पीने की चीजें हैं और इस मंजर को आबाद करते बड़े-बूढे लोग हैं. जवान लोग तो कम ही हैं यहाँ. पर यहाँ के बूढ़े लोग, हमारे देश से इतर परेशान से नजर नहीं आते. वे खुल के हँसते बोलते हुए, स्टाइलिश कपड़े पहने हुए, जीने की चाह वाले ज्यादा लगते हैं. गली-गली में लंबी- लंबी मेजों के पीछे 15-20 के ग्रुप मे बड़े-बूढ़े बातें करते खाने-पीने में लगे हैं. शाम हो चुकी है, कुछ ही देर में रात हो जाएगी, इनको घर जा के संध्या पूजा करने की चिंता नहीं है शायद इसीलिए खाने-पीने-बतियाने में समय लगा रहे हैं. पर क्या ये टीवी भी नहीं देखना चाहते. और खबर. न्यूज़. इनको शाम को वो भी नहीं सुनना क्या? खैर ऐसे बुजुर्ग तो मेरी समझ से बाहर हैं. हम आगे बढ़ जाते हैं.

सैलानियों को यहाँ उनके बड़े बड़े झुंडों से आसानी से पहचाना जा सकता है. लोगों का हुजूम सा लगा रहता है. जैसे बड़ी बरातों में पीछे चलने वालों का टोला हो. होते-होते लाल बत्ती पर पचासों लोग इकठ्ठा हो जाते हैं. पैदल वालों की बत्ती हरी होती है तो पूरा हुजूम एक साथ ही सड़क पार कर लेता है. हाथों में नक़्शे थामे तेज-तेज चलते इन लोगों को देखकर लगता है की ये किसी खास चीज की तलाश में हैं. जब कुछ खोजना हो तो पहले तो उनका पीछा करो जिनको उसका ज्यादा पता हो. पर यहाँ सब तो सैलानी ही हैं, कुछ दिनों के लिए ही आए हुए लोग. पर इस समय जाने क्यूँ इनका पीछा करने में मजा आ रहा है. और इस तरह हम एक बड़े हुजूम का हिस्सा बन गए, जिसने छोटी बड़ी कई गलियों से गुजारकर हमें पहुंचा दिया ‘फोंताना दी ट्रावी- उर्फ ट्रावी फाउंटेन’.

पहली नजर में ट्रावी फाउंटेन बस एकबड़े तिराहे पर एक बड़े से महल के आगे बना दुनिया का सबसे मशहूर फव्वारा है जिसमें सिक्के डालने से मुराद पूरी होती है. फव्वारे में पानी एक से दूसरी मूर्ति में और आगे बने एक हौदे में घूमता रहता है. हौदे में समुद्र के देवता ‘नेपच्यून’ और कुछ और भी मूर्तियाँ- आकृतियाँ हैं. कुछ नकली चट्टानें हैं. आगे कुछ सीढ़ियाँ बनीं हुई हैं जो लोगों से खचाखच भरीं हुईं हैं. सीढ़ियों पर बैठने के लिए जगह पाने के लिए थोड़ा इंतजर करना पड़ सकता है. पर ये इससे इतर बहुत कुछ है ये बात जहन में बैठाने के लिए यहाँ फुर्सत से शाम गुजारनी जरुरी है. भागते हुए तो हमारे सामने से बस चीजें निकल जातीं हैं. अंदर उतारने के लिए तो ठहरना ही पड़ता है.

ऐसा लगता है दुनिया में जितने भी रंग और रूप के लोग हैं वो सब इस समय यहाँ पाये जा सकते हैं. हर उम्र के मजेदार लोग हैं यहाँ. रोम में इस समय को जीने के हिसाब से ये शायद जगह सबसे उम्दा जगह थी. बस बैठने को जगह मिल जाए तो यहाँ दुनियाँ भर के अजब-गजब लोगों को देखते हुए शामें निकाली जा सकती हैं. एक बार जगह मिल जाने पर सीढियों पर बस पड़े रहो. कुछ लोग फव्वारे की तरफ पीठ करके हाथ को ऊपर ले जाकर हौदे में सिक्के डालने में लगे हैं. ये सिक्के हमारे रुपए वाले सिक्के नहीं हैं, बल्कि यूरो वाले सेंट हैं. जाहिर है हमारा दिल इनको कहीं चढ़ावे में डालने जितना बड़ा बिलकुल भी नहीं है. सभी फाउंटेन की बाउंडरी के पास जाकर फोटो निकालना चाहते हैं. जैसे ही बाउंड्री पर कोई स्लॉट खाली होता है, तुरंत ही दूसरा वहाँ पहुँचकर उसको भर देता ही. हम भी किसी अच्छी जगह के खाली होने के इन्तजार में हैं, और बहरहाल वेटिंग टाइम में दूसरों के मजे से मजे ले रहे हैं. कुछ लोग यहाँ अकेले ही घूमने आये लगते हैं. ये सामने खड़ी मंगोलियाई नक़्शे वाली कन्या उनमें से एक है. इसकी पीठ की तरफ ट्रावी फाउंटेन है, इसके एक हाथ में मोबाइल है,जिसमें कैमरा सेल्फी मोड में है. अपने दूसरे हाथ को वो बार बार ऊपर अपने मुह की तरफ ले जाती है और खुद को ही स्माआआआइल बोलती है. मुसकुराती है. फोटो क्लिक करती है. बेचारी की लगातार चौड़ी होती जा रही स्माइल भी शायद उसको संतोषजनक फोटो नहीं दे पा रही. तभी तो लगी है इतनी देर से.

खैर वहाँ दूसरे लोगों पर ध्यान लगाती हूँ. सामने ही तो एक अस्सी से भी ऊपर के से लगने वाले बुजुर्ग खड़े हैं जो अपने से काफी जवान दिखने वाली पार्टनर को चूमने की कोशिश में लगे हुए हैं. उनके भी एक हाथ में मोबाइल है. कहने की जरूरत ही नहीं कि मोबाइल सेल्फी मोड में है. वे ऐसा करते हुए फोटो खींचना चाहते हैं. पर उन बेचारे की पार्टनर तो उनकी इस ख्वाहिश से एकदम ही बेपरवाह अपनी अकेले की ही बढ़िया फोटो निकालने की जुगाड़ में लगती है.

हम गली-गली होते हुए काफी बाजार घूम लेते हैं. काफी होटलों को बाहर से ही घूर लेते हैं. रुपए में कमा के यूरो में खर्च करने में जो आफत सी लगती है, वो भी समझ में आने लगी है. हर चीज की कीमत को जब यूरो से रुपए में बदल के आंकों तो लेने का मन ही खतम हो जाता है. यूं ही काफी समय निकल जाता है. हमारे पास घूमने के लिए अभी कई दिन और हैं. कल काम भी है सो अब वापस चलना चाहिए. आज के लिए इतना ही काफ़ी है.

