पिथौरागढ़ महाविद्यालय में पर्याप्त शिक्षकों और पुस्तकों की मांग को लेकर धरना पिछले 19 दिनों से जारी है. सेमेस्टर परीक्षाओं के बीच भी युवा छात्र भरपूर ऊर्जा से धरना स्थल पर बैठे हैं और धरना स्थल पर ही पढ़ाई के साथ-साथ आंदोलन को लेकर अडिग हैं. शिक्षक – पुस्तक आंदोलन पर शिवम पाण्डेय द्वारा विस्तृत रिपोर्ट.
उत्तराखंड राज्य के पिथौरागढ़ जिले में जिला मुख्यालय से करीब 2 किलोमीटर की दूरी पर जिले का सबसे बड़ा महाविद्यालय, लक्ष्मण सिंह महर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय स्थित है. महाविद्यालय की स्थापना 1963 में हुई थी और तब ये महाविद्यालय आगरा विश्वविद्यालय से सम्बद्ध एक कॉलेज हुआ करता था. वरिष्ठ UKD नेता और समाजसेवी चंद्रशेखर कापड़ी बताते हैं कि महाविद्यालय में तब करीब 300-400 छात्र छात्राएं ही पढ़ते थे और शिक्षा का स्तर भी बेहतर था. उन दिनों को याद करते हुए वह कहते हैं कि-
“महाविद्यालय में तब छात्र संख्या बहुत कम थी आर्थिक रूप से सक्षम परिवारों के छात्र ही महाविद्यालय में आते थे. छात्राओं की संख्या तो बहुत ही कम थी और हम कॉलेज में सभी विद्यार्थियों को एक दूसरे के नाम से जानते थे.”
सन 1972 में उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र में एक अलग से पर्वतीय विश्वविद्यालय की मांग ने जोर पकड़ा और शीघ्र ही यह आंदोलन पूरे कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र में फैल गया. सरकार की अनदेखी के कारण पर्वतीय विश्वविद्यालय की इस मांग ने जल्द ही उग्र रूप ले लिया और 15 दिसंबर 1972 को पिथौरागढ़ जनपद में पुलिस की गोलीबारी में 2 युवाओं सज्जन लाल शाह और सोबन सिंह नेपाली की मौत हो गयी.
2 शहादतों के पश्चात 1973 में कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों के लिए अलग-अलग विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी.
गढ़वाल के लिए गढ़वाल विश्वविद्यालय, जिसे अब ‘हेमवतीनंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय’ के नाम से जाना जाता है और कुमाऊं के लिए कुमाऊं विश्वविद्यालय बनाया गया जिसका कार्यालय नैनीताल में बनाया गया. पिथौरागढ़ महाविद्यालय तब से नैनीताल से सम्बद्ध एक कॉलेज है.
वर्तमान में महाविद्यालय में 6900 विद्यार्थी अध्यनरत हैं. सीमांत क्षेत्र का सबसे बड़ा महाविद्यालय होने के कारण जिले के साथ ही पड़ोसी जिलों ( अल्मोड़ा व चम्पावत ) से भी भारी संख्या में छात्र उच्च शिक्षा हेतु पिथौरागढ़ महाविद्यालय में आते है. महाविद्यालय में नेपाली छात्र – छात्राओं की भी अच्छी तादात है. महाविद्यालय में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है. लगभग 7000 विद्यार्थियों के लिए 120 प्राध्यापकों के पद ही सृजित हैं, जिनमें से भी लगभग 3 दर्जन पद रिक्त पड़े हैं. महाविद्यालय के पुस्तकालय में पुस्तकों का भारी अभाव है और जो पुस्तकें उपलब्ध भी हैं वो इतनी पुरानी हैं कि उनकी प्रासंगिकता खत्म हो गयी है.
एम.ए. इतिहास के छात्र किशोर जोशी कहते हैं कि –
हम अभी भी 90 के दशक की किताबें पढ़ रहे हैं, उन किताबों में सोवियत रूस अभी भी महाशक्ति है और शीत युद्ध चरम पर है ऐसे में हमसे कैसे उम्मीद की जा सकती हैं कि तेजी से बदल रहे वैश्विकरण के इस दौर में हम अच्छे शिक्षण संस्थानों से मुकाबला करें.
