कॉलम

लोक देवता लोहाखाम

आइए, मेरे गांव के लोक देवता लोहाखाम के पर्व में चलते हैं. यह पूजा-पर्व ग्यारह-बारह साल में मनाया जाता है. लोहाखाम देवता का थान गांव से दूर जंगल में एक पहाड़ी पर स्थित है. उस जंगल में कभी हमारे पुरखों ने प्रकृति की गोद में कुछ पत्थर संजो कर लोहाखाम देवता की स्थापना की होगी. इस पूजा-पर्व के आयोजन के लिए इलाके के गांवों के सभी लोगों को न्योता दिया जाता है. तब हमारे गांव कालाआगर का हर घर मेहमानों की मेजबानी करता है और हर घर में मेहमानों के लिए खाने और रहने की व्यवस्था रहती है.
(Lohakham ke Lokdevta Memoir)

आसपास के ही नहीं दूर-दराज गांवों से भी पूजा में भाग लेने के लिए लोगों की ‘जातुरि’आती हैं. वे निशान (ध्वज) लेकर हुड़का, ढोल, नगाड़े, मशकबीन बजाते-गाते हुए आते हैं. पूजा आपस में जुड़े ढालूदार छतों वाले मकानों यानी बाली के किसी घर में होती है.

गांवों से आए हजारों लोग सारी रात ‘श्योंरात’ में भाग लेने के लिए बाखली के लंबे-चौड़े आंगन में आते हैं. वहां बांज के सूखे मोटे तने के टुकड़ों का अंगीठा धुधकाया जाता है जिसके चारों ओर रात भर डंगरिए नाचते हैं. आंगन के बाकी हिस्से में लोग गोल घेरे में बांहें थाम कर पूरी रात भ्वैनी (झोड़ा) लोकगीत गाते हैं.

चलिए, सामने भवान सिंह जी की चाख (बाहर का कमरा) में पूजा की शुरुआत हो गई है. सांझ के शुभ मुहूर्त में कमरे के पूर्वी कोने में अखंड ज्योति जला दी गई है. कैड़ागांव के जगरिया गणेश राम और ईश्वरी राम हुड़के और ढोल-दमामों के साथ तैयार बैठे हैं.

गणेशराम हुड़के पर धीरे-धीरे थपकियां देने लगे हैं –

दुम्हल्या… तुतम! दुम्हल्या… तुतुम… तुतुम… दुम्हल्या तुतुम!

सूरज पश्चिम में ऊंचे पहाड़ के उस पार उतर चुका है. संध्या झुलि आई है. दूर हिमालय से, नीली पर्वतमालाओं से, अगास से, पताल से संध्या झुलि आई है. संझबाती जग गई है. दुलैंच (आसन) बिछ गए हैं. उन पर लोहाखाम लोक देवता के पुजारी और डंगरिए विराजमान हो गए हैं. लोहाखाम के पुजारी हरीशचंद्र जी ने देवता का झगुला (चोला) पहन लिया है. लाल पटुवा (शाल) ओढ़ लिया है. सिर पर टांका (पगड़ी) बंधवा लिया है. गुरु गोरखनाथ के डंगरिया सोबन सिंह को भी पटुवा ओढ़ा कर टांका बांध दिया गया है. बाकी डंगरिए भी धोती-पटुवा पहन रहे हैं. सभी पुरोहित श्वेत-सुकीले वस्त्रों में सामने विराजमान हो गए हैं. और, अब जगरिया गणेशराम ने हुड़के की धुन पर देव स्तुति शुरु कर दी है. एक पुरोहित पिठियां-अक्षत लगा रहे हैं, दूसरे जल छिटक कर अभिषेक कर रहे हैं. खूब अगरबत्तियां जला दी गई हैं. सामने पूजा सामग्री के बीच शंख, पंचमुखी शंख, घंटा-हथौड़ी, कसासुरी थाल, ताली और नगाड़े रखे हुए हैं. पास ही चौंरीगाई की पूंछ और मोरछड़ रखी हुई है.
(Lohakham ke Lokdevta Memoir)

अब अचानक ईश्वरी और गणेश ने हुड़का छोड़ कर बड़े जोश के साथ ढोल बजाना शुरु कर दिया है- किड़…किड़…किड़…किड़! द दुंग दुंग दुंग! द दुंग दुंग दुंग !