हम बस स्टॉप पर पहुँचते हैं. वहाँ हर बस के नंबर पढ़ते हैं. हमारे साथ बस स्टॉप पर 15-20 लोग और भी खड़े हैं. धीरे-धीरे सभी की बसें आ जाती हैं. हमारे नंबर वाली बस करीब एक घंटे बाद आती है. खैर 11 बजे के करीब वो बस हमें टर्मिनी में उतार देती है. इन सबमें हमने खाना तो खाया ही नहीं. भूख बहोत तेज़ लगी है. होटल के बार से गरम पानी ले कर हाफ कुक्ड पोहे में डालकर शायद आज का काम चल जाये. ये सोचकर हम वापस थके हारे वापस आ जाते हैं. पर न रे खाने के मामले में किस्मत बिलकुल साथ नहीं है. दुबारा फटाफट जूते पहनो और निकल लो और आधी रात में जो भी कुछ मिल जाए बस टूट पड़ो.

हमारे होटल के बगल में यहाँ दो-तीन एक रेस्टोरेंट हैं. हम इतनी मश्श्कत कर चुके हैं कि बिना सोचे समझे एक में घुस जाते हैं. अरे ये होटल तो बांग्लादेशी का निकला. अंदर सब कुछ हिन्दुस्तानी टाइप है. पर कमाल है रोम की सबसे खास जगह पर बांग्लादेशियों ने यूं ही होटल खोले हुए हैं? पर पिज्जा बनाना इनके बस की बात बिलकुल नहीं. ये तो दिल्ली की किसी तंग-गली में मिलने वाले पिज्जे से भी कई गुना बेकार निकला. हमारा इस मामले को लेकर मूड काफ़ी ख़राब हुआ, आपस में लड़ाई हुई जिसका बखान करना मुमकिन नहीं और आधा खाने के बाद उसको छोड़ना भी पड़ा. यूरो बर्बाद होने का जो अफसोस हुआ सो अलग.

तो हम रोम आये क्यूँ हैं? घूमने?? जी नहीं लेकिन जी हाँ. नहीं क्यूंकि हिंदुस्तान से उठकर केवल घूमने के लिए परदेस आयें ऐसे हम नहीं हैं. मतलब उतने पैसे तो नहीं हैं हमारी अंटी में. मेरे लिए ये एक ऑफिशियल ट्रिप है प्रोजेक्ट के सिलसिले में. खास बात ये थी कि प्रोजेक्ट यूएन की एक संस्था का है. इस अमीर संस्था ने आने से काफ़ी पहले ही रहने की बुकिंग कर दी और साथ ही साथ आने जाने, खाने-पीने के लिए एडवांस सीधे अकाउंट में डाल दिया. जब यूरो हिन्दुस्तानी रूपये में बदला तो कमाल हुआ. यूरो में तो कुछ सौ ही था, रुपए में बदलने पर समझ आया कि अगर थोडा खींच-तान के चला जाये तो इससे दो लोगों का खर्चा निकल सकता है. ये बात मजेदार है. जब दो के जितना खर्चा दे रहे हैं, तो क्यूँ न दो लोग ही चले जाएँ? Rome Memoir by Chetna Joshi

पर क्या ये ठीक रहेगा? मतलब ऑफिशियल ट्रिप को पर्सनल बनाने के बारे में सोचना वो भी अब जब कि जाने में कुछ 15-20 दिन ही बचे हैं? ऑफिस में नयी-नयी आई चेतना ही नाम की एक कलीग ने अपने बारे में कुछ ऐसा बताया की बात तय हो गयी. चेतना को यहाँ ज्वाइन किये हुए अभी कुछ हफ्ते ही हुए हैं. लड़की हिम्मती है, बातों-बातों में राजों को आसानी से खोलने वाली. मतलब जो बात शायद मैं कभी-किसी को न बताऊँ ये सोच के कि दूसरा इस बारे में जानकर मेरे बारे में कुछ छोटा सोचेगा, कम करके अँकेगा, मुझे जज करेगा, ऐसी बातों को वो बिना किसी हिचक के पहली मुलाक़ात में ही बता सकती है. उसकी बातें जतातीं हैं कि वो अपनी ही खाल के अंदर सुकून से रहने की प्रैक्टिस कर रही है. खैर वो मुझे पसंद आ रही है और उसकी बातों के इस समय मेरे लिए मायने हैं. वो अपनी पुरानी नौकरी में कई बार विदेश घूमी है और हमेशा अपने बॉयफ्रेंड को भी साथ ले गयी है. बोली इसमें दोबारा सोचने जैसी कोई बात नहीं है. हमें कहाँ रोज-रोज मौके और छुट्टी मिलती है विदेश जाने की, इसलिए दोस्त मौका मत छोड़ो. बस फटाफट मैंने फोन लगाया, वेद ने भी बोला कि सभी बोल रहे हैं ‘मौका है तो छोड़ो मत’. तो इस तरह हम दोनों ही रोम पंहुंच गए. और अब एक बेहतरीन इतवार यहाँ गुजर चुके हैं.

यहाँ आने के अगली ही शाम भटकते हम एक बड़ी रोशनी से नहाई ईमारत में पीछे की तरफ से पंहुचे पर वो बंद निकली. ये भी कोई गिरिजाघर ही लगता है. पर बींचों-बीच वाली इमारत से जो मीनार निकली है उसमें एक घंटा है. एक बड़ी सी घड़ी भी लगी है. तो इसको घंटा घर मान लेते हैं. दायीं और बायीं तरफ भी शानदार बिल्डिंग थी. इस जगह के बींचो बीच पत्थर का एक घुड़सवार खड़ा था. तीनों ही इमारतों में ऊपर छत पर थोड़ी थोड़ी दूरी पर लम्बे लबादे वाले इसाईं संत जनों की छोटी-छोटी मूर्तियाँ लगाई हुई हैं. सामने से जा के देखने पर पता लगा कि हम यहाँ अकेले नहीं हैं और ठीक सामने कुछ और भी लोग इसे देख रहे थे. वहाँ कुछ पुलिस वाले भी हैं. हम पुलिस के पास गए ये पूछने कि ये जगह क्या है और हम कैसे अंदर जा सकते हैं? पर ये पुलिस वाले लोग बिलकुल भी अंग्रेजी नहीं जानते. पर उसमें से एक हाथ हिला के बोला ‘क्लोज्ड क्लोज्ड’. फिर इटालियन में जो बोला उसका मतलब ये ही हो सकता है कि ‘कल आना’. हम फिर से आने के इरादे के साथ वहाँ से निकल लिए. बाद में पता ये चला कि ये जगह ना घंटा घर है और ना ही गिरिजाघर बल्कि ये एक म्यूज़ियम है, ‘केपिटोलीन म्यूज़ियम’, 1471 में बना हुआ, और ये भी कि यहाँ एंट्री के लिए टिकट है.

