बटरोही

माँ शिवरानी देवी, प्रेमचंद और सास सुभद्रा कुमारी चौहान

इस पोस्ट को पिछली पोस्ट के क्रम में पढ़िए. पिछली पोस्ट का लिंक: पचास साल पहले इलाहाबाद में कथाकार अशोक कंडवाल के साथ: प्रेमचंद और उनके बेटे की स्मृतियां

‘नई कहानियाँ’ का सम्पादकीय कार्यालय अमृत राय जी के अशोक नगर स्थित घर ‘धूप-छांह’ में ही था. बेहद खूबसूरत शिल्प में बनी यह विशाल कोठी इलाहाबाद की नई बनी इमारतों में खासी चर्चित हो चली थी. अमृतजी से ईर्ष्या रखने वाले लोग अमूमन व्यंग्य में कहा करते, “आज प्रेमचंद जी जिन्दा होते तो उनकी हिम्मत इस घर में घुसने की नहीं होती.” अमृत राय जी तो पत्रिका का काम अपनी स्टडी में ही करते थे, मगर मैं उनकी माँ शिवरानी प्रेमचंद जी के बगल वाले कमरे में बैठता था, जो एक बड़े कमरे का छोटा कोना था और पत्रिका के कार्यालय के रूप में उपयोग में लाया जाता था.  

नए पाठकों की जानकारी के लिए बता दें, प्रेमचंदजी के दो पुत्र थे – बड़े श्रीपत राय और छोटे अमृत राय. श्रीपतजी उच्च कोटि के चित्रकार और हिंदी-अंग्रेजी में गंभीर विषयों पर लिखने वाले चर्चित गद्यकार थे, जिन्होंने पचास के दशक में कहानी सम्बन्धी पहली मासिक पत्रिका ‘कहानी’ का संपादन-प्रकाशन शुरू किया था. आजादी के बाद की पीढ़ी का शायद ही कोई महत्वपूर्ण कहानीकार होगा जिसने अपनी शुरुआत ‘कहानी’ से न की हो.

छोटे बेटे अमृत राय (1921-1996) इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एमए करने के बाद अनुवाद और सर्जनात्मक लेखन करने के साथ ही प्रेमचंद जी के समय से चले आ रहे ‘हंस प्रकाशन’ को देखते थे. पहले हंस प्रकाशन प्रेमचंद के वाराणसी वाले घर में ही था, जहाँ से ‘हंस’ (मासिक) के प्रकाशन के साथ ही प्रेमचंद-साहित्य का प्रकाशन होता था. बाद में भाइयों में बटवारा होने के बाद शायद अमृत जी ने अपना घर ‘धूप-छांह’ बनवाया था और किताबों के प्रकाशन का बड़ा हिस्सा सम्हाला था.

अमृत जी ने अनेक विधाओं में लिखा है, भाषा को लेकर हिंदी-हिन्दुस्तानी विवाद को उन्होंने नई शक्ल दी; उनका सबसे बड़ा योगदान अनुवाद के क्षेत्र में है. हॉवर्ड फ़ास्ट के कालजयी उपन्यास ‘स्पार्टाकस’ का हिंदी अनुवाद ‘आदि विद्रोही’ अपनी सृजनात्मक भाषा के कारण आज तक याद किया जाता है. हिंदी की मशहूर लेखिका सुभद्राकुमारी चौहान की पुत्री सुधा चौहान के साथ अमृत जी का विवाह हुआ. इस दंपत्ति के दो पुत्र हुए, बड़े अलोक राय, जो दिल्ली यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी विभाग के बेहद लोकप्रिय प्रोफ़ेसर रहे. छोटे पुत्र के अकाल निधन की घटना का जिक्र मैंने इस लेखमाला की पिछली कड़ी में किया है, जिस घटना ने मेरे जीवन की धारा ही बदल दी थी. इसी घटना के कारण मुझे इलाहाबाद में आजीविका का ठिकाना मिला था और मैं अमृत राय जी के साथ ‘नई कहानियाँ’ का सम्पादकीय काम-काज देख रहा था.

