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मेरी जाँ, मुझे जान ना कहो मेरी जाँ

(पोस्ट को रुचिता तिवारी की आवाज़ में सुनने के लिए प्लेयर पर क्लिक करें)

मेलोडेलिशियस – 7

ये ऑल इंडिया रेडियो नहीं है. ये ज़ेहन की आवाज़ है. काउंट डाउन नहीं है ये कोई. हारमोनियम की ‘कीज़’ की तरह कुछ गाने काले-सफेद से मेरे अंदर बैठ गए हैं. यूं लगता है कि साँसों की आवाजाही पर ये तरंगित हो उठते हैं. कभी काली पट्टी दब जाती है कभी सफेद. इन गानों को याद करना नहीं पड़ता बस उन पट्टियों को छेड़ना भर पड़ता है.

आज रात की रानी की मदभरी खुशबू से बिंधी हुई हवा के झोंके खिड़की से आकर मुझे इतने भावमय तरीके से छू रहे हैं कि ज़ेहन की एक सफेद ‘की’ दब गई है. ये ‘की’ मुझे एक बहुत खुशनुमा, नटखट हंसी से भरी, ज़रा सी सेंसुएलिटी और क़तरा भर दर्द से सजी एक रहस्यमयी आवाज़ के जादू में डुबोती जा रही है. मैं इस जादुई आवाज़ और उसके संगीत की दुनिया में खिंची चली जाती हूँ जो इस तरंगित माहौल को और भी नशीला बना देती है. सुनने वाला इस गाने को शब्दशः महसूस करने और जीने लगता है क्योंकि मेरी पसंदीदा गायिका में वो क्षमता है जो गाने के मूड के समरस हो जाती है और गाने के हर शब्द में अहसासों की उतनी ही मात्रा ढालती है जितनी उस शब्द के खिलने के लिए ज़रूरी हो.

मेरी जाँ मुझे जान ना कहो मेरी जाँ

ये गीता दत्त हैं जिन्होंने अपने swan song यानि आख़िरी गाने में ऐसा लगता है कि अपना दिल ही निकाल कर रख दिया और लोगों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ गईं. बासू भट्टाचार्य द्वारा निर्देशित फ़िल्म अनुभव (1971) का ये गाना हिंदी सिनेमा के सबसे बेहतरीन एक्टर्स में से एक संजीव कुमार और तनुजा पर फिल्माया गया है. इसे कानू रॉय जो कि उस ज़माने के क़ाबिल संगीतकार और एक्टर थे और पहले कभी सलिल चौधरी जैसे प्रतिष्ठित संगीतकार के सहायक रह चुके थे, ने संगीतबद्ध किया है.

इस गाने की सबसे ख़ास बात ये है कि इसमें वाद्ययंत्रों का बहुत कम प्रयोग किया गया है जिससे गाने के बोल और रागात्मकता में एक अलग सी चमक आ गई है. गाने में देबू चक्रवर्ती ने तबला और सैमी रुबिन ने पियानो एकोर्डियन बजाया है. पियानो एकोर्डियन, पियानो का देसी रूपांतरण है जिसमें एक हारमोनियम होता है जो दोनों हाथों से बजाया जाता है और जिसमें सिलाई मशीन के जैसे पेडेस्टल से हवा भरी जाती है.

किसी इंटरव्यू में सैमी रुबिन ने बताया है कि गाने की रिकॉर्डिंग के लिए गीता दत्त सीधे अस्पताल से स्टूडियो पहुंची थीं. स्वास्थ्य ख़राब होने के बावजूद उन्होंने गाने की लय और प्रत्येक उतार-चढ़ाव को पूरी कुशलता से अभिव्यक्त किया है. बिना किसी रिहर्सल के उन्होंने बहुत कम समय में ही गाने की फील को पकड़ लिया और लगभग एक घण्टे में रिकॉर्डिंग सम्पन्न हो गई. बिला शक़ ये साबित हो गया कि अपने व्यक्तिगत जीवन के बिखराव के बावजूद गीता दत्त भाव गायकी की महारानी हैं. गाने में और कोई भी उनके जैसे इमोशन्स पैदा नहीं कर सकता.