पर इस जगह की सबसे खास बात यहाँ मौजूद शेर वाला खंभा और शेरों के मुह से निकलता पानी था. पुलिस से इशारों में पूछकर पक्का हो गया कि हम इस पानी को पी सकते हैं. हमारे पीछे और भी लोग वहाँ अपनी बोतलें भरने लगे. तो फाइनल्ली हमें फ्री पानी वाली जगह मिल चुकी थी. अब तो अगले कई दिनों तक यहाँ आना जाना लगा रहेगा.

देर रात होटल पंहुचने से पहले ब्रैड, थायलैंड का बना चिल्ली सॉस, आम और आड़ू सा दिखने वाला टमाटर जैसे टेस्ट का फल, एवोकैडो जिसका नाम काफ़ी सुना है पर खाया कभी नहीं है, एक छुरी, प्याज, टमाटर हम एक गेट (इंडिया गेट टाइप) के सामने वाले स्टोर से ले लेते हैं. हम सॉस में ग्रीन लेबेल देख रहे हैं. दुकान का मालिक जो कि एक यंग और स्मार्ट सा लड़का है हमें बिना पूछे ही बताता है कि ये ‘वेज’ है. वो कहाँ का है? बांग्लादेश का. कलकत्ता और दिल्ली भी रहा हुआ है. ये ठीक-ठाक बड़ा स्टोर उसका अपना है. मतलब वो मालिक है इसका. अच्छी हिन्दी और इटालियन जानता है. परिवार भी सब यहीं बस गए हैं उसके. स्टोर से फल और दूसरे सामान लेकर फ्रिज में रखने वाला आइडिया मस्त चला. सारी प्रोब्लेम ही सॉल्व. इंग्लिश ब्रेकफास्ट वैसे भी हमारे होटल में ठीक ठाक है. अब तो कहीं भी घूमो. खाने कि फिक्र नहीं. अगले 6 दिन मस्त जाएंगे.

वेद ने पूरे दिन एक एक जगह के कई कई चक्कर लगाए. शाम को उन्ही जगहों में भाग-भाग के हम फिर से जाते, कभी गुम भी हो जाते और फिर किसी गलत मोड़ से कुछ नया मिल जाता. इस तरह रोम की अगली चार शामें हमने इकट्ठा देखीं. पांचवे दिन बस 2 घंटे का काम था फिर पूरा दिन फ्री. छठे दिन दोपहर की हमारी फ्लाइट थी वापसी की. अब किस दिन क्या-क्या देखा वो तो कुछ याद नहीं. पर जहन में जो खाका बना उसमें खास था रोम की सड़कों पर साइकल सवारों के झुंड. आप सड़क पर बेपरवाह चल रहे होते हो और ये एकदम सर्रर्रर्र से आप के एकदम करीब से गुजर जाते हैं. ये बस आते हैं और कुछ लम्हों के लिए सड़क पर कब्ज़ा कर लेते हैं. बाकी सब कुछ थम सा जाता है. कुछ वैसे ही जैसे दाना चुगते कबूतरों के झुण्ड अचानक एक साथ उड़ते हैं और आसमान में छा जाते हैं. स्मार्ट सा हेलमेट लगाए मजबूत साइकलों को चलाते हुए शहर के मजे लेने का शौक रखने वाले लोगों का झुण्ड कई बार सौ से भी ज्यादा का लगता है. इनका सरगना सबसे आगे की साइकल पर सवार है और उसकी साइकल के ऊपर एक लंबे से डंडे पर एक रंगीन झण्डा बंधा हुआ है. पीछे वालों को बस उस झंडे को देखते हुए आगे बढ़ना है. सब के कानों में ट्रांसलेटर लगा हुआ है. सरगना जो भी इटालियन में बोलेगा उसे ये लोग अपनी अपनी भाषाओं में समझते हुए घूमेंगे. Rome Memoir by Chetna Joshi

साइकिल के अलावा यहाँ ‘कोई मिल गया’ टाइप एक पैर से रगड़कर चलने वाले स्कूटर से घूमने वालों का भी खूब बोलबाला है. बिना पेट्रोल जलाए, शोरगुल किए शहर को देखने के मजे लेने वाले ये लोग साइकिल की ही तरह बड़े बड़े झुंडों में गोल-गोल घूमते हुए से सरपट निकल जाते हैं. इनके झुंड में मोंगोलीयन चेहरे वाले लोग ही ज्यादा दीखते हैं. पर ये चान्स की बात भी हो सकती है.

पर इन से भी अच्छे हैं, पैदल वालों के ग्रुप. ये हर जगह, हर गली, हर नुक्कड़, हर तिराहे –चौराहे में दिखते हैं. इनको इनके सरगना के ऊंचे झंडे से पहचाना जा सकता है. जहाँ भी कोई झंडा लिए जाते दिखे समझो उसके पीछे उसकी सेना आ रही है. इनमे बच्चों से ले कर बूढ़े सब लोग थे. ये रोम के प्रसिद्ध वाकिंग टूर हैं. इनमें से कई तो फ्री भी हैं. मतलब कि वो टूर ऑपरेटर आपको शहर दिखायेगा, सब कुछ बताएगा. आपको कहाँ पर मिलना है और कहाँ-कहाँ से होते हुए कहाँ पर कितने घंटे में छोड़ देंगा, सब पहले से बता देगा. आपको बस अपने वाले ऑपरेटर के झंडे को नजर में रखना है और चल पड़ना है उनके पीछे-पीछे. कहीं ग्रुप से भटक जाओ तो अपना वाला झण्डा ढूंढो. ऐसा लगता है कि ये काम यहाँ की औरतें ही ज्यादा कर रहीं हैं. वो भी हर उम्र की. इस काम के सिलसिले में ये सब जगह छा सी गयीं हैं. हो सकता है शाम को पार्ट टाइम में शहर घुमाने का काम करतीं हों. पर फ्री का मतलब इतना भी फ्री नहीं हैं. बस ये फिक्स्ड प्राइस वाले नहीं हैं. ये आपकी मर्जी कि घूमने के बाद आप उनको कुछ दो, कितना दो या न भी दो. पर ऐसा लगता है कि एक ग्रुप को घुमाने से उनकी अच्छी कमाई हो जाती है. दुनियाँ में न तो अच्छाई की कमीं है, न नेक और सहूलियतों का सही दाम अदा करने वाले लोगों की. कितनी अच्छी बात है ये. है कि नहीं?

