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तू फेक मैं लोक(तंत्र)

गणतन्त्र के मौके पर राष्ट्र का नागरिकों के राष्ट्र का नागरिकों के नाम पत्र मिला था .आज उसका प्रीक्वेल भी मिल गया.

तू फेक मैं लोक(तंत्र)

ओए राष्ट्र… अबे देस… अमां मुल्क़…

सुन तो यार ज़रा. तू तो हाल-ख़बर लेगा नहीं, मैं ही एक चिट्ठी भेज रहा हूँ. जवाब मत भेजना डर लगता है यार. बस बीच-बीच में…

कैसे हो? पहले जैसे हो? लगते तो नहीं.

इधर तुम्हारा पेट निकल आया है, बाल कम हो गए हैं पर हां, ग्लो बढ़ गया लगता है चेहरे का… अरे ये तो शायद फ्लैश का कमाल है… ओके! सेल्फ़ी मोड में हो तुम! अच्छा है!

ज़ूम करके देख रहा हूँ. पीछे हूँ न. आगे तुम्हारे अनुयायी घेरे हैं. अनुयायियों का भी कैमरा तुमपर ही है. ये कमाल ही हुआ न मियाँ कि बाशिंदे उपासक हो गए. ज़रूर कुछ किया होगा तुमने. चाल बदल दी या चोला?

अच्छा बताओ तुम्हारे नेम प्लेट पर जो बड़े बड़े शब्दों में लिखा हुआ था… सम्प्रभुता… समता…समाजवाद… लोकतंत्रात्मक… न्याय… स्वतन्त्रता… व्यक्ति की गरिमा… उसकी लिखाई कुछ घिस दी गई क्या. किसी ने कालिख़ पोत दी शायद… पता नहीं…  कुछ गुचपुच सा दिख रहा है.

क्या कहा? तुम्हें भी दिखता नहीं? हां हो सकता है. सेंसेक्स के कन्धे बड़े ऊंचे होते हैं उसपर चढ़कर नीचे दिखना… सुना तो ये भी है कि ये एंटीलिया जैसे ही हैं कई-कई माला. हर माले पर झरोख़ा दर्शन के लिए स्कोप है. सिक्के भी उछाल सकते हैं अपनों की सलामती और सदके उठाकर. न्याय वाला घण्टा भी लटकता दिखता है बस जंज़ीर नीचे तक नहीं पहुँचती. इतनी लम्बी रस्सी बुनने में कई सौ साल लग जाते होंगे, है न?

ऊपर जाकर तो वो दिल्ली का लुटिएन-बेकर वाला गोल भवन भी इत्तु सा दिखता है जिसे जनता के ख़्वाबों का गुलाबीपन संजोने का जिम्मा है.

नहीं दिखता न… ये जो ज़मीन फोड़कर गेहूं-धान उगाने वाला पगलैट है इतना छोटा फंदा बनाता है कि क़ानून के किताब की कोई पतली धारा भी नहीं घुस पाती, अपनी पतली गर्दन लटका देता है. न फंदा दिखता होगा तुम्हें न गर्दन.

एक गोली वहाँ चली कंटीले तारों को भेदकर जो आई. नहीं दिखता न कि वो एक अकेली गोली कितने निशानों पर लगी. किसी रोटी में छेद हुआ, कोई बस्ता होटल के बर्तन पोंछने लगा, कोई चेहरा कफ़न की झुर्रियों से भर उठा.

क्यों दिखे भला. रतौंधी की सफेदी, अफीम की पिनक और काला चश्मा… डेडली कॉम्बिनेशन!

क्या? सुनाई भी नहीं देता. अब तो बाबू झूठ बोल रहे हो. चूज़ी कहीं के.  कुछ नारे तो सुन लिए तुमने, गालियां न सुनीं, फब्तियां न सुनीं और हाँ फतवे तो बिलकुल ही इग्नोर मार दिए यार. पर ऐसा कैसे कि सभ्यता के पिछले पन्नों से एक चित्कार आ रही थी. किसी सहिष्णुता के मुँह-हाथ बांधकर, किसी समता को घसीटकर, किसी तहजीब को चौराहे पर ही नंगा करके हंटर से पिटाई हो रही थी. तुमने उसे भी… वेरी स्ट्रांग हां… रॉक सॉलिड!

तुम तो सॉफ्ट सॉफ्ट कहे जाते थे. ऐसा कैसे कि तुम पथरीली ज़मीनों पर कूद पड़े. वो भी ऐसे. बिना प्रोटेक्शन. देखा! चोट लगी न. खून रिसा न. दर्द नहीं हुआ?

पर हमें तो हुआ यार. हो रहा है. इस नासपीटे इंतज़ार से दर्द हो रहा है. इंतज़ार के कई घण्टे, कई दिन, कई साल दिए तुमने हमें. जो दवाओं के इंतज़ार में था, अब मौत के इंतज़ार में है, जिसे रोटी का इंतज़ार था वो अब मौत के इंतज़ार में है, जो मौत के इंतज़ार में था बस उसका इंतज़ार खतम हुआ. ये इतना भर बदलाव हुआ है. सूरज पश्चिम से नहीं उगा भाई. दिशा नहीं बदली… गौर से देखो कहीं तुमने पीठ और पेट के संवाद तो नहीं पलट दिए हैं.

पर उससे क्या? यहाँ मौत के आंकड़े जन्म से लगातार भिड़ंत में हैं. कारण पाले बदलते रहते हैं. तुम आंकड़ों का हिसाब रख सकते हो कारणों का हिसाब हम जैसों के पास है. हम उसे हर पांच साल पर नेल कटर से कुतर देते हैं.

देखो अब हमारा नेल कटर मत छीन लेना यार… डर लगता है कहीं नाखून इतने बड़े न हो जाएं कि अपना जिस्म ही नोच लें हम.

शेष कुशल है. उसे बख़्श देना. बीच-बीच में अपना असली चेहरा दिखा देना बस. तुम्हारी याद आती है.

– तुम्हारा एक प्रेमी
(लगा दो नींद पर पहरे, उठा लो रात की जुम्बिश
मगर ये ख़्वाब-ए-उल्फ़त हैं, इन्हें आना है आएँगे)

पीटीओ– नो नो नॉट द पेज… बट योरसेल्फ बडी

पुनश्च
सुना है पुलिस ने तुम्हें चारों तरफ से घेर लिया है… सुना है अब त दादुर बोलिहैं… सुना है शिकारी खुद शिकार हो गया… सुना है… सुन रहा है न तू?

डिस्क्लेमर– ये लेखक के निजी विचार हैं.

 

अमित श्रीवास्तव

उत्तराखण्ड के पुलिस महकमे में काम करने वाले वाले अमित श्रीवास्तव फिलहाल हल्द्वानी में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात हैं. 6 जुलाई 1978 को जौनपुर में जन्मे अमित के गद्य की शैली की रवानगी बेहद आधुनिक और प्रयोगधर्मी है. उनकी दो किताबें प्रकाशित हैं – बाहर मैं … मैं अन्दर (कविता).

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Girish Lohani

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  • खूब टार्चर कर रहे हो
    भाषा में ऐसी थर्ड डिग्री
    कि न तलवों में चोट
    न लात -घूसों सी खोट
    बड़ा सुकून कि आखिरी
    जमात में दुबका दर्द जाने हो
    ऊपर के पिरामिड की
    रग -रग पहचाने हो.
    इस माटी के हर रौखड़
    गंदला गई नदी
    बहक गई हवा
    और लिज़लिज़ा गई नीयत
    को छूती तुम्हारी कलम
    सलाम अलैकुम.

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