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बागेश्वर के गोगिना से नामिक गांव की यात्रा के बहाने पहाड़ का जन-जीवन

गोगिना से नामिक गांव होते हुए मुनस्यारी- 1

बागेश्वर से हिमालय के साथ ही हरे-भरे बुग्यालों को जाने वाले कई रास्ते झरनों की तरह फूटते हैं. मंजिल तक पहुंचने तक ये रास्ते खूब थकाते तो हैं, लेकिन हर पल प्रकृति के अद्भुत नजारे आगे अपनी ओर खींचते जैसे महसूस होते हैं. कुछ ऐसा ही एक ट्रैक है बागेश्वर के गोगिना से नामिक गांव होते हुए मुनस्यारी का. इस रास्ते में खूबसूरत थाला बुग्याल, रूढ़खान पास और खलिया टॉप भी हैं.

बागेश्वर से अब गोगिना गांव तक मोटर रोड बन गई है. अब ये अलग बात है कि बरसातों में ये रोड कई जगहों पर भूस्खलन से बंद हो जाती है. योगेश के साथ इस रास्ते के बारे में बात हुई तो साथी आंनद खाती और हरीश जोशी को लेकर चार लोगों की टीम बन गई. गोगिना में मैंने अपने मित्र भवान सिंह से इस रूट में जाने की ईच्छा जताई तो उन्होंने इस बकरवाल वाले रास्ते के लिए दो पोर्टर साथी भीम सिंह और बलवंत सिंह की व्यवस्था करवा दी. ‘बकरवाल’ का मतलब भेड़-बकरियों को चराने के लिए हिमालयी क्षेत्रों में पहाड़ के संकरे व दुरूह रास्तों के साथ ही बुग्याली रास्तों से होकर जाने वाले भेड़-बकरियों के संरक्षक जिन्हें अनवाल या बकरवाल कहा जाता है.

बागेश्वर से सुबह साढ़े पांच बजे सिर्फ एक ही जीप गोगिना को जाती है, जो कि शाम को वापस लौट आती है. शाम को जीप के मालिक से चार सवारियों के बारे में बात कर ली. पहाड़ों में ग्रामीण क्षेत्रों में चलने वाली जीपों में एक सवारी की जान की कीमत कुछ रूपये मात्र ही है. इस भयानक सच्चाई से हम सभी खुद भी रूबरू हुए. बागेश्वर से गोगिना जाने के लिए एक मात्र साधन जीप ही है. पहले शामा तक बसें जाती थी, जीप ज्यादा होने से अब वो भी बंद हो गई हैं. सुबह पांच बजे बागेश्वर से चलने वाली इस जीप में तेरह सवारियों ने दो बच्चों समेत अपने आप को ठूंस कर खुद ही भर लिया. जीप का बागेश्वर से गोगिना तक किराया रू.180 बताया गया. अब तो बढ़ ही गया होगा.

जीप के फर्राटे भरने पर हमारे साथी ने चालक महोदय से धीमे-धीमे चलने का निवेदन किया, जो कि शायद चालक महोदय को नागवार सा गुजरा. चालक ने स्पीड बढ़ाते हुए टेपरिकार्डर का गला भी खोल दिया. भराड़ी पहुंचने में करीब एक घंटे का वक्त लगता है, लेकिन चालक ने जीप को चालीसेक मिनट में वहां पहुंचा एक होटल के किनारे चाय-नाश्ते के लिए खड़ा कर दिया. कुछ देर बाद जीप फिर शामा रोड पर दौड़ने लगी. चालक के बगल में गोगिना के पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य जसपाल सिंह रौतेलाजी तिरछे होकर बैठे थे. बातों-बातों में हमें पता लगा कि वो फौज से रिटायर्ड हैं तो हमने उनसे बीते फौजी जिंदगी के बारे में बातें करनी शुरू कर दी. रौतेलाजी अपने लय में आए तो हमें टेपरिकार्डर से मुक्ति मिल गई. चालक को भी उन्होंने आराम से चलने की हिदायत दे दी.

