फोटो: सुधीर कुमार
एक मित्र ने हाल ही में वाट्सएप पर दो खूबसूरत पंक्तियां भेजी थी – (Memoir by Shurveer Rawat)
‘न प्यार-मोहब्बत की, न वफा की बात होगी.
अब जो भी बात होगी रोपणियों के बाद होगी.’
बात दिल को छू गयी. गांव की बात आये और मेरे जैसे गांव के पंछी पुरानी यादों में न खो जाये ऐसा नहीं हो सकता. अतीत चलचित्र सा आँखों के आगे घूमने लगता है.
टिहरी भिलंगना की उपत्यका में बसा और समुद्रतल से मात्र एक हजार मीटर ऊँचाई पर स्थित मेरे गांव में रोपणी प्रायः जुलाई के पहले या दूसरे सप्ताह में लगती थी. इधर स्कूल खुलने का समय होता और उधर गांव में रोपणी की शुरुआत. पहाड़ का किसान दिन-रात मेहनत कर अपने खेतों में कितना अन्न उगा सकता है यह किसी से छुपा हुआ नहीं है. हाँ, घाटियों वाले गांवों के सिंचित खेतों में अन्नोत्पादन इतना तो हो ही जाता है कि कुछ महीने निश्चित होकर रह सकता है. परन्तु खेती किसाणी करने वाले जानते हैं कि सिंचित खेतों की ‘रोपणी’ एक ऐसा कमरतोड़ कृषिकार्य है जिसमें अच्छे से अच्छे पस्त हो जाते हैं. इसमें परिवार के हर छोटे-बड़े सदस्य की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती थी. माँ-बाप, बड़े-सयाने सभी खेतों में अक्सर मुहँ अन्धेरे ही घर से निकलते और रात गये तक ही लौट पाते थे. कभी-कभी तो पूरी रात खेतों में ही कट जाती और कभी दो-दो, तीन-तीन दिन में ही घर लौटना होता था. रोपणी के लिये मेहनत खेतों में ही नहीं परिवार के सभी सदस्यों को उससे इतर भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभानी होती थी. सबके कन्धों पर बोझ आ जाता था. सच मानो तो अपने होने की अहमियत प्रत्येक सदस्य को रोपणी में ही होता था.
खेतों में हल लगाकर नीचे की मिट्टी पलटकर ऊपरी सतह पर लाई जाती है जिससे मिट्टी को पोषक तत्व मिल सके, पिछली फसल की जड़ों का पूरी तरह से सफाया हो सके और भूमि की जल ग्राह्य क्षमता बढ़ जाये. मिट्टी के ढेलों को तोड़कर उसे भुरभुरी बना दिया जाता है जिससे फसल की जड़ें गहराई तक जाकर पकड़ बना सके, जड़ों को हवा मिल सके और केंचुओं की वृ(ि हो. खेतों में रोपणी हल लगाने अधिक उच्च स्तर की वह प्रक्रिया है जिसमें खेत को पानी से लबालब भर दिया जाता है और हल लगाकर उस पर कंघी जैसे आकार का लकड़ी या लोहे का बना मैया;दनेलाद्ध लगा दिया जाता है. यह माना जाता कि इस प्रकार मिट्टी को अच्छी तरह से घोल देने से खेतों में खर-पतवार की सफाई ही नहीं खेत का समतलीकरण और उसकी उर्वरा शक्ति कई गुना तक बढ़ जाती है.
रोपणी के दौरान परिवार में किशोरावस्था की ओर बढ़ते बच्चों और बुजुर्गों को अबोध बच्चों को संभालना, पालतू पशुओं को दाना-पानी देना, खाना पकाकर खेतों में पहुंचाना और घर की पूरी चैकीदारी भी करनी पड़ती थी. परिवार में किशोर सदस्यों के ऊपर जिम्मेदारी ज्यादा होती थी. सबसे मुख्य यह कि वे सिंचाई की नहर/गूल पर निगरानी रखते जिससे कि पानी की आपूर्ति बाधित न हो. साथ ही खेतों में धान की बिज्वाड़ उपाड़ने (पौध उखाड़ने) में मदद करना, बैल व खेती के उपकरण खेतों तक पहुँचाना, गीली मिट्टी की डौल बनाना, रोपणी के बाद खेत तैयार होने पर बिज्वाड़ की मूठों को नर्सरी से खेतों तक पहुँचाना व फैलाना और घर में रह रहे सदस्यों तथा खेत में काम करने वाले सदस्यों के बीच संवाद बनाये रखना भी किशोरों का ही काम होता था. अनर्थ तब होता जब रोपणी के दौरान गलती से कभी कोई किशोर दबी जुबान में ही स्कूल शुरू होने या सिलैबस छूटने की चिन्ता जताता तो कोई चाचा या ताऊ ही एक ही झटके में निकम्मा, कामचोर जैसे कई-कई विशेषणों के साथ उस पढ़ाकू विद्यार्थी की कई पीढ़ी नाप लेता. रोपणी के खेतों में जूझ रहे किसानों की नजर में रोपणी जैसा पुनीत कार्य के आगे पढ़ाई शब्द ही गौण थी. उनका तर्क होता कि ‘अरे, पढ़ाई तो साल भर की है और रोपणी कुल चार दिन की. मर नहीं जायेगा तू यदि चार दिन नहीं जायेगा.’