ऐसा ही कहना धरने पर बैठी बी.एस.सी की छात्रा अंशिका का भी है. वह कहती हैं कि कॉलेज में प्रयोगशाला की हालत इतनी खराब है कि विज्ञान जैसे विषय भी किताबी ज्ञान पर चल रहे हैं और अधिकतर छात्र-छात्राओं को किताबें भी उपलब्ध नहीं हो पातीं.
इन्हीं मांगों को लेकर छात्रसंघ के नेतृत्व में 17 जून से धरना प्रदर्शन की कार्यवाही शुरू की गयी. आंदोलन को लेकर छात्रसंघ अध्यक्ष राकेश जोशी का कहना है कि
शिक्षकों और पुस्तकों की मांग को लेकर छात्रसंघ में चुनकर आने के तुरंत बाद ही 8 अक्टूबर 2018 को जिलाधिकारी कार्यालय के माध्यम से उच्च शिक्षा मंत्री को ज्ञापन दिया गया था जिसमें महाविद्यालय में शिक्षकों और पुस्तकों की पर्याप्त उपलब्धता के संदर्भ में बात रखी गयी थी परंतु उस पर कोई कार्यवाही नहीं हुई.
बात को आगे बढ़ाते हुए राकेश कहते हैं कि इस सम्बन्ध में 5 बार जिलाधिकारी कार्यालय के माध्यम से ज्ञापन भेजा जा चुका है और एक-एक बार नैनीताल जाकर कुलपति महोदय और उच्च शिक्षा निदेशालय से बात की गयी थी जिस पर कोई कार्यवाही न होने पर ही हमें परीक्षाओं के बीच भी धरने पर बैठने के लिए बाध्य होना पड़ा है.
इन युवा छात्रों द्वारा 17 जून को धरने पर बैठने से पहले एक अंतिम ज्ञापन जिलाधिकारी के माध्यम से कुलपति और शिक्षा मंत्रालय को भेजा गया जिसमें एक हफ्ते के भीतर जवाब न आने पर धरने पर बैठने की चेतावनी दी गयी, जाहिर है कि हर बार की तरह जवाब नहीं आया और ये छात्र-छात्राएं 19 दिनों से महाविद्यालय प्रांगण में धरने पर बैठे हैं.
17 जून से शुरू हुआ यह धरना प्रदर्शन परीक्षाओं और बारिश के. बीच भी अनवरत जारी है. आंदोलनरत छात्र-छात्राओं की मांगे हैं कि
महाविद्यालय में पुस्तकों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाए. महाविद्यालय में प्राध्यापकों के रिक्त पदों को तुरंत भरा जाए तथा नए पदों का भी सृजन हो. महाविद्यालय में अध्ययनरत शोधार्थियों को शोध सहायता (Stipned) दी जाए. महाविद्यालय में एक सब – रजिस्ट्रार कार्यालय खोला जाए जिसके अभाव में छात्रों को डिग्री निकालने और अंकतालिका में त्रुटि जैसी छोटी समस्याओं के समाधान के लिए नैनीताल का चक्कर लगाना पड़ता है. आंदोलनरत युवाओं की यह भी मांग है कि कुलपति महोदय महाविद्यालय में आकर खुद इनकी समस्याओं का सुनें.
आंदोलन में सक्रिय रूप से भागीदारी दे रहे पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष महेंद्र रावत का कहना है कि सीमान्त क्षेत्र के महाविद्यालय में मूलभूत सुविधाओं के अभाव के कारण अधिकतर छात्र बेहतर उच्च शिक्षा के लिए देहरादून या दिल्ली की और पलायन कर जाते हैं, शिक्षक पुस्तक आंदोलन के साथ साथ ही पिथौरागढ़ में विश्वविद्यालय बनाने की मांग को लेकर भी आंदोलन चल रहा है, शिक्षा के कारण हो रहे पलायन को दूर करने में एक पृथक विश्वविद्यालय की स्थापना सकारात्मक कदम होगा राज्य सरकार को इस पर तुरंत कार्यवाही करनी चाहिए.