ढोल के बोल क्या गूंजे कि गणेशराम के मुंह से भी देवताओं को न्योंतने के तेज बोल फूट पड़े हैं-

‘तबेत बाबा! महरजान को राजा, पुजी पठौंनों
पांव परदा लैनों, सिर पड़ी ढोक दिनों
औन सुर्ज, पौन पानी
धरती धरम राज, गिरी कैलाश
तबेत बाबा! ’

द दुंग… दुंग… दुंग!

डंगरिया एक-एक कर झूमने लगे हैं. लोहाखाम के पुजारी मुट्ठी भर-भर कर अक्षत लेकर चारों ओर छिटका कर दिशा मारने लगे हैं. लोहाखाम पुजारी हरीश चंद्र और डंगरिया सोबन सिंह हाथ में चौंरी गाई की पूंछ पकड़ कर, उसे झुलाते हुए लोगों को आशीर्वाद दे रहे हैं.

द दुंग… दुंग… दुंग!
द दुंग… दुंग… दुंग !

जगरिया गणेश पूरी रौ में गा रहे हैं-

“अगाश में क्व छैं? इंदर राजा
पंयाल में क्व छैं?
बैशी नाग
जैक सिर में चौंखुंडा धरती, नौखुंडा मनिमा
गैला पंयाल, ऊंचा हिवाल
चार दिशा छैं, चार भुवन छैं…”

द दुंग… दुंग… दुंग!
द दुंग… दुंग… दुंग !

कई डंगरिए थर्राने लगे हैं. भीड़ बढ़ती जा रही है. कोई जोर से कह रहा है – आब हिटा (चलो) बाहर ‘खोलिखांड़’ में.

खोलीखांड़ यानी आंगन में अंगीठे के पास खुले में पंचनाम देवों के दुलैंच (आसन) में. वहां अंगीठा धू-धू कर धुधक रहा है. जमीन पर आसन बिछ गए हैं. उन पर लोहाखाम पुजारी और गोरखनाथ जागा (मंदिर) के डंगरिए बिराजमान हो गए हैं. सामने दाहिनी ओर जगरिया गणेश और ईश्वरिया बैठ गए हैं.

द दुंग… दुंग… दुंग!
द दुंग… दुंग… दुंग!

बीच-बीच में बाजा बदल रहा है-

दनकि… दनन…
दनकि…दनन !
दनकि… दनन…
दनकि….दनन !
द दुंग… दुंग… दुंग!
द दुंग… दुंग… दुंग !

शंख भी बज रहा है- “पू ऊ ऊ ऊ ह्”

लोहाखाम पुजारी जगरियों को चौंरीगाई की पूंछ से झाड़ कर आर्शीवाद दे रहे हैं… भलो है जालो तुमरो हे गुरु! सतगुरु आदेश ! आदेश !

द दुंग… दुंग… दुंग… दुंग… दुंग!

डंगरिए मुट्ठी में अछेत (अक्षत) लेकर लोगों की ओर छिटक रहे हैं. माथे पर अछेत भरी हथेली टिका कर आशीष दे रहे है – “भलोऽ है जालोऽ है शौकारो… इनऽ मोती का दाना, त्वै हनऽ दयालि है जालाऽ… आदेश! गोठ माई, पांड़ा माई, सबों कै भलऽ है जालो… आदेश!

अंगीठा धुधक रहा है. डंगरिए नाचते जा रहे हैं. चारों ओर, यहां तक कि मकानों की छत पर भी भारी भीड़ जमा है.

भीड़ बीच-बीच में जयकारा लगा रही है… लोहाखाम देवता की जै! भगवती माता की जै! अब तक सत्रह डंगरिए नाच चुके हैं.

द दुंग दुंग दुंग!
द दुंग दुंग दुंग!