शामा में जीप के रुकते ही उसकी छत में चार-पांच लोग चढ़ गए. जीप फिर लीती-गोगिना के कच्चे सड़क में चलने लगी. रास्ते में कुछ लोग पीछे से भी लटक लिए. कई जगहों पर जीप के हिचकोलों से लग रहा था कि जीप अब पलटी तब पलटी. रिठकुला में सड़क में मिट्टी डाल कर भरान का काम चल रहा था. रोड बंद थी तो वहीं पर एक घंटा रूकना पड़ा. सड़क व दीवारों के घटिया काम पर रौतेलाजी ने थोड़ा कामगारों को हड़काया भी लेकिन कामगारों की सेहत में कुछ भी अंतर नजर नहीं दिखा. सड़क खुलने पर आगे पोढूंगा के पास से चार लोग फिर जीप में आढ़े-तिरछे लटक गए. जीप में अंदर-बाहर करीब बाईस सवारियां हो गई थी. साढ़े दस बजे गोगिना में जीप से उतरने के बाद जान में जान आई. जीप यहां से वापस बागेश्वर जाने के लिए मुड़ गई.

हमारी इस यात्रा के दो हफ्ते पहले ही इस रोड में एक जीप के एक्सीडेंट होने से एक की मौत हो गई थी. वैसे भी पहाड़ में कितनी ही दुर्घटनाएं हों किसी को कोई सबक नहीं मिलता है. ग्रामीण क्षेत्रों में अन्य विकल्प नहीं होने से सवारियों और जीप वालों के बीच सफर करने के लिए एक अघोषित समझौता जैसा हो जाता है. टैक्सी जीप चलाने वालों को नियम-कानून से कोई लेना-देना नहीं होता है, वो नियम जानते भी नहीं. लाइसेंस भी उनके दलालों से बन जाने वाले हुए. कभी हादसों के बाद यदि बच गए तो शायद कुछ सबक ले लेते होंगे.

प्रशासन भी कभी दुर्घटना होने पर कुछ दिन खानापूर्ति कर फिर चुप सा बैठ जाता है और फिर कभी हादसा होने पर अफसरानों के हुक्म पर पुलिस के जवानों का काम भी अब लोगों को जिंदा रखने के बजाय दुर्घटना में उनकी लाशें निकालना भर रह जाता है. ग्रामीण क्षेत्रों में धडल्ले से दौड़ने वाले वाहनों में से ज्यादातर अपनी उम्र कब की पूरी कर चुके हैं. कईयों के तो कागज ही नहीं होते हैं और फिटनेस की बात तो वाहन के लिए सपना जैसा हुवा.

गोगिना में हमें भवान सिंह मिल गए. यहां उनकी पुश्तैनी दुकान है. थोड़ी देर बाद ही हमारे गाइड साथी भीम सिंह और बलवंत सिंह भी पहुंच गए. भवानदा हमें अपनी दुकान के बगल में ही नए बन रहे मकान में ले गए. ये मकान वे टूरिस्टों के रूकने के लिए बना रहे हैं. इस ओर पर्यटकों की कम आवाजाही से वो सरकार की नीति को ही कोसते रहे. भवानदा के बड़े भाई हैं भगतदा. मैंने भगतदा के बारे में पूछा तो भवानदा ने दुकान के पीछे पेड़ों के झुरमुटों की ओर इशारा कर दिया. नजदीक जाकर देखा तो वहां छह-एक बुजुर्गजनों की बावन पत्तों के ताश की मजेदार महफिल जमी हुई थी.

‘भगतदा… भगतदा…’ आवाज देने पर चेहरे पर झुर्रियां लिए एक बजुर्ग से जवान ने कौतुहलवश झांका तो मैंने हाथ हिला इशारा किया. अनमने से वो दूसरे साथी को अपने पत्ते पकड़ा कुछ समझाते हुए मेरे पास आए. मैंने उन्हें अपनी पहली हिमालय की यात्रा की याद दिलाई तो वो गले मिल गए. काफी देर तक उनसे बातें होती रही. अब भगतदा हिमालय की ओर तो नहीं जाते हैं लेकिन अपने अनुभवों की खान लिए वो हर किसी का अभी भी मार्ग-दर्शन करते रहते हैं.