रोपणी के कुछ सकारात्मक पहलू ऐसे थे जो अनमोल थे. जैसे कि रोपणी में परिवार के सभी सदस्यों की ‘ओवर-हाॅलिंग’ हो जाती है. दायित्व निर्धारित हो जाने से परिवार के हर सदस्य की अपनी-अपनी ‘वैल्यू’ मालूम हो जाती है. रोपणी के दौरान पूरे गांव में हर परिवार, हर व्यक्ति ‘मूवमेण्ट’ में बना रहता इसलिये गांव में उत्सव का माहौल सा बना रहता. इस कार्य में पारस्परिक निर्भरता स्वाभाविक रूप से अधिक रहती इसलिये गांव में सौहार्द बढ़ाने में इस प्रकार के कृषिकार्य प्रमुख कारक रहे हैं. दिन भर आॅवजी ढोल-दमाॅऊं के साथ अपने गैखों (अन्नदाताओं) के खेतों में अधिकाधिक अन्न उपजने की प्रार्थना अपने गीतों के माध्यम से ईष्ट देवताओं से करते. उनके ढोल-दमाऊं की गंूज, सुमधुर गीत और बैलों को हांकने के समवेत स्वर तब अद्भुत रोमांच भर देता. यह नजारा और भी रोमाचंक हो जाता जब आषाढ़-सावन की घनी अन्धेरी रातों में जगह-जगह पेट्रोमैक्स की लाईट में बैलों को हांकने, डौल बाँधने, किसी को जोर से पुकारने, किसी पर चिल्लाने या झल्लाने और पानी की छपछप के साथ मैया (दनेला) लगाने के शोर के साथ मेंढ़कों की टर्र-टर्र होड़ लेती. गांव में हर एक की कोशिश रोपणी को पहले निपटाने की रहती थी. क्योंकि सबसे बाद में रह जाने वाले व्यक्ति पर ‘मैयाजाड़ा’ आ गया, कहा जाता, जो कि उसके लिये फिसड्डी होने का दंश होता. रोपणी शुरू करने से पहले जिस प्रकार ईष्ट देवताओं को स्मरण करते हुये ‘रोट-प्रसाद’ पूजने की परम्परा रही उसी प्रकार ‘मैयाजाड़े’ के दंश झेलने वाले परिवार को दण्डस्वरूप बकरा मारकर गांव वालों की दावत देनी पड़ती, ऐसी प्रथा हमारे पूर्वजों ने बना रखी थी. हालांकि गांव में हर एक से भावनात्मक लगाव होने के कारण बड़े सयाने लोग कमजोर आर्थिक स्थिति वाले व्यक्ति को इस दण्ड से मुक्त भी कर देते थे. मैयाजाड़ा वाली व्यवस्था के बारे में मेरा मानना है कि इसके मूल में रोपणी कार्य को शीघ्रातिशीघ्र निपटाने की भावना प्रधान रही होगी, कोई भी किसान ढिलाई न करें. भले ही इसके लिए वह अपने सम्बन्धों के आधार पर गांव के लोगों या रिश्तेदारों को बुलाकर त्वरित गति से कार्य सम्पन्न कर सके.
रोपणी में पुरुषों के साथ-साथ महिलायें दोनों ओर से पिसती थी. हल बैल से जूझ रहे पुरुषों के कन्धे से कन्धा मिलाकर काम करती और फिर रोपाई के लिये उसे गांव की औरतों और रिश्तेदारों से सहयोग लेना पड़ता था. रोपणी के मौके पर प्रायः रिश्तेदार भी हाथ बंटाने आ जाते थे. खेतों में रोपणी व रोपाई के दौरान सौजड़्या; हमउम्रद्ध देवर-भाभियों, जीजा-सालियों के बीच खूब मजाक चलती. देवर या जीजा धान की मूठ भाभी या साली की ओर ठीक इस एंगल से फेंकता कि पानी से लबालब भरे खेत के पानी की छपाक से वह पूरी की पूरी भीग जाये. परन्तु भीगने वाली भाभी/साली यदि तेज तर्रार हुयी और उसने शराफत का जामा उतार दिया तो वह मीठी गाली और खेत की गीली मिट्टी के साथ द्विअर्थी संवाद लपेटकर देवर/जीजा की ओर इस अन्दाज में उछाल देती कि वह बेचारा चित्त हो जाता. लेकिन सच्चाई यह है कि खेतों में काम के दौरान इस तरह की हँसी-मजाक, ठठा-ठिठोली ‘एनर्जी बूस्टर’ का काम ही करती थी.
रोपणी के दौरान खेत की मिट्टी में लथपथ हो जाने से एक सबसे बड़ा फायदा यह होेता था कि काम निपटकर जब लोग नहाते तो शरीर पर लगी मिट्टी के साथ-साथ हमारे रन्ध्र छिद्रों (च्वतमे) में जमी हुयी पुरानी मैल भी साफ हो जाती थी. आज लोग ‘स्पा’ में जाकर हजारों रूपये खर्च करने के बाद शरीर पर मिट्टी (मड) पुतवाते हैं. परन्तु रोपणी से निपटकर धारे पर नहाने के बाद शरीर में जो कान्ति व ताजगी आ जाती वह स्पा में कई दिनों तक चक्कर काटने के बाद भी शायद ही आ पाये.
‘रोपणी स्पेशल’ यह भी कि रोपणी तक कद्दू, लौकी, चचैया आदि सब्जियां गांव में हो जाती थी जिससे शाम को दही, कद्दू-लौकी व चचैया की सब्जी के साथ खूब दाल-भात छकने को मिल जाता और खूब छपछपी पड़ जाती. दिन भर की थकान चुटकी में गायब. ‘मूव‘ के विज्ञापन ‘चोले गे छे’ वाले अन्दाज में. अहा. वे दिन तो अब लौट कर आने से रहे.
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देहरादून में रहने वाले शूरवीर रावत मूल रूप से प्रतापनगर, टिहरी गढ़वाल के रहने वाले हैं. शूरवीर की आधा दर्जन से ज्यादा किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगातार छपते रहते हैं.
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