भारतीय सिनेमा को बदलता एक मराठी निर्देशक

‘सैराट’ (मुक्त) क्षेत्रीय भाषा में रचा गया भारतीय सिनेमा का महाख्यान है. ‘सैराट’ बोन्साई होती जा रही मानवीय संवेदना की जड़ों को गमलों से उखाड़ कर गीली ज़मीन में रोपने का अथक प्रयत्न है. ‘सैराट’ माने मुक्ति की सच्ची अवधारणा. ‘सैराट’ माने सिनेमा का नया शास्त्र! ‘सैराट’ नागराज के अनुभवों की दृश्यात्मक और कथात्मक पूंजी है. आइंस्टाइन अनुभव को ज्ञान का सबसे बड़ा स्रोत मानते हैं तो नागराज का अनुभव ही उनके ज्ञान की रीढ़ है. ‘सैराट’ की चर्चा करने से पहले सैराटकार पर बात की जानी ज़रूरी है, कारण बहुत कम ऐसा होता है या यूं कहूं नहीं के बराबर और मराठी सिनेमा में तो पहली बार कि फिल्म में अभिनय, अभिनेता, अभिनेत्री, गीतों की चर्चा के बजाए फिल्म बनाने वाला चर्चा के केंद्र में आ जाए. वाद-विवाद, समर्थन विरोध, आर्ट या कमर्शियल, जाति समाज इन सारे तर्कों, बहसों, आरोपों, प्रत्यारोपों के बीच मैं अडिग ढंग से ज़मीन न छोडऩे की ज़िद्द लिए निर्देशक नागराज मंजुले को बैठे हुए पाती हूं.

‘उन्हाच्या चा क्टाविरुद्ध’ (‘धूप की साजिश के विरुद्ध’ – नागराज का काव्य संग्रह) नागराज ने धूप की साज़िशो के विरुद्ध एक जंग ही छेड़ दी. आसमान को छूने की ख्चाहिश नहीं, आसमान को ज़मीन तक झुका लाने का साहस. मैं उस बच्चे को देख रही हूं जो रोटी के लिए जूझता, आर्थिक समाज की आखिरी पायदान पर खड़ा है. वडार समाज का वह बच्चा जिसे चाचा-चाची ने दत्तक लिया है, लेकिन वह मां-बाप और चाचा-चाची, दोनों से ही अलक्षित है, आर्थिक स्तर पर त्रासद स्थितियों से गुज़रते इस समाज के हर बच्चे की नियति कमोबेश इसी तरह की है. कक्षा पांचवीं का यह विद्यार्थी चरस, गांजे, दारू और ब्लू फिल्मों से घिरा है. साथ ही सिनेमा का रसिया भी. कैसा है यह बचपन? यह पतन? आवारगी? यह भटकन कहां ले जाएगी? इन सबके बीच ही नागराज देखी हुई फिल्मों को अपने मित्र समूह के साथ बिना किसी स्क्रिप्ट के नाटक में तब्दील कर गांव के टीलों, मैदानों, चौराहों में मुक्ताकाशी मंच पर खेलता. सिनेमा की बारीकियां समझते हुए यह बालक अपनी आवारगी में भस्म होता अपनी ही राख से पुन: निर्मित हो ‘फिनिक्स पक्षी’ बन गया. नागराज सिनेमा का अंतर्मन पकडऩे लगा था. सारे नशे तिरोहित हो चले थे. सिनेमा एक बड़ा नशा. नागराज का अनुभव दृश्यों की जड़ों और समय की परतों से जिंदगी का सोता आप ही पैदा करने लगा. नागराज ने सिनेमाई तिलिस्म, कैमरे की सीमा, तकनीकी घटाटोपों का अतिक्रमण करना सीख लिया. यही कारण है कि नागराज की फिल्मों की जटिलता भी मासूमियत अख्तियार कर लेती है. नागराज नए किरदारों के लिए बातचीत का नया अंदाज़, नए मेटाफर, नए मुहावरे तलाश लेते है. कला की पारंपरिक संकल्पना से अलग. नागराज अपनी मोटिफ के अनुसार दर्शकों का अनुकूलन करते हैं. सबसे सुखद है, नागराज अपनी कला और अपने दर्शकों पर समान रूप से भरोसा करते हैं. इसीलिए हिंसा और देह, ‘आइटम सांग’ उनकी फिल्मों के हिस्से नहीं बनते. इवान क्लीमा के शब्दों में कहूं तो – नागराज की फिल्में मृत्यु के प्रतिरोध में सर्जक के गले की पुरअसरार चीख हैं. नागराज की फिल्में उनकी आत्मा का आर्तनाद है. चाहे समाज की अंतर्रचना जितनी जटिल हो, चाहे सामुदायिक भावना अपने बनाए नियमों को लेकर जितना क्रूर और दमनकारी हो लेकिन नागराज इस उम्मीद से भरपूर हैं कि-

