समाज

कम तनख्वाह वाले सरकारी स्कूल के मास्साब

वैसे हम पहाड़ी पहले ही सरकारी सिस्टम की मार झेल रहे हैं. पहाड़ के अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं. स्कूलों में शिक्षक नहीं. खेतीबाड़ी भी जानवरों ने उजाड़ दी है. गांव के लोग भी अंग्रेजी मीडियम के स्कूल में ही अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं. (Memoirs by Pramod Dalakoti)

अब आजकल मास्टर (गुरु जी) और सरकार के बीच छुट्टी को लेकर जो घटनाक्रम चल रहा है उसे देख अपने स्कूल के मास्टरों की याद आ गई —रमेश मास्साब और बिमला मैडम. गोविंद मास्साब का कड़क मिजाज भी. उनका पढ़ाने का तरीका, उनकी सीख. एक आदर्श शिक्षक के पूरे गुण उन सभी में थे. सबसे बड़ी बात ये थी कि वह सुबह हमसे पहले स्कूल में पहुँचते. शाम को छुट्टी के करीब एक घंटे बाद घर वापस जाते. रविवार की छुट्टी के दिन भी अपने घर में पांचवी के बच्चों को पढ़ने बुलाते. हमारे घर वाले उनका दबे स्वर में विरोध भी करते, गाली भी देते. —य मास्टर हमारा नानतिन के छुट्टी दिन लै किताब ली बेर बुलुन भगो, हमर काम लै ठप कर दे.

हम छुट्टी के दिन और तो कोई काम नहीं करते, गाय लेकर ग्वाला जरूर जाते. सुबह और शाम नौले से पानी लाते. ये भी हमारे हेड मास्टर साहब ने बन्द करवा दिया. वैसे ज्यादा दूर की नहीं आज से करीब 15 साल पहले की ही बात है. मास्साब का जो सम्मान था वह किसी भी अफसर, नेता या अभिनेता का नहीं हुआ करता. डीएम हो या सीएम हर कोई मास्साब का सम्मान करता, वह भी दिल से.

अगर मास्साब ने किसी बच्चें को रोक दिया कि आज तुम हमारे साथ चलोगे. जान आफत में पड़ जाती. डर लगा रहता न जाने क्या पूछ लें.

गांव से तीन किमी दूर धनियान के प्राइमरी स्कूल में हम रोज सुबह रात की बासी रोटी खाकर जाते. लंबे झोले में किताब रखकर उसे पिठ्ठू बैग बनाकर स्कूल के लिए निकल पड़ते. वह दिन भी क्या दिन थे. आज भी स्कूल के उस दौर की सीख हमेशा याद रहती है.

हमारे मास्साब ने हमें किताबी ज्ञान तो दिया ही जिंदगी जीने के सिद्धांत भी सिखाए. अनुशासन में रहना, समय का उपयोग करना बताया. कड़ी मेहनत करना और समाज में जीने का सलीका भी बताया. गणित में जोड़, गुणा-भाग कैसे करना है ये तो बताया ही बड़े होकर अपनी तनख्वाह से ज्यादा काम करने की सीख भी दी. कला में चित्र बनाना सिखाया तो रंगों का जीवन में कैसे उपयोग करना है यह भी बताया. समाज को कैसे मजबूत करना है बताया तो एक मार्गदर्शक की भूमिका भी समझाई.

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एक छात्र को अच्छा इंसान बनाने के लिए किताब, ब्लैक बोर्ड, चॉक और डंडे का इस्तेमाल भी किया. अपने घर वालों के सपनों को आधार बताकर अपनी जिम्मेदारी की अहमियत भी समझाई.

खैर हमारे मास्साब की बात ही निराली थी. बस उनके पास कमी थी तो आजकल की तरह डिग्रियों की और मोटी तनख्वाह की.

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प्रमोद डालाकोटी दैनिक हिन्दुस्तान के अल्मोड़ा प्रभारी हैं.

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Sudhir Kumar

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