अल्मोड़ा से 6 किलोमीटर दूर एक छोटी सी जगह है कसारदेवी. पिछले पचास से भी अधिक सालों से कसारदेवी दुनिया के पर्यटन मानचित्र पर अपनी एक अलग पहचान बना चुका है. कसारदेवी यात्रा का मन बना रहे हों और वहां रहने लायक अच्छी जगहें गूगल पर ढूंढ रहे हों तो इंटरनेट सबसे पहले मोहन्स का नाम दिखाता है. कसारदेवी में रहने आने वालों का सबसे प्रिय अड्डा है यह. आज आपको इसे चलाने वाले शख्स से मिलवाते हैं.
मोहन सिंह रयाल का जन्म कसारदेवी से लगे छोटे से गाँव माट में 1973 में हुआ था. पिता रंजीतसिंह रयाल फ़ौज में नौकरी करती थे जबकि माता पार्वती देवी एक साधारण पर्वतीय गृहिणी थीं. शुरुआती पढ़ाई स्थानीय स्कूलों से पूरी करने तक मोहन को अपने बारे में पता लग गया था कि उनकी दिलचस्पी कृषि में है. उनके मन में डेरी फ़ार्म खोलने का सपना भी था. इसी वजह से इंटर करने वे पाटिया के एग्रीकल्चर कॉलेज गए. इंटर के बाद उनके सामने वही समस्याएं आईं जिनसे हर पहाड़ी युवा दो-चार होने को अभिशप्त रहता आया कि आगे के किया जाय.
पंतनगर विश्वविद्यालय में बी. एस. सी. एग्रीकल्चर में एडमीशन तो मिल गया लेकिन पिता के पास फीस भरने के पैसे नहीं थे. मन मार कर आधी पौलीटेक्नीक और पूरी आईटीआई करने के बाद मोहन को काशीपुर स्थित सूर्या फैक्ट्री में ट्रेनी फिटर की नौकरी मिल गयी. यह 1992-93 की बात है. छः महीने में ही इस नौकरी से आजिज आकर मोहन ने हितैषियों के कहने पर दिल्ली का रुख किया. नौकरी की तलाश और भीषण गर्मी के प्रकोप से दुखी होकर मोहन महीन भर के भीतर वापस कसारदेवी आ गए.
आगे क्या किया जाय – यही सवाल फिर से सामने था. कसारदेवी 1960 के दशक से ही फिरंगी पर्यटकों की प्रिय जगह बन चुका था और मोहन ने बचपन से ही उन्हें आते-जाते देखा था. इन में से कई विदेशी कसारदेवी के आसपास के गाँवों में छः-छः माह तक रहा करते थे और स्थानीय निवासियों से उनके अच्छे सम्बन्ध बन जाते थे.
ऐसा की एक फ्रेंच पर्यटक था इगोर. इगोर से मोहन की पुरानी जान-पहचान थी और वे दोनों कई बार साथ-साथ ट्रेकिंग पर जा चुके थे. इगोर ने मोहन को आइडिया दिया कि एक खोमचानुमा कैफे खोला जाय. कसारदेवी में आने वाले पर्यटकों की तादाद के मद्देनज़र यह आइडिया मोहन को जंच गया. इस बीच “कुछ करने” का घरवालों का दबाव तो था ही.
सो 1993 में मोहन्स कैफे नाम का खोमचा अस्तित्व में आया. इगोर पाककला का ज्ञाता था और उसके निर्देशन में मोहन की कुकिंग क्लासेज़ शुरू हुईं. कॉफ़ी. केक, पित्ज़ा और पास्ता जैसी चीज़ें बनाना मोहन ने इगोर से सीखा तो बदले में इगोर ने मोहन के घर पर उनकी मां से पहाड़ी डुबके और चुल्काणी बनाना सीखा. मोहन का यह प्रयोग चल निकला और पर्यटकों के अलावा अल्मोड़ा से लगातार घूमने आने वालों को उनके व्यंजनों का स्वाद पसंद आने लगा. अल्मोड़ा के निवासियों के लिए पास्ता और पित्ज़ा तब नई-नई डेलीकेसीज़ थीं. काम को बढ़ाने की गरज से प्रधानमंत्री रोजगार योजना के तहत बैंक से पैंतीस हजार रूपये का लोन भी लिया गया.
