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और हम वापस पहुंचे पहाड़ों की गोद में, ठुलीगाड़ बना पिथौरागढ़ में अड्डा

पहाड़ और मेरा बचपन – 12

(पिछली क़िस्त : उधमपुर में दो साल के छोटे भाई की मौत और पिता का थोड़ा पगला जाना)


(पोस्ट को लेखक सुन्दर चंद ठाकुर की आवाज में सुनने के लिये प्लेयर  के लोड होने की प्रतीक्षा करें.)

दिमाग पर बहुत जोर डालने पर भी मुझे याद नहीं पड़ता कि उधमपुर से हम कैसे पिथौरागढ़ पहुंचे. बहुत धुंधली-सी याद है कि हमने लंबी-लंबी रेल यात्राएं कीं, जिसके दौरान ठंड से बचने के लिए मां ने हमें फौजी कंबल ओढ़ने को दिए. उस पूरी यात्रा में कोई भी सुखद पल होता, तो मुझे जरूर याद रह जाता. पर चूंकि मेरी स्मृति में कुछ दर्ज ही नहीं, इसलिए मैं कह सकता हूं कि उस यात्रा के दौरान मेरे साथ कुछ भी सुखद नहीं घटा. हमने रेल में बहुत स्वादिष्ट भोजन भी नहीं किया होगा, नहीं तो वही याद रह जाता.

सामान्यत: हमें जीवन में घटित होने वाले दुखी और सुखी पल ही ज्यादा याद रहते हैं. सामान्य समय बहुत धुंधला बनकर हमारी स्मृति से विलीन हो जाता है. मुझे लगता है कि रेल में हमने चॉकलेट या बिस्कुट जैसी भी कोई चीज नहीं खाई क्योंकि मैं इतना भुक्खड़ था कि एक टॉफी भी अगर मिल गई होती, तो यात्रा की स्मृति दिमाग से न जाती.

मेरी स्मृति में कुमाऊं के पहाड़ों के बीच की सड़क यात्रा भी नहीं, हालांकि मैं जानता हूं कि हमने रोडवेज की बस से ही यात्रा की होगी क्योंकि उन दिनों हम खुद को इससे बेहतर सुविधा नहीं दे सकते थे.

मेरी स्मृति में पहला दृश्य पिथौरागढ़ के केमू स्टेशन से सटे एक दो-तीन मंजिला होटल का है, जिसका नाम बहुत सालों तक दिमाग में रहा पर मैं अब उसे भूल गया हूं. बड़े भाई से पूछा तो उसे भी याद नहीं रहा. हो सकता पिथौरागढ़ के किसी पाठक को याद आ जाए. यह होटल ठीक सिनेमा लाइन के मुहाने पर था. कह सकते हैं कि इसी होटल से सिनेमा लाइन शुरू होती थी. बाद में वह होटल तोड़कर कुछ और बनाया गया. उस होटल की लकड़ी की सीढ़ियों से ऊपर-नीचे करते हुए मैंने उसकी सीलन भरी दीवारों की गंध महसूस की थी, जो मुझे आज भी याद है. उसकी लकड़ी की बालकनी से मैं स्टेशन की रंगबिरंगी बसों को देख रहा था. तब ज्यादातर बसें ट्रक जैसी होती थीं यानी उनका इंजन आगे की ओर निकला हुआ रहता था. बसों के रंग थोड़े चटख-चमकीले होते थे, पर उतने भी नहीं जितने पाकिस्तान की बसों में दिखते हैं. मैं बहुत कौतुहल से चीजों को देखने-समझने की कोशिश कर रहा था. यहां हम कई घंटे रुके और इस दौरान मैं बहुत बेचैन रहा क्योंकि मेरे पास करने को कुछ न था. मैं बार-बार लकड़ी की बालकनी जैसी जगह पर आकर बाहर का दृश्य देखने लगता. अंतत: कई घंटों बाद पिताजी एक ट्रक लेकर आए. इस ट्रक में घर का सामान लादा गया और हम ट्रक ड्राइवर के साथ वाली आगे की सीट पर बैठे. ट्रक स्टेशन से करीब पांच किलोमीटर दूर ठूलीगाड़ के किनारे जाकर रुका.

जैसा कि नाम से ही लगता है ठूलीगाड़ एक छोटी पहाड़ी धारा थी, जिसमें बरसातों के दिनों में पानी का स्तर बढ़ जाता है. यह एक छोटी-सी गाड़ थी, जो आगे जाकर काली नदी में मिल जाती है, पर छोटी होते हुए भी इसमें लोगों को डुबोने की कूवत थी. जल्दी ही मैं बताऊंगा कि कैसे कक्षा छह में मेरा एक सहपाठी यशुदास मेरे ही सामने गाड़ में डूबकर मरा.

