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जब 4 मिनट में पहाडों की छवि मिट्टी में मिला दी गई

25 मार्च को न्यूज 18 इंडिया कार्यक्रम के पत्रकार प्रतीक त्रिवेदी अपने मशहूर चुनावी शो ‘भैयाजी कहिन’ के लिए उत्तराखंड की सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा पहुंचे. ये शो शिखर होटल के प्रांगण में हुआ. इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए राजनीति दलों के प्रतिनिधयों के साथ, पार्टियों के कार्यकर्ता, जनता और स्थानीय कलाकार भी शामिल थे. ये देखकर अच्छा लगा कि इसमें युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों की भागेदारी अच्छी खासी थी. नेशनल टीवी पर पहाड़ की समस्याओं पर बात करने का ये बेहतरीन मौका था. ऐसा भी हुआ भी शुरूआत में पूर्व सैनिकों ने अपने पेंशन और स्वास्थ्य सुविधाओं का मुद्दा उठाया. लेकिन थोड़ी देर में वो हुआ जिसकी अपेक्षा खुद शो के होस्ट प्रतीक ने भी नहीं की थी.

4 मिनट में मिट्टी में थी पहाड़ की छवि

प्रतीक त्रिवेदी लोगों से सवाल ले रहे थे तभी एक महानुभाव से सवाल करने की जगह पुलवामा हमने के बाद एयर स्ट्राइक के लिए पीएम मोदी की तरीफ की. फिर वो हुआ जो खुद एंकर ने भी सोचा था कि पहाड़ के लोग भी यही करेंगे. इसके बाद मोदी-मोदी के नारे लगने शुरू हो गए. इसे लेकर विपक्षी पार्टी कांग्रेस कहां चुप रहती, उन्होंने भी चौकीदार चोर है के नारे लगाने शुरू कर दिए. अब माहौल डिबेट शो में कम नारेबाजी में तब्दील हो गया. इसके बाद प्रतीक त्रिवेदी ने लोगों को शांत कराने की कोशिश की पर असर नहीं हुआ. थोड़ी देर बाद प्रतीक से लोगों से कहा कि आप पहाड़ के लोग हैं. पहाड़ के लोग मैदान से बेहतर होते हैं. आप मैदान वाले नहीं हो सकते. आप ये क्यों करते हैं. आप बहुत सभ्य है. एकंर लगातार ये बात दोहराते रहे पर लोगों ने नारेबाजी जारी रखी.

रिपोर्टर ने दी शो बंद करने की धमकी

प्रतीक त्रिवेदी ने थक हारकर लोगों से कहा कि अगर वो ऐसा करेंगे तो उन्हें शो बंद करना होगा. इसके साथ वो ये भी समझाते रहे कि इससे आपका समय बर्बाद होगा. वो सवाल नहीं ले पाएंगे. तकरीबन 5 मिनट बाद ये शोर थमा. नेशनल टीवी देख रहे लोग भी प्रतीक की तरह जरूर आश्चर्य में होंगे. ये सच है कि पहाड़ के लोग ऐसे नहीं होते है. कुछ लोगों ने अपनी व्यक्ति विशेष और पार्टी की निष्ठा की वजह से पहाड़ की छवि मिट्टी में मिलाने में कसर नहीं छोड़ी.

जो काम नेता न कर सके वो जनता ने किया

इस शो के इस हिस्से से भले ही पहाड़ की छवि खराब हुई पर इस शो में कुछ स्थानीय लोगों ने अपनी मांग पुरजोर तरीके से उठाई. आल्पस दवा फैक्टरी में काम करने वाली महिला ने अपना दर्द जब सामने रखा तो हर कोई स्तब्ध था. चुनावी मौसम में भी वो आश्वासन के भरोसे है. इसके अलावा गैरसेंण राजधानी का मुद्दा भी जनता की तरफ से आया, पानी, सड़क, बंदर के अत्याचार और सासंद निधि पर तीखे सवाल लोगों ने पूछे. इसके अलावा स्थानीय कलाकारों ने पहाड़ की संस्कृति से देश को रुबरु करवाया. कुल मिलाकर सार ये है कि राजनीति दल और उनके कथित तौर पर समर्थ टक थोड़ा संजीदगी से काम लेते ये शो एर बेहतरीन शो बन सकता था. पहाड़ के लोगों के बारे में लोगों की जो ईमानदार छवि है वो और मजबूत होती. 18 सालों से यहां की जनता ठगी ही जा रही है, सरकार चाहे किसी की रही हो. लोकसभा चुनाव से पहले मीडिया का इस्तेमाल बेहतरीन तरीके से हो सकता है पर जब लोग टीवी पर चीखने-चिल्लाने वाले प्रवक्ताओं और एंकरों को अपना रोल मॉडल बनाएंगे तो ऐसी स्थिति फिर सामने आएगी.

डिसक्लेमर– ये लेखक के निजी विचार हैं.

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विविध विषयों पर लिखने वाले हेमराज सिंह चौहान पत्रकार हैं और अल्मोड़ा में रहते हैं.

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Girish Lohani

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