‘पू ऊ ऊ ऊ ह’ शंख बज रहा है. कसासुरी थाल झन्न्ऽ झनझना रहा है. भ्वां करके पंचमुखी शंख बज उठा है. ताली की खिन-खिन के साथ ही घंटियां टुन-टुना रही हैं. बीच-बीच में घंटे की टन्न… टन्न आवाज सुनाई दे रही है. डंगरिए रात भर नाचेंगे.
(Lohakham ke Lokdevta Memoir)

रात का दूसरा पहर है. इधर अंगीठे के चारों ओर डंगरियों के नाचने की धुरमंडल मची हुई है तो उस पार आंगन से लोकगीतों की आवाजें आ रही हैं –

दानि शौकाऽ
दानिपुरै को दानि पीपल, बालिपाऽ
दानि शौका, सबौं हन दयालि है जौ बालिपाऽ
लोपचुली-लोखाम सा बालिपा!

बाहर जयकारा लग रहा है – “लोपचुली-लोहाखाम देवता की जै! सच्चे दरबार की जै! पंचनाम देवों की जै!”

झमाझम वर्षा बरसने लगी थी जो अब कुछ कम हो गई है. पुजारी जी ने जगरियों से कह दिया है – “चलो, चलते हैं. हलकी वर्षा तो चलती रहेगी.”

गणेश और ईश्वरी ने हाथ जोड़ कर ढोल पर बाजा बदल दिया है –

किड़ किड़ किड़ किड़ किड़!
द धंग, द धंग!
द दुंग दुंग दुंग!
द दुंग दुंग दुंग!

गणेश जोर-शोर से बिनती कर रहा है –

तबेत बाबा!
क्षीर सागर छैं
जै में बिश्नु अवतार छैं
जैकी नाभी में अमरित छ
नाभी नली बटी, पैद बनिगीं सुर्ज कमल
सुर्ज कमल में सतजुगी ब्रह्मा छैं…

डंगरिए नाच रहे हैं. बाहर बहुत हलकी वर्षा जारी है. लोहाखाम के पुजारी को कंधों पर बिठा कर मंदिर तक ले जाने के लिए सजी-धजी चौकी आ चुकी है. पुजारी चौकी में बैठ गए हैं और चार लोगों ने उन्हें चौकी सहित कंधों पर उठा लिया है और वे नंगे पैर चल पड़े हैं जंगल में लोहाखाम मंदिर की ओर.

पू ऊ ऊ ऊ ह!
द, डिंग डिंग डिंग!
द, डिंग डिंग डिंग!

पीछे-पीछे डंगरिए और लोगों की लंबी कतार और उनका जयकारा-लोहाखाम देवता की जै! बांज-बुरोंज के जंगल के पार लोहाखाम मंदिर दिखने लगा है. बीच-बीच में वर्षा की छमक भी आती जा रही है.

डोला लोहाखाम मंदिर की धार में पहुंच गया है. वर्षा की हलकी फुहारों के बीच जयकारे के साथ चौकी लोहाखाम मंदिर के चबूतरे पर उतार दी गई है. पूजा अनुष्ठान शुरू हो गया है. उधर हुड़का, मशकबीन की धुनों के साथ गाते-बजाते, नाचते लोग आते जा रहे हैं.
(Lohakham ke Lokdevta Memoir)

पूजा अनुष्ठान पूरा हो गया है. लोग मंदिर में खा-पी कर लौट रहे हैं. शाम से ही मशकबीनों, हुड़कों, ताली और बांसुरी की धुन पर लोकगीत गाए जाने लगे हैं. घर भीतर पूजा भी शुरु हो गई है. जगरिया गणेशराम और ईश्वरीराम के ढोल के बोल बज उठे हैं-

किन किन किन…द धंग! द धंग!

गणेशराम गरज उठा है – “भोर भाब्बा!” और बिनती गाने लगा है –

“तैंतीस करोड़ द्याप्तां कैं न्योंत पड़िगै
तब सतजुगी ब्रह्मा ले
यश्मीर यज्ञ सुजै
जैलि सुजै चार धाम, चार खाम! भोर भाब्बा…

रात का समय है.