अमृत राय जी के घर ‘धूप छांह’ की मेरे मन में इतनी मधुर और कोमल स्मृतियाँ हैं कि मेरे लिए उनमें से चुनाव कर पाना बहुत कठिन है. जीवन में पहली बार मुझे इतने बड़े घर को अन्दर से देखने का मौका मिला था. मेरे जीवन को वरदान की तरह नया अर्थ प्रदान करने वाले इस जादुई घर में ऐसे लोग रहते थे, जिनको पढ़कर मुझे साहित्य के संस्कार मिले थे और जिन्हें सशरीर छूने की तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था.

पिछली क़िस्त में मैंने प्रेमचंद जी के वाराणसी वाले घर में अकेले छह महीनों तक रहने और उनकी कुर्सी में बैठकर लिखने का जिक्र किया था. इलाहाबाद के घर में मैं उनकी पत्नी शिवरानी देवी जी, पुत्र अमृत राय और बहू सुधा चौहान जी के साथ था. शिवरानी जी मेरी दादी की उम्र की थीं, लेकिन मैं उन्हें अमृत राय जी की तरह ‘माँजी’ ही कहता था. वो ज्यादातर सफ़ेद साड़ी पहनती थीं, झुर्रियों के बावजूद उनके चेहरे में ऐसा तेज था, जो उनके संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति को आकर्षित ही नहीं करता था, बहुत साफ दिखाई भी देता था.

उनकी पीठ कुछ झुक गयी थी, इसलिए उनके कद का अंदाज नहीं लग पाता था; हालाँकि उनके रूपाकार पर नजर ही कहाँ टिकती थी. वो श्रद्धा की जीती-जागती प्रतिमूर्ति थी, मुझ जैसे इक्कीस-बाईस साल के, साहित्य की दुनिया को झिझकते-सहमते हुए झाँकते लड़के के लिए तो वह मंदिर की देहरी पर खड़े होने की जैसी पवित्र अनुभूति थी. मूर्ति-पूजक तो मैं बचपन से ही नहीं था, मगर बगल के कमरे में बैठीं शिवरानी जी में मैं अपने क्षेत्र की कुलदेवी माँ नंदा की छवि साफ अनुभव करता था.

एक दिन मैं किसी कारण से उनके कमरे से गुजरा था तो उन्होंने मुझे बुलाकर मेरे बारे में सारी जानकारी ली. नैनीताल के बारे में वो जानती थीं, फिर भी कुछ बातें पूछी थीं. इलाहाबाद में मुझे जर्दे वाला पान खाने की लत लग गयी थी, उन्होंने मीठी डांट पिलाते हुए कहा था, ‘इस उम्र में जर्दा वाला पान नहीं खाना चाहिए.’ फिर थोड़ा धीमी आवाज में कहा, ’वो कोने में पान का डिब्बा रखा है, ज्यादा ही तलब लगे तो यहाँ से एक टुकड़ा उठा लेना, एक मुझे भी खिला जाना.’

मकान की बायीं ओर एक छोटा-सा बाग और अनेक कमरे थे जिनमें अमृत राय जी का परिवार रहता था : वे दोनों, दो बच्चे अनेक पालतू जीव-जंतु और पेड़-पौंधे. घर के अन्दर मैं कभी नहीं जा पाया, मगर उसके आभिजात्य का अंदाज ‘धूप-छांह’ कोठी के विशाल गेट से ही लग जाता था.

शिवरानी जी की बहू सुधा चौहान खंडवा (मध्य प्रदेश) के मशहूर सेनानी अधिवक्ता ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान और 1921 में गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन में भाग लेने वाली पहली महिला आन्दोलनकारी; आजादी की कालजयी गायिका सुभद्रा कुमारी चौहान की, जिन्होंने आजादी का पहला गीत ‘सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी… खूब लड़ी मरदानी वो तो झाँसी वाली रानी थी’  (1919) लिखा; की पुत्री थी. साहित्य का संस्कार उनके खून में था. माँ सुभद्रा जी से मिले साहित्यिक संस्कारों को लेकर उनकी किताब ‘मिला तेज से तेज’ (प्रकाशक : हंस प्रकाशन) खूब चर्चित रही है.