अच्छे माहौल में ढल जाना बिलकुल आसान होता है.सड़क पर यहाँ पैदल चलने वालों की दादागिरी है. भड़भड़ बस चलते जाओ, गाड़ी वाला खुद ही रोकेगा. पर स्कूटी वाले भी हैं यहाँ, और चलते नहीं उड़ते हैं. लंबी सी फ्रंट स्क्रीन वाली स्कूटी और सिर पर एकदम स्टाइलिश हेलमेट. है तो स्कूटी पर शान रॉयल एंफील्ड जैसी है. लोग भी स्टाइलिश हैं यहाँ के. पर सिगरेट खूब पीते हैं. कार में सभी आदमी और औरतें एक हाथ से ड्राइविंग तो दूसरे से सिगरेट के धुएँ को खिड़की से बाहर उड़ाते दिखते हैं. लोग सुबह की ठण्ड में अच्छे से तैयार होकर सिगरेट पीते हुए, एक हाथ में बैग लिए मेट्रो की तरफ भागते दिखते हैं. अगर आपको पता नहीं कि मेट्रो का स्टेशन किस तरफ है तो बस इन बैग को लिए भागने वालों के पीछे लग जायें.

शहर में घूमने के लिए बस और मेट्रो तो हैं ही, प्राइवेट दुमंजिली ऊपर से खुली गाडियाँ भी खूब हैं, उनका पंफ्लेट बांटने वाले, और बुकिंग की सलाह देने वाले तो आपको हर जगह मिलेंगे. मेट्रो बहुत पुरानी है. केवल दो ही लाइन है रेड और ब्लू. और कहीं से कहीं चले जाओ दाम एक ही है. जाते समय कार्ड पंच करना होता है पर आते समय नहीं. पूरी मेट्रो जमीन के नीचे है. पर हाँ वो एक जगह नदी के पास कुछ सेकेंड्स के लिए ऊपर आती है. फिर वापस नीचे चले जाती है. एक बार की बात है, चूंकि वेद ने दिन में मेट्रो से कई चक्कर लगा लिए थे,तो जब ट्रेन ऊपर आने वाली थी तो मुझसे कहा कि अभी मेट्रो ऊपर आएगी और नदी दिखेगी. बगल में बैठेएक रस्किन बॉन्ड जैसे दिखने वाले एक बुजुर्ग कुछ समझ गए. वे भी बड़े उत्साहित होकर मुझे इटालियन में ही कुछ बताने लगे. खैर उन चंद लम्हों में मैंने फटाफट झाँका और नदी देखी और वेद और वे बुजुर्ग दोनों ही खुश हुए कि चान्स मिस नहीं हुआ.

यहाँ सड़कों पे चलते- चलते आप किसी ना किसी लंबे चौड़े खाली इलाके में आ जाएंगे. इन इनको यहाँ पियाजा बोलते हैं. रोम में बहोत सारे और शानदार पियाजा हैं. कई सारी छोटी-बड़ी सड़कें और गलियाँ सब इन पियाजों में खुलती हैं. जिंदगी से लदे हुए, खूब चहल पहल वाले सजे धजे पियाजा. कई पियाजों पर तो लोगों की बड़ी भीड़ सी रहती है. सब कलाकारी, करतब वाले लोग यहाँ मिलते हैं. जैसे गिरिजाघर वैसे पियाजा. गिरिजाघर तो हमने इतने घूम लिए हैं कि अब अंतर करना मुश्किल हो चुका है. हर अगली गली मोहल्ले में हैं बड़े गिरिजाघर. सब एक से बढ़कर एक हैं. सबके अंदर बड़ी बड़ी पेंटिंग हैं. पेंटिंग ही क्यूँ, सभी कुछ -आगे का हिस्सा, छत, दरवाजा सब शानदार है. पर इतने ज्यादा हैं कि अपने दिमाग में इनके अंतर को रजिस्टर कर पाना नामुमकिन हो चुका है. अब सब एक जैसे लगने लगे हैं. कुछ भी छोटा मोटा नहीं बनाया इन रोमनों ने. और कोई भी चीज नयी नहीं है. किसी 500-600 साल पुरानी जगह या ईमारत को देखकर मन में वैसा ही भाव आता है जैसा अपने 25-50 साल पुरानी में आता है.

एक शाम हम कोलोजियम के सामने वाली सड़क से गुजर रहे थे. कोलोजियम से विट्टोरेयनों वाली सड़क पर. एकदम बिजली की तरह एक हमसे दुगनी लंबाई और चौड़ाई का आदमी मेरे और वेद के बींचोबीच आ कर यूं खड़ा हुआ कि सामने से वेद अचानक गायब हो गए. और फिर अचानक ही उसने अपना हाथ बढ़ाया और मेरे हाथ मे एक बैंड बांध दिया. वो एक अश्वेत था. और बहोत सारे ऐसे बैंड वो दूसरे हाथ में लिए था. पैसे लपेटने का एक तरीका. मना करने पर उसने थोड़ा गुस्सा भी दिखाया और अचानक ही फुर्ती से कहीं गायब हो गया. कुछ पांच–सात मिनट के बाद जनाब वापस आए और 50 सेंट ले कर ही माने.

पर ये सड़क है कमाल की. इस के बाएँ और दाहिने दोनों तरफ रोम के इतिहास के खंडहर मौजूद हैं. बांयी तरफ पुराने रोम के खंडहर फैले हुए हैं. इनको ही रोमन फोरम कहते हैं. ये था ईसा से भी 700-800 साल पहले केरोमका मुख्य बाजार. उस समय की एकदम खास जगह. ये पुराने महलों, सरकारी दफ्तरों, पुराने रोमन मंदिरों, जूलियस सीज़र और औगस्टस का रोम था जिसको बनने में कई सदियाँ लगीं थीं. और ये जगह थी जीती हुई सेना के शानदार जुलूसों और जलसों के लिए, पेशेवर लड़ाकों से रोम की जनता और शाही लोगों के मनोरंजन के लिए, भाषण देने के लिए, चुनाव कराने के लिए तो अपराधियों को सजा देने के लिए भी. पर अब बची हैं तो बस कहीं दीवार तो कहीं पाँच- छः ऊंचे खंभे. कहीं सीढ़ियाँ सी दिखतीं हैं तो कहीं पुराने समय में शानदार रहे हुए कमरे जिनकी छत अब नहीं बची है. कहीं केवल पत्थर छितरे पड़े हुए हैं. बाकी जगह घास उगी है. ये सब दूर-दूर छितरा हुआ है. लेकिन जो भी बचा है वो शानदार है. ‘खंडहर बताते हैं की इमारत बुलंद रही होगी’. ये मुहावरा भी ठीक से समझ यंही आया. इन खंडहरों, खंभों, पत्थरों पर जगह-जगह बड़े करीने से लाइट लगाई हुई है. शाम हुई तो ये सब खंडहर भी ऐसे जगमगए जैसे ये बनाये ही ऐसे गए हों. सभी जगह जो कुछ भी लिखा है वो है तो रोमन में पर भाषा है इटालियन. तो हमको ज्यादा कुछ समझ नहीं आया. यों समझने के लिए हमने कोई ज्यादा कोशिश भी नहीं की.

