चूल्हे पर एक नौजवान कायदे से लकड़ी सुलगा रहा है. बीच-बीच में उसका ध्यान कड़ाही से उठने वाले भाप पर भी जा रहा है. यह एक तरह की कला है, मैं इसे दुनिया भर की श्रेष्ठ कला में स्थान देता हूँ. यहां प्रयोजन नकद नारायण के साथ आपकी पसंद का भी है.
(Mankot Uttarakhand Food Bageshwar)
मेरे द्वारा बातचीत शुरु करने पर कोई ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है. दो-एक सवालों पर नियमित चलते हाथ रुक जाते हैं और दूसरे सहयोगी को तेजी से आवाज लगाई जाती हैं. आवाज में थोड़ा तीखापन है जिससे मुझे समझ में आता है कि मैं उनके काम में खलल डाल रहा हूँ लेकिन बेशर्मी की दीवार पार कर अगला सवाल कर बैठता हूँ- तो दाज्यू मतलब कितनी सुबह से ये कार्यक्रम शुरू कर देते हो.
साथ वाले चूल्हे पर चाय चढ़ा दी जाती है. अब शायद उसे भी एहसास हो गया कि सवाल-जवाब थोड़ा लंबे चलने वाले हैं. सामने बारिश लगी है, मैं भी सुबह तड़के 6 बजे से भीगता हुआ यहां करीब 2 घंटे में पहुंचा हूँ. चूल्हे की गर्माहट से आस-पास सामान्य बातें शुरु हो गई हैं. थोड़ा कुरेदने पर बताया गया कि रात के भिगाए भट्ट सुबह तड़के 4 बजे सिलबट्टे पर पीसने शुरू करे जाते हैं. अपने खदुवेपन की वजह से बात समझ आ गई थी कि आख़िर मिक्सर ग्राइंडर के बखत में पुरातन कालीन सिलबट्टे का प्रयोग क्यों हो रहा है.
करीब दो घंटे की मशक्कत के बाद हमारे सामने उसका नतीजा पिसी हुई दाल होती है. अब तक होटल खुलने का भी समय हो गया होता है. रानीखेत-अल्मोड़ा से चलने वाली सवारी गाड़ियां चाय-नाश्ते के लिए आने लग जाती हैं. समय होता है पिसी हुई दाल को चूल्हे के हवाले करने का. पिसी हुई दाल को बराबर कड़ाही में चलाना पड़ता है, जिससे उसमें अपने हिसाब का स्वाद पैदा किया जा सके.
(Mankot Uttarakhand Food Bageshwar)
आधे से एक घंटा चलाने के बाद इसमें डाला जाता है पानी. चूल्हे की मद्धम आंच में हमें दो चीज़े दिखती हैं. एक उस आदमी की कला साकार होते दिखती है और दूसरा उसके चेहरे पर संतोष के भाव उमड़ते हुए. गन्द्रैणी, हींग, लहसुन का छौंका एक अलग ही माहौल बना देता है. इस पूरी मेहनत के बाद मैं उस आदमी से इस भट्ट के डूबके के पकने का समय पूछता हूँ तो जवाब मिलता है- जब तक कड़ाही में एक भी चम्मच डुबके बचे हैं यह तैयार ही होती रहती है और इसका स्वाद बढ़ते रहता है. यानी सुबह की चूल्हे पर चढ़ी ये कड़ाही देर शाम को ही चूल्हे के बंद होने के समय ही नीचे उतरती हैं.
इस तरह तैयार होते हैं ‘मनकोट के भट्ट के डुबके’ जो अपने इलाके में खासा नाम रखते हैं. बागेश्वर से कोई 10-12 किलोमीटर की दूरी पर चौकोड़ी के रास्ते पर आपको मनकोट जगह पर ये 5-6 ढाबेनुमा शक्ल के होटल मिल जाएंगे जिन पर कुमाऊंनी खाने के बोर्ड आपको टांगे मिल जाएंगे. साथ में आपको मिलेगी झोई और सीज़नल सब्जी. तो जब भी इधर से गुजरें, पहाड़ का यह स्वाद लेना न भूलें.
(Mankot Uttarakhand Food Bageshwar)
–डोई पांडे
अल्मोड़ा ताड़ीखेत के रहने वाले मुकेश पांडे अपने घुमक्कड़ी धर्म के चलते डोई पांडे नाम से जाने जाते हैं. बचपन से लखनऊ में रहने के बाद भी मुकेश पांडे के दिल में पहाड़ खूब बसता है. मुकेश की यात्राओं के अनुभव उनके फेसबुक पेज डोई ठैरा यार में भी पढ़े जा सकते हैं.
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