फोटो www.thebetterindia.com से साभार
साधो हम बासी उस देस के – 8
–ब्रजभूषण पाण्डेय
(पिछली कड़ी : बावन सेज, तिरसठ आँगन, सत्तर ग्वालिन लूट लिए)
चौधरी मास्टर परमानेंट शिक्षक नहीं थे. लेकिन इस विद्यालय में वो सत्ताईस सालों से पढ़ा रहे थे. बदले में प्रति विद्यार्थी पाँच रूपए उनको मिलते. उपर से कुछ ट्यूशन मिल जाते. पंद्रह सौ कभी दो हज़ार. इसी में चालीस किलोमीटर दूर अपने गाँव रह रहे उनके बीबी और पाँच बच्चे पलते. लेकिन विद्यालय तो ख़ुद उनका पालक बालक ठैरा. सो क्या शिकायत करना? लगे रहो,जमे रहो.
“लेकिन तिवारी जी हम ये पूछना चाह रहे हैं कि जब परोगराम स्कूल का तो नाटक नौटंकी बाहर के लोग क्यों करेंगे? हमारे बच्चे करेंगे.”
“बाहर के लोग दिखते हैं तुमको गाँव के लोग? साला इनके बाप दादा ने ज़मीन दे के कमेटी बना के चलाया है इस विद्यालय को जहाँ बैठ के आप फूटानी छाँट रहे हैं।समझे?”
बात ये थी कि आने वाले बसंत पंचमी के दिन का फाग महोत्सव करने के लिए हेडमास्टर साहब और तिवारी मास्टर गाँव वालों को न्योत आए थे जबकि चौधरी मास्टर स्कूली छात्रों से ही परफ़ार्म करवाने पर अड़े थे।
“देखिए परसनल मत बनाइए आप लोग. चलाया होगा गाँव ने स्कूल नहीं कालेज लेकिन हम यहाँ सरकार की खाते हैं ना कि रामसंजीवन पांड़े के ख़ानदान की. हम तो विद्यालय के हक़ की बात बोलेंगे. रही बात चौधरी के फूटानी छाँटने की तो हमें भी पता है कि कौन कहाँ से आग पी रहा है और कहाँ पेट्रोल थूक रहा है.”
त्रिभुवन मास्टर वस्तुस्थिति से वाक़िफ़ हो चुके थे और अब संघर्ष में खुल कर कूद पड़े थे.
असल बात ये थी कि चौधरी मास्टर, राधे और तिरभुवन को ये लगता था कि तिवारी और मथुरा परसाद गाँव के बहाने पंडित गोल को स्कूल में घुसाना चाह रहे हैं. इसलिए छात्र हित का कार्ड खेलकर उनकी चाल को विफल करना सबसे अचूक विकल्प था.
रामसंजीवन पांडे गाँव के एक्टिविस्ट टाइप के मेंबर थे और तिवारी मास्टर के दूर के रिश्तेदार भी. इसलिए त्रिभुवन ने उनका नाम ले कर तिवारी की कमज़ोर नस को छेड़ा. साथ ही ये भी जता दिया कि वो उनकी रणनीति से अच्छी तरह वाक़िफ़ हैं।
“ले आए न साला बैकवर्ड फार्वर्ड. साला हर बात में यही राग रहता है तुम लोगन का. अरे फाग में गाँव का लोग पहली बार आ रहा है? ई तो परंपरा रही है. आंय? और सुनो तिरभुवन पेट्रोल थूकने पर आए ना हम तो पिछवाड़ा जलता मिलेगा यहाँ सबका.”
माहौल गरमा रहा था. तिवारी मास्टर के दो नौजवान लोकल चेले कुर्ते की बाँहें मरोड़ रहे थे. तिरभुवन ने नोटिस किया कि उनकी कमर के पास का हिस्सा थोड़ा उठा हुआ है. आजाद मिस्तरी के वर्कशॉप में बना आठ सौ रूपए का देसी तमंचा लेटेस्ट फ़ैशन में था इसलिए त्रिभुवन ने बोलना चाहा लेकिन बोलते बोलते रह गए.
“अरे कुकुरहट मत करिए भाई आप लोग. सांति से भी बात हो सकती है.”
मथुरा की मार झगड़ा से एकदम फटती थी. इसलिए वो बात को संभालने की कोशिश करने लगे.
लेकिन तिवारी मास्टर का ग़ुस्सा शांत नहीं हुआ. वो गर्जन तर्जन करते रहे.