तुम्हारी सख्त जड़ें
मिट्टी में दबे मेरे दिल को पहचानेंगी

(लोर्का)

नागराज के सिनेमा का चिंतन बीज आंबेडकर, शाहू, फुले की समता का सिद्धांत है. नागराज बचपन से ही सिनेमा में अपनी या अपने जैसों की तलाश कर रहे थे. कहां हैं वे? सिनेमा की भाषा में? तस्वीरों में? छवियों में? कहीं तो नहीं … बकौल नागराज रामायण के बानर-भालू माने हम. महाभारत के राक्षस माने हम. दंतकथाओं की अभिशप्त शिला माने हम. नायक तो हम कहीं भी नहीं. इसी दहकती सतह से उठती है नागराज की प्रतिबद्धता. ‘अगर मेरा सिनेमा पीडि़तों, वंचितों के पक्ष में और संकीर्णता, कट्टरता के विरोध में नहीं खड़ा होगा तो मुझे सिनेमा का ख्याल त्याग कर पुन: होटल में वेटर का ही काम करना चाहिए!’ नागराज संघर्ष के बुनियादी तबके से ही आते हैं, इसीलिए अंतोनियो ग्राम्शी के शब्दों में उन्हें ‘ऑरगैनिक इंटलेच्कुअल’ कहा जा सकता है. आनंद पटवर्धन कहते हैं, ‘मेरे लिए फिल्म एक माध्यम है अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध करने का’. नागराज का यही भाव जांबवंत को जन्म देता है. फिल्म ‘पिस्तूल्या’ का ‘जब्या’. नागराज की यही चेतना ‘पिस्तूल्या’, ‘फैंड्री’ (निर्देशक की पृष्ठभूमि ही फिल्म का परिवेश बन जाती है) से होते हुए ‘सैराट’ तक का सफर तय करती है. यह नागराज का मुकम्मल लाइफस्केच नहीं है लेकिन ‘सैराट’ को समझने के लिए इतना कहा जाना ज़रूरी लगा मुझे.

युवा चेतना क्रांति के महत्व को ध्यान में रखकर रचा गया सिनेमा ‘सैराट’ दरअसल एक कबीरी दांव है जो घर फूंकने का विकल्प आज भी खुला है का बोध हमें कराता है. अगर इसके अंतर्वस्तु की बात करें तो कथा मुख्तसर इतनी है कि उच्चवर्णीय उच्चवर्गीय विधायक पाटिल की पुत्री व निम्नवर्गीय मछुआरे का पुत्र, उनके बीच में पनपने वाला प्रेम, फिर प्रेम विवाह, फिर बच्चे का जन्म और प्रेमी जोड़ी की हत्या (‘ऑनर किलिंग’ जैसा शब्द मुझे अश्लील लगता है). इसमें नागराज को क्या कहना है. कौन नहीं जानता भारतीय समाज के दुर्दान्त मसत्य को, लेकिन नागराज को इससे ऊपर उठकर मनुष्य की मूलभूत सोच पर सार्थक टिप्पणी करनी थी, इसीलिए सैराट हमें जिस दुनिया में ले जाती है, वहां हमें लगता है हम पहली बार प्रेम, घृणा, दुख को देख रहे हैं, रोशनी की एक पारदर्शी अम्लान दुनिया जहां मनुष्य सारे दर्प और सिद्धांतों से निरावृत्त हो जाता है. निर्मल वर्मा इसे ही कला का गौरव कहते हैं. लोर्का लिखते हैं-

एक सौ प्रेमी
सोए पड़े हैं अनंत निद्रा में
बंजर ज़मीन के नीचे
लंबे रक्त रंगे राजपथ हैं अंदलूसिया में