औरों के लिए तो आज भी ठूलीगाड़ एक गाड़ का ही नाम है, पर हमारे परिवार के लिए ठूलीगाड़ एक जगह का नाम था, जिसने हमारे परिवार की परवरिश की और उसे अपने पैरों पर खड़ा किया. यही वह जगह थी जहां हम अगले कई सालों तक रहने वाले थे. इस जगह को बनाने वाले जमा तीन घर थे. एक घर बड़ा था और थोड़ी ऊंचाई पर था, दूसरा घर छोटा था और बड़े घर से महज बीस-पच्चीस मीटर नीचे थोड़ी ढलान पर था. नीचे वाले घर में ऊपर एक कमरा था और उसके नीचे भी एक कमरा. नीचे वाले कमरे के साथ जरा-सी जगह और निकाल दी गई थी. पता चला कि पिताजी ने 20 रुपये महीने की कीमत पर नीचे वाला कमरा किराए पर ले लिया था. इस कमरे में कहीं से भी कोई खिड़की न थी. क्योंकि वह जमीन खोदकर उसे समतल करके बनाया गया था, उसके दो ओर तो खुदाई से बनी दीवार ही थी.

ऊपर वाले घर में हमारे मकान मालिक का परिवार रहता था. उस घर में नीचे दो कमरे थे और ऊपर एक बड़ी-सी जगह थी, जिसे कमरा नहीं कह सकते क्योंकि चलने के लिए सिर झुकाना पड़ता था. इन दोनों घरों के चारों ओर क्यारीनुमा खेत थे, जिनमें अलग-अलग सब्जियों के पौधे लगे हुए थे. नीचे वाले घर के दरवाजे के पास ही एक आड़ू का पेड़ था. उसके थोड़ा बाईं ओर एक दाड़िम का पेड़ था. ऊपर बड़े वाले घर के दरवाजे के पास ही एक बहुत बड़ा पीपल का पेड़ था. इस घर के ऊपर एक खेत था, जिसके साथ लगकर एक नहर चलती थी. इस नहर के ऊपर एमईएस की कॉलोनी थी. इस जगह यानी ठूलीगाड़ का लोग नीचे मुख्य सड़क से एमईएस कॉलोनी जाने के लिए शॉर्टकट की तरह भी इस्तेमाल करते थे.

नहर के साथ-साथ पुलम के पेड़ों की पूरी कतार चली जाती थी, जो एक तरह से बाड़ का काम भी करती थी क्योंकि इनके तनों का इस्तेमाल करते हुए कंटीली तारें बांध दी गई थी. यहां अलग से संडास की कोई व्यवस्था नहीं थी. संडास के लिए गाड़ की ओर रवाना होना पड़ता था. जब मैं चौथी में था, तो छोटी उम्र का लाभ उठा घर के आसपास ही बैठ जाता, पर छठी में आने के बाद मैं इस प्राइवेट कार्य हेतु उचित जगह की तलाश करने लगा क्योंकि जहां मैं क्रिया में बैठता था, वहां से मुख्य सड़क दिखती थी और इसी सड़क से हमारी स्कूल बस गुजरती थी और उस स्कूल बस में ही वह अर्चना वर्मा बैठी होती थी, जिसके साथ मुझे इश्क होने का गुमान हो गया था. शुरू में मैं यह सुनिश्चित करता था कि बस के समय से पहले ही फारिग हो आऊं, पर उन दिनों चूंकि आड़ू वगैरह बहुत खा लेता था और जिन लोगों ने कच्चे आड़ू खाएं हैं बचपन में वे इस बात से भली-भांति वाकिफ होंगे कि कैसे इसके बाद पेट जब-तब मरोड़ छोड़ता रहता है. मेरे साथ भी यही होता और मैं जब-तब गाड़ किनारे भागता. एक-दो बार मुझे लगा जैसे बस में से अर्चना वर्मा ने दूर से ही सही पर मुझे क्रियारत देख लिया है. अब सोचता हूं कि कोई देखना भी चाहता बस के अंदर से तो देख नहीं पाता क्योंकि मैं जैसी आड़ लेकर बैठता था उसे हद से हद मेरा सिर दिखता और सिर देखकर कौन किसे पहचान सकता है, लेकिन तब मैं बच्चा था और इतना सोच नहीं सकता था.

एक दिन जब अचानक बस पांच-दस मिनट पहले नमूदार हो गई, जबकि मैं ऐक्शन में लीन था, बैठे-बैठे ही यह सोचकर कि आज अर्चना वर्मा ने मुझे देख लिया होगा, मेरा मुंह शर्म के मारे सुर्ख हो गया. उस दिन मैं स्कूल में दिन भर अर्चना वर्मा के सामने आने से कतराता रहा. दो-चार दिन गुजरने और इस दौरान अर्चना वर्मा के चेहरे पर कोई गैर मामूली भाव न आते हुए देखने के बाद ही मेरा मन सुनिश्चित हो पाया था कि उसकी नजर में मेरी छवि सेफ थी, मेरी छवि पर खुली जगह विसर्जन करने वाले गए-गुजरे गरीब परिवार से संबंधित होने का बट्टा नहीं लगा था. मुझे लगता था कि वह अब भी मुझे अपने हीरो की तरह देखती है, जैसे उस जमाने की फिल्मों में कोई हीरोइन अपने हीरो को देखती थी, फख्र और गरूर भरी नजरों से.

(जारी)

सुन्दर चन्द ठाकुर

कवि, पत्रकार, सम्पादक और उपन्यासकार सुन्दर चन्द ठाकुर सम्प्रति नवभारत टाइम्स के मुम्बई संस्करण के सम्पादक हैं. उनका एक उपन्यास और दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं. मीडिया में जुड़ने से पहले सुन्दर भारतीय सेना में अफसर थे.

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