सन् 1880 का वह दौर, जब नैनीताल में मानवीय दखल न के बराबर थी. 1841 में खोजे गये इस शहर को आबाद हुए 40 साल से भी कम का समय गुजरा था. तब महज 10,054 की कुल जनसंख्या वाले इस नवोदित शहर में आज ही के दिन आज से ठीक लगभग 142 वर्ष पूर्व कुदरती तबाही का जो कहर बरपा उसमें 151 लोग मरे अथवा लापता हुए, जिसमें 43 यूरोपियन व यूरेशियाईं के अलावा शेष भारतीय थे. यानि कुल आबादी के लगभग 1.5 प्रतिशत लोग इस भूस्खलन की भेंट चढ़ गये. कल्पना कीजिए आज 10 लाख से भी अधिक आबादी वाले इस शहर में यदि वर्तमान नैनीताल में उस तरह का भीषण हादसा होगा तो कितना जान-माल का नुकसान होगा, इसको सोचकर ही रूह कांप जाती है. लेकिन अफसोस इतनी बड़ी तबाही से भी नैनीताल वासी सबक नहीं ले पाये और मिट्टी भरे कट्टों के ऊपर बहुमंजिली ईमारतें खड़ी करने को आमादा हैं.
(Nainital Article Bhuwan Chandra Pant)
यह अच्छी बात है कि समय बड़ी से बड़ी दुर्घटनाओं को अपने आगोश में समेटकर हमें सब कुछ भुला देता है लेकिन इन घटनाओं से भी सीख न लेना इन्सान की सबसे बड़ी कमजोरी है, विशेषरूप से हिन्दुस्तानी मानसिकता की. ब्रिटिशर्स ने तो इस घटना के बाद नैनीताल को व्यवस्थित करने के लिए पानी की उचित निकासी हेतु पक्के नाले बनवाये और हमने समय आने पर उनको पाटने का कार्य किया, उनमें पानी की पाइप लाइनों का जाल बिछा दिया. यह उनकी दूरगामी नीति ही थी कि उन्होंने आल्मा पहाड़ी की संवेदनशीलता को भांपकर आल्मा पहाड़ी से राजभवन तक को मजबूत पहाड़ी पर शिफ्ट कर दिया, नगरपालिका के बायलॉज इस तरह बनाये कि माल रोड पर वाहनों की आवाजाही पूर्णतः प्रतिबन्धित कर दी.
हम आज इस बात पर अपना सीना चौड़ा तो जरूर करते हैं कि नैनीताल नगरपालिका नॉर्थ वेस्ट प्रोविन्स की सबसे पहली नगरपालिका है, लेकिन उसी नगरपालिका और बाद में झील विकास प्राधिकरण के नियमों, उपनियमों की हमने किस तरह धज्जियां उडाई, यह जगजाहिर है. नगर में उसके बाद भी कई छोटे बड़े भू-स्खलन हमें चेताते रहे, बलियानाला भारी-भरकम बजट खर्च होने के बाद हर साल दरक रहा है. लेकिन हम हैं कि प्रशासन की ऑखों में घूल झोंककर चोरी-छिपे सारे नियम-कानूनों को ताक में रखकर क्या अपने ही भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं कर रहे हैं?