क्या अंदलूसिया को भारत नहीं पढ़ा जाना चाहिए? नागराज व्यक्ति और नागरिक के द्वंद्व और भेद को पकड़ते हैं. जिन क्षणों को जिंदगी की धड़कन कहा जा सकता है, जिन्हें महसूस किए बिना जीना हम सीख चुके हैं, ‘सैराट’ हमारी उंगली पकड़कर जीवन के उन नाज़ुक क्षणों तक हमें ले जाता है. यहां कला को मुक्ति के अस्त्र की तरह इस्तेमाल किया गया है. इस कलाकृति की सबसे बड़ी कसौटी यह है कि इसमें मनुष्य बनाने की कितनी संभावना है. और मुझे इसमें नागराज की ईमानदार कोशिश दिखाई देती है. इसका लक्ष्य अर्थ, और कीर्ति के पीछे अंधी दौड़ नहीं.

अंतोनियो ग्राम्शी शोशण की जिन दो पद्धतियों का ज़िक्र करते हैं, वे हैं बल और सामंती प्रथा. सामंती प्रथा तो कई बार जाति से भी अधिक बलवती हो उठती है. यही शोषण पद्धति ‘सैराट’ की कथा का मूल आधार है. सिनेमा का पहला दृश्य ही बिटरगांव की क्रिकेट प्रतियोगिता है. क्रिकेट एक लोकप्रिय खेल है. क्रिकेट देश के स्तर पर खेल नहीं, राष्ट्रीय भावना का आधार बन जाता है. बिटरगांव के लिए जीत ही प्रमुख है. इसीलिए जाति प्रथा शिथिल दिखाई देती है. परंतु सामंती मूल्य ज्यों के त्यों. क्रिकेट टीम का कप्तान निम्नवर्गीय मछुआरे का बेटा पस्र्या (प्रशांत काले) है. टीम में विधायक का भांजा भी मौजूद है. वह सल्लू (सलीम) लंग्ड़्या (प्रदीप) की डांट खाकर भी चुप रहता है. पूरा दृश्य सहज हास परिहास और खेल का दिखाई देता है, लेकिन महाराष्ट्र की पोस्टर संस्कृति, नेताओं में गोल्डन मैन होने की होड़, राजनीति और खेल के मंच का भेद न कर पाने की नेताओं की विवेकहीनता, गांव में पाटिल के प्रभाव और भय को महसूस करने के लिए कैमरे की अद्वितीय भाषा, यहां दिखाई देती है. इसी दृश्य में पस्र्या की गेंद बहुत ऊंचे लगे पोस्टर में विधायक पाटिल की पगड़ी से सीधे टकराती है. दरअसल यह नागराज की सामाजिक चिंता की सघनता और तीव्रता है. सामंती सिरमौर का किला इतना अभेद्य भी नहीं.

