फोटो: जगमोहन रौतेला
सांस्कृतिक विविधता के मामले में उत्तराखण्ड की अपनी एक अलग पहचान है. यहां हर महीने कोई न कोई त्यौहार मनाया ही जाता है, जिनमें से कई बदलती जीवन शैली के कारण अब लुप्त होने की कगार तक पहुँच गए हैं, जो एक चिंताजनक स्थिति है. उत्तराखण्ड में फूलदेई और घुघुतिया त्यार मूल रुप से बच्चों के त्यौहार (Phool Dei festival of Children) पूरा उत्साह ही खत्म हो जाता है. बसंत के इस्तकबाल का त्यौहार फूलदेई
उत्तराखण्ड में सौरपक्षीय पंचांग चलता है. इस कारण से यहां हिन्दी के महीनों की शुरुआत संक्रान्ति के दिन से होती है. मैदानी क्षेत्रों में चन्द्रपक्षीय पंचांग का चलन है और वहां पूर्णिमा के दिन से महीने की शुरुआत होती है. इस कारण से उत्तराखण्ड और मैदान के महीनों की शुरुआत अलग-अलग दिन होती है. फूलदेई का त्यौहार चैत्र (उत्तराखण्ड में चैत) महीने की संक्रान्ति को मनाया जाता है. जो इस साल आज 15 मार्च 2019 को मनाया जा रहा है. संक्रान्ति के दिन छोटे बच्चे सवेरे उठकर नहा लेते हैं, उसके बाद रिंगाल की टोकरी में फूल तोड़कर लाते हैं. जिनमें बुरांश, गेंदा, गुलाब, भिटोर, फ्यूँली जैसे कई प्रकार के फूल होते हैं. इन फूलों को थालियों व रिंगाल की छोटी- छोटी टोकरियों में सजाया जाता है, जिनमें चावल व गुड़ भी रखा जाता है. उसके बाद बच्चों की टोलियां गांव के हर घर की देहरी में फूल व चावल चढ़ाते हैं. साथ ही निम्न गीत गाते जाते हैं :–
फूलदेई, छम्मा देई,
दैंणी द्वार, भर भकार,
य देई में हो, खुशी अपार,
जुतक देला, उतुक पाला,
य देई कैं, बारम्बार नमस्कार.
फूलदेई, छम्मा देई.
इसके बाद हर घर की बुजुर्ग महिला बच्चों को आशीष देते हुए चावल, गुड़, रुपए देती हैं. कुमाऊँ में जहां केवल एक ही दिन संक्रान्ति को बच्चे घर की देहरी पर फूल, चावल चढ़ाते हुए फूलदेई त्यौहार मनाते हैं, वहीं गढ़वाल में चैत के पूरे महीने ही बच्चे देहरी में फूल चढ़ाते हैं. फूलदेई के दिन बच्चों की टोलियों का उत्साह देखने लायक होता है.
पहले जहां हर गांव में सवेरे से ही बच्चों की टोलियां गांव की पगडंडियों पर रिंगाल की टोकरियों व थाली के साथ हर्ष और उल्लास के साथ चलती हुई दिखाई देती थी, वहीं अब बच्चों के उल्लास से जीवन्त रहने वाली गांव की उन पगडंडियों पर साल दर साल उदासी की चादर फैलने लगी है. रोजगार, शिक्षा व स्वास्थ्य के कारण पहाड़ के गांवों से अब लोग पहाड़ के ही शहरी कस्बों व मैदानी शहरों की ओर स्थाई तौर पर रहने के लिए जाने लगे हैं. जिसके कारण पहाड़ के गांवों में फूलदेई के त्यार के दिन सवेरे-सवेरे ‘फूलदेई छम्मा देई’ कहते हुए बच्चों के स्वर नहीं गूँजते, अपितु एक अजीब तरह की नीरवता पसरने लगी है. गांव में रहने वाले बड़े-बुजुर्ग ही अपनी-अपनी देहरी पर फूल व चावल चढ़ा कर त्यौहार के शगुन को पूरा कर रहे हैं. फूलदेई: बाजार की मार से हांफता त्यौहार
गांव के नजदीक के कस्बों में रहने वाले परिवार भी अपने बच्चों के फूलदेई के दिन घर नहीं ले जा पाते हैं, क्योंकि स्कूलों में छुट्टी ही नहीं होती. यह कितनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि उत्तराखण्ड जब उत्तर प्रदेश का हिस्सा था तो यहां के स्कूलों में स्थानीय स्तर पर फूलदेई के दिन छुट्टी होती थी जब से उत्तराखण्ड बना है तब से यहां के स्कूलों में फूलदेई के दिन छुट्टी नहीं होती है.