डंगरिया नाचते-नाचते बाहर ‘खोलीखांड’ (आंगन) में आ गए हैं. अंगीठे की धूनी के चारों ओर नाचने लगे हैं. लोगों की भारी भीड़ जमा है.

द दुंग दुंग दुंग!
द दुंग दुंग दुंग!

डंगरिए अक्षतों से दिशाएं साध रहे हैं. फलों और अक्षतों की भेंट देते हुए आशीर्वचन कह रहे हैं….“इनों हन दयालि हैऽ जाला… ”.

वे चौंरीगाई की पूंछ से दुःख-तकलीफ, रोग- शोक झाड़ रहे हैं. तसले में से गेहूं लेकर चारों ओर छिटकते हुए ‘ताड़’ मारने लगे हैं. बाजे बज रहे हैं –

पू ऊ ऊ ऊ ह !
टन्न् टन्न् ! झन्न् !
टिन-टिन, टुनटुन!
द दुंग दुंग दुंग!
द दुंग दुंग दुंग!

गणेश और ईश्वरीराम के हाथ ढोल पर बिजली की गति से चल रहे है –

द दुमलि दुमलि दुमलि दुंग!
द दुमलि दुमलि दुंग! द दुमलि दुमलि दुंग!

बगल में बैठा आदमी मुझे बता रहा है, “ताड़ मारने के बाद जितना गेहूं बचेगा, जगरियों को ही दान दे दिया जाएगा. दोनों को एक-एक क्विंटल से तो बाकी ही मिलेगा.”

धीरे-धीरे डंगरिए शांत हो रहे हैं. बाजा थम रहा है. गुड़ और घी की ‘शिरनी’ बांटी जा रही है. प्रसाद के रूप में दूध और चावल का बना ‘खिर-खाजा’ बंट रहा है.

सिरखुरी के भोज में हलुवा, पूरी, पुए, सब्जी और बलि के बकरों का पका मांस परोसा जा रहा है. शाकाहारी लोग शाकाहार कर रहे हैं. खाना खाने के बाद लोग लोकगीत गाने में जुट गए हैं. तीन दिन से थके-थकाए लोग आषाढ़ के बादलों को देख कर बारिश का अनुमान लगा रहे हैं. हम भी आकाश की थाह लेकर लौट रहे हैं.

देवेन्द्र मेवाड़ी

वरिष्ठ लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी के संस्मरण और यात्रा वृत्तान्त आप काफल ट्री पर लगातार पढ़ते रहे हैं. पहाड़ पर बिताए अपने बचपन को उन्होंने अपनी चर्चित किताब ‘मेरी यादों का पहाड़’ में बेहतरीन शैली में पिरोया है. ‘मेरी यादों का पहाड़’ से आगे की कथा उन्होंने विशेष रूप से काफल ट्री के पाठकों के लिए लिखना शुरू किया है.

इसे भी पढ़ें: ले कावा दै मैं कें दे भलि-भलि ज्वै

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

Premium Service Tier Spinsy Casino verhoogt de kwaliteit van de klantenservice in België

Bij het onderzoeken van de Premium Service Tier die casino spinsy welkomstbonus heeft gelanceerd, wordt…

10 hours ago

Navigating Neosurf Payments Changes the Way Aussies Play Online Casinos

Neosurf’s payment system offers Australian players a straightforward and secure option when engaging with online…

11 hours ago

Test Post Created

Test Post Created

11 hours ago

Wingaga iOS – kompletní průvodce, bonusy, platby a bezpečné hraní

Wingaga iOS – kompletní průvodce pro české hráče Co je Wingaga iOS a proč si…

11 hours ago

Hodnocení Plinko – bezpečnostní průvodce

Hodnocení Plinko – praktický průvodce pro české hráče Co je Plinko a jak funguje? Plinko…

11 hours ago

Inscription sur 1Win en Côte d’Ivoire : guide complet et avis approfondi

Inscription sur 1Win : Guide complet pour les joueurs ivoiriens Pourquoi choisir 1Win ? 1Win…

11 hours ago