फिल्म की नाभिकीय चेतना परस्या और आर्ची का प्रेम और मनुष्य जीवन का सौंदर्य है, पूरा जीवन-चक्र है. यहां हम नागराज को समझदार, संवेदनशील और परिपक्व निर्देशक के रूप में पाते हैं. ‘सैराट’ सिनेमा की प्रचलित धारा या फिल्मी रूढिय़ों के विरुद्ध या मैं विरुद्ध शब्द का इस्तेमाल न भी करूं तो इन रूढिय़ों से मुक्त सिनेमा है. मसलन ग्रामीण नायिका (गांव की छोरी) की छवि सिनेमा स्थापित नहीं है. आर्ची (अर्चना) बी ए प्रथम वर्ष की छात्रा है. स्वभाव से दबंग है. दबंगई एक सामंती गुणधर्म की तरह आता है, जो वजूदहीन पाटील पुत्र प्रिंस में भी है. फर्क इतना है कि आर्ची की दबंगई में मानवीय सौदर्य और साहस है, जबकि प्रिंस में क्रूरता और धूर्तता. परस्या का परिवेश उसमें सहमापन लाता है. आर्ची ‘बुलेट’ मोटरसाइकिल चलाती है. ट्रैक्टर चलाती है, घोड़े दौड़ाती है. इन सारे दृश्यों में जो आधुनिक स्त्री की सिनेमा स्थापित छवि है, उससे अलग सच्ची, ईमानदार और ‘डी-ग्लैमर’ है. परस्या आर्ची के मोहक सपने देखता है और अवसर मिलने पर चोरी-छिपे उसे ही देखता है. आर्ची भी परस्या की आंखों को समझती है. परस्या और आर्ची के प्रेम को पर्दे पर उतारने के लिए निर्देशक ने कहीं भी स्थूलता का आश्रय नहीं लिया. कैमरे का काम यहां बहु-प्रशंसनीय है. अभिनय मजबूत और सघन है. प्रेम के लिए कश्मीर/ऊटी का ख्याल भी निर्देशक को नहीं आता. उसे अपनी माटी की खूबसूरती और उसका हरापन ही खींचता है. महाराष्ट्र के गांवों की प्रकृति का मोहक सौंदर्य, परस्या-आर्ची का मिलना, तितलियों का उडऩा, गन्ने के सरसराते पोरों से रसों का उमड़-उमड़ आना, बाजरे की तनी छरहरी बालियों का झुक-झुक जाना, दरिया की मौजों का किनारे आकर बिछ-बिछ जाना. ठूंठ वृक्ष की ऊंची नंगी शाखों पर आर्ची और परस्या के भयमुक्त सपनों का परवान चढऩा. इन्हीं क्षणों में आकाश में उड़ते परिंदों की रूह से संगीत का फूटना. कमाल, अप्रतिम अद्वितीय कैमरे का प्रयोग. दर्शक यहां प्रेम के अध्यात्म को अपनी रूह तक उतरता महसूस करता है. फिल्म के गीतों में अजय-अतुल पेठे का बेहतरीन पाश्र्व- संगीत संयोजन (एक में तो पाश्चात्य क्लासिकल कान्सर्ट की ध्वनियों से बुनी अद्वितीय सृष्टि की रचना) सिनेमा की प्रभावशाली ‘भाषा’ और दृश्यविधान को अत्यंत सघन और काव्यात्मक बनाने में सहायक होते है. परिवेश का यह रागात्मक विस्तार सदा-सदा के लिए दर्शक की स्मृति का हिस्सा बन जाता है.

परस्या में नायकत्व कहीं नहीं है. वह विद्रोह नहीं कर सकता. वह क्रांति का भी साहस नहीं कर सकता. वह जिस समुदाय का युवा है, वहां के युवा जाने कब से पौ फटे कायनात को देख पाने की हसरत लिए बैठे हैं. लेकिन प्रेम का वर्जना से क्या संबंध? वह जीने के लक्षणों को लेकर आता है. परस्या प्रेम में है. बकौल नाजिम हिकमत-

तुम्हें प्यार करना, मानो यह कहना
कि मैं जिंदा हूं

परस्या का प्रेम उसके मित्र प्रदीप और सलीम के लिए भी एक ‘मिशन’ है. सामूहिकता ही वंचितों का आधार है. प्रेम मनुष्य के स्वभाव का लोकतांत्रिक विन्यास है. जाति समुदाय की आंतरिक संरचना लोकतंत्र विरोधी होती है.

बिटरगांव की जगह हैदराबाद लिख दो या मुंबई, कोई फर्क नहीं पड़ता. यहां ‘आत्मसंयम’ को बड़ा महत्व दिया जाता है. ‘आत्मसंयम’ इस दृष्टि से, यानी सामाजिक दासता के सधे तंत्र के प्रति इच्छा सें संपूर्ण समर्पण. परस्या और आर्ची का प्रेम समाज को स्वीकार्य नहीं है. परस्या पाटिलों के हाथों पिट चुका है. परस्या का पूरा मुहल्ला दहशत में है. परस्या की बहन की हंसती आंखें उदास हो चली हैं. उत्तम जीवन की साझी अवधारणा के लिए भारतीय समाज (सभी समुदाय सभी जातियों) में आंतरिक संवाद गायब है. युवाओं के हक में नागराज की सामाजिक लड़ाई है. (यद्यपि इसमें उत्कृष्ट कलाकृति के सभी तत्व मौजूद हैं) यह कलात्मकता तृप्ति के लिए बनायी गयी फिल्म नहीं है. यह उत्कृष्ट कलाकृति ही नहीं, बल्कि सामाजिक समस्या से सीधे साक्षात्कार करती कलाकृति भी है. परस्या और आर्ची, सलीम और प्रदीप इतने परिचित चरित्र हैं कि दर्शक इनकी धड़कन तक अपने भीतर स्पष्टत: महसूस करता है. जिन प्रश्नों से नागराज रूबरू होते हैं, उन्हें मैं जावीद आलम के शब्दों के सहारे स्पष्ट कर दूं-