1900 मीटर की उंचाई पर बसे गोगिना में करीब दो सौ मवासे हैं. जनसंख्या करीब चौदह सौ के आसपास है. इस क्षेत्र में रौतेला, दानू, वाच्छमी, टाकुली रहते हैं. भवानदा ने बताया कि गोगिना गांव से लमतरा, मधारी, अल्यूणा, चौपता होते हुए छोलिया बुग्याल के लिए दो दिन का रास्ता है. पहली रात मधारी में गुजारनी हुई. छोलिया से आगे चनणिया, रजला होते हुए कफनी ग्लेशियर को भी रास्ता है. इसके लिए टूरिज्म विभाग बताता ही नहीं है किसी को कुछ. पता नहीं ऑफिस में ही क्या करते रहता है. कुछ टूरिस्ट आते तो गांव वालों को भी रोजगार मिल जाता. कुछ यहां भी चहल-पहल हो जाती. अब आप लोग यहां के बारे में बताना, बहुत अच्छे ट्रैक हैं इस ओर. भवानदा से विदा ले हम गोगिना से नामिक गांव की ओर चल पड़े.

ग्रामीणों के मुताबिक गोगिना से नामिक की पैदल दूरी करीब छह किलोमीटर है. गोगिना से रामगंगा तक ढलान लिए हुए उतराई है. इससे पहले एक रास्ता चार किलोमीटर कीमू गांव को खड़ी चढ़ाई वाला है.

रामगंगा नदी के तट पर पहुंचे तो वहां झूला पुल मिला. 1995 में जब पहली हिमालय की यात्रा पर गया था तो यहां पैदल पुल बह गए थे. हमें दो दिन गोगिना में ही रुकना पड़ा था. बाद में नदी को रस्सी से पार किया था. तब रामगंगा का बहाव गोगिना की पहाड़ी की ओर था. आज नदी ने अपना सिराना बदल कर नामिक गांव की ओर कर लिया था. पुल पर गोगिना से लाई ककड़ी का पहाड़ी नमक के साथ स्वाद लेकर हम सभी आगे नामिक गांव की चढ़ाई में धीरे-धीरे बढ़ने लगे. पहाड़ी की तीखी ढलान में कुछ महिलाएं जानवरों के लिए घास काटने में मगन थी. पास में ही एक मोबाइल में बज रहे पहाड़ी गानों के सांथ वे भी गुनगुना रहे थे. नामिक गांव की सरहद में सबसे पहले हाईस्कूल है, फिर कुछ आगे बाद गांव फैला हुआ है. दो हजार मीटर की उंचाई पर बसे नामिक गांव में टाकुली, भंडारी, कन्यारी, रौतेला, परिहार, जेम्याल आदि परिवारों को मिलाकर लगभग 120 परिवार हैं.

स्कूल में हम सभी सुस्ताने के लिए लेट-बैठ गए. कुछ बच्चों की आवाजें सुन देखा तो एक महिला हमारे पास आई और हमसे कुछ दवाईयां मांगने लगी. वो कस्तुरा देवी थी. उसने बताया कि वो खेत में काम कर रही थी हमें देखा तो यहां आ गई. उसने बताया कि उसे गले, पेट, पीठ दर्द के अलावा कई तरह की दिक्कतें हैं कुछ दवाईयां दे दो. यहां कोई हॉस्पिटल नहीं है. बीच में कोई बड़ा नेता आया था, कह रहा था कि ये कर दूंगा वो कर दूंगा, सब झूठ बोल गया वो तो. बातों-बातों में कस्तूरा ने बताया कि उसका लड़का विशाखापट्टनम में सेठों के वहां नौकरी करता है. फोन यहां काम करने वाला हुआ नहीं, साल में कुछ दिनों के लिए घर आता है तब ही जो बातें हो जाती हैं.