गाने के अंत में जो हंसी है वो कितनी प्राकृतिक है न, उतनी ही जितनी कि इन शब्दों की अदायगी में खीज में मुंह फुलाने की अदा

जा न कहो अनजान मुझे
जान कहां रहती है सदा

कहते हैं दिए की लौ बुझने से ठीक पहले बहुत तेज़ हो उठती है. दुर्भाग्य से ‘अनुभव’ की सफलता गीता दत्त की गायकी के दिये की लौ में वो आख़िरी चमक साबित हुई.गीता रॉय के नाम से महज़ सोलह साल की उम्र में अपना कैरियर शुरू करने वाली इस हिरनी जैसी आंखों वाली लड़की ने अपने पहले ही गाने से फ़िल्म इंडस्ट्री में धूम मचा दी. दो भाई (1947) फ़िल्म का वो गाना था ‘मेरा सुंदर सपना बीत गया.’ ऐसा लगता है जैसे गीता रॉय ने गीता दत्त बनने से पहले ही गुरु दत्त के साथ अपने असफल वैवाहिक जीवन की कहानी कह दी हो.

गाने के अल्फ़ाज़ और उसके फिल्मांकन के हिसाब से समुचित अनुपात में अहसास और आवाज़ को घोल देने की उनकी अद्भुद क्षमता की वजह से कुछ ही दिनों में गीता ने, लता जैसी दिग्गज गायिका के बराबर ही मुक़ाम हासिल कर लिया. संगीत के सारे रंग, पूरे स्पेक्ट्रम में वो समान कुशलता से विचरण कर सकती थीं. चाहे वो कोई गम्भीर मर्मस्पर्शी गीत हो या कोई चुलबुला गाना, रोमांटिक युगल गीत हो या दर्द भरा सोलो, कोई भजन हो या क्लब सॉंग, ऐसा लगता था कि जैसे उनके लिए सब बच्चों का खेल हो. शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित गीता दत्त की विशेषज्ञता फोक सांग्स और भक्ति गीतों में थी. लेकिन हिंदी फिल्मों में उन्होंने हर मूड के अमर गीत दिए हैं जो पीढ़ियों तक याद रक्खे जाएंगे.

संगीतकार अनिल बिस्वास ने गीता दत्त की खूबसूरत गायकी का एक किस्सा पीयूष शर्मा को दिए एक इंटरव्यू में सुनाया था. फ़िल्म प्यासा में मोहम्मद रफ़ी और गीता दत्त का एक युगल गीत रिकॉर्ड होना था. गाना था ‘हम आपकी आंखों में इस दिल को बसा दें तो.’ सचिन देव बर्मन यानि बर्मन दा जो इस गाने के संगीतकार थे को जब स्पूल पर ऱफी और गीता की गाई रिकॉर्डिंग मिली तो उन्होंने रफ़ी को अपने पास बिठाया और रिकॉर्डिंग सुनाते हुए कहा कि गीता की गायकी को ध्यान से सुनो और बताओ कि उसने कहां-कहां गलतियां की हैं. दो-तीन बार पूरा गाना सुनने के बाद कहते हैं कि रफ़ी बर्मन दा के पैरों पर गिर पड़े. उन्हें समझ आ गया कि खुद उन्होंने कहां-कहां गलतियां की हैं. ऐसी त्रुटिरहित गायकी थी गीता दत्त की कि रफ़ी जैसे महान गायक भी कुछ सीख सकते थे. और हां ऐसे सौहार्दपूर्ण होते थे संगीतकार और गायक के सम्बंध कि सिखलाई भी हो गई और आपसी प्रेम भी बना रहा.

गाने को लिखा भी कितनी खूबसूरती से गया है, हिंदी फिल्म संगीत में प्रेम गीतों के पर्याय गुलज़ार द्वारा.

