फोटो : अशोक पांडे
“और डियर तू तो इंग्लैण्ड जाणी वाल छै बल” – इस ज़रा से कुमाऊनी वाक्य के विन्यास में सबसे ज़रूरी शब्द है – “बल”. यानी इस वाक्य को जो आदमी कह रहा है उसने किसी से सुना है कि सुनने वाला व्यक्ति निकट भविष्य में इंग्लैण्ड की यात्रा पर निकलने वाला है. “बल” लगाकर वक्ता ने एक साधारण से वाक्य को कई सारे और मायने भी दे डाले है – इस से इस वाक्य में श्रोता से किसी सुनी हुई बात को कन्फर्म करवा लेने की उत्सुकता आ गयी है, और थोड़ा सा चुटीला रस मौज लेने और हल्के-फुल्के मखौल का. किसी भी कुमाऊनी से “बल’ का सही सही अर्थ पूछकर देखिये – वह नहीं बता सकेगा लेकिन आपको अपने तरीके से उसकी व्याख्या अवश्य सुना देगा. भाषा ऐसे ही काम करती है, ख़ास तौर पर लोकभाषाएं और बोलियाँ.
(Our Kumaoni Column by Ashok Pande)
परम्परा है कि पिछली पीढ़ियों को नई पीढ़ियों से हमेशा तमाम तरह की शिकायतें रहती आई हैं. इधर के समय में अपनी बोली भाषाओँ को लेकर युवतर पीढ़ियों में जिस तरह की बेपरवाही और “ऑल इज़ वेल” वाला नजरिया बढ़ा है, अभिव्यक्ति के ये शानदार माध्यम धीरे धीरे अपने अंत को पहुंचने की कगार पर पहुंच गए हैं. यह मैं नहीं कह रहा, कुछ साल पहले आई यूनीसेफ के वह रपट कह रही है जिसमें अस्तित्व के गम्भीरतम संकटों से जूझ रही भाषाओं की लिस्ट में कुमाऊँनी, गढ़वाली और जौनसारी भी शामिल की गई हैं.
आपको अपने घर में अपनी मातृभाषा बोलने में शर्म आती है तो ज़ाहिर है आप सार्वजनिक जीवन में तो उसका इस्तेमाल करने से रहे. आपको अपनी मातृभाषा की वजह से शर्म आती है तो ज़ाहिर है अपने बड़े-बूढ़े बुजुर्गों से आपका व्यवहार कैसा रहता होगा, पूछने की ज़रुरत तो नहीं ही है.
(Our Kumaoni Column by Ashok Pande)
हमारी कुमाऊँनी की सबसे संपन्न सांस्कृतिक विरासत यदि कहीं बची हुई है तो हमारे लोकगीतों और अनुष्ठानों में – मिसाल के लिए चम्पावत के वीर बफौल भाइयों की गाथा आज भी धान रोपाई के समय “हुड़किया बौल” की सूरत में गाई जाती है, राजुला मालूशाही की अमर प्रेमकथा कितनी ही तरह से कितनी ही संगीत परम्पराओं का हिस्सा रही है. हमारे और हमारी परम्पराओं के बीच सब से बड़ा कोई पुल अगर है तो वह है हमारी मातृभाषा.
राजस्थान की बातपोशी और अवध की दास्तानगोई की तर्ज़ पर हमारे यहाँ भी गप्पें सुनाने या फसक मारने की परम्पराएँ रही हैं जिनमें स्थानीय शब्दों का चमत्कारिक प्रयोग किये जाने की एक से एक दास्तानें बुजुर्गों से अभी भी सुनी जा सकती हैं.
ज़रा शाम के होने पर एक छोटे से संवाद का अंश देखिये –
“किलै रे, यौ अधराति कां बटी ऊण लाग रै छै?”
“न्यौत में हल्द्वाणि जै रै छी कका. धो-धो करने पूजूं.”
इस तरह “धो-धो” कर के सिर्फ़ कुमाऊँनी भाषा में ही कहीं पहुंचा जा सकता है. और इतने कम शब्दों में अपनी बात को सबसे प्रभावी ढंग से आप अपनी बोली-भाषा में कह सकते हैं. जब आप या आपके बच्चे “बेटर कम्युनिकेशन स्किल्स” का महंगा कोर्स करने बड़े शहरों का रुख करते हैं तो आपने अपने आप से पूछना चाहिए कि अपनी विरासत और भाषा के अलावा ढंग की कोई और चीज़ आपके पास है भी या नहीं. और यह भी कि इन सबका कोई मतलब या मूल्य आपके लिए बचा है या नहीं. अगर इन सवालों का जवाब नहीं है तो गड्ढे में दफ़न कीजिये इन्हें. और बंद कीजिये परम्परा का यह रोना-पीटना.
(Our Kumaoni Column by Ashok Pande)
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