कला साहित्य

माँ! मैं बस लिख देना चाहती हूं- तुम्हारे नाम

आज दिसंबर की शुरुआत हो रही है और साल 2025 अपने आखिरी दिनों की तरफ बढ़ रहा है. पेड़ों के पत्तों की एक कहानी पूरी होने को है. पर मैं जो कहानी बताने जा रही हूं. इसकी शुरुआत आज से पाँच साल पहले हुई थी. यानि 2020 में. मैंने 2020 में अपनी 12वीं कक्षा पास करके कॉलेज में दाखिला लिया. क्योंकि मुझे हमेशा से ही घर-परिवार से दूर, एक नए शहर में जाकर रहने का अनुभव महसूस करना था. मुझे अनुभव करना था कि इस तरह जिंदगी और दुनिया को नए तरीके से देखना कैसा होता है. (Memoir by Upasana Vaishnav)

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अनुभव लेने की इसी चाह में मैंने कॉलेज एडमिशन अपने कस्बे से बहुत दूर देहरादून में लिया. पर यह सब इतना आसान नहीं था. इसके लिए मैंने अपनी मां को बहुत मनाया. उनसे बहुत मिन्नतें कीं, कि वे मुझे कॉलेज की पढ़ाई के लिए देहरादून भेजें. उन्हें दिक्कत कुछ नहीं थी, सिवाय इस के कि मैं मेरे घर की सबसे छोटी सदस्य हूं. इस वजह से उन्हें मेरी बहुत चिंता थी कि मैं घर से दूर शहर में अकेले कैसे रह पाऊंगी. कैसे परिस्थितियों से जूझ पाऊंगी. पर जैसे-तैसे मेरे बड़े भाई-बहनों द्वारा मेरा समर्थन करने पर मेरी मां ने मुझे कॉलेज के लिए बाहर भेजने को हां कर दिया. फिर क्या था? जल्द ही मेरा दाखिला कॉलेज में हो गया. पर शुरुआत के कुछ वक्त कोरोना काल के चलते, कॉलेज की पढ़ाई ऑनलाइन ही हुई.

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लेकिन… एक दिन कॉलेज से नोटिस आया कि अब ऑफलाइन क्लासेस शुरू होने वाली हैं. यह देखकर मेरी खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था. फिर आया वह दिन जब मुझे अपना घर छोड़कर हॉस्टल जाना पड़ा. मेरे लिए हॉस्टल में रहना एक बहुत ही नया अनुभव होने वाला था. इसलिए मेरे अंदर थोड़ी सी उत्सुकता के साथ  घबराहट सी भी थी. यही कोई 7 से 8 घंटे का सफ़र तय करने के बाद जब मैं और मेरी माँ हॉस्टल पहुंचे, तब अचानक ही एक अजीब सा एहसास मेरे अंदर पनपने लगा. जैसा कि मैंने कहा कि मेरे अंदर थोड़ी सी घबराहट भरी उत्सुकता थी. पर जो मुझे अब हॉस्टल पहुंचने के बाद महसूस हो रहा था. यह एहसास घबराहट और उत्सुकता दोनों से अलग था. यह कुछ कड़वा, किसी बारीक-तेज़ नुकीली सुई जैसी चुभन लिए एक भारी सा एहसास था. अचानक मेरा शरीर बेजान और अकड़ा सा लगने लगा. मेरे होंठ सूख कर स्थिर हो गए. वह चुलबुलाहट, चेहरे की चमक और मुस्कान कहीं गायब हो गई, जो घर से निकलते वक्त थी.

अब तो बचा ही क्या था? हॉस्टल पहुंच गए थे. मेरा कमरा भी मुझे मिल गया था. और अब मेरा कमरा सजा कर मेरी मां का भी वक्त हो चला था वापस घर लौटने का. चौथी और आखिरी मंजिल पर मेरा कमरा था. तो चौथी मंजिल से नीचे जाते वक्त मेरे गले में न जाने कौन सा पत्थर पड़ गया. जिसके भार को संभालते हुए अगर मैं कुछ कह देती तो शायद आंसुओं में बिखर जाती.

ऊपर से नीचे सीढियां उतरते वक्त मेरी मां बस मुझे कुछ ना कुछ समझा ही रही थी. आखिरकार हम दोनों नीचे पहुंच ही गए. अब वो ठीक मेरे सामने मुझे अलविदा कहने के लिए खड़ी हो गई.