आइये, आपको रूबरू कराते हैं, 1880 की उस त्रासदी से जिसका उल्लेख एटकिंसन ने अपनी पुस्तक हिमालयन गजेटियर में विस्तार से किया है- इस वर्ष 14 सितम्बर से ही यहॉ भारी बारिश होने लगी थी, जो 19 सितम्बर रविवार शाम तक अनवरत चलती रही. शुक्र व शनिवार को 33 इंच बारिश हुई, जिसमें 20 से 25 इंच बारिश शनिवार शाम के पहले के 40 घण्टों के दौरान हुई. वर्षा के साथ पूर्व से उग्र हवा के तेज झोंके भी आ रहे थे, सड़कें टूट-फूट गयी थी और जल स्रोत अवरूद्ध हो गये थे और उत्तरी श्रृंखला में जहॉ सड़ी स्लेटी चट्टान वाली जमीन है आस-पास के चट्टानों के ढीले-ढाले मलबे से अन्दर पानी समाना शुरू हो गया था. पिछले वर्षों इस तरफ काफी पेड़ कटे थे और भवन निर्माताओं ने प्राकृतिक प्रवाह को निर्बाध रखने के लिए समुचित व्यवस्था नहीं की थी. कई स्थानों पर पानी दरारों में समाकर अपना नया रास्ताबना रहा था. वर्ष 1866 में एक भूस्ख्लन वर्तमान स्खलन से पश्चिम में हुआ था, जिसने पुराने विक्टोरिया होटल को नष्ट कर दिया था वर्ष 1869 में यह स्खलन फैलकर आल्मा के नीचे तक पहुंच गया था.
जिस स्थान पर वर्ष 1880 का भू-स्खलन हुआ उसमें विक्टोरिया होटल और उसके कार्यालय, इनके नीचे झील के किनारे एक मन्दिर, इसके समीप ही बेल की दुकान तथा आगे झील के ही किनारे स्थित सभाकक्ष (एसेम्बली रूम्स) शामिल थे. शनिवार को करीब 10 बजे सुबह विक्टोरिया होटल के एकदम पीछे पहाड़ी के एक हिस्से में पहला स्खलन हुआ, जो बाह्य कक्षों (आउट हाउस)के एक हिससे और होटल के पश्चिमी छोर अपने साथ लुढ़काता ले गया. इसमें एक अंग्रेजी बालक और उसकी परिचारिका समेत कुछ स्थानीय नौकर मारे गये. तुरन्त बचाव कार्य के लिए कार्यदल बुलाये गये. मिस्टर लेनार्ड टेलर सी एस, मिस्टर मौर्गन, ओवरसियर तथा डिपो से सिपाही और अधिकारी बुलाए गये, ताकि दबे लोगों को बाहर निकाला जा सके. इस बीच होटल में रहने वाले हर व्यक्ति को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया गया. केवल कर्नल टेलर, आइर ई होटल के नीचे अलग से उस कमरे मे थे जो बिलियर्ड कक्ष तौर पर इस्तेमाल होता था तथा मेजर और श्रीमती मॉर्फी व श्रीमती टर्नवुल जो सहायता के लिए आई थी, सभा कक्ष की तरफ बढ़ गये. चॅूकि अब कुछ और नहीं किया जा सकता था, सभी जाने को तैयार थे तथा मुझे होटल से बाजार गये केवल 20 मिनट ही हुए थे और मैं मिस्टर राइट के साथ पास से गुजर रहा था कि शोर सुनाई दिया, हमने देखा की ऊपर चोटी से बड़े बड़े पत्थर होेटल की ओर लुढ़क रहे हैं. मैंने इसे गम्भीरता से नहीं लिया और आगे बढ़ गया . अगले दस मिनट में भूस्खलन हुआ.
एटकिंसन इस पहाड़ी की संवदेनशीलता पर आगे लिखते हैं- यह पूरा पहाड़ अर्धतरल स्थिति में था और इसे स्ख्लित करने के लिए हल्के झटके की जरूरत थी. इस पहाड़ को सूखे मौसम में सत्तू के ढेर के मानिंद बताया गया है, जो पानी मिलने पर रबड़ी बन गया. इसे हिलाने का काम किया भूकम्प के एक झटके ने जो इन पहाड़ों पर प्रायः आते रहते हैं.
आगे उस भयानक मंजर को बयां करते हुए वे लिखते हैं- बारिश के बूंदों साथ पेड़ों के टूटने की आवाज आई. विक्टोरिया से करीब 400 फीट ऊपर बांज के पेड़ नीचे को लुढ़कते देखे गये. एक या दो बड़े पत्थर लुढ़के और होटल से भागो-भागो की आवाज सुनाई दी. इसके बाद गड़गड़ाने की आवाज आई, जिसे उन्हें लगा कि जैसे बचा लिए गये लोगों को ढांढस बंधाने का शोर हो रहा है. …… आधे मिनट के अन्दर आखिरी पत्थर भी झील में छपाक से कूद पड़ा. झील की ऊपरी सतह पर ऊॅवी लहरें उठी, जबकि इसके उत्तर-पश्चिमी किनारे को हल्की भूरी धूल के कोहरे ने ढक लिया और विक्टोरिया होटल वाला स्थान भी दृष्टि से ओझल हो गया.