गीतकार गुलज़ार की तीन ख़ास बातें मुझे आकृष्ट करती हैं. पहली, वो पुरानी गज़लों, कविताओं या गीतों की ज़मीन पर नए ट्रीटमेंट के साथ गीत लिखते हैं. कभी कुछ शब्द तो कभी पूरा शे’र या मिसरा लेकर. दूसरी, अमूर्त वस्तुओं से मूर्त और मूर्त से अमूर्त तक का सफ़र बहुत सफाई और कुशलता के साथ करते हैं. और तीसरी, शब्दों के साथ बहुत शानदार तरीके से खेलते हैं. ही प्लेज़ डेक्सट्र्सली विद वर्ड्स.

पहली ख़ासियत का सबसे बेहतरीन उदाहरण है फ़िल्म ग़ुलामी का गाना

ज़िहाल-ए-मिसकीं मकुन ब-रंजिश ब हाल-ए-हिज़रा बेचारा दिल है
सुनाई देती है जिसकी धड़कन हमारा दिल या तुम्हारा दिल है

ये मौलिक रूप से अमीर ख़ुसरो की बहुत ख़ूबसूरत रचना का रूपांतरण है
जिसमें एक पद फारसी और एक ब्रज भाषा का है

ज़िहाल मिसकीं मकुन तग़ाफ़ुल, दुराय नैना बनाय बतियाँ
कि ताबे हिज़राँ न दारम ऐ जां, न लेहु काहे लगाय छतियाँ

गुलज़ार के गाने में अमीर ख़ुसरो से न केवल शब्दों की उधारी है बल्कि भाव भूमि और तो और भाषा का ट्रीटमेंट भी लगभग वही है जो ओरिजिनल कविता में है.

दूसरी ख़ूबी को समझने के लिए सुनिए ‘मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है’

सही मायनों में गुल्ज़ारियत अगर कुछ है तो वो यही ख़ासियत है. ‘
सावन के कुछ भीगे- भीगे दिन रक्खे हैं
और मेरे इक ख़त में लिपटी रात पड़ी है
वो रात बुझा दो…

प्रेम की अजब रूमानियत बिखेरते हैं गुलज़ार, जिसमें शब्द अपने भौतिक अर्थों के अतिरिक्त प्रतीकों के नए कलेवर में प्रस्तुत होते हैं.

और तीसरी ख़ासियत का सबसे उम्दा उदाहरण है हमारा आज का ये गाना ‘मुझे जान न कहो मेरी जां’

जाँ या जान (life or beloved) और जान (to know) जैसे शब्दों की बारीक़ कारीगरी से बुने गए इस गाने में पोएट्री में लफ्ज़ के महत्व को महसूस किया जा सकता है. और जब इसे आवाज़ दी जाती है तो गानों में तलफ़्फ़ुज़ की सफ़ाई की ज़रूरत का पता चलता है. गीता दत्त हर शब्द पर अलहदा भार देती हैं.

जान ना कहो अनजान मुझे
जान कहाँ रहती है सदा
अनजाने क्या जानें
जान के जाए कौन भला

कितनी सफाई से प्रेयसी अपने प्रेम को प्रेमी के प्रेम से श्रेष्ठ होना बता रही है. तुम प्यार से अनजान हो, मुझे जान मत कहो क्योंकि जान तो हमेशा रहती नहीं, चली जाती है. जो प्यार के इस खेल से अनजान है, वो किसी को अपनी जान के बराबर चाहने की बात जान ही नहीं सकता और जो इस खेल के हश्र को जान जाता है, वो इस रास्ते पर जाता ही नहीं. बिल्कुल वैसे ही भाव जैसे-

ख़ुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार

सूखे सावन बरस गए इतनी बार इन आँखों से
दो बूंदें ना बरसीं इन भीगी पलकों से

ऐसी ही कारीगरी सूखे सावन के बरसने और दो बूंदों के बरसने के कंट्रास्ट में है. इसे प्यार की बेबसी कहिए या ईगो कि अक्सर आप अपने प्रियतम के आगे बेआवाज़ रोते हैं. कमज़ोर होकर भी आप दिखना नहीं चाहते. इसके वीडियो में संजीव कुमार और तनुजा की रहस्यमयी मुस्कुराहटें हैं, रात है, फूल हैं, खिड़की है और है खूब सारी बारिश. उतनी ही छुपी-छुपी सी और उतनी ही मुखर है ये सेटिंग जितने कि गाने के बोल या गायकी.

