घमंडी पिता और उसकी सीख

हिमालय की ऊँची पहाड़ियों के बीच एक छोटा-सा गाँव था. पत्थर के घर, देवदार के जंगल और पास ही बहती ठंडी नदी; यही वहाँ की पहचान थी. उसी गाँव में एक किसान रहता था. मेहनती था, लेकिन उससे भी ज़्यादा वह अपने बेटे पर गर्व करता था. उसका बेटा सचमुच ताक़तवर था; ऊँचा कद, मजबूत शरीर और काम में तेज़. पिता जहाँ भी जाता, बेटे की तारीफ़ किए बिना नहीं रहता.

वह कहता, “मेरे बेटे जैसा मज़बूत लड़का पूरे इलाके में नहीं मिलेगा. जो काम दस लोग नहीं कर सकते, वह मेरा बेटा अकेला कर देता है.” धीरे-धीरे यह गर्व घमंड में बदलने लगा.

एक दिन गाँव में मेला लगा. दूर-दराज़ से लोग आए थे. बातचीत के दौरान पिता ने फिर शेखी बघारनी शुरू कर दी. उसने सबके सामने ऐलान किया, “अगर किसी को शक है, तो आज ही देख लो; मेरा बेटा पहाड़ी के उस भारी पत्थर को अकेले हिला देगा.”

लोग हैरान थे. कुछ मुस्कराए, कुछ ने टोका, “अरे भाई, ताक़त अच्छी चीज़ है, लेकिन इतना घमंड ठीक नहीं.” पिता ने बात अनसुनी कर दी.

बेटे को बुलाया गया. वह पत्थर के पास पहुँचा. पूरी ताक़त लगाई; पसीना बहा, साँस तेज़ हुई; लेकिन पत्थर अपनी जगह से हिला तक नहीं. लोग चुप हो गए.

पिता का चेहरा उतर गया, लेकिन उसने हार मानने के बजाय कहा, “थोड़ा आराम कर ले, फिर उठा लेगा.” उसी समय गाँव का एक बूढ़ा व्यक्ति आगे आया. उसने शांत स्वर में कहा, “अगर इजाज़त हो, तो मैं भी कुछ कहूँ.”

उसने कुछ लकड़ी के गुटके मँगवाए, उन्हें पत्थर के नीचे फँसाया और बेटे से कहा कि अब ज़ोर लगाए. पत्थर थोड़ी-सी मेहनत में खिसक गया.

बूढ़े ने मुस्कराकर कहा, “बेटा ताक़तवर है, इसमें कोई शक नहीं. लेकिन अकेली ताक़त हमेशा काम नहीं आती. समझ और सहयोग उससे भी ज़रूरी हैं.”

पिता की आँखें झुक गईं. पहली बार उसे अपनी गलती समझ आई. उसने बेटे के कंधे पर हाथ रखकर कहा, “आज मुझे सीख मिली है. ताक़त पर गर्व ठीक है, लेकिन घमंड नहीं.” उस दिन के बाद पिता ने शेखी बघारना छोड़ दिया. वह बेटे को सिखाने लगा कि; कामयाबी सिर्फ़ ताक़त से नहीं, बल्कि समझ, धैर्य और विनम्रता से मिलती है.

इसे भी पढ़ें : मेहनती भालू और चालाक सियार की लोककथा

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

अलमोड़े में नंदादेवी मेले की ताज़ा तस्वीरें

आस्था और विश्वास की प्रतीक श्री नंदा देवी की भक्ति में इन दिनों पूरा उत्तराखंड…

2 days ago

अहा! कैसा होता था नंदादेवी कौतिक

उत्तराखण्ड के पहाड़ों में मेले केवल मनोरंजन के अवसर नहीं रहे हैं. वे लोकजीवन की…

2 days ago

सागर से शिखर तक : स्वामी मन्मथन

पिछली कड़ी : बद्रीदत्त पांडे और इंद्र सिंह नयाल ने रखा था ‘उत्तराखंड राज्य की…

6 days ago

उत्तराखण्ड की महिलाएं : स्थितियों, संघर्षों और चुनौतियों का दस्तावेज

1970 के दशक का उत्तराखण्ड का ‘चिपको आंदोलन’ विश्वविख्यात है. यह तथ्य भी कमोबेश ज्ञात है कि…

6 days ago

कामिनी तुम कौन?

पानी बरस रहा है. जब भी पानी बरसता है, देखता हूं पेड़-पौधे बहुत खुश हो जाते…

6 days ago

पूर्वी नयार नदी की वो बाढ़

राजेसिंह का कहना है कि ‘‘मरोड़ा गांव से लदोली घाट तक का रास्ता उतार-चढ़ाव का न…

6 days ago