फोटो : सुधीर कुमार
अस्थायी प्रवास हिमालय के चरवाहों के जीवन का अभिन्न हिस्सा होता है. ये चरवाहे पहिये की तरह साल भर मवेशियों, भेड़-बकरियों, घोड़ों, याकों और तिब्बती बकरवाल कुत्तों के साथ कभी उच्च हिमालय, कभी दूनगवार कभी नगर भाभर में घूमते हुए साल भर भ्रमणशील जीवन जीते हैं. (Male lambs castrated by Himalayan shepherds)
स्तनधारी भेड़-बकरियों की कुछ नस्लों को छोड़कर सभी वर्ष में एक या 2 शिशुओं को जन्म देती हैं. प्रजनन काल के बाद नगर भाभर प्रवास के दौरान कार्तिक मंगसीर में नये मेमनों को जन्म होता है. भेड़ के मेमने पैदा होने के 2-4 दिन बाद से ही यात्रा शुरू कर देते हैं जबकि बकरी के मेमने अमूमन 15-20 दिन बाद ही चलने की हिम्मत जुटाते हैं. थके या छोटे मेमनों के साथ इस प्रजनन काल में ही शीप डॉग के पिल्ले भी होते हैं. 22 दिनों तक आंख नहीं खुलने व चलने में असमर्थ होने पर अनाज या दैनिक रोजमर्रा के सामानों को ढोने वाली कुशल अनुभवी बकरियों व घोड़ों, याकों की पीठ पर दोनों तरफ समानांतर विभाजित करबच्छ में इन्हें डालकर लम्बी थकाऊ यात्राओं को रोज तय करना होता है. जब तक रेवड़ भाभर के मुख्य नजदीकी चरागाह तक न पहुँच जाये. यात्रा प्रवास के दौरान तीन महीने भाभर प्रवास के बाद फिर दून ग्वार मध्य हिमालय मुनस्यारी के नजदीकी चारागहों, बुग्यालों— कालामुनि, थामरी कुण्ड, ख़लिया बुग्याल, गेलगारी, मर्तोलीथौढ़, गेंयखड़क, न्योलीखान, क़वीरखान, सुदुमखान, पोटिंग ग्लेशियर होते उच्च हिमालय पर प्रवास किया जाता है. यात्रा पड़ाव के अन्य मार्ग धापा, क्वीरीजिमि, साई, पोलू, लिलम, खलकोट, नैन सिंह टॉप, बबलधार, रारगढ़ी, स्योनी होते हुए बुगड्यार तक पहुंचा जाता है. इस दौरान कई पड़ावों में सुविधा के हिसाब से रात्रि विश्राम किया जाता है.
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रिलकोट जोहार घाटी के मुहाने पर बसा एक समतल गाँव है जहाँ पर काफी तेज हवा चलती रहती है. यहाँ पर अमूमन झड़ (बारिश) के दिनों पड़ाव में आग जलाना काफी मुश्किल होता है. लेकिन मुश्किल में ही एक सच्चे, कर्मठ चरवाहे की पहचान होती है. कहावत है कि जो वास्तव में ‘शौकाक च्योल’ (मुनस्यारी के जनजाति वर्ग का उपनाम) होगा वही रिलकोट में आग जलाकर खाना बनायेगा. रिलकोट पड़ाव तक नर मेमनों की छंटनी हो जाती है. परिपक्व मादाओं से जन्मे नर मेमनों को बीज नस्ल सुधार हेतु नये नर के तौर पर चिन्हित किया जाता है बाकी लगभग 5-6 महीनों के नर मेमनों का देशी विधि से बधियाकरण किया जाता है. जिसमें चरवाहा एक तेज धार चाकू से नर मेमने के अण्डकोष की त्वचा को काटकर दोनो अंड कोष को बाहर खींचता है. इसके बाद पहले से अपने मुंह मे भरे ढेलेनुमा नमक, जो अमूमन तंबी खाने या मवेशियों को खिलाने में प्रयोग होता है, अंडकोष के अंदर थूक दिया जाता है, जिससे निकाले गये अंडकोष के किसी भाग से रक्तस्राव न हो नही कोई भाग संक्रमण से खराब हो. 1- 2 दिन में भेड़ो के झुण्ड के लगभग 200-250 नर मेमनों के बधियाकरण किया जाता है. इसके बाद नर मेमने कुछ सुस्त और घायल से हो जाते हैं पर रिलकोट की तेज हवा उनके अण्डकोष की चरकन को कम करने में सहायक होती है. इस दौरान थौढ़ (पड़ाव) में अण्डकोषों की भरमार होती है जिन्हें भूनकर खाया जाता है और राहगीरों को भी दिया जाता है. यह एक देशी पारम्परिक विधि द्वारा नस्ल सुधार हेतु नर मेमनों के बधियाकरण का तरीका है जिससे प्रजनन काल में मादा से एक स्वस्थ नर का प्रणय निवेदन हो ओर स्वस्थ मेमना पैदा हो. अमूमन एक वर्षीय नर या मादा के प्रजनन चक्र से कमजोर मेमना पैदा होता है. यही प्रक्रिया कुत्तों के साथ भी होती है. अमूमन पहले वर्ष जन्मे शिशुओं को किसी को दे दिया जाता है. इन्हें झुण्ड से बहिष्कृत भी किया जाता है जिससे यात्रा पड़ाव कष्टकारी न हो.
अगले 2-3 दिन विश्राम के बाद मर्तोली, सलांग, ग्वार, मिलम, उटाधुरा तक का उत्क्रमण प्रवास होता है. मखमली बुगी, फिजी, हम्प, आदि घास का 3 महीने सेवन कर पौष्टिकता से भरपूर जोहार प्रवास बिताने के बाद कार्तिक के दूसरे हफ्ते तक दूनग्वार निचले नजदीकी चरागाह की तरफ रवाना हो जाता है. हिमालय के चरवाहे और उनके मवेशी जन्म से मृत्यु तक यही जीवन दोहराते हैं. इन हिमालयवासियों को आपका एक अभिवादन (नमस्ते) मन से उत्साहित करता है. जब भी उधर जाएँ तो अभिवादन कर उस वीराने में चरवाहे को अपनेपन का एहसास जरूर करवाएं.
जोहार घाटी में मिलम के करीबी गांव जलथ के रहने वाले प्रयाग सिंह रावत वर्तमान में उत्तराखण्ड सरकार में सेवारत हैं. हिमालय और प्रकृति के प्रेमी प्रयाग उत्तराखण्ड के उत्पादों और पर्यटन को बढ़ावा देने के कई उपक्रमों के सहयोगी हैं.
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