“सब तो सब स्साले चौधरी तुम चढ़े जा रहे हो. तुम क्या यहाँ के मास्टर हो? तुमको तो रामसंजीवन के कहने पर ही मास्टरी मिली थी. भूल गए?”
“तिवारी जी! ए तिवारी जी! हम नहीं हैं यहाँ के मास्टर? आंय? अरे इसकी चारदीवारी का एक एक ईंटा लगवाए हैं. रात नौ नौ बजे तक जाग कर चौकीदारी किए हैं यहाँ के आम नींबू कटहल के गांछ की. आप कहते हैं नहीं हैं हम यहां के. तो बताइए ना सत्रह बरिस से फूल जइसे बच्चों को छोड़ कर सनिच्चर पीटी परेड कराते फिर रहे हैं, कहाँ के हैं हम? ठीक ही है फिर. कराइए फाग चाहे जलाइए होरी. हम चलते हैं.”
कहते हुए चौधरी मास्टर थके क़दमों से बाहर की ओर चल पड़े जैसे जुए की दाँव पर कोई सपना हार गए हों. एक झिलमिलाता छलाव जिसमें जीवन के सभी कच्चे, कड़वे यथार्थों का एकमुश्त निवेश कर रखा हो बरसों से. बीबी, बच्चे, घर, रोग, व्याधि, बुढ़ापा. मथुरा रोकते रह गए मगर वो रुके नहीं.
तिवारी मास्टर ने कुछ बोला तो नहीं लेकिन उनको भी लग गया कि सच में कुछ ज़्यादा हो गया. आत्मग्लानि से वो भी अन्यमनस्क से हो गए.
“अरे जिन लडऽ भाई आपुसे में.” मथुरा बाबु लाड़ करते हुए ठेठ ज़बान पर उतर आए.
“अइसा करते हैं कि सुबे वेला में लड़कों से करा लेते हैं ड्रामा और तीन बजे से हुरियारा फाग के लिए समाज को बुला लिया जाए.”
हेडमास्टर साहब ने कामन साल्यूशन निकाला लेकिन अब ना तो त्रिभुवन को कोई आपत्ति थी ना राधे को. तिवारी मास्टर कहीं दूर खोये खोये से थे.
“तो डन रहा ना? क्यों जनार्दन?”
मथुरा परसाद के झकझोरने पर वो जैसे जागे.
“हाँ.ठीकई है सब.देखिए संभालिए आप लोग.”
कहते हुए वो कुछ सोचते से बाहर खड़ी अपनी राजदूत मोटरसाइकिल की ओर बढ़ चले.
तो ऐसा है भैया कि प्रोग्राम हो गया फ़िक्स. लोकल कलावंतों में अग्रगण्य निरमल मास्टर और जवाहिर परसाद ने लोक नाट्य सती बिहुला के मंचन का निर्णय लिया. पात्रों का चुनाव किया जाने लगा.
‘बिहुला के रोल में सुनील.’
‘ए सुनील? लग जाओ बेटा.तुम्हीं से निभेगा बस. एतना डायलॉग किसी और से नहीं होगा डिलीवर.’
‘निरंजन! ए निरंजन पांड़े! तुम बनो बाला लखंदर’
‘तांत्रिक,इंदर सभा,धोबिन मौसी.’
‘बने अपछरा नाचे लौंडा गिरीस.क्या कमर मटकाता है!आय हाय.’
‘तनिक ढोलक की डोरी कसो बीरेन-तिरकिट धिरकिट काट के सम पर आओ.’
‘आलाप लो तो बेटा-अरे रेई रेई रेई रेई ए हां.गमक लाओ गले में गमक. समझ्यो?’
ईसरी सिंह के दालान में बैठे बैठे चौधरी देखते और कुढ़ते.
‘देखो साला रिहलसल में पोंका फ़ार रहे हैं सब. एस्टेज पर तो लीप पोत के बराबर कर देंगे. बीरेनवा साला जनम के लंठर. ठाह ठाह ढोलक पीटता है. बिना मेजन के कुकाठ. कलहकार बनते हैं निरमल. बोरेंगे इन चूतियानंदनों के साथ. सब तो सब साला बिषइया के भरोसे बैठे हैं. पीछे के परदा में गमला बराबर छेद है. अउर गाँजा चढा ले तो कहो परदा खींचे में बिहान कर दे. ना मिठाई का बयाना दिलाया है ना टेंट का ठिकाना है. मजाक में हो जाएगा सब? आंय? राम भरोसे हिंदू होटल.’
