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सभी विश्विद्यालयों की फीस जेएनयू की तरह कम होनी चाहिए

जेएनयू अपनी स्थापना से लेकर 2015 तक कभी इतना लाइमलाइट में नहीं रहा जितना पिछले कुछ वर्षों में रहा है. ऐसा नहीं है कि अतीत में जेएनयू में धरना प्रदर्शन या छात्रों की माँगों को लेकर नारेबाजी नहीं होती थी. अपने शुरूआती दिनों से ही जेएनयू छात्र हितों के लिए लड़ता आया है. जेएनयू से मेरा पहला सरोकार वर्ष 2007 में हुआ. उत्तराखंड के नानकमत्ता जैसे छोटे से कस्बे से मैं ग्रेजुएशन के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय पहुँचा और मेरा ही नामराशि मामा जी का लड़का कमलेश अटवाल पोस्टग्रेजुएशन के लिए जेएनयू. दिल्ली में तमाम रिश्तेदार थे और उनकी मदद से एडमिशन की प्रक्रिया भी पूरी हो गई लेकिन दिल्ली में रहना तब भी उतना ही मंहगा लगता था जितना आज लगता है. (Memoirs of JNU)

पिताजी बमुश्किल 3-4 हजार रुपये महीना भेज पाते थे जिससे कमरे का किराया, महीने भर का खाना पीना और कॉलेज आना-जाना करना होता था. 3-4 हजार में इतना कुछ मैनेज करना बहुत कठिन था तो कई बार दिन का खाना इसलिए भी नहीं खाता था कि 20-30 रूपये बच जाएँगें. न चाहते हुए भी ब्लू-लाइन बस में कॉलेज का स्टाफ चलाता था क्योंकि किराया जेब को बहुत खलता था. तब लगता था ये स्टाफ का फॉर्मूला इजाद करने वाले कॉलेज के नेता कितने भले लोग हैं. जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं था वो सिर्फ अपनी दबंगई के लिए बसों में स्टाफ चलाते थे और बस कन्डक्टर के आनाकानी करने पर कई बार बसों में तोड़फोड़ भी करते थे जिस वजह से कई बार तो स्कूल के बच्चे तक बस में कॉलेज का स्टाफ बोलकर कन्डक्टर से भिड़ जाते थे. डीटीसी का स्टूडेंट पास तब 76 रूपये में 6 महीने के लिए बनता था लेकिन बसों की संख्या इतनी कम थी कि कई बार घंटों इंतजार करना पड़ता था इसलिए अधिकांशतः ब्लू लाइन बस का ही इस्तेमाल करता था.

दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने की इन तमाम जद्दोजहद के ठीक उलट दिल्ली के अंदर ही जेएनयू में पढ़ रहे भाई कमलेश से मिलने कई बार पहुँच जाया करता था. शुरूआती महीनों में भाई को हॉस्टल नहीं मिला तो कभी संदीप सिंह के रूम में रह लिए तो कभी अरविंद भाई के रूम में. संदीप सिंह खुद हॉस्टल से बाहर रहकर भी उन छात्रों की मदद के लिए हमेशा आगे रहते थे जो दूर-दराज गाँवों से पढ़ने जेएनयू आते थे. जेएनयू के बाहर मुनिरिका के आसपास कमरा लेकर रहना मतलब 5-6 हज़ार किराया और बाकी का खर्च अलग जो गरीब परिवार से आए छात्रों के लिए संभव ही नहीं था. जेएनयू के हॉस्टलों में अक्सर यूपी, बिहार से आए गरीब बच्चे हॉस्टल न मिलने के कारण सीनियर छात्रों की मदद से उनके कमरों में कई-कई महीने गुजार देते थे.

जेएनयू में हर तबके के छात्र पढ़ते थे लेकिन उन छात्रों के बीच वैचारिक मतभेद के अलावा कभी कोई व्यक्तिगत, जातिगत या आर्थिक मतभेद देखने को नहीं मिलता था. अधिकतर होता यह था कि सक्षम व समृद्ध घरों के छात्र कई बार गरीब छात्रों की आर्थिक मदद कर दिया करते थे. गंगा ढाबा से लेकर ब्रह्मपुत्र हॉस्टल तक न सिर्फ छात्र आपस में बल्कि अध्यापकों के साथ भी देश-विदेश व सामाजिक मसलों पर चर्चा-परिचर्चा करते नजर आ जाते थे. कहीं रमाकान्त विद्रोही की कविताएँ सुनने के लिए छात्र उमड़ पड़ते तो कभी होली के दिन चाट सम्मेलन में छात्र अपनी विलक्षण प्रतिभा का प्रदर्शन करते. छात्रसंघ के चुनाव के समय रात-रात भर प्रेसिडेंशियल डिबेट सुनना और उम्मीदवारों का अपनी दावेदारी के लिए छात्रों को आश्वस्त करना देखने लायक होता था.