सुधा जी एक समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता थीं, अपना अधिकांश समय जरूरतमंद लोगों की मदद करने में बिताती थीं. उनके भाई विजय चौहान भी उस दौर के हिंदी कथाकारों की नई पीढ़ी के बेहद चर्चित और प्रभावशाली कहानीकार थे. वो कभी-कभी अपनी बहिन के घर आते थे, तो उनसे मेरी आत्मीय मुलाकात हो जाया करती थी.

‘धूप छांह’ के दफ्तर में मेरा काम पत्रिका की प्रेस-कॉपी तैयार करना, प्रूफ पढ़ना और संपादक के द्वारा सुझाये लोगों के साथ पत्र-व्यवहार करना था, जिसे मैं वक़्त से पहले ही निबटा देता था. मुझे उन्होंने कभी अपने कर्मचारी के रूप में नहीं देखा, यों भी, शुरू में उनसे जो बातें हुई थीं, वो मुझे जेब खर्च के लिए 125 रू. महीने देते थे, जो उस वक़्त बहुत बड़ी राशि थी. तब मैं ममफोर्ड गंज में दस रुपये महीने किराये की बरसाती में रहता था, तीस रुपये महीने में दोनों वक़्त का खाना मिल जाता था और बाकी जरूरतों के बाद भी कुछ पैसा बच जाता था. जब भी कोई दिक्कत होती थी, दोस्तों में एकमात्र नौकरी-पेशा देवेन मेवाड़ी से मैं तार-मनीऑर्डर के जरिए पैसे मंगा लेता था, जिसके लिए कभी उसने मना नहीं किया. इस तरह सारा काम बहुत मजे से चलता रहा.

नैनीताल के मेरे मित्रों में सबसे निकट वीरेन डंगवाल था, जो मुझसे दो साल पहले एमए करने के लिए इलाहाबाद आ चुका था. दूसरे दोस्त के रूप में नीलाभ से इस रूप में दोस्ती हुई क्योंकि उसे, मुझे और वीरेन तीनों को एक ही गाइड – डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी – मिले थे. उन दिनों डीफिल. की भी कक्षाएं ली जाती थीं, जिनमें शुरू-शुरू में तो नीलाभ दो-एक कक्षा में आया था, मगर वीरेन कभी नहीं आया; अलबत्ता कभी रामस्वरूप जी कॉफ़ी हाउस या कहीं और दिखाई देते थे तो वह फ़ौरन छिप जाता था. इसके बावजूद वीरेन रामस्वरूप जी का सबसे प्रिय छात्र था.  

अपने विद्यार्थियों के प्रति स्नेह, आत्मीयता और अधिकार का भाव जैसा मैंने रामस्वरूप जी में देखा, वैसा आज तो दुर्लभ है. जरूरत पड़ने पर वो घर पर भी उपलब्ध रहते थे और उनकी ज्यादातर बातचीत पाठ्यक्रम के अलावा समकालीन लेखन पर ज्यादा केन्द्रित होती थी. उनकी सरलता और निश्छलता का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब मेरी थीसिस टाइप और बाइंड होकर तैयार हो गयी, नैनीताल कॉलेज में नई-नई नौकरी होने के कारण मुझे छुट्टी न मिलने की दशा में मैंने थीसिस की पाँचों प्रतियाँ अपने गाइड को डाक से भेजी और वो उनमें हस्ताक्षर करने के बाद उन्हें ढोकर सीनेट हॉल तक ले गए थे और डाक से ही मुझे रसीद भेजी.

वीरेन और नीलाभ जैसे कुछ अपेक्षाकृत खुशहाल घर के मित्रों को छोड़कर ज्यादातर हम शोध-छात्र निम्न-मध्यम वर्ग के लड़के थे, जिन्हें तत्काल नौकरी की जरूरत थी. आत्मीय दोस्तों में कहानीकार अमर गोस्वामी मेरे सबसे निकट था, जिसके साथ मिलकर हम ‘वैचारिकी’ नाम की साहित्यिक संस्था चलाते थे. जब मेरी नियुक्ति नैनीताल के ठाकुर देब सिंह बिष्ट कॉलेज में हुई, सभी लोगों को लगा कि यह कॉलेज मेरे रिश्तेदार का है, इसलिए लम्बे समय तक उनके पत्र आते रहे कि मैं अपने रिश्तेदार से कहकर उनको भी नियुक्त करवा दूँ.