चौधरी मास्टर बेचैनी में कभी बाहर बैठते कभी अंदर लेटते.
‘ए मास्टर देखो तो कौन आ रहा है,’
ईसरी सिंह ने दातुन हिलाते हुए कहा.
‘कौन है?’
‘लगता है जनार्दन तिवारी हैं.आज इधर कइसे?’
चौधरी ने देखा तो सचमुच तिवारी मास्टर चले आ रहे थे. चौधरी उठ कर दालान के अंदर वाली खाट पर लेट गए.
‘अरे आइए आइए मास्साब. राम राम. कइसे हैं? आइए बैठिए.’
ईसरी सिंह ने खाट बिछाई.
‘सब बढ़िया ईसरी भाई. जरा चौधरी मास्टर से कुछ काम है.’
कहते कहते वो दालान में अंदर घुस गए. चौधरी अचकचा कर बैठ गए.
‘ए चौधरी भाई. कहा सुना माफ़ करिए महाराज. चलिए अभी मेरे साथ नहीं तो सब गड़बड़ा जाएगा. आपके बिना कुछ हुआ है आज तक जो आज होगा.’
‘अरे जनार्दन भाई. हम नाराज़ नहीं हैं तो मनाने माफ़ करने की क्या बात है. लेकिन हमको लगता है अब हमारा विद्यालय जवान हो गया है. बिरवा नहीं है जिसे छावा छोपा जाए. संभालिए आप लोग. बुलाएंगे तो परसादी खाने हम भी आ जाएँगे.’ चौधरी मास्टर की आँखें डबडबा आयीं थीं.
‘देखिए ऐसा ना करिए. अरे हमारा आपका बतकट अलग है लेकिन विद्यालय आपका बच्चा है. गारजिवन हैं आप.’
‘नाहीं मास्साब. हमसे अब काम होता भी नहीं. संतोष की माई की चिट्ठी आई है. सोच रहे हैं तेलारी लौट जाएँ. कुछ दोकान दौरी कर लेंगे. ठीक से गैंती पकड़ना भी सीख लेते तो नब्बे रूपए खा पी के मेहनताना मिलता. कान्ट्रैक्ट की माहटरई से तब भी जादा कमाते.’ चौधरी मास्टर का दर्द फूट फूट के बह रहा था.
‘ए चौधरी. तुम कहीं नहीं जाओगे. और सुन लो कान खोल के तुम्हारे माथे अबीर लगे बिना कोई आग फाग नहीं होगा साला.’ जनार्दन मास्टर भी अँगोछे से आँख पोंछ रहे थे.
चौधरी मास्टर ने देखा तो ख़ुद भी बहने लगे. आंसू अभी इतने महँगे नहीं हुए थे. बात बात पर कोरों से ढरक जाया करते और तमाम निशानियों के चुभते चटख रंगों को धुँधला कर जाते.
‘अरे मान भी जाओ मास्टर. छिमा बड़न को होत है छोटन को अपराध. एक दिन लाद पाथ के तो सबको चल देना है यहाँ से यार.’
अब तक ईसरी सिंह पीछे आ कर खड़े हो गए थे और चौधरी को मना रहे थे.
‘चलो उठो गिरीसा तब से बेताला नाच रहा है. मथुरा का माथा मुड़ा देगा ई लोग.’
चौधरी मास्टर उठ खड़े हुए. ढोलक धनक रहा था- ‘तकई के तक धिन मकई के लावा.’
अंदर के किता से ठिठुरती जनाना आवाज़ें पीड़िया व्रत की रस्मी कहानी तेज़ तेज़ दुहरा रही थीं.
‘एक चिरईया रन में बन में
कूटेली पीसेली आदित मनावेली.’
उगऽ हे आदित उगऽ. चिडिया रन में है बन में है. उसे कूटना है पीसना है. अब नहीं उगोगे तो कब उगोगे? बताओ. आंय?
(जारी)
बनारस से लगे बिहार के कैमूर जिले के एक छोटे से गाँव बसही में जन्मे ब्रजभूषण पाण्डेय ने दिल्ली विश्वविद्यालय से उच्चशिक्षा हासिल करने के उपरान्त वर्ष 2016 में भारतीय सिविल सेवा जॉइन की. सम्प्रति नागपुर में रहते हैं और आयकर विभाग में सेवारत हैं. हिन्दी भाषा के शास्त्रीय और देसज, दोनों मुहावरों को बरतने में समान दक्षता रखने वाले ब्रजभूषण की किस्सागोई और लोकगीतों में गहरी दिलचस्पी है.
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