”अपनी संस्कृति और आस्था को लेकर चल रहे ये समुदाय अपने समूहगत अधिकारों की मांग करते हैं, लेकिन अगर कोई व्यक्ति उन्हें सामुदायिक अधिकारों के खिलाफ जाता हुआ दिखता है या समुदाय की अस्मिता के लिए अभिन्न समझे जाने के किसी सांस्कृतिक पहलू अथवा नैतिक संहिता को चुनौती देता हुआ दिखता है तो समुदाय की ‘इज़्ज़त’ के नाम पर व्यक्तियों के साथ क्रूरता का व्यवहार करने की मिसालें अनगिनत हैं- चाहे समुदाय के मानकों के खिलाफ शादी करने का सवाल हो या कुछ कर्मकांड या पोशाक पहनने का तरीका हो. समुदाय की सत्ता बड़ी बेरहमी से व्यक्ति का दमन करती है. सामूहिक शख्सियत के रूप में समुदाय पूरी ताकत से व्यक्ति के निजी व्यवहार और नैतिकता पर लगाम कसते हैं!”

स्टूडियो की चमक-दमक से दूर सजीव लोकेशनों पर सामाजिक जीवन के पीछे की इस सच्चाई को नागराज प्रभावी ढंग से पर्दे पर लाते हैं.

बर्बर निरंकुश अमानवीय वृत्तियों से बचते-बचते प्रेमी जोड़े हैदराबाद की झोंपड़पट्टी में छांव पाते हैं; सीलन, बदबू, शौचालय, कचरे का पहाड़, दुर्गंध से भरी बस्ती! इसमें परस्या कहीं से भी असहज नहीं है और आर्ची के लिए यह सह्य नहीं है. आर्ची की बड़ी-बड़ी आंखें पूरी बस्ती को निहारती हैं, जहां तक दृष्टि जाती है गंदगी है, अभाव है और उसे उबकाई आ जाती है. समूचे दृश्य में जीवन का निर्मम सत्य उघड़ता है. प्रेम फैंटेसी नहीं, जीवन संघर्ष है. यह पूरा दृश्य विधान ही नागराज की कविता ‘तुझ्या येण्याअगोरी पत्र’ (तुम्हारे आने से पहले पत्र) का विजुअल है. इस कविता की अपनी सीमा है. परंतु ‘सैराट’ इस कविता की सीमा से मुक्त हो आगे बढ़ता है.

तू रंगवलेली स्वप्न इथल्या
भूमीत अंकुरागार नहीं

(तुम्हारे बुने रेशमी ख्वाब इस मिट्टी में/ अंकुरित न होंगे)

लेकिन ‘सैराट’ में सपने तो इसी अभाव की मिट्टी में पनपते हैं. और कैमरा इसी विचार विशेष को हमारे सम्मुख लाकर लुप्त हो जाता है. मृणाल सेन की तरह नागराज भी फिल्म कला को अपने विचारों का संवाहक बनाते हैं. आर्ची तनी हुई रस्सी पर चल रही मां-बाप, भाई के स्नेह की तड़प, इधर परस्या की मुहब्बत. जीवन के दैनोदिन की डायरी प्रेम कविताओं सी रूमानियत से भरी नहीं. संघर्ष है, तनाव है, शक-शुबहा, झगड़े हैं और इन सबके बावजूद प्रेम है, जो आर्ची परस्या को अभिन्न बनाए रखता है. प्रेम है तो जीवन की सुंदरता है. जीवन का सौंदर्य है तो पृथ्वी के बचे रहने की उम्मीद है. तिनका-तिनका चोंच में दबाए परिंदों को नए घोंसले की तैयारी करते देखा जा सकता हे. इसी बीच आर्ची ओर परस्या के प्रेम की साझी विरासत उनका बच्चा भी संसार में आ चुका है. जीवन विस्तार के छोटे-छोटे क्षण आह्लादित करने वाले उम्मीद से भरे दिन. इधर पाटील की सारी कठोरता दयनीय उपहास बनने लगती है. दंभ में पगा भारती पितृसत्तात्मक समाज इसी को मान-अपमान जीने मरने का प्रश्न बना लेता है. इन आंखों में आंसू नहीं.