करीब साल भर के बाद मैंने प्रयाग स्टेशन के बगल में ऐलनगंज के पीसी बनर्जी मार्ग पर एक कमरा किराये पर लिया, जो एक पॉश कॉलोनी समझी जाती थी. मेरे बगल में ही हिंदी विभाग के हमारे अध्यक्ष लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय रहते थे. इसी घर में कुछ महीने तक नैनीताल का मेरा दोस्त ओमप्रकाश साह गंगोला भी रहा. बीच-बीच में कभी कम और कभी ज्यादा वक़्त के लिए सईद भी आता था और हम लोग किसी तरह मिलजुलकर काम चला लेते थे, हालाँकि आज ताज्जुब होता है कि कैसे हम लोगों ने मस्ती से अपने इतने सारे दिन बिता दिए.

अमृत राय जी और सुधा जी के स्नेह के बिना मैं अपने शोधकार्य का अंतिम चरण कभी पूरा नहीं कर पाता. उस दिन सुधा जी की उपस्थिति में अमृत राय जी ने पूछा कि तुम इलाहाबाद किसलिए आये थे? हालाँकि वो इसका उत्तर जानते थे, फिर भी मैंने बताया, ‘शोधकार्य के लिए.’ ‘तो फिर ‘नई कहानियाँ के दफ्तर में अपना वक़्त क्यों बर्बाद कर रहे हो?’ उन्होंने दुबारा सवाल किया तो मैंने बताया कि मुझे अपने फील्ड वर्क के लिए वाराणसी के ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ जाना है, मगर मैं वहां कहाँ रहूँगा, मेरे पास कोई ठिकाना नहीं है; वहां मेरा कोई परिचित भी नहीं है.

अमृत राय जी ने बिना विलंब किये सुधाजी से कहा कि वो मुझे गुदौलिया के घर की चाभी दे दें; बहुत दिनों से वहां कोई रहा नहीं है, इसलिए कुछ सफाई करनी होगी. हंस प्रकाशन के बनारस ऑफिस के इंचार्ज को फोन पर उन्होंने बताया कि मकान के बीच वाले तल की सफाई करवा दें, जहाँ मेरे रहने की व्यवस्था कर दें. अमृत जी के घर के सामने पांडे धर्मशाला के पास ही खाने-पीने के ढाबे थे, पान की दुकानें थीं, इसलिए जरा भी दिक्कत नहीं हुई. अमृत जी ने यह भी समझा दिया था कि रुपये-पैसे की कोई दिक्कत हो तो हंस प्रकाशन की दुकान से ले लूं.

वाराणसी में सबसे पहले मेरी मुलाकात कथाकार काशीनाथ सिंह और कवि धूमिल से हुई और कभी वो दोनों मेरे पास गुदौलिया के घर चले आते थे, ज्यादातर हम लंका के एक ढाबे में शाम बिताते, जहाँ ठंडई या भंग का सेवन सप्ताह में एकाध बार हो ही जाता था.

मेरे लिए इस बात से अधिक गर्व की और क्या बात हो सकती थी कि मेरे साहित्यिक और अकादमिक जीवन की शुरुआत का पहला पत्थर भारत के अमर कथा शिल्पी प्रेमचंद जी के परिवार ने अपने हाथों से रक्खा था. इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है?

मतलब यह कि जीरो से शुरू करके भी आप वहां पंहुच सकते हैं, जहाँ बड़ी-से-बड़ी पूँजी और ऐश्वर्यशाली पदों की बदौलत भी नहीं पहुँचा जा सकता.      

डाना गैराड़ के कलबिष्ट देवता की जागर सुनिए

फ़ोटो: मृगेश पाण्डे

लक्ष्मण सिह बिष्ट ‘बटरोही‘ हिन्दी के जाने-माने उपन्यासकार-कहानीकार हैं. कुमाऊँ विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रह चुके बटरोही रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ के संस्थापक और भूतपूर्व निदेशक हैं. उनकी मुख्य कृतियों में ‘थोकदार किसी की नहीं सुनता’ ‘सड़क का भूगोल, ‘अनाथ मुहल्ले के ठुल दा’ और ‘महर ठाकुरों का गांव’ शामिल हैं. काफल ट्री में नियमित कॉलम.

    

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