सड़क पर दायीं ओर भी एक बड़ा सा पुराना किला है. वो दिन में कैसा दिखता था याद नहीं. पर शाम को उसकी दीवार अलग-अलग रंगो की बिजली से चहकती है. किले की लंबी-चौड़ी दीवार के बैक्ग्राउण्ड पर लाइट एंड साउंड शो चलते रहते हैं. अंधेरे बैक्ग्राउण्ड पर बड़े-बड़े घुड़सवार योद्धाओं, सुल्तानों, तलवारबाजों के चित्र बनते बिगड़ते रहते हैं. टिकट ले कर देखने वालों के लिए अलग और खास जगह है और जो भी कहानी चल रही है उसको अपनी भाषा में सुनते हैं. बाकी सड़क पर चलता कोई भी बिना सुने उन लाइट्स और चित्रों के मजे ले सकता है. और हमारे लिए इतना काफी है. क्यूंकि टिकट लेके वहाँ पूरे समय बैठना पड़ता, सुन भले लेते समझ में कम आता और याद तो बिलकुल भी नहीं रहता, तो हमारे लिए तो जो कुछ अच्छा दिख जाए उतना काफी है इस समय को महसूस करने के लिए.

और इसी तरह सैर करते हुए हम पंहुच गए एक भयंकर बड़ी सी इमारत के पास जो पियाजा वेनेजिया पर है. बड़े-बड़े खंभे हैं इसमें जैसे हमारे संसद भवन में हैं. चहारदिवारी से घिरी चौथ के चाँद जैसे आकार की इमारत, सीढ़ियों से शुरू होती है. सबसे ऊपर वाली चौड़ी सीढी में कुछ कार्यक्रम चल रहा था. जैसे सेना के दो जवान किसी को श्रद्धांजलि दे रहें हों. कुछ समय तक ये चला. सीढ़ियों पर कई लोग पसरे हुए हैं. बाहर कोई बोर्ड लगा था या नहीं याद नहीं. अंदर जाएँ या नहीं? क्या ये कोई सेना का ऑफिस है? विदेशी सेना से तो जितना दूर रहो उतना ही अच्छा! पर और लोग तो गए हैं! शायद जाना चाहिए. सीढ़ियों के ऊपर ठीक बीच में किसी की मूर्ति है. उसके सामने इन लोगों ने मशाल भी जलायी हुई है. इमारत के बींचों-बीच एक ऊंचे से चौक पर एक मूर्ति किसी घुड़सवार लड़ाके की है. हो न हो ये उसी घुड़सवार से जुडी ईमारत है. छत के किनारों के ऊपर पंखों वाले कुछ लोग उकेरे गए हैं. सीढ़ियों के ऊपर चढ़ कर सामने आया पियाजा का नजारा शानदार था. यहाँ तक तो घुस आए पर अंदर जाने के लिए टिकट तो तगड़ा होगा. पर ये मिलता कहाँ से है. कुछ लोग लाइन से अंदर जा रहे हैं. हम भी चलते हैं.

वेद ऐसे ही घुसते जाने के लिए तैयार नहीं हैं. मतलब अब और आगे नहीं जाने के लिए इनसिस्ट कर रहे हैं. मेरा विचार है कि लाइन में तो लगना ही चाहिए और अगर कोई टिकट के लिए पूछेगा तो बोल देंगे कि नहीं पता कि कहाँ से मिलता है. पर ये क्या टिकट की तो किसी ने बात ही नहीं की और बस चुटकियों में हम अंदर पंहुच गए. ये हमने ली – चैन कि गहरी सांस. ये तो फ्री एंट्री वाली जगह है. पर अंदर है क्या? बड़े बड़े अहाते और आर्ट गैलरीयां. सीढ़ियाँ भी हैं जिनको हम चढ़ जाते हैं और एक मजिल ऊपर पहुंच जाते हैं. वहाँ के अहाते से भी पियाजा वेनेजिया देखते हैं. फिर एक और मंजिल और वहाँ से भी पियाजा वेनेजिया. हमारी आँखें हर नयी ऊंचाई पर पंहुंच कर पियाजा वेनेजिया का नया आयाम दिखाती जातीं हैं वो बड़ी शान से शानदार होता चला जाता है. अब पता चलता है कि और भी बढ़िया नजारे देखने के लिए यहाँ लिफ्ट लगी है जो छत तक ले जाएगी. लिफ्ट से जाने में 9 यूरो लगेंगे. देने का बिलकुल मन नहीं है. पर राहत कि हम सीढ़ियों से भी छत में पंहुंच सकते हैं. सो हम पंहुंच जाते हैं. इस विशाल इमारत के सबसे ऊपर वाली मंजिल की छत से इस ढलती लाल नीली शाम में हम शहर की लगभग सारी बड़ी इमारतें देख सकते हैं. यहाँ छत पर इटालियन कबूतर भी मजे ले रहे हैं. ठंडी हवा भी इतमीनान से बह रही है. हल्की जैकेट पहनने वाली सर्दी हो गयी है. दूर-दूर की इमारतों और बाजार की बिजलियों से शहर चकमकाया है. ये छत तो मेरी पसंदीदा टाइप की जगहों में से निकली. यहाँ बस आराम से बैठा जा सकता है. यहां इत्मीनान है. यहां आवाजें कानों में पड़ कर दर्ज होतीं हैं.

पर इस इमारत के साथ मुश्किल ये है कि ये इतनी बड़ी है कि चाहे कहीं से भी फोटो ले लो फोटो अच्छी नहीं आएगी. केवल एक-दो ही खंभे ही आ पाएंगे और इस इमारत की इमारतगिरी तो छुपी ही रह जाएगी. इसकी सही फोटो खींचने के लिए इसके सामने वाले ‘पियाजा वेनेजिया’ के ठीक बीच में जाना होगा. वहीं से इसकी पूरी फोटो आ सकती है. ‘पियाजा वेनेजिया’ नाम तो यहाँ अच्छे से याद हो गया है. कई बसों के सामने ये लिखा होता है. बहुत सी बसें यहाँ से चालू होतीं होंगी या शायद ये उनका अंतिम अड्डा होगा. हम इस इमारत से उतरकर उसके सामने वाली सड़क पर उससे दूर जाने लगे और तब तक बढ़ते गए जब तक कि इस पूरी इमारत को एक साथ पूरा का पूरा न देख लें. और हमें वो स्पॉट मिल भी जाता है जहाँ इतमीनान से बैठकर हम इसे देख सकते हैं. हम शायद सही जगह पहुंच गए हैं. क्यूंकी यहाँ और भी लोग, लड़के-लड़कियां, फोटोग्राफर्स सब पहुंचे हुए हैं और इसकी फोटो निकालने की कोशिश कर रहे हैं. यहाँ हम एक जापानी जैसे दिखने वाले युगल की फोटो लेते हैं और उससे अपने फोटो लेने के लिए रेकुएस्ट करते हैं. ये तो बाद में ही पता लगा कि उन्होने हमारी बिलकुल हिली हुई सी तस्वीर ली. जापानी से तो ये उम्मीद बिलकुल नहीं थी. खैर हम अब किसी और दिन यहाँ अच्छी तस्वीर लेंगे क्योंकि आज तो रात हो चुकी है.

होटल में वापस जा के जब फोन पर वाई-फ़ाई आया तब पता चला की जिस इमारत के हम दर्शन कर आए थे उसका नाम ‘विटटोरियनों’ है. ये संयुक्त इटली के पहले सुल्तान विक्टर इमेनुयल द्वितीय की याद में 20 वीं सदी में ही बनाई गयी है. इमारत के बीचों बीच खड़े घुड़सवार योद्धा ये ही जनाब हैं. ये भी पता लगा कि ये इमारत इटली के रक्षा मंत्रालय के अंदर आती है.

एक खास बात जो बताना मैं भूल ही गयी. एक शाम सड़क पर घूमते हुए बायीं ओर को ऊपर को जाती कुछ सीढ़ियाँ दिखी. जैसे किसी चट्टान में ऊपर की ओर जाती हों. जगह कौन सी थी बिलकुल याद नहीं. पर किस्सा याद है. सीढियों पर कोई खास सजावट थी ना ही बनावट. किनारों पे घास फूस भी उस आई थी. ऊपर अंधेरा सा था. इक्का-दुक्का लोग ऊपर से नीचे आ रहे थे. टूरिस्ट टाइप की तो बिलकुल नहीं थी ये जगह. मेरा मन ऊपर जाने का हुआ. पर हमेशा कि ही तरह वेद का नहीं हुआ. मैं तो जा के देखूंगी कि ऊपर क्या है क्या नहीं. कुछ तो होगा ही. कैसे पता? जा के पता लगेगा. ऊपर एक बड़ा सा गेट था. पुरानी टनल जैसा. वहाँ अंधेरा सा था. एक बूढ़ा सा आदमी उस अंधेरे में कुर्सी में बैठा वाइलिन बजा रहा था. दूर नीचे से ही उसकी आवाज आने लगी थी. पास आए तो हमने उसको देखा, उसने हमको देखा. इटालियन धुन कुछ समझ नहीं आई. पर कुछ अच्छा ही बाजा रहा होगा सोच कर हम मुसकुराते हुए आगे निकल गए. थोड़े ही दूर पर एक कॉलेज जैसा कुछ था. लगता है कॉलेज में कोई प्रोग्राम हुआ है. तीन चार टीचर टाइप लोग और कुछ बच्चे बाहर हैं. जगह-जगह सजाने के लिए जो पतंगीयां- झंडियाँ लगाई होंगी वो नीचे गिरी पड़ी हैं. शाम हो गयी है तो जो भी फेस्टिवल रहा होगा वो खतम हो चुका है और लोग वापस जा रहे हैं. हम उसके अंदर चले जाते हैं. ये छोटा सा कॉलेज ही है. यहाँ ग्रुप में लड़के लड़कियां खड़े हैं. सबके हाथ में बीयर है. सब मस्त हैं. हमारे लिए यहाँ कुछ खास है नहीं. इसलिए हम उल्टे पाँव वहाँ से निकल लेते हैं. क्यूंकी गली में आगे कुछ भी मजेदार नहीं दिखाई दे रहा इसलिए वापस रुख करते हैं. टनल जैसे गेट को पार करते हुए हम एक बार फिर वोइलीन वाले को और वोइलीन वाला हमें देखता है. पर उसके चेहरे पर अब ये शैतानी हंसी क्यूँ है? जैसे कुछ कहना चाह रहा हो. और अचानक इसके वोइलिन की धुन इतनी मधुर कैसे हो गयी? ओह्ह तो ये जनाब ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को, नजर नहीं चुराना सनम’ बजा रहे है. और उनकी आँखें जैसे इशारे में कह रहीं हों कि ‘बच्चू समझ चूका हूँ तुमको’. हम दोनों के चेहरे भी अनायास ही चमक जाते हैं. हम वोइलीन वाले के सामने ख़ुशी से खड़े हैं और मुस्कुराते हैं. हम अगले कुछ मिनट वहाँ रुकते हैं. वो पूरा गाना बजाता है. वेद 50 सेंट उसकी टोपी मे डालते हैं. हमें हजारों बार सुना ये गाना एकदम नया लगता है और सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए हम इसकी धुन में झूमते आते हैं.

रोम में हमने और क्या देखा? यहाँ पानी की तरह मिलती वाइन, बीयर और रम. सड़कों पर चलते हुए और किनारों पर, पियाजों पर बैठ के मजे लेते लोग. ये मजे तो हमें भी लेने चाहिए. आइडिया अच्छा है. फिर क्या…थक के चूर हुए हम पता नहीं कहाँ से रात के साढ़े दस बजे अपने होटल के दरवाजे पर पहुंचे ही थे कि फिर उल्टे पैर लौट लिए. उसी सड़क में वापस सीधे नीचे. केवल एक ही स्टोर खुला हुआ था. हमारे लिए ही शायद. और हमारे वापस निकलते ही वो बंद भी हो गया. पर हमें क्या हमारा काम तो हो चुका है.

हमारे होटल के बिलकुल पास में ही ट्राम का स्टैंड था. और वो हमारे ठीक सामने से निकालती थी. ट्राम को देखना यूरोप में बाकी चीजों से बिलकुल अलग है. ये छोटी-छोटी उन गलियों से भी बेपरवाह सी निकलती हैं जहां से हम यकीन भी न कर सकें. ये कहाँ जा रही है? जहां भी जाए कुछ तो दिखा ही देगी. तो हम चढ़ गए. गलियों के बीच से गुजरती ट्राम ने हमें आधे घंटे में रोम के बाहरी इलाके में पहुंचा दिया. वहाँ कुछ भी देखने जैसा था नहीं. तो हम एक जगह उतर कर दूसरे साइड वाले स्टेशन पहुंच गए. जानकारी लेने के अपने देसी तरीके को अख़्तियार करते हुए हम वहाँ पर खड़े एक आदमी से पूछ ही रहे थे कि क्या यहाँ आस पास कुछ देखने लायक है और वो हमारी बातें समझने में टाइम लगा रहा था कि कहीं से एक लड़का आया और बोला ‘कुछ नहीं है यहाँ’. वापस जाइए. सब कुछ तो सेंट्रल एरिया में ही है. बोला वो उधर ही जा रहा है. तो हम भी उसके साथ हो लिए. वो भी एक बंगलादेशी है, अच्छी हिन्दी बोलता है और बताता है कि अच्छी इटालियन जानता है. अपना और भाई का परिवार लेकर यहाँ आ गया है. यहाँ एक छोटा बिजनेस करता है. अवैध रहता है शायद. बताता है कि यहाँ नयी सरकार के राज में प्रवासियों के कानून काफ़ीसख्त हो गए हैं. वो फिक्रमंद लगता है. Rome Memoir by Chetna Joshi

गलियों-गलियों से होते हुए हमने एक बार फिर खुद को एक गिरिजाघर के बगल में खड़ा पाया. शाम हो चुकी थी इसलिए हम अंदर नहीं जा सकते थे. आते समय ये महसूस नहीं हुआ पर इसके सामने की इतनी सारी नीचे जाती हुई सीढ़ियाँ बताती हैं कि ये जगह ऊंचाई पर है. ये आबाद सीढ़ियाँ हैं. हम बगल से आए थे पर सामने से सीढ़ियों से होते हुए वापस गए. तो ये है आइकोनिक ‘स्पेनिश स्टेप्स’. और इसके सामने वाले पियाजा का नाम है –‘पियाजा दी स्पेगना’. ये जगह भी काफ़ी अच्छी है . यहाँ भी एक फव्वारा है. यहाँ से होते हुए हम एक काफी पुराने ‘पेंथिओन’ नाम के गिरिजाघर के सामने पहुंचे. ईसा से पहले बनी ये इमारत पहले एक मंदिर (टैम्पल) था. हिंदुओं वाला मंदिर नहीं बल्कि रोमनों वाला मंदिर. 7 वीं शताब्दी में इसे गिरिजाघर मे बदला गया. वेद ने दिन में इसे अन्दर से देखा और मैंने इसके बाहर सामने की भीड़ से इसको महसूस किया. इसके सामने वाली गली यहाँ पर बैठे हुए लोगों से खचाखच भरी है. पेंथिओन के सामने के बड़े बड़े खंभों और दीवार के बैक्ग्राउण्ड पर लाइट एंड साउंड शो जो चल रहा है. रोम की एक खास बात यहाँ की सड़कों पर चलते रहने वाले शो भी हैं जो न केवल खास इमारतों बल्कि आम दुनिया में झांक पाने का मौका देते हैं.

रोम की मेट्रो हर तरीके से पुरानी है लेकिन है मजेदार. खचाखच भर के चलती है. ऑफिस टाइम पर तो धक्का मार के भी घुसना पड़ सकता है. रोमा टर्मिनी से मेट्रो ने हमको ‘ओतेवियनो सेंत पियत्रो’ उतारा. वहाँ मार्केट से होते हुए हम एक लम्बी, ऊंची और मोटी सी दीवार तक पहुंच गए. दीवार ऐसी जैसे किले की घेराबंदी हो. हम अंदाजे से मार्केट के बाद आए तिराहे से दायीं तरफ मुड गए. यहाँ इस समय तेज चलने वाले लोगों की वैसी भीड़ नहीं थी जैसी मेन सिटी में थी कि उसके पीछे लग लो और सही जगह पहुंच जाओ. यहाँ तो सड़क पर कोई भी नहीं था. आखिर हम एक बड़े से गेट के सामने पहुंच गए. पर कोई अंदर जाता नहीं दिख रहा है. सामने एक ‘फूड ऑन व्हील्स’ की गाड़ी लगी है और एक सोवेनियर वाला और कुछ गार्ड्स भी खड़े हैं. हम उनसे वेटिकल जाने का रास्ता पूछते हैं. ‘फूड ऑन व्हील्स’ वाला हमें बताता है की आम रास्ते के लिए हमने गलत मोड ले लिया है. हम उल्टे जा कर आखिर एक ऐसी जगह पहुंचते हैं जहां कुछ और भी लोग हैं.

शाम के 7 बजे होंगे. ये गेट बड़ा है और चेकिंग करा के ही गेट से अन्दर जा सकते हैं. ये ही वेटिकन का मेन गेट लगता है. ये बात मामूली अंदाज में बयान की है पर ये जगह बिलकुल मामूली नहीं है. बल्कि इसका ठीक उलट है. ये आला दर्जे की शानदार जगह है. एक अलग ही दुनिया है. वेटिकन की लाइटें हमारे पहुंचने के थोड़ी देर बाद ही रोशन हुई और हुईं तो क्या हुईं. सेंट पीटर्सचर्च जिसको यहाँ ‘सैंत पियत्रों’ बोलते हैं जगमग हो गयी. ऐसी नायाब नगरी को इन लोगों ने आज से 500 साल से भी पहले बना लिया था. यकीन नहीं आता. ‘सैंत पियत्रों’ के सामने काफ़ी जगह है. ये दोनों तरफ से ऊंचे खंभों और फिर गलियारों से शुरू होने वाली अर्धचंद्राकार इमारत से घिरा है. रोमा का यहीं स्टाइल है. इस इमारत की छत पर थोड़ी थोड़ी दूर पर इनके संत लोग बैठे हुए हैं. मूर्तियों में. ‘सैंत पियात्रों’ खुद भी काफ़ी ऊंचाई से स्टार्ट होता है. एकदम आलीशान. उसके ठीक सामने एक खंभा है. जिसमे क्रॉस है. ठीक सामने एक चौड़ी सड़क है जिसके दोनों तरफ एक से बढ़कर एक शानदार इमारतों के अन्दर कई सारे म्यूज़ियम हैं. यहाँ इस जगह सैकड़ों लोग हैं. पर इतनी खुली जगह है कि सभी आराम से घूम रहे हैं.

जगमग रोशन होते हुए सैंत पियत्रों और वेटिकन को महसूस करने हम वहाँ जमीन पर बैठ गए. आलथी पालथी मार के. इस असंभव खूबसूरती को कैमरे में नहीं लिया जा सकता, इसलिए आँखों में बिठा लेना चाहिए. वेटिकन की इस सड़क के ऊपर के नीले आसमान में ऊपर उठते हुए चंद्रमा ने उसकी खूबसूरती को और भी बढ़ा दिया. आराम के चंद लम्हे गुजार के हम उसी सड़क से सौवेनियर देखते हुए बाहर निकल आए. इस जगह को अंदर से और एक बार और गौर से देखने के लिए हमें फिर से आना होगा. वेटिकन में एक बात और काम की निकली. यहाँ लगा हुआ नल और उससे मिलता फ्री का पानी. जैसे पानी पिलाना इनके यहाँ भी पुण्य का काम माना गया हो. Rome Memoir by Chetna Joshi

रोम की कहानी पूरी नहीं होगी इसकी छोटी सी ‘टिबर’ नदी के बिना. जो साफ और शांत है. हम इसके किनारे बेमकसद से बहुत चले और जब लगा कि अब तो शहर ही पार हो गया तो वापस आ गए. इसके किनारे घूमने में मजा है. पर नदी किनारे ज्यादा लोग नहीं हैं. हम तो ऊपर ही टहल रहे थे, एक जगह नीचे जाती हुई सीढ़ियाँ देखकर उतर आए हैं. छोटे छोटे बच्चे इसमें छोटी-छोटी नावें चलाते नजर आए जिन्हें केयाक बोलते हैं. छोटी लड़कियां भी अकेले नदी में अपनी केयाक उतारती, सैर करती दिखीं. नदी के ऊपर कई सारे पुल हैं. इनपुलों को नीचे से पार कर हम वापस ऊपर आ गए.

अब बचा था एक पार्क – विला बोर्घिज. जिसको वेद ने मेरे पीछे अच्छे से घूम लिया था. देखना तो मेरे लिए भी जरूरी सा हो गया है. क्या पता दुबारा कभी रोम आने का मौका मिले या न मिले. तो लौटने वाले दिन सुबह सुबह हम भागते हुए से वहाँ पहुंचे. बारबेरिनी मेट्रो स्टेशन से चल कर यहाँ पहुंच सकते हैं. बारबेरिनी के मेट्रो स्टेशन के बारे में दो शब्द कहना जरूरी लगता है. ये बहुत ही पुराना स्टेशन होगा. अजीब सा डरावना खतरनाक खुफिया रास्ता लगता है ये बनावट से. एस्कलेटर भी बेहद पुराने हैं जिनमे एक सीढी में केवल एक ही इन्सान खड़ा हो सकता है. स्टेशन में कोई आता या जाता नहीं दिखता. दीवारों पर ग्रेफिटी भी खूब है. इतना खतरनाक कि इसको देखकर ऐसा लगता है जैसे विश्व युद्ध में इसका इस्तेमाल किया गया हो. कई तले नीचे जाने के बाद मेट्रो लाइन मिलती है. मेट्रो से बाहर निकलकर हम फटाफट रास्ता समझकर निकलने की जुगाड़ में है कि हमें पहले एक परिवार और फिर 3-4 महिलाओं का झुंड मिल गया. ये सब भी ‘विलाबोर्घिज’ की तलाश में हैं. और हमसे रास्ता पूछ रहे हैं. खैर तिराहे पर एक छोटी सी जूस की दुकान में पूछकर हम भी पहुंच ही गए. बड़े-बड़े घास उगाये हुए मैदान और एक छोटा सा पानी का तालाब है यहाँ. एक म्यूज़ियम भी है. अभी सुबह है ये शायद खुला नहीं है. हमारे पास अब ज्यादा समय नहीं है. विला बोर्घिज’ की सबसे शानदार याद स्पीड जॉगिंग करती एक बूढी महिला की है जो जाते समय भी उसी रफ्तार से जॉगिंग करतीं दिखीं जिस रफ्तार से एक सवा घंटे बाद वापस आते समय.

रोम वज नॉट बिल्ट इन ए डे’. ‘रोम कोई एक दिन में नहीं बन जाता’. मुहावरा ये काफी पुराना है और बात घिसी पिटी. लेकिन ये मुहावरा क्यूँ बना होगा और ये बात किस दर्जे की सच्ची बात है ये रोम में हर एक पल समझ आई. ये शहर बना, खाक हुआ, फिर बना, फिर खाक हुआ और फिर बना. छोटा- मोटा तो जैसे ये लोग कुछ बनाना जानते ही नहीं थे. पुराने साम्राज्य के खंडहरों और हर गली में मौजूद और आबाद भयंकर बड़े गिरिजाघरों की नगरी है रोम. गलियों, उन पर थिरकते कलाकारों, विशाल चौराहों, उन पर सजे बाज़ारों की नगरी रोम है. ऊंची ऐतिहासिक इमारतों की दर्जनों सीढ़ियों और उन पर बैठे दुनियाभर के हर रंगों और चेहरे – मोहरों वालों की नगरी है रोम. सड़क किनारे रोस्टेड घोंघा बेचते अफ्रीकनों की नगरी तो हर जगह मौजूद बांग्लादेशियों की नगरी भी और सड़क पर डांस करते अल्बीनियनों की नगरी भी.

अंतिम दिन हमारे पास समय कम था और 12 बजे तक हमें निकलना था. आते-आते लगा कि हमने किसी के लिए कुछ गिफ्ट तो लिया ही नहीं. तो हम फटाफट अपने होटल के पीछे वाली गली में पहुंचे. क्या लें क्या न लें. स्कार्फ, पर्स, टी शर्ट, कोट, जैकेट. क्वालिटी उसकी कोई खास नहीं थी अपने सरोजिनी का समान भी उससे अच्छा है. पर कुछ तो लेंगे ही. सड़क पर लगे बाजार में बहुत सा समान उलट-पलट कर देखा. इसमें काफ़ी समय निकल गया. देखने और पसंद करने के बाद अब दाम कुछ कम करने के लिए भी बोलना चाहिए. दुकानदार नेकदिल निकला. उसने कम कर दिया और बोला ‘ले जाइये आपने अच्छा सामान छांटा है’. क्या बात है! दिल खुश हुआ! आप कहाँ से हैं? जी मैं पाकिस्तान से हूँ. तो इतनी जिंदगी काटने के बाद हम रियल असल पाकिस्तानी से मुखातिब थे. मुंह से अचानक निकला ‘आपसे मिल के खुशी हुई’. उसने भी कहा – शुक्रिया. Rome Memoir by Chetna Joshi

चेतना जोशी

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लेखिका को यहाँ भी पढ़ें: गोमुख, गंगोत्री और तपोवन की यात्रा

चेतना जोशी. जन्मस्थान –रायबरेली, बाद में हल्द्वानी, नैनीताल और दिल्ली निवासी. पैतृक निवास पिथौरागढ़. वर्तमान में पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और सतत विकास के मुद्दों पर काम करने वाली संस्था से सम्बद्ध. कई साल दिल्ली में बिताने के बाद फिलहाल उदयपुर में रहती हैं.

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