इतनी देर से मां मुझे जो भी कह रही थी. मैंने न ठीक से ध्यान दिया और न ही मुझे कुछ समझ आया. पर ठीक इस पल में मुझे यह समझ आ गया कि हॉस्टल आने के बाद मुझे इतनी देर से जो एक अजीब सी चीज़ महसूस हो रही थी. उसे “बिछड़ने” का एहसास कहते हैं. मुझे यह भी समझ आया कि मेरे पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने कितनी हिम्मत और साहस से जीना सीखा होगा. मेरे बड़े होते-होते मुझे पहले ऐसा कुछ महसूस नहीं होने दिया.

तभी इस मन की उधेड़-बुन के बीच मेरे कानों में एक आवाज पड़ती है. “बाय बेटा! अपना ख्याल रखना और ध्यान से रहना.” उस ममता भरी कोमल आवाज के मेरे कानों में पढ़ते ही मेरे गले का पत्थर जैसा बोझ उठकर मेरी आंखों से लगातार टप-टप बहने लगा. मैंने झपटकर अपनी मां को दोनों हाथों से जकड़ लिया. मैं उनसे लिपट कर बहुत रोई. सिर्फ रोई नहीं बल्कि फूट-फूट कर रोई.

करीब 10 मिनट बाद मेरे दिमाग में ख्याल आया कि कहीं कोई मुझे ऐसे रोते हुए देख न ले. फिर मैंने अपनी माँ को छोड़ दिया. उनकी आंख में भी आंसू थे. लेकिन वे मेरे सामने ठीक से रो भी नहीं सकती थी. उन्होंने मेरे आंसू पोंछे. इसके बाद वे गाड़ी में बैठकर वापस चली गई. मैं वहीं पर खड़ी रही जब तक उनकी गाड़ी मेरी नजरों से ओझल नहीं हो गई. अब वक्त था आंसू पोंछकर हॉस्टल की जिंदगी को अपनाने का. मैं जैसे ही आंसू पोंछ कर पलटी तो मैंने देखा कि पहली मंजिल से लेकर चौथी मंजिल की सारी बालकनियों में हॉस्टल के बच्चे न जाने कब से खड़े होकर मुझे सुध-बुध खोकर रोता हुआ देख रहे थे. मुझे थोड़ी शर्म तो आई लेकिन फिर मैं नज़रे झुका कर चलते हुए हर मंजिल की भीड़ को अनदेखा करते हुए अपने कमरे में चली गई.

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ख़ैर कॉलेज के 3 साल बीत गए और आज 5 साल बाद मैं देहरादून जैसे बड़े शहर में अपने हिस्से की लड़ाइयां लड़ रही हूं. जो कि हर इंसान को लड़नी ही होती हैं. पर इन सब के बावजूद अब घर जाने की इच्छा होते हुए भी, जाने का मन नहीं करता. क्योंकि बहुत मुश्किल होता है वक्त के साथ अपने माता-पिता की बढ़ती उम्र देखना. पतझड़ में पत्तों के साथ जीवन का पड़ाव भी पूरा होते देखना. अब बहुत मुश्किल है बिछड़ते वक़्त का दुख वापस मां की गोद में जाकर रोते हुए रख देना. हालांकि वे पल अभी भी आते हैं जब मां कहती है “बाय बेटा! ख्याल रखना और ध्यान से रहना.” उस पल में गले पर वही बोझ भी महसूस होता है. बस पहली बार की तरह बच्चों की तरह रोना-धोना ही नहीं हो पाता है.

मुझे नहीं पता कि अपने मन के भावुक ख्याल किसी अपने से भी कैसे कहे जाए. शायद एक उम्र बाद मन की बात कह देने और रो देने के लिए बहुत हिम्मत जो जुटानी पड़ती है.

फ़िलहाल इतना ही— कि माँ! मैं यह भाव तुम्हें भी कभी नहीं जता पाई. इसलिए, मैं बस इसे लिख देना चाहती हूं “तुम्हारे नाम.”

रामनगर की रहने वाली उपासना वैष्णव देहरादून से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद अभिनय की दुनिया में अपना मुकाम बनाने के लिए संघर्ष की अगली मंजिलों पर कदम रख चुकी हैं. उपासना एक अच्छी अभिनेत्री होने के साथ ही अपने भावों को शब्द देने में भी बेजोड़ हैं.

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Sudhir Kumar

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