ऐसा फिल्मांकन हिंदी फिल्मों में कम ही देखने को मिलता है कि कोई गाना भावना और रूमानियत के ऐसे शीर्ष पर जाकर ख़त्म होता हो जो आपको अपने साथी को गले लगाने पर मजबूर कर दे.

होठ झुके जब होठों पर सांस उलझी हो साँसों में
दो जुड़वा होठों की बात कहो आंखों से

तो अगर आप गीता दत्त नाम की उस मनमोहक आवाज़ को महसूस करना चाहते हैं जो कभी बहुत कोमल है, कभी चिढ़ाती हुई सी नटखट, कभी नशे से भरी रोमांटिक तो कभी बहुत मीठे से एक दर्द से लबरेज़ तो इस गाने के यूट्यूब लिंक पर जाइये और अपने प्रिय का हाथ थामे दो जुड़वा होठों की बात आंखों से कह डालिये

मेरी जाँ, मुझे जान ना कहो मेरी जाँ
मेरी जाँ, मेरी जाँ
मुझे जान ना कहो मेरी जाँ
मेरी जाँ, मेरी जाँ

जान ना कहो अंजान मुझे, जान कहां रहती है सदा
जान ना कहो अंजान मुझे, जान कहां रहती है सदा
अंजाने, क्या जानें जान के जाए कौन भला
मेरी जाँ, मुझे जान ना कहो मेरी जाँ
मेरी जाँ, मेरी जाँ

सूखे सावन बरस गये, कितनी बार इन आंखों से
सूखे सावन बरस गए कितनी बार इन आंखों से
दो बूंदे ना बरसीं, इन भीगी पलकों से
मेरी जाँ, मुझे जान ना कहो मेरी जाँ
मेरी जाँ, मेरी जाँ

होठ झुके जब होठों पर, सांस उलझी है साँसों में
होठ झुके जब होठों पर, सांस उलझी है साँसों में
दो जुड़वा होठों की बात कहो आँखो से
मेरी जाँ, मुझे जान ना कहो मेरी जाँ
मेरी जाँ, मेरी जाँ
मुझे जान ना कहो मेरी जान
मेरी जाँ

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रुचिता तिवारी/ अमित श्रीवास्तव

यह कॉलम अमित श्रीवास्तव और रुचिता तिवारी की संगीतमय जुगलबंदी है. मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा यह लेख रुचिता तिवारी द्वारा लिखा गया है. इस लेख का अनुवाद अमित श्रीवास्तव द्वारा काफल ट्री के पाठकों के लिये विशेष रूप से किया गया है. संगीत और पेंटिंग में रुचि रखने वाली रुचिता तिवारी उत्तराखंड सरकार के वित्त सेवा विभाग में कार्यरत हैं. 

उत्तराखण्ड के पुलिस महकमे में काम करने वाले वाले अमित श्रीवास्तव फिलहाल हल्द्वानी में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात हैं. 6 जुलाई 1978 को जौनपुर में जन्मे अमित के गद्य की शैली की रवानगी बेहद आधुनिक और प्रयोगधर्मी है. उनकी दो किताबें प्रकाशित हैं – बाहर मैं … मैं अन्दर (कविता). काफल ट्री के अन्तरंग सहयोगी.

देख लो आज हम को जी भर के
महसूस तुम्हें हर दम फिर मेरी कमी होगी
जो मैं जानती बिसरत हैं सइयाँ
मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो

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Girish Lohani

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