अल्मोड़ा के ग्राम सैनार में फूलदेई. फोटो: जयमित्र सिंह बिष्ट
पहाड़ के लोग अपनी विशिष्ट संस्कृति के लिये जाने जाते हैं, जाने जाते हैं प्रकृति से अपने प्रेम के लिये. उत्तराखंड के लोग प्रकृति की गोद में पलते और बढ़ते हैं सो उनके जीवन में प्रकृति का हर रंग लोक संस्कृति के रूप में मौजूद रहता है. फूलदेई, पहाड़ियों की इसी विशिष्ट संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है.
(Phooldei 2021)
पहाड़ियों का प्रकृति से लगाव उनकी लोक संस्कृति में भर-पूर दिखता है. पहाड़ी हर मौसम का स्वागत बकायदा त्यौहार की तरह करते हैं. हमारी लोक संस्कृति में बसंत के इस्तकबाल का त्यौहार है फूलदेई. कुमाऊँ और गढ़वाल मंडल में इसे फूलदेई कहा जाता है तो जौनसार बावर में गोगा. चैत के महीने की पहली गते को पहाड़ी फूलदेई का त्यौहार मनाते हैं.
(Phooldei 2021)
सौरपक्षीय पंचांग चलने के कारण उत्तराखंड में चैत महीने की शुरुआत संक्रान्ति के दिन से मानी जाती है. सुबह सवेरे महिलायें घर की लिपाई पुताई करती हैं और बच्चे नहा-धोकर फूल तोड़ लाते हैं. इसके बाद फूल और चावल के दाने से गांव के हर घर की देहली में ले जाकर उसका पूजन करते हुये गीत गाते हैं:
फूल देई, छम्मा देई,
देणी द्वार, भर भकार,
ये देली स बारम्बार नमस्कार,
फूले द्वार…फूल देई-छ्म्मा देई.
फूल देई माता फ्यूला फूल
दे दे माई दाल-चौल.
इस दौरान देहली कफ्फू, भिटोर, आडू-खुमानी आदि के फूलों से पूजी जाती है. देहली पूजने के बाद बच्चों को घर की सबसे बड़ी महिला चावल, गुड़ और कुछ पैसे दिये जाते हैं. बच्चे इन चावलों को अपने घर ले जाते हैं इन चावलों से रात को घर में त्यौहार मनाया जाता है.
पहाड़ों में आज भी बच्चों की टोलियां पतली पगडंडियों पर फूलदेई के दिन एक घर से दूसरे घर जाते दिख जाती हैं. पिछले कुछ सालों में सोशियल मिडिया के चलते देश-विदेश में रहने वाले पहाड़ियों की तस्वीरें भी खूब देखने को मिलती हैं.
(Phooldei 2021)
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