(Nainital Article Bhuwan Chandra Pant)
आगे एटकिंसन कुछ अन्य प्रत्यक्षदर्शी रेवरेंड डी. डब्ल्यू. थामस के हवाले से बताते हैं कि एक भयावह झपटे में विक्टोरिया होटल, बेल की दुकान, एसेम्बली कक्ष और कई सारे लोगों का जमघट अचानक चट्टानों के तले और झील में पहुंच गया. होटल ढहने से पहले कम से कम एक सौ फीट दूर तक बुनियाद समेत आगे को खिसकता आया और इतनी ही दूर तक बेल की दुकान भी खिसकी. जिस समय भू-स्खलन शुरू हुआ बहुत से स्थानीय व पांच या छः अंगेज सिपाही नीचे माल से गुजर रहे थे, जिनमें से अधिकांश चट्टानों के मलबे के नीचे दब गये. मिस्टर थामस आगे कहते हैं कि विक्टोरिया होटल औरहिन्दु मन्दिर सीधे झील में गये. होटल के मुख्य भवन का एंकमात्र जो निशान बचा था वह था स्तम्भ का एक टुकड़ा, लेकिन वह भी खेल के मैदान तक आ गया था.
एक अन्य प्रत्यक्षदर्शी मिस्टर डब्ल्यू गिलबर्ट के बयान को दर्ज करते हुए वे बताते हैं कि यह सब इतनी जल्दी हुआ कि अगर एक खुले मैदान में मैं अपनी क्षमता से दौड़ता तो इतनी अवधि में बीस कदम भी नहीं दौड़ पाया होता.
यही नहीं बचाव कार्य को निर्देशित करने जब हैनरी रैम्जे पहुंचे तो कुछ और मलबा आया और उन्हें झील की ओर धकेल ले गया और वे कमर तक डूबने के बाद झील से निकलकर महफूज स्थान तक चढ़ने में सफल रहे.
इस तबाही को याद करने का मकसद किसी को आतंकित करने का नहीं बल्कि हमें आत्मचिन्तन के लिए चेताने का है कि कहीं हमारी कुदरत के प्रति यह अनदेखी हमें खुद अपनी कब्र खोदने की ओर तो नहीं धकेल रही है? क्योंकि हम एक तरह से चेतनाहीन हो चुके हैं. जाहिर है शासन-प्रशासन के नजरों से बच-बचाकर हम भले अपने मकसद में कामयाब हो जायें लेकिन कुदरत की नजरों से बच नहीं सकते. यदि आपको हकीकत में अपने शहर नैनीताल से प्यार है, इसकी खूबसूरती को बनाये रखना चाहते हैं, तो जरा संभलिये.
कैंसर तो उपज चुका है हमारी लापरवाही से लेकिन आगे परहेज व उपचार पर ध्यान देंगे तो बहुत संभव है, इसे बढ़ने से रोक पायें. अरे, हम से ज्यादा संवेदनशील तो वो अंग्रेंज थे जो सात समन्दर पार के होने के बावजूद नैनीताल के अस्तित्व के इतने चिन्तित थे. उन्हीं की दूरगामी योजनाओं व प्रबन्धन का नतीजा है कि नैनीताल अब तक सुरक्षित है.
(Nainital Article Bhuwan Chandra Pant)
भवाली में रहने वाले भुवन चन्द्र पन्त ने वर्ष 2014 तक नैनीताल के भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय में 34 वर्षों तक सेवा दी है. आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से उनकी कवितायें प्रसारित हो चुकी हैं.
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