नामिक गांव के हाई स्कूल में लगभग 150 बच्चों पर चार अध्यापक हैं. इंटर कालेज की बिल्डिंग कई सालों से बनने में ही है. प्राइमरी में दो अध्यापक हैं. जूनियर वाले बच्चों को पढ़ाने के लिए दिगड़ी संस्था द्वारा एक मास्टर आए हैं अभी, वो भी तीनेक महीने बाद चले जाएंगे. नवीन सिंह रावत एक माह से यहां पढ़ा रहे हैं. अध्यापक मेहनती लगे. उन्हें दुःख है कि यहां के बच्चों का भविष्य अंधकारमय ही रह जाता है. सुविधाएं न होने पर लड़के तो मुनस्यारी आदि जगहों में पढ़ने के लिए चले जाते हैं लेकिन लड़कियां पढ़ने की इच्छा होने के बावजूद गांव की विषम परिस्थितियां होने पर फिर आगे पढ़ नहीं पाती हैं.

नामिक गांव के ग्रामीण खेती कर अपने साल भर के लिए आलू, राजमा, जौ, मडुवे की फसल तैयार कर ही लेते हैं. बाकी अन्य जरूरी सामानों के लिए इनकी छोटी बाजार गोगिना और बड़ा बाजार बागेश्वर ही होता है. गांव में आड़ू, पुलम, अखरोट के पेड़ भी अपने होने का एहसास कराते महसूस हुए.

गांव की छोटी-छोटी बाखलियों से होते हुए हम गांव के उपर नंदा देवी मंदिर के एक बड़े से मैदान में पहुंचे. गांव वालों ने इस जगह का नाम टीटी गेर रख छोड़ा है. ये वही मैदान था जिसमें तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने गांव वालों को सुखमय भविष्य के सपने दिखाए थे, जो आज तक भी पूरे नहीं हो सके. आगे भी वो सपने पूरे होंगे यह भी एक सपने की तरह ही है.

मैदान के कोने में हम अपने टैंट लगा रहे थे कि मिस्त्री का काम करने वाले गोविंद सिंह परिहार जिज्ञासावश पास आ गए. बातचीत से पता लगा कि वो स्कूल पढ़ने के वास्ते मुनस्यारी में अपने बच्चे को छोड़ पैदल ही सुबह बुग्याल-जंगल नाप कर आ रहे थे. गांव में पढ़ाई के संसाधन ठीक नहीं होने पर उन्होंने अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए मुनस्यारी में ही अपने रिश्तेदार के वहां व्यवस्था कर रखी थी. उन्होंने बताया कि यहां घर में बच्चों के खाली रहने पर उनकी मां उन्हें गाय-बछियों के साथ जंगल भेज देती है. हम तो अपनी जिंदगी जी लिए अब इस गुफा से बच्चे तो बाहर निकलें. दुनिया को जाने-समझें. ‘अभी थक गया हूं’ कह वो हाथ मिला तेजी से नीचे अपने नामिक गांव को उतरते चले गए.

सूरज भी अपनी दुकान समेटते हुए बादलों की रजाई ओढ़ते हुए सा महसूस होता दिख रहा था. बादलों और सूरज की इस लुकाछिपी में कीमू गांव के ऊपर किरणों की तरह बरसती हुई लालिमा को हम कई पलों तक देखते रहे.

टैंट लगने के बाद योगेश ने पूरी-सब्जी के साथ ही कचूमर की तैयारी करनी शुरू कर दी. कचूमर यानि बारिक कटी ककड़ी, प्याज, टमाटर में दही के साथ कुछ हरी मिर्च और स्वादानुसार नमक मिलाकर बनी चटपटी चीज. बाहर दो पत्थरों के बीच की जगह को चूल्हा बनाकर लकड़ी जला पूड़ी बननी शुरू हुवी. भीम बिना चकले-बेलन के हाथों से ही पूड़ियाँ बनाने में जुटा था और उसका साथी बलवंत एक पतली लकड़ी से पूरियों को तलने में लगा था. गर्म पूरी और कचूमर के साथ पेटपूजा कर हम सभी टैंटों में समा गए.

( जारी )

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बागेश्वर में रहने वाले केशव भट्ट पहाड़ सामयिक समस्याओं को लेकर अपने सचेत लेखन के लिए अपने लिए एक ख़ास जगह बना चुके हैं. ट्रेकिंग और यात्राओं के शौक़ीन केशव की अनेक रचनाएं स्थानीय व राष्ट्रीय समाचारपत्रों-पत्रिकाओं में छपती रही हैं. केशव काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

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