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च्येपी बंग्बा का नारायण आश्रम और सोसा गाँव

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में धारचूला तहसील के सोसा गाँव के इलाके में अवस्थित नारायण आश्रम को रं समाज में बहुत सम्मान और भक्ति के साथ देखा जाता है. समुद्र तल से 2,734 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह आश्रम 1936 में विख्यात साधु और सामाजिक उद्धारक नारायण स्वामी ने स्थापित किया था. Narayan Ashram Sosa Village

सोसा गाँव के रहने वाले स्वर्गीय कुशाल सिंह हयांकी ने इस आश्रम के लिए अपनी ज़मीन दान में दी थी. आश्रम के आसपास की जमीन को स्थानीय लोगों से क्रय किया गया था. आश्रम का वास्तुशिल्प अद्भुत है और इसके चारों तरफ लगे अनेक तरह के फलदार वृक्षों से आच्छादित सुन्दर उद्यान इस आश्रम की सुन्दरता को बढ़ाते हैं.

नारायण स्वामी

1962 के भारत-चीन युद्ध से पूर्व नारायण आश्रम कैलाश मानसरोवर जाने वाले तीर्थयात्रियों के लिए महत्वपूर्ण पड़ाव हुआ करता था. युद्ध के बाद शुरू में तो यात्रा पर प्रतिबन्ध लगा लेकिन 1990 में यात्रा के दोबारा शुरू होने पर इसका मार्ग बदल दिया गया. यह अलग बात है कि नारायण आश्रम में देश-दुनिया से यात्री-पर्यटक आते हैं. शान्ति और आध्यात्मिक खोज के उद्देश्य से आने वाले इन पर्यटकों के लिए आश्रम में रहने की अच्छी व्यवस्थाएं हैं.

नारायण आश्रम के आसापस के ग्रामीण यहाँ गुरु पूर्णिमा और जन्माष्टमी के उत्सवों को मनाने के लिए जुटते हैं.

धार्मिक महत्त्व के अलावा इस आश्रम ने भौगोलिक रूप से बहुत सुदूर स्थित इस सीमान्त इलाके में स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है. क्षेत्र की बहुत नामी-गिरामी समाजसेविका स्व. श्रीमती गंगोत्री गर्ब्याल इस आश्रम के प्रबंधन से लम्बे समय तक जुड़ी रही थीं.

स्व. श्रीमती गंगोत्री गर्ब्याल तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के साथ

पिथौरागढ़ से नारायण आश्रम की दूरी 116 किलोमीटर है. यहं पहुँचने के लिए पहले धारचूला पहुँचना होता है. धारचूला से 18 किलोमीटर की दूरी पर तवाघाट नाम की जगह है जहाँ पर धौलीगंगा और कालीगंगा नदियों का संगम होता है. तवाघाट से तल्ला दारमा घाटी के सोबला जाने के मोटर मार्ग पर कोई दस किलोमीटर चलने के बाद कनच्योती से दाईं तरफ फटने वाला एक रास्ता इस आश्रम को जाता है.

तकनीकी रूप से देखा जाय तो यह आश्रम चौंदास घाटी में है. इस घाटी को स्थानीय भाषा में च्येपी बंग्बा भी कहा जाता है. इस घाटी का ज़िक्र मानस खंड में आता है जहां इसे चतुर्दश (चौदह) कहा गया है. च्येपी बंग्बा का अर्थ भी चौदह का समूह है. यह चौदह पूर्वजों या घाटी के चौदह गाँवों के आधार पर रखा गया नाम हो सकता है. इसके अलावा रं समाज का कोई भी धार्मिक अनिश्थान च्येपी बंग्बा सुमसा माँ (चौदह देवता और तीस देवियां) क्व स्मरण के बिना पूर्ण नहीं होता है.

काली और धौली नदियों के बीच स्थित यह घाटी रं सभ्यता में महत्वपूर्ण स्थान रखती है. यहाँ की जलवायु ऐसी है कि जहाँ एक तरफ दो अन्य रं घाटियों – व्यांस और चौंदास के लोगों को सर्दियों में अपने गाँव छोड़कर शीतकालीन घरों को जाना होता है, इस घाटी के लोग साल भर यहीं रहते हैं.

चौंदास के सोसा गाँव के समीप तिल्थिन-गुंगतिल्थिन में रं समाज के आदरणीय पूर्वज मीयर मिश्रू का आवास माना जाता है. सोसा गाँव में हयांकी और गर्खाल लोग रहते हैं.

नारायण आश्रम और सोसा गाँव की कुछ अद्भुत छवियाँ लेकर प्रस्तुत हैं हमारे साथी जयमित्र सिंह बिष्ट.

Narayan Ashram Sosa Village

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जयमित्र सिंह बिष्ट
अल्मोड़ा के जयमित्र बेहतरीन फोटोग्राफर होने के साथ साथ तमाम तरह की एडवेंचर गतिविधियों में मुब्तिला रहते हैं. उनका प्रतिष्ठान अल्मोड़ा किताबघर शहर के बुद्धिजीवियों का प्रिय अड्डा है. काफल ट्री के अन्तरंग सहयोगी.

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  • बिष्टजीआपके फोटोग्राफ मन मोह लेते हैं । अल्मोड़ा आने पर किताबघर के दर्शन जरूर करूंगा ।

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