नए-नए भोजन बनाने के लिए मोहन के भीतर उत्साह था और ग्राहकों की संख्या बढ़ती जा रही थी. इगोर के कहने पर ही 1999 में मोहन्स कैफे के साथ-साथ एक गेस्टहाउस खोलने का विचार हुआ क्योंकि बढ़ते पर्यटन के साथ कसारदेवी में रहने की बहुत सुविधाएं नहीं थीं. फिर से लोन लिया गया और 4-5 कमरों का एक गेस्टहाउस बनाया गया. गेस्टहाउस के कमरों के साथ स्टूडियो किचन भी उपलब्ध कराये गए थे. 300 से 500 रुपये में कमरे उठने लगे और धीरे-धीरे बिजनेस बढ़ता चला गया और कमरों की संख्या भी. इस बीच मोहन का विवाह हो गया था और उनका छोटा भाई पूरन भी पढ़-लिख कर उसी समस्या से जूझ रहा था जिससे मोहन का सामना हुआ था. मोहन ने अपने छोटे भाई को भी अपने व्यवसाय में जोड़ लिया और आज मोहन्स कसारदेवी का सबसे लोकप्रिय होटल बन चुका है. होटल के साथ चलने वाला रेस्तरां अपने विविधतापूर्ण भोजन के लिए आसपास के इलाके में बेहद लोकप्रिय है.
कसारदेवी में एक समय मुख्यतः इटली, फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया और ब्रिटेन से तमाम पर्यटक आया करते थे. कसारदेवी आने वालों में देश-विदेश की बड़ी हस्तियाँ शामिल थीं जिनमें पिंक फ्लायड, डी. एच. लॉरेन्स, बॉब डिलन, स्वामी विवेकानंद से लेकर टिमोथी लियरी जैसे लोग शामिल थे. मोहन बताते हैं कि पिछले 10-15 सालों में इजराइली पर्यटकों की संख्या में बहुत वृद्धि हुई है. इन युवा बैकपैकर्स के लिए मोहन के मन में बहुत आदर और सम्मान है. वे कहते हैं कि ये युवा अत्यंत विनम्र, जिज्ञासु और हर तरह की परिस्थिति में ढल जाने वाले होते हैं. भारतीय पर्यटकों से उनकी शिकायत रहती है कि एक बार होटल में चेक इन करने के बाद वे खुद को बादशाह से नीचे नहीं समझते. एक दफा एक ऐसे ही सज्जन ने अपने कमरे में गिर गए कांटे को खुद न उठाते हुए फोन कर वेटर को बुलाया और उससे काँटा उठवाया. विदेशी पर्यटक हमेशा अपनी थाली खुद कमरे से वापस लाकर स्टाफ को धन्यवाद देना नहीं भूलते.
खैर! मोहन का जीवन अब अच्छी तरह चलता है और बिजनेस लगातार बढ़ रहा है. लगातार अलग-अलग तरह के लोगों के साथ मिलते-जुलते हुए मोहन ने यह बात भी समझ ली कि जीवन में सिर्फ पैसा ही सब कुछ नहीं होता. कोई दसेक साल पहले अपने एक मित्र प्रशांत बिष्ट के साथ हुई मुलाक़ात ने मोहन के जीवन में एक नए जुनून का प्रवेश कराया. उस दिन प्रशांत उनके कैफे में मशहूर इटालियन लेखक तिज़ियानो (तिज़ियानो तेरजानी पर एक उम्दा आलेख आप पहले भी पढ़ चुके हैं –बिनसर में इटली का संत) के साथ कॉफ़ी पीने आये थे और उन्होंने लोहाघाट के नज़दीक पंचेश्वर में होने वाले एक एन्ग्लिंग और फिशिंग फेस्टिवल के बारे में उन्हें बताया.
मोहन ने एक बार एन्ग्लिंग और फिशिंग की तो वे उसी के होकर रह गए. वे बताते हैं कि इससे बेहतर ध्यानयोग और मेडीटेशन कोई नहीं हो सकता. देश की तमाम नदियों – काली, सरयू, पिंडर, गंगा, कोसी, रामगंगा और गोरीगंगा – में फिशिंग कर चुके मोहन देश-विदेश जाकर अपने इस शौक को पूरा करते हैं और इस से जुड़ी अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के पदाधिकारी हैं. मोहन की गिनती देश के सबसे बड़े एन्गलर्स में होती है.
पलायन और रोजगार की कमी का रोना रोने वालों के लिए मोहन ने एक मिसाल तैयार की है. उत्तराखण्ड को जिस तरह का पर्यटन प्रदेश बनाने की खोखली सरकारी घोषणाएं पिछले दो दशकों से हो रही हैं, उनके संदर्भ में मोहन असल मायने में उत्तराखंड पर्यटन के ब्रांड एम्बेसेडर हैं.
-कसारदेवी से अशोक पाण्डे
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वाह बहुत खूब।
प्रेरणाप्रद कदम मोहन जी का।
मोहन दा आज के युवाओं के लिए प्रेरणादायक है। बहुत करीबी से ध्यान केंद्रित कर fishing करते हुए कई मर्तबा मैंने देखा है । गजब की उर्जा , धैर्य,संयम, विनम्रता और एकाग्रता है मोहन दा के पास।