फोटो: सुधीर कुमार
उत्तराखण्ड को देवभूमि भी कहा जाता है. यहाँ के उच्च हिमालयी क्षेत्र देश-विदेश में मशहूर मंदिरों से पटे हुए हैं. धर्मग्रंथों और पुराणों में ढेरों प्रसंगों में उत्तराखण्ड का जिक्र मिलता है. शिव उत्तराखण्ड में सबसे ज्यादा पाए और पूजे जाने वाले भगवान हैं. हिमालय की लगभग सभी चोटियाँ शिव से संबंधित दन्त कथाओं से जुड़ी हुई हैं. यहाँ शिव और माँ नंदा (पार्वती) के ढेरों मंदिर हैं. इनमें कुछ का महात्म्य बहुत ज्यादा है. इन्हीं में से हैं भगवान महादेव के मंदिर (Lord shiva’s Panch Kedar) पञ्च केदार.
देश भर में मौजूद 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक केदारनाथ उत्तराखण्ड में ही है. केदारनाथ से सारी दुनिया के श्रद्धालु परिचित हैं. लेकिन केदारनाथ अपने पूर्ण स्वरूप में यहाँ पंचकेदार के रूप में मौजूद हैं ऐसा कम ही लोग जानते हैं. केदार के रूप में शिव की आराधना पञ्चकेदार के बगैर पूरी नहीं मानी जाति. भगवान केदारनाथ के पूर्ण स्वरूप को पूजे जाने के लिए पंच केदार की यात्रा जरूरी है.
मान्यता है कि नेपाल स्थित पशुपतिनाथ समेत पंच केदार की यात्रा के बाद ही केदारनाथ की पूजा पूर्णता को प्राप्त करती है. केदारनाथ समेत सभी पंच केदार दुर्गम हिमालयी मार्गों से पैदल होकर जाया जाता है. केदारनाथ में रहने, खाने-पीने की उचित व्यवस्था है लेकिन अन्य में ऐसा नहीं है. स्थानीय ग्रामवासियों व मंदिर समिति के के सहयोग से ही यहाँ की यात्रा की व्यवस्थाएं संभव हो पाती हैं.
कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद अपने गुरु, कुल, ब्राह्मणों और सगोत्रीय भाइयों की हत्या के पाप के प्रायश्चित के लिए पांडव शिव की शरण में जाना चाहते थे. ऐसा करने का परामर्श उन्हें कृष्ण ने दिया था.
पांचों पांडवों ने अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को हस्तिनापुर का राजा नियुक्त किया और शिव की तलाश में निकल पड़े. शिव उनके द्वारा किये गए कृत्यों से खफा थे और उन्हें इतनी जल्दी दोषमुक्ति नहीं देना चाहते थे. जब पांडव काशी पहुंचे तो शिव उनसे बचने के लिए कैलाश पर्वत आ पहुंचे. नारद से खबर पाकर पांडव भी उनका पीछा करते हुए उत्तराखण्ड आ पहुंचे.
यहाँ पहुंचकर गुप्तकाशी में पांडवों ने देखा कि बुग्याल में एक झुण्ड में विचरते गाय-बैलों में से एक अन्य से भिन्न है. उनकी समझ में आ गया कि उन्हें चकमा देने के लिए शिव ने बैल का रूप धारण कर लिया है. पांवों द्वारा पहचाने जाने पर शिव ने वहां एक गड्ढा किया और जमीन में विलुप्त हो गए.
भगवान शिव यहाँ से केदारनाथ के बुग्यालों में जा पहुंचे. यहाँ भी बैल के रुप में विचरते शिव को पांडवों द्वारा पहचान लिया गया. अब पांडव किसी भी हाल में उनसे प्रायश्चित करना चाहते थे. इसलिए भीम ने विराट रुप धारण कर अपने दोनों पैर दो पहाड़ी धारों पर टिका दिए. वहां विचारने वाले सभी बैल भीम के दो पैरों के बीच से आगे निकल गए. लेकिन महादेव नहीं निकले. अब पांडवों को यह पक्का हो गया कि पांडव बैल के रूप में हैं. यह जानकर भगवान शिव पुनः भूमिगत हो गए. उन्हें भीम द्वारा पकड़ने की कोशिश की गयी और उनका पृष्ठ भाग यहाँ पर एक शिला के रूप में विराजमान हो गया.
