मसूरी ने जब भी मुझे बुलाया मैंने अविलंब उसके अनुभूत सौंदर्य को पुनः अपने दृगों पर संजोया. मसूरी मोहताज कहां है प्रशंसा की? अनगिनत सैलानी आते हैं यहां दूनघाटी और शिवालिक की पहाड़ियों के प्राकृतिक सौंदर्य का रसपान करने हेतु. लंढोर बाजार, गनहिल, लालटिब्बा, नागटिब्बा, कंपनी गार्डन, कैंपटी फॉल, जार्ज ऐवरेस्ट, कैमल्स बैक रोड, मसूरी झील, भद्रज मंदिर जैसे बहुत से नयनाभिराम स्थल हैं यहां पर्यटकों के लिए. किंतु नहीं जानती कि मैं मसूरी क्यों आती हूं? क्या अपनी भौतिकता और मानसिक विचारों के बोझ को हल्का करने ? मसूरी के लिए मेरा विशेष आकर्षण है किंतु पहाड़, बादल और घाटियों के रहस्य को नहीं जानना चाहती हूं मैं वरन् मालरोड को स्वयं के भीतर समाहित करना चाहती हूं. मुझे यहां पैदल चलना, टपरी पर चाय की चुस्कियां भरना, भुट्टे खाना बहुत पसंद है. (Mussoorie Memoir by Sunita Painuli)
मेरा यह मानना है कि ज़िंदगी को समझना है तो भीड़ के बीच रहकर ही किसी एक कोने को पकड़कर शांत भाव से सड़क और उस पर बहते जीवन को पढ़ो और जो निभृत है उसे खंगालो. खंगालने और बीनने की इस प्रक्रिया में बहुत कुछ हमारे भीतर उमड़ने और कभी-कभी पिंघलने भी लगता है. सोचती हूं कितना ख़ूबसूरत है ना पहाड़ों पर रचा-बसा यह सहज जीवन? ना कहीं से शुरू करने और ना कहीं तक पहुंचने की आपाधापी. मालरोड के किनारे लगी हुई बैंच संभवतः मुझ जैसे सैलानियों के लिए ही बनी हुई हैं. कहीं पढ़ा था! “ऊर्जा वहीं बहती है जहां ध्यान जाता है” मेरा ध्यान पहले कुल्हड़ वाली चाय पर आसक्त होता है फिर चाय की उड़ती हुई भाप के धुंधलके में मालरोड की सड़कों पर उभर आयी सैकड़ों ज़िंदगियों के चेहरे-मोहरे पर. मुझे अहसास ही नहीं हो पाता है कि कब चुपचाप से मैं लोगों के मस्तिष्क की गुहा में घुसपैठ कर जाती हूं. यही नहीं, उनकी मनोवृत्ति से अपने मनोभाव मिलाती हूं और पाती हूं कि जीवन के धरातल पर हम सभी एक से ही तो हैं. ज़िंदगी से सूक्ष्म व नि:स्पृह पलायन करते फिर बैक टू पवेलियन.
मदमहेश्वर: जहां शिव की नाभि पूजी जाती है
कोई भुट्टे बेच रहा है, कोई रिक्शा चला रहा है और कोई चाय बेच रहा है. सबकी पेशानी पर जीवन का संघर्ष या स्वयं को दूसरे से सशक्त व जीवंत बनाये रखने की जद्दोजहद और हां! मालरोड पर स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने की राजनीति भी बखूबी फलती-फूलती है जब एक फल वाला दूसरे फल वाले के फल नहीं खरीदने हेतु सड़क पर चल रही भीड़ को बड़ी सफाई से इंगित करता है यह कहकर कि “फल ले.. लो, बासी, सड़े हुए फलों से बचो, “मसूरी की मालरोड जीवंत विथिका है जनजीवन की और मैं भीड़ में भीड़ की सहचर, लोकजीवन से नि:सृत किस्से, कहानियों के धागों को अपने शब्दों में बुनने वाली, मालरोड की बैंच पर बैठकर चाय की तरलता में विचारों की सघनता को आकार देना, मानवीय जीवन की गुंजलक व उनके मनोविज्ञान से पीछा छूटता ही नहीं है मेरा?
संभवतः एक रचनाकार कभी रिक्त नहीं होता उसके आसपास जो भी है उसे उत्तेजित करते हैं कि उन पर कुछ लिखा जाये. सहर्ष स्वीकार्य है यह अनुमोदन क्योंकि सड़कों पर शुन्य होकर चलना रचनाकार की नियति नहीं. चलते हुए जो भी उसे आकृष्ट व उद्वेलित करता है वह अनजाने में ही सही, ग्रहण कर लेता है. मानवीय जीवन को उसके सार्वभौम में लिखूं तो समझ पा रही हूं कि हर गतिमान क्षण ग्राहय है अत: जीवन की राह में जो भी छोटा-बड़ा दृश्यमान है उसे सहेजते हुए चलते रहो. जीवन नहीं जीवन से उपजी प्रतिक्रियाओं का आनंद लो. रास्तों के अनुभवों से मंजिल आसान हो जाती है. दरअसल हम वर्तमान की वह खेप हैं जो अपनी-अपनी ज़िंदगियों में चमकीली चीजों को जुटाते-जुटाते स्वयं को खोते जा रहे हैं. इसका निदान हम सभी के पास अपने अनुसार होना चाहिए.
देहरादून की रहने वाली सुनीता भट्ट पैन्यूली रचनाकार हैं. उनकी कविताएं, कहानियाँ और यात्रा वृत्तान्त विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.
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