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पैयाँ की टहनियों बिना पहाड़ियों की शादी का मंडप अधूरा रहता है

मध्य हिमालय में जब कड़ाके की सर्दी बढ़ती है तो पेड़ अपने पत्तों को भी ख़ुद से अलग कर देते है. ख़ुद को बचाने वाले इस मौसम में मध्य हिमालय में उगने वाला पैयाँ का पेड़ है जिसपर इस जटिल मौसम में भी फूल खिलते हैं. नवम्बर से दिसम्बर तक मध्य हिमालय में पैयाँ का गुलाबी सफ़ेद फूल खूब खिलता है.
(Paiya Padam Tree Religious Importance)

उत्तराखंड में पैयाँ का पेड़ बहुत पवित्र माना जाता है. पैयाँ के पेड़ की पवित्रता की लोकमान्यता भी ख़ूब है. इसका पता इससे भी चलता है कि विवाह जैसे पवित्र अवसर पर बनाये जाने वाले मंडप के लिये पवित्र माने जाने वाली लकड़ी एकमात्र पैयाँ की टहनियां ही हैं. विवाह के समय मंडप पैयाँ की टहनियों और कागज के पताकों से बनाया जाता है. इसके बिना मंडप अधूरा माना जाता है. इसके अतिरिक्त गृह पूजा, यज्ञोपवीत इत्यादि में घरों में लगने वाली माला भी पैयाँ के पत्तों की ही बनाई जाती है.

आचार्य मनु ने अपने संस्कृति संबंधी लेखों में कहा है कि पद्म अर्थात् पैयाँ देववृक्ष है. प्रतिकूल मौसम अवस्था में भी पैयाँ का वृक्ष ख़ुशहाल रहता है. जब शीतकाल की जटिल ऋतु में सभी पेड़ अपनी पत्तियाँ तक गिरा देते हैं तब देववृक्ष पैयाँ में पुष्प उगते हैं. विवाह के मंडप में इसकी लकड़ी का उपयोग वर-वधु के नवजीवन में मजबूती और ख़ुशहाली का प्रतीक है.
(Paiya Padam Tree Religious Importance)

फोटो: काफल ट्री टीम

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यज्ञोपवीत व जागर तथा बैसी के आयोजन में भी इसका डंठल किसी न किसी रूप में प्रयोग में लाया जाता है. धार्मिक कार्यक्रमों में बजाये जाने वाद्यों की लुकुड़ी में सबसे पवित्र पैयाँ के पेड़ की लकड़ी की बनी लुकुड़ी ही मानी जाती हैं. उत्तराखंड क्षेत्र में पैयाँ के पेड़ को कभी नहीं काटा जाता है. पैयाँ के पेड़ की टहनियों को ही धार्मिक कार्यों में उपयोग में लाया जाता है. यही कारण है की आज भी पहाड़ में हमें पैयाँ के बहुत पुराने-पुराने पेड़ देखने को मिलते हैं.

पैयाँ का वैज्ञानिक नाम प्रुन्नस सीरासोइडिस (Prunus Cerasoides) है. हिंदी में इसका नाम पद्म है. अंग्रेजी में इसे हिमालयन चैरी कहा जाता है.

काफल ट्री डेस्क

इसे भी पढ़ें: कसारदेवी में चार चाँद लगाते पैयाँ के फूल
(Paiya Padam Tree Religious Importance)

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