मान्यता है कि बैल रूपी भगवान शिव के शरीर के विभिन्न हिस्से जिस-जिस जगह पर पुनः बाहर आये उन्हें पंच केदार माना गया. पंच केदार केदारनाथ, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, मध्यमहेश्वर और कल्पेशवर के नाम से पहचाने जाते हैं.
महादेव के बैल रूप का धड़ का ऊपरी हिस्सा नेपाल की राजधानी काठमांडू में प्रकट हुआ था. यहाँ महादेव के पशुपतिनाथ स्वरूप की पूजा की जाती है.
प्रथम केदार केदरानाथ में भगवान शिव के पृष्ठ भाग की, तुंगनाथ में भुजा, रुद्रनाथ में मुंह, मध्यमहेश्वर में नाभि और कल्पेशवर में जटाओं की पूजा-अर्चना की जाती है. यह सभी मंदिर 3500 मीटर से ज्यादा की ऊँचाई पर बसे हुए हैं. पंच केदारों का निर्माण पाडंवो द्वारा 1000 साल पहले किया बताया जाता है.
केदारनाथ मंदिर उत्तराखण्ड के गढ़वाल में केदार पर्वत पर बना हुआ है. केदारनाथ पंचकेदार होने के साथ-साथ महादेव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है. केदारनाथ का महत्त्व चार छोटे धामों में से एक होने के कारण भी है. यह देश के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है. यहाँ भगवान शिव के पृष्ठ भाग की पूजा की जाति है. इस मंदिर का निर्माण कत्यूरी शैली में किया गया है. आधुनिक इतिहास में आदि शंकराचार्य द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया था. 2013 में उत्तराखण्ड मे आयी आपदा का केंद्र केदारघाटी में होने के बावजूद इस मंदिर को आंच नहीं आने को भी एक चमत्कार के रूप में देखा गया.
केदारनाथ
मध्यहेश्वर को द्वितीय केदार माँ गया है. यहाँ महादेव के मध्य भाग की पूजा-अर्चना की जाती है. मध्यमहेश्वर चौखंबा के शिखर पर हिम से घिरी सुरम्य घाटी में बना हुआ है. पौराणिक मान्यता के अनुसार शिव-पार्वती ने यहाँ के नैसर्गिक वातावरण में ही अपनी मधुचंद्र रात्रि बितायी थी. केदारनाथ की तरह ही यहाँ भी दक्षिण भारत के शैव पुजारी पूजा-अर्चना संपन्न किया करते हैं.
मध्यमहेश्वर
तृतीय केदार तुंगनाथ दुनिया की सर्वोच्च ऊँचाई पर स्थित शिव मंदिर है. ऊंचाई 3680 मीटर है. यहाँ महादेव की भुजा की पूजा की जाती है. यहाँ मक्कूमठ के मैठाणी ब्राह्मणों द्वारा पूजा-अर्चना संपन्न करायी जाती है. यहाँ से हिमालय की चोटियों का नयनाभिराम दृश्य दिखाई देता है.
तुंगनाथ
समुद्र तल से 2286 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है चतुर्थ केदार रुद्रनाथ. यहाँ महादेव की मुख की पूजा-अर्चना की जाती है. यह दुनिया का अकेला ऐसा मंदिर है जहाँ भगवान शिव के मुखारबिंद की पूजा होती है.
रुद्रनाथ प्राकृतिक चट्टानों से बना प्राचीन मंदिर है. यह हिमालय की पहाडियों के बुग्याल और बुरांश के जंगलों से घिरा रमणीक स्थल है. रुद्रनाथ की यात्रा पंच केदारों में सबसे बीहड़ और दुरूह मानी जाती है.
रुद्रनाथ
कल्पेश्वर को कल्पनाथ नाम से भी जाना जाता है. इसके कपाट साल भर खुले रहते हैं. पंच केदारों में बाकि सभी के कपाट शीतकाल में बंद कर दिए जाते हैं और भगवान को उनके शीतकालीन प्रवास में स्थापित कर दिया जाता है. लेकिन मद्महेश्वर के कपाट साल भर खुले रहते हैं. यहाँ शिव की जटाओं की पूजा अर्चना की जाती है. किवदंती है कि यहाँ पर दुर्वासा ऋषि ने कल्पवृक्ष के नीचे शिव की तपस्या की थी. इसीलिए इसे कल्पेश्वर या कल्पनाथ के नाम से जाना जाता है. एक कथा यह भी है कि असुरों के आतंक से त्रस्त देवताओं ने यहाँ पर महादेव की स्तुति की और शिव ने उन्हें इनसे मुक्ति दिलाई.
(सभी फोटो साभार इन्टरनेट)
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