रही-सही कसर पब्लिक स्कूलों के बढ़ते प्रभाव ने खत्म कर दी है. पब्लिक स्कूलों के बढ़ते दखल के कारण भी हमारे बच्चे इन त्योहारों से दूर हो रहे हैं, क्योंकि उनकी शिक्षा व्यवस्था में स्थानीय तीज-त्यौहारों के लिए कोई जगह नहीं है. इस वजह से बच्चों के इस सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार के दिन स्कूलों में अधिकारिक तौर पर कोई छुट्टी नहीं होती. पब्लिक स्कूलों में इन दिनों वार्षिक परीक्षाएँ चल रही होती हैं. ऐसे में अधिकतर बच्चों की ‘फूलदेई’ के दिन परीक्षा होती है. जिस कारण से बहुत से बच्चे चाह कर भी अपना प्रिय त्यौहार फूलदेई नहीं मना पाते हैं. इसका एक प्रमुख कारण लोगों का अपने तीज-त्यौहारों के प्रति उपेक्षा का भाव भी है. अगर लोगों में अपने तीज-त्यौहारों के प्रति सामाजिक व सांस्कृतिक चेतना होती तो वह इस बारे में प्रदेश सरकार पर दबाव बनाती, ताकि स्कूलों में छुट्टी होती और उनके बच्चों फूलदेई के दिन स्कूल न जाकर अपना त्यौहारों मनाते. फुलदेई की फुल्यारी बसंत के रंग
बढ़ते शहरीकण, पहाड़ के गांवों से लोगों के तेजी के साथ पलायन करने व पढ़ाई के जरूरत से ज्यादा बोझ के कारण भी बच्चे इन त्यौहारों से दूर हो रहे हैं. नई पीढ़ी के ‘मम्मी-पापा’ भी बच्चों को अपने त्यौहारों से नहीं जोड़ पा रहे हैं. यह बेहद चिंताजनक है. कथित तौर पर मॉडर्न हो चुके बच्चे भी चावल व गुड़ की थाली लेकर हर घर के द्वार पर नहीं जाना चाहते हैं. अगर माता-पिता अपने बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ कर नहीं रखेंगे तो वे अपनी संस्कृति व तीज-त्यौहारों को कैसे जान पायेंगे?
लेख के अंत में चर्चित युवा कवि डॉ. अनिल कार्की की कविता ‘हिमाल की बेटियां’ की पंक्तियां—
किसी सुबह
ठिठुरते हुए
वे आयेंगी हिमाल से
सबसे ठन्डे दिनों में भी
अपने लत्तर झगुले की कुट्टी में
भिटाऊ
आडू-मेल-केशिया
बुरांश के फूल छुपाये
बिना कुछ मॉगे
बिखरा जायेंगी वे
देहरी पर
पंखुड़ियाँ फूलों की
देहरी पर रख के फूल
देते हुए प्रेम का पैगाम
वे एक दिन चुपके से
पार चल देंगी
देहरी के
हिमाल लगा लेगा
गले से उन्हें
लौटेगा फिर बसन्त
पहाड़ों पर.
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जगमोहन रौतेला
जगमोहन रौतेला वरिष्ठ पत्रकार हैं और हल्द्वानी में रहते हैं.
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