इस देश में लिंगदोह कमेटी के दिये गए सुझावों के अनुसार कहीं चुनाव होता है तो वह सिर्फ जेएनयू में. यही वजह थी कि खुद लिंगदोह कमेटी ने जेएनयू के चुनाव को पूरे देश में होने वाला सबसे आदर्श चुनाव माना था. चुनाव के समय पूरा जेएनयू हाथ से बनाए पोस्टरों व पेंटिग्स से पटा रहता. वहीं दूसरी तरफ दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में करोड़ों रूपए पानी की तरह बहा दिये जाते थे. दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष का कारवॉं निकलते कई बार देखा था मैंने. किसी मंत्री से कम नहीं लगता था वह कारवॉं जिसके आगे पीछे न जाने कितनी ही कारें नाचती रहती थी. वहीं पहली बार जब तत्कालीन जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष संदीप सिंह को देखा तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि देश की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी का अध्यक्ष साधारण से कपड़े, पैरों में चप्पल व कंधे में खादी झोला लटकाए अकेला घूम रहा है. यह तमाम कारणों में से एक कारण है जो जेएनयू को दूसरे विश्वविद्यालयों के सापेक्ष अलग खड़ा करता है. (Memoirs of JNU)

जेएनयू के छात्र दिनभर कक्षाओं व एडमिन में, शाम को गंगा ढाबा और 24×7 के आसपास और रातभर लाइब्रेरी में मिलते. मैं कई बार भाई के साथ लाइब्रेरी चला जाता था जहॉं बैठने तक के लिए जगह नहीं मिलती थी. सुबह सिर्फ साफ-सफाई के लिए लाइब्रेरी एक घंटे बंद रहती और उसके बाद छात्रों का आना-जाना लगा रहता. जिस खाने की फीस को लेकर इतनी बहस छिड़ी हुई है मैंने कभी डिनर टेबल में नहीं देखा कि छात्रों का ध्यान खाने की थाली पर हो. अधिकांश छात्रों के हाथ में एक सफेद पर्चा होता था जिस पर किसी समसामयिक मुद्दे पर बहस लिखी होती थी. कुछ छात्र अखबारों व किताबों में अपनी नजरें गढ़ाए खाना खा रहे होते थे. जेएनयू में किसी से भी आप मिलो तो वो सामाजिक सरोकार या देश में चल रहे मुद्दों पर ही बात करता हुआ मिलता था. मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों का फैशन व मॉल कल्चर तथा जेएनयू के छात्रों का सामाजिक सरोकार देखकर हमेशा हैरानी होती थी कि एक ही राज्य के दो विश्वविद्यालयों में कितना अंतर है. ग्रामीण पृष्ठभूमि से होने की वजह से जितनी असहजता मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय के अपने कॉलेज में महसूस होती थी उससे कई गुना सहज मैं खुद को जेएनयू में पाता था.

भाई की वजह से मेरी जान पहचान व दोस्ती उसके तमाम साथियों व सीनियरों से हो गई थी जो हर बार मुझसे उसी उत्साह से मिलते जिस उत्साह से पहली बार मिले थे. दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन के बाद मेरी दिली इच्छा थी कि मैं आगे की पढ़ाई जेएनयू से करूँ. भाई के साथ रहकर लगभग दो महीने तैयारी भी की. बेहद गरीब परिवारों के छात्र भी जेएनयू की प्रवेश परीक्षा के दिनों में रात दिन एक कर तैयारी में जुटे रहते. कुछ चोरी छुपे हॉस्टलों में रह लेते और जिन्हें हॉस्टल में रहने को नहीं मिल पाता वो 6-7 लोग मिलकर सिर्फ रात गुजारने के लिए मुनिरिका में एक कमरा किराये पर ले लेते थे. जेएनयू के कई सीनियर छात्र इन गरीब बच्चों की तैयारी के लिए कई शिफ्ट में कक्षाएँ चलाते थे. जेएनयू में प्रवेश पाना हर किसी का सपना होता था. मेरा यह सपना पूरा नहीं हो सका जिसकी टीस आज भी दिल में है. लेकिन जिंदगी चलने का नाम है और जो नहीं मिला उसे छोड़कर आगे बेहतर करने का जज्बा भी.

