फोटो: सुधीर कुमार
श्रीकृष्ण के बाल्यकाल में यमुना के तट पर उनका कालियनाग से संघर्ष का वर्णन मिलता है. श्रीकृष्ण और कालिय नाग के मध्य हुए इस संषर्ष में जब श्रीकृष्ण विजयी होते हैं तो कालिय नाग को यमुना छोड़कर जाने को कहते हैं. इसके बाद कालिय नाग कुमाऊं में रहकर शिव की आराधना करते हैं.
(Dhauli Nag Temple)
कुमाऊँ क्षेत्र में रहकर कालिय नाग यहां के स्थानीय लोगों की अनेक बार रक्षा करते हैं जिसकारण यहां कालिय नाग देव रूप में पूजे जाने लगते हैं. यहीं उनके पुत्र धवल नाम का भी जन्म होता है. धवलनाग अर्थात सफ़ेद नाग को स्थानीय भाषा में धौलीनाग कहा जाता है.
महर्षि व्यास ने स्कंद पुराण के मानस खण्ड के 83 वें अध्याय में धौलीनाग की महिमा का वर्णन करते हुए लिखा है:
धवल नाग नागेश नागकन्या निषेवितम्।
प्रसादा तस्य सम्पूज्य विभवं प्राप्नुयात्ररः।।
धौलीनाग का निवास स्थान बागेश्वर जिले में विजयपुर के समीप खन्तोली गांव में एक पहाड़ी चोटी पर है. विजयपुर से इस चोटी की दूरी डेढ़ किमी है. यहां स्थित एक बांज के पेड़ पर धौलीनाग का निवास स्थान बताया जाता है. लोकप्रचलित कथा अनुसार एक बार जब जंगल में आग लग गयी तो धवल नाग ने गांव वालों को सहायता के लिये पुकारा. रात के समय धौलीनाग की सहायता के लिये स्थानीय धपोलसेरा गांव के भूल जाति के लोग सर्वप्रथम गये.
(Dhauli Nag Temple)
उन्हें 22 हाथ लम्बी मसाल लेकर धौलीनाग की सहायता को जाते देख चंदोला वंशज भी अपने यहां से मसाल लेकर चल पड़े. सभी लो छुरमल के मंदिर में एकत्रित होकर धौलीनाग की मदद को चले. कहते हैं कि इसके बाद इस क्षेत्र में धौलीनाग की विशेष कृपा रहती है. इस क्षेत्र के आराध्य देवता भी धौलीनाग ही हैं.
इस पूरी पट्टी में धौलीनाग के प्रति अगाध भक्ति भावना है. यहां के गावों में आज भी घर में होने वाले अनाज से लेकर धिनाली तक धौलीनाग को चढ़ाने की परम्परा है. प्रत्येक वर्ष ऋषि पंचमी, नाग पंचमी और नवरात्रि की पंचमी को यहाँ विशेष पूजा की जाती है. यहां आयोजित होने वाले मेले में आज भी रात्रि में 22 हाथ लम्बी मसाल लेकर मंदिर की परिक्रमा करने की प्रथा है.
मेले के दिन धपोलासेरा से चीड़ के छिलकों की मसाल बनाकर गाजे-बाजे के साथ छुरमल देवता के मंदिर आया जाता है. यहां देव डांगरों का अवतरण होता है इसके बाद सभी धौलीनाग को जाते हैं मंदिर में घर-घर से आने वाले दूध, दही, घी, शहद, चीनी से पंचामृत बनाया जाता है. मंदिर में खीर का ही भोग लगाया जाता है और नया अनाज भी अर्पित किया जाता है.
(Dhauli Nag Temple)
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.......सहायता को सर्वप्रथम धामी लोग पहुंचते हैं एक छोटी सी मसाल लेकर तत्पश्चात कनियार व बाद में धपोला क्षेत्रवासी
कुछ वर्ष पूर्व तक इसी क्रम में आर (अर्थात छिलके का बना मसाल) भी आती थी अब सिर्फ आर धपोल की आती है।
यहाँ पुजारी भी धामी ही बनते हैं।
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