परीक्षाओं के बीच धरने पर बैठे ये युवा धरना स्थल पर ही अपनी पढ़ाई भी कर रहे हैं और अपने से जूनियर छात्र – छात्राओं को पढ़ा भी रहे हैं. महाविद्यालय के धरना स्थल पर पहुँचते ही आपको लगेगा कि यहां कोई रचनात्मक कार्यशाला चल रही है, धरने पर बैठे युवा यहां कविताओं का पाठ कर रहे हैं, कविता पोस्टर बना रहे हैं और पेंटिंग कर रहे हैं.
एम.ए. गृह विज्ञान की छात्रा चेतना पाटनी कहती हैं कि-
धरना स्थल अपने आप में एक रचनात्मक मंच होता है और हमारी कोशिश यही है कि धरने प्रदर्शन को एक कलात्मक रूप दिया जाए.
धरने प्रदर्शन में बैठे छात्रों का कहना है कि मांगो को लेकर एक दिन कलेक्ट्रेट परिसर में भी धरने पर बैठा गया परन्तु अधिकारियों द्वारा सुरक्षा कारणों से उन्हें हटा दिया गया और बात करने के नाम पर एडीएम द्वारा उन्हें ‘सीजन’ आने जैसे शब्द कहे गए और जिलाधिकारी द्वारा छात्रसंघ कार्यकारिणी भंग करने जैसे असंवैधानिक शब्द कहे गए जिस पर विरोध स्वरूप जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर काफी नारेबाजी भी हुई और छात्रों को हटाने के लिए कोतवाली से पुलिस तक बुलानी पड़ी.
प्रशासन की इस असंवेदशीलता के खिलाफ दो दिन पूर्व ही छात्रों द्वारा महाविद्यालय से कलेक्ट्रेट तक एक मौन मार्च निकाला गया जो अपने आप में एक अनोखा मार्च था. इस मौन मार्च में सैकड़ो छात्र -छात्राओं द्वारा मुँह पर काली पट्टी बांध कर हाथ से बने पोस्टरों द्वारा विरोध प्रदर्शित किया गया. ये पोस्टर अपने आप में बहुत कुछ बोल रहे थे.
इस धरने प्रदर्शन को अब जिले भर के लोगों के साथ ही जनसरोकारों से जुड़े सभी बाहरी लोगों का भी समर्थन मिलने लगा है, किंतु इसके बाद भी शासन – प्रशासन का रवैय्या इस आंदोलन को लेकर गैरजिम्मेदाराना ही है. जिला प्रशासन द्वारा प्राप्त पत्र में आंदोलन के कारणों को कतिपय और महाविद्यालय के हित में अनुचित बताते हुए इसके निस्तारण पर जोर दिया गया है.
आंदोलन के अनुभवों पर बात करते हुए ये युवा एक स्वर में कहते हैं कि शुरुआत से ही उनमें आंदोलन को लेकर जोश था जो धीरे-धीरे बड़ता जा रहा है. धरना स्थल पर बैठ कर ही वो परीक्षाओं की तैयारी भी कर रहे हैं और कविता पाठ व पेंटिंग भी.छात्र कहते हैं कि 19 दिनों तक के आंदोलन को जब वह मुड़ कर देखते हैं तो बहुत सारे अनुभव और यादें उनके जीवन में जुड़ रही हैं और वे ये भी समझ रहे है कि कैसे आंदोलन जन्म लेता है? आंदोलन की चुनौतियां और समाज की बेहतरी के लिए अनवरत चलता संघर्ष.
छात्रा नूतन कहती हैं कि
” इस आंदोलन से किताबी बातों को वास्तविकता में जानने का मौका मिला है और धरने के बीच किताबी सामूहिकता ने वास्तविकता का रूप लिया है, हम साथ में पढ़ रहे हैं, कविता पाठ कर रहे हैं और समसामयिक मुद्दों और बहस भी कर रहे हैं.“
शिक्षकों और पुस्तकों की मांग को लेकर धरना 19वें दिन भी जारी है, अपनी मांगों को लेकर डटे यह छात्र आपको महाविद्यालय के प्रांगण में अपनी रचनात्मकता से आकर्षित करते हुए और वैचारिक मजबूती के साथ डटे हुए मिलेंगे. आशा और उम्मीदों के साथ आंदोलन के जज्बे को सलाम.
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