कात्यायनी कहती है ”पुरुष प्रधान ढांचे में व्याप्त संवेदनहीनता और निर्ममता की मानवद्रोही संस्कृति की ही अभिव्यक्ति है!” आर्ची की मां रोती है और वह सिर्फ रो सकती है. बेआवाज़ वह उत्पादन के औजार के अतिरिक्त कुछ भी नहीं. इधर आर्ची व परस्या के परिश्रम से जिंदगी संवरने को है वह अपने लिए निर्माणाधीन बिल्डिंग में फ्लैट देखने जाते हैं लौटते है. आर्ची स्कूटर चलाती है. परस्या बच्चे को गोद में लिए पीछे. सड़क से गुज़रते हुए एक दृश्य जो पीछे छूटता चला जा रहा है. भगवा झंडा उठाए उन्मादियों का दल प्रेमी जोड़े को पीट रहा है. परस्या और आर्ची अब कुंआरे प्रेमी जोड़े नहीं. वे भारतीय दम्पति हैं. (वे इस भ्रम में हैं) कि वे खतरों से आगे जा चुके हैं. मनुष्य की अदम्य जिजीविषा के मोहक रूप. यहां जीवन को सोचना खूबसूरत है. बच्चे की किलकारी जैसे दुनिया की सबसे खुशनुमा आवाज़ को सुनना. जैसे सबसे प्यारे गीत को गाना. कथा के विकासक्रम में यह फिल्म सिर्फ महाराष्ट्र की नहीं रह जाती. और केवल भारत की भी नहीं. याद करें लोर्का की कविता. मानव जीवन की सार्वभौमिक अवधारणा का मूर्त रूप. मानव संस्कृति और सभ्यता की अनिवार्य पड़ताल. भौगोलिक सीमाओं को लांघकर भाषाई अवरोधों को पार कर भारतीय पटल की महत्वपूर्ण और जरूरी फिल्म. और ज़रूरी समय में प्रदर्शित होने वाली.

जीवन की सुंदरता परदे को ही नहीं, दर्शकों को भी मह-मह कर रही है. आर्ची अपने छोटे से घर के सामने रंगोली (अल्पना) बना रही है. पैरों की छाया महसूस करती है. सिर उठाकर देखती है. भय भय भय लेकिन भाई व अन्य (समुदाय के लोग) की मुसकराहट से आश्वस्त. पर न जाने क्या है मुसकराहट में कि दर्शक रीढ़ तक सनसनाहट महसूस करता है. बच्चा पड़ोसन के साथ बाहर गया है. परस्या लौट रहा है शाक-भाजी लेकर. दरवाज़े पर ही ठिठक गया अपनी ही दहलीज पर भयाक्रांत हो उठा. हमेशा की तरह आर्ची ही उसकी शक्ति और सुरक्षा है और यही उसके जीवन की आश्वस्ति भी. जीवन का विकास क्रम घर दीवारों पर तस्वीरों के बहाने सजा है. नितांत निजी और छोटे-छोटे जीवन उत्सव हर वह क्षण जिनमें सामान्य व्यक्ति आनंद के गहरे क्षणों में होता है. भाई व अन्य इन तस्वीरों से दीवारों और अल्बल के सहारे गुज़रते हैं. परस्या आर्ची के कहने पर चाय देने आता है. रसोई में आर्ची मां के भेजे हुए छोटे-छोटे कपड़े, गोंद के लड्डू दिखाती है. वे एक दूसरे के गले लग जाते हैं, समुदाय में स्वीकृत होने की अपनी खुशी है.