जेएनयू में आंदोलनों का इतिहास बहुत पुराना रहा है. हाल ही में नोबेल पुरस्कार से नवाजे गए अभिजीत बैनर्जी भी अपने जेएनयू के छात्रदिनों में आंदोलन करने के चलते दस दिन जेल में रहे थे. जेएनयू में मैंने एडमिन बिल्डिंग के पास छात्रों की तमाम तरह की मॉंगों को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों को कई बार देखा. एक बार तो हमारे ही मित्र अरविंद प्रताप 6 दिन तक इसलिए भूख हड़ताल पर बैठ गए क्योंकि विश्वविद्यालय प्रशासन ओबीसी रिजर्वेशन लागू नहीं कर रहा था. 2005 में ही जेएनयू आए तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अमरीका के साथ न्यूक्लियर डील की खामियों के चलते संदीप सिंह के नेतृत्व में काले झंडे में दिखाए गये थे. कांग्रेस की सरकार के रहते राहुल गांधी के जेएनयू में एक सभा के दौरान छात्रों द्वारा कांग्रेस की शिक्षा नीति पर गहरे प्रश्न पूछे गए जिसको लेकर राहुल गांधी काफी असहज हुए लेकिन उन्होंने छात्रों की मॉंगों को सुना. वहीं 2015 में भी बाबा रामदेव के एक व्याख्यान को लेकर जेएनयू के छात्रों ने अपना विरोध दर्ज कराया था. हाल ही में जेआरएफ व रिसर्च फैलोशिप को लेकर भी जेएनयू के छात्रों ने एक बड़ा आंदोलन किया जिसके बाद सरकार को झुकना पड़ा और फैलोशिप बढ़ानी पड़ी.

देश में जब-जब छात्र हितों की बात आती है तब-तब जेएनयू सबसे आगे खड़ा होकर आंदोलनों को राह दिखाता है. वर्तमान सरकार की समस्या जेएनयू का बजट बिल्कुल नहीं है उसकी समस्या है जेएनयू के छात्रों की मुखरता और छात्रहितों के लिए उनकी लड़ाई. कहीं जेएनयू की देखादेखी दूसरी यूनिवर्सिटी के छात्र भी अपने हितों के लिए आवाज न उठाने लगें इसलिए जेएनयू को दबाना सरकार ने अपनी प्राथमिकता बना ली है. पिछले कुछ सालों में जेएनयू को बदनाम करने का जो षड्यंत्र रचा गया वह बेहद दुखद है. जेएनयू में नारेबाजी हुई और उसका एक भी दोषी आजतक पकड़ा नहीं गया और ना ही किसी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हुई. लेकिन मीडिया मैनेजमेंट के माध्यम से ऐसा माहौल तैयार किया गया कि आज एक 10 साल का बच्चा भी जेएनयू नाम सुनकर उसको देशद्रोही कहने लगता है.

NIRF की 2019 की रैंकिंग में जेएनयू देश में दूसरे नंबर पर आता है और NAAC की ग्रेडिंग में उसे A++ मिलता है. देश विदेश से छात्र यहॉं पढ़ने आते हैं फिर भी जेएनयू को इस तरह बदनाम किया जा रहा है जैसे उसका इस देश की शिक्षा में कोई योगदान ही न रहा हो. बेहद साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले संदीप सिंह जैसे छात्र आज राहुल गांधी के एडवाइजर हैं और उनके भाषण लिखते हैं. अरविंद भाई आईपीएस हैं, कमलेश अटवाल नानकमत्ता में एक बेहतरीन स्कूल चला रहे हैं. साथ ही जेएनयू से डॉक्टरेट व बेहद साधारण परिवार के साथी रीता, विकास, मिथिलेश, प्रीतम, श्रीनिवास आदि न जाने कितने ही मेरे मित्र देश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं.

यह जेएनयू ही है जो गरीब तबके के बच्चों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करता है. हमें यह पूछने की जगह कि जेएनयू इतना सस्ता क्यूं है, यह पूछना चाहिये कि बाकी के विश्वविद्यालय, इंस्टिट्यूट और महाविद्यालय इतने मंहगे क्यों हैं? एक आदर्श राज्य में तो शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का बोझ जनता पर पड़ना ही नहीं चाहिये. आईआईटी, आईआईएम की फीस पहले ही बहुत बढ़ा दी गई है. उत्तराखंड में आयुष के छात्र पिछले लगभग 50 दिनों से फीस वृद्धि के खिलाफ हड़ताल में हैं लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है. इससे पहले कि फीस वृद्धि का यह जिन्न बाकी बचे संस्थानों को भी अपनी चपेट में ले ले हमें सरकार से सवाल करने चाहिये और अपने बच्चों के लिए अच्छी व सस्ती शिक्षा को सुरक्षित व सुनिश्चित करना चाहिये. अगर अलग-अलग संस्थानों में बेतहाशा बढ़ती हुई फीस का विरोध आज नहीं किया गया तो कल विश्वविद्यालयों में पढ़ना तो दूर आपके बच्चे विश्वविद्यालयों में खड़े होने लायक भी नहीं रहेंगे. (Memoirs of JNU)

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नानकमत्ता (ऊधम सिंह नगर) के रहने वाले कमलेश जोशीने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक व भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबन्ध संस्थान (IITTM), ग्वालियर से MBA किया है. वर्तमान में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यटन विभाग में शोध छात्र हैं.

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Sudhir Kumar

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