पर्यावरण

रिंगाल उत्तराखण्ड की बहुउपयोगी वनस्पति

बौना बांस (dwarf bamboo) के नाम से जाना जाने वाला रिंगाल उत्तराखण्ड का बहुउपयोगी पौधा है. रिंगाल पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के अलावा भूस्खलन को रोकने में भी सहायक है. (Ringal Multifunctional plant of Uttarakhand)

रिंगाल को उत्तराखण्ड के लोकजीवन का अभिन्न अंग कहा जाए तो गलत नहीं होगा. कमेट और स्याही से लिखने वाली कलम, सामान लाने वाली और संजोकर रखने वाली विभिन्न तरह की टोकरियां, अनाज साफ़ करने वाला सूपा और रोटी रखने की छापरी, फूलदेई की टोकरी हो या फिर झाड़ू, खाना रखने की टोकरी और घर की छत तक रिंगाल के कई उपयोग हैं. (Ringal Multifunctional plant of Uttarakhand)

बांस कुल के रिंगाल की उत्तराखण्ड के ग्रामीण समाज में कुछ उसी तरह की भूमिका है जैसी की उत्तर पूर्व के राज्यों में बांस की हुआ करती है. रिंगाल बांस की तरह ऊँचा और लम्बा नहीं हुआ करता. रिंगाल 10-12 फीट तक की ऊंचाई का हुआ करता है और बांस की तुलना में बहुत पतला

https://outofdcity.wordpress.com वेबसाइट के अनुसार उत्तराखण्ड में उत्तराखण्ड में मुख्यतः 5 तरह के बांस पाए जाते हैं. रिंगाल की इन प्रजातियों के स्थानीय व वानस्पतिक नाम— देव रिंगाल (Thamnocalamus Pathiflorus), थाम (ThamnocalamusJonsarensis), साररू (Arundineria Falcata), भाटपुत्र यानि देशी रिंगाल.

रिंगाल से दैनिक जीवन में काम आने वाले जरुरी उपकरण तो बनते ही हैं, इनसे कई तरह के आधुनिक साजो-सामान भी बनाये जा सकते हैं. प्रदेश में कई इलाकों में रिंगाल से कई आधुनिक उपकरण और सजावट के सामान बनाये जा रहे हैं. इनमें लैम्प शेड, गुलदस्ते, हैंगर, स्ट्रॉ, पेन, पेन स्टैंड, टेबल लैम्प, डस्टबिन, ट्रे आदि प्रमुख हैं. Ringal Multifunctional plant of Uttarakhand

रिंगाल को लगभग उसी तरह उपयोग में लाया जा सकता है जैसे कि उत्तर पूर्व में बांस को. सरकारी उदासीनता के अलावा उत्तराखण्ड में मौजूद जातिवादी मूल्य इस दिशा में बड़ी बाधा हैं. सरकार द्वारा रिंगाल को कुटीर उद्योग के रूप में विकसित करने के ठोस प्रयास नहीं किये गए हैं. न ही रिंगाल उद्योग में लगे व्यक्तियों, संस्थाओं को उचित प्रोत्साहन ही दिया जाता है.

रिंगाल का काम पारंपरिक रूप से उत्तराखण्ड की अनुसूचित जाति शिल्पकार की उपजातियों द्वारा किया जाता रहा है. इस काम में ज्यादा अवसर न देख इन जातियों की आने वाली पीढ़ियों ने इस काम को त्यागना ज्यादा बेहतर समझा. सवर्ण जातियां अपने जातीय पूर्वाग्रहों के चलते इन कामों को करने से कतराया करती हैं. हालाँकि अब सामाजिक बदलावों के कारण कुछ लोग इस काम में आगे आ भी रहे हैं.

रिंगाल के उत्पादों में प्लास्टिक को जनजीवन से पूरी तरह बेदखल करने की संभावना है, सरकारों की इच्छाशक्ति के बगैर फिलहाल इसकी सम्भावना कम ही दिख रही है.  

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सभी तस्वीरें मयंक आर्य के सौजन्य से

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Sudhir Kumar

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  • बहुत सुंदर ब्लॉग 🤗 उम्मीद है कि वैज्ञानिकों के साथ साथ सरकार भी इस पर थोड़ा जोर दे।

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