दृश्य बदलता है. पड़ोसन बच्चे को लेकर लौट रही है. घर के सामने छोड़ देती है. बच्चा नन्हे-नन्हे डग भरते हुए घर की दहलीज पर पहुंचता है. बच्चे की ही आंखों से दर्शक भी देखता है. आर्ची और परस्या खून से तर-ब-तर, कहीं भी जीवन बाकी नहीं है. फिल्म का क्लाइमेक्स इसका अंत है. धक्कादायक चौंकाने वाला, यही पूरी फिल्म की ताकत है. बंजर मैदानों की सारी रेत के बावजूद दर्शक प्रेम बांसुरी की धुन से अपनी बावस्तगी पाता है परंतु यह क्या? यह पति-पत्नी की हत्या नहीं. यह एक प्रेमी जोड़े की हत्या नहीं. यह मनुष्य की अदम्य जिजीविषा की हत्या है. सिनेमा का अंत एक भयानक विस्फोट है. आर्ची परस्या की हत्या जीवन के सौंदर्य की हत्या है. जीवनचक्र के विस्तार पर सधे हुए तंत्र का आघात है. इस जीवन सौंदर्य का हत्यारा कोई एक समुदाय नहीं बल्कि नेता, पुलिस, सामंती मूल्य भारतीय समाज के पाखंड सबकी सधी हुई व्यवस्था है जो हर मानवीय सुगंध को नष्ट करने पर आमादा है एक विध्वंस मानवद्वीप, आर्ची परस्या की हत्या, परस्या के परिवार की करुण स्थिति, सलीम के परिवार का विस्थापन वर्तमान समाज की भयंकरता से हम आक्रांत और आतंकित होते हैं. इस विनाश में क्या हम बचे रह पाते हैं? हम जीवित मृत्यु की तरह सिनेमा हॉल की कुर्सी से चिपके हैं. फिल्म हादसे की तरह भीतर घटती है. रोना घंटों बाद जब आप अपने एकांत क्षणों में होते हैं. अब यह केवल सिनेमा भर नहीं रह गया. बच्चे का चेहरा गौरैया के पंख की तरह थरथराहट लिए है.

उसका रोना विराट रोना है
आंसुओं ने हवा के सूराख बंद कर दिए हैं
और रुलाई के सिवाए कुछ सुनाई नहीं देता

बच्चा खून सने पैरों से छोटे-छोटे डग भरता एक अबूझ संसार की ओर लौटता है. बच्चा प्रेम है. प्रेम के लिए पृथ्वी का कोई कोना बचा है जो रक्तरंजित न हो? सिनेमा के अंत में एक अधूरा अनिश्चित अंतहीन दृश्य संपूर्ण विध्वंस के साथ मुखर है. इसके बावजूद बच्चे का बच जाना एक नयी मानवीय सृष्टि की उम्मीद का बोध है. यही आकांक्षा हर युग का सत्य है. और हरयुग की कला की शाश्वत खोज भी. हर भाषा हर धर्म प्रलय के बाद प्रकृति द्वारा किसी जीवित को सहेज लेने की कहानी में इस नयी सृष्टि की आकांक्षा निहित रहती है. यही आकांक्षा ‘सैराट’ को आज की ही नहीं, आने वाले समय की भी महत्वपूर्ण फिल्म बनाती हैं.

नागराज को ‘सैराट’ के कारण अपने ही प्रांत में स्थूल आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा. लेकिन यह निर्विवाद सत्य है कि हर चार कदम पर आप महाराष्ट्र में ‘सैराट’ की चर्चा सुनेंगे, किसी न किसी रूप में. इस समय मैं महाराष्ट्र को ‘सैराष्ट्र’ कह दूं तो आप इसे अतिशयोक्ति न समझें.

दूसरी महत्वपूर्ण बात ‘सैराट’ कहा जाने वाला नहीं, देखा जाने वाला सिनेमा है, वह भी बड़े परदे पर. युवा जीवन के सौंदर्य से लबरेज़ कुछ दृश्यों का भाष्य केवल आंखें ही कर सकती हैं, शब्द या भाषा नहीं. पढ़ा कि चेन्नई और हैदराबाद में ‘सैराट’ चौथे सप्ताह में भी हाउस फुल है. हिंदी प्रदेशों की स्थिति का भान नहीं मुझे. इसका हर दृश्य दर्शक के साथ निजी संवाद करता है. इसे कहकर कैसे समझाया जा सकता है? इसका पाश्र्वसंगीत अपनी विलक्षणता में खुद ही महसूस किया जा सकता है. मराठी सिनेमा के विकास में ही नहीं, ‘सैराट’ नागराज के कैरियर में भी मील का पत्थर है.

-शशिकला राय

शशिकला राय की यह समीक्षा मशहूर हिंदी पत्रिका पहल के